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देशभर के टूर ऑपरेटरों ने देखी छत्तीसगढ़ की अनोखी झलक

रायपुर विभिन्न राज्यों से आए टूर ऑपरेटरों और ट्रैवल एजेंट्स ने बस्तर, मैनपाट और जशपुर के प्रमुख पर्यटन स्थलों का भ्रमण किया छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों के व्यापक प्रचार-प्रसार और राज्य की प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक धरोहर को देश-दुनिया तक पहुंचाने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड द्वारा आयोजित फेम (FAM) ट्रिप के अंतर्गत देश के विभिन्न राज्यों से आए टूर ऑपरेटरों और ट्रैवल एजेंट्स ने बस्तर, मैनपाट और जशपुर के प्रमुख पर्यटन स्थलों का भ्रमण किया। इस दौरान प्रतिनिधियों ने छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, जनजातीय संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहर को करीब से देखा और उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। फेम ट्रिप के दौरान प्रतिनिधियों को बस्तर जिले के विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात का भ्रमण कराया गया, जहां उन्होंने प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया साथ ही बोटिंग भी कराई गई, जिसने उनके अनुभव को और रोमांचक बना दिया। इसके साथ ही प्रतिनिधियों ने चित्रकोट स्थित प्राचीन शिव मंदिर के दर्शन भी किए। बस्तर की जीवंत लोक संस्कृति से परिचित कराने के लिए प्रतिनिधियों को यहां के प्रसिद्ध हाट-बाजार भी ले जाया गया, जहां उन्होंने पारंपरिक मुर्गा लड़ाई जैसे स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों को देखा और बस्तर की विशिष्ट जनजातीय परंपराओं को समझा। इस भ्रमण के दौरान प्रतिनिधियों को ऐतिहासिक नगरी बारसूर भी ले जाया गया, जहां उन्होंने प्रसिद्ध बत्तीसा मंदिर और भगवान गणेश की अद्भुत एवं प्राचीन मूर्तियों का अवलोकन किया। इन ऐतिहासिक धरोहरों ने प्रतिनिधियों को छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया। फेम ट्रिप के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने बस्तर संभाग के प्रशासनिक अधिकारियों से भी मुलाकात की। प्रतिनिधियों ने बस्तर के कमिश्नर, आईजी और एसपी से भेंट कर क्षेत्र में पर्यटन विकास, सुरक्षा व्यवस्था और पर्यटन सुविधाओं पर चर्चा की। अधिकारियों ने उन्हें आश्वस्त किया कि बस्तर क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। इसी क्रम में प्रतिनिधियों को मैनपाट के खूबसूरत पर्यटन स्थलों का भी भ्रमण कराया गया। यहां उन्होंने करमा एथेनिक रिजॉर्ट और सैला रिसोर्ट का दौरा किया तथा मैनपाट की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण का अनुभव किया। इसके अलावा प्रतिनिधियों को कुनकुरी स्थित गिरजाघर, जशपुर का राजपुरी जलप्रपात तथा केरे विलेज जशपुर में स्थित महुआ होमस्टे जैसे आकर्षक पर्यटन स्थलों से भी परिचित कराया गया। इन स्थलों ने छत्तीसगढ़ के इको-टूरिज्म और ग्रामीण पर्यटन की संभावनाओं को उजागर किया। छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड द्वारा आयोजित यह फेम ट्रिप 13 मार्च से 18 मार्च तक आयोजित की जा रही है, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए लगभग 28 टूर ऑपरेटर और ट्रैवल एजेंट्स शामिल हैं। इन प्रतिनिधियों को दो समूहों में विभाजित कर राज्य के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों के प्रमुख पर्यटन स्थलों का भ्रमण कराया जा रहा है। इस पहल के माध्यम से छत्तीसगढ़ सरकार और पर्यटन बोर्ड का उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों के टूर ऑपरेटरों को राज्य की पर्यटन संभावनाओं से सीधे परिचित कराना है, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों का प्रचार-प्रसार कर सकें। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री  राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड राज्य के पर्यटन को नई पहचान दिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। पर्यटन बोर्ड के अध्यक्ष  नीलू शर्मा तथा प्रबंध संचालक  विवेक आचार्य के नेतृत्व में राज्य में पर्यटन सुविधाओं के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए कई नवाचार किए जा रहे हैं। इस फेम ट्रिप से जुड़े प्रतिनिधियों ने छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विविधता और यहां के लोगों के आत्मीय आतिथ्य की सराहना करते हुए कहा कि राज्य में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं और वे अपने-अपने राज्यों में छत्तीसगढ़ को एक आकर्षक पर्यटन गंतव्य के रूप में बढ़ावा देंगे। फेम ट्रिप का समापन 18 मार्च को रायपुर में आयोजित कार्यक्रम के साथ होगा, जहां दोनों समूहों के प्रतिनिधि एकत्रित होंगे और छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड की ओर से राज्य की पर्यटन संभावनाओं पर विस्तृत प्रस्तुति दी जाएगी। इस पहल से आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के पर्यटन को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी।

वित्तीय वर्ष के अंतिम दिनों में भी खुले रहेंगे पंजीयन कार्यालय अवकाश के दिनों पर भी मिलेगी पंजीयन की सुविधा

रायपुर, राज्य के आम नागरिकों को पंजीयन संबंधी कार्यों में किसी प्रकार की असुविधा न हो और वित्तीय वर्ष 2025-26 के अंतिम दिनों में पंजीयन कार्यों का सुचारू एवं समयबद्ध निष्पादन सुनिश्चित किया जा सके, इसके लिए छत्तीसगढ़ शासन ने महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इसके तहत राज्य के सभी पंजीयन (स्टाम्प दस्तावेज) कार्यालय चयनित अवकाश दिवसों में भी संचालित (खुले) किए जाएंगे। जारी निर्देशों के अनुसार प्रदेश के सभी पंजीयन कार्यालय 22 मार्च, 28 मार्च, 29 मार्च तथा 31 मार्च 2026 को भी सामान्य कार्यदिवसों की तरह खुले रहेंगे। इन तिथियों में दस्तावेजों के पंजीयन सहित अन्य सभी संबंधित सेवाएं नियमित रूप से उपलब्ध रहेंगी।        शासन के इस निर्णय का उद्देश्य नागरिकों को अतिरिक्त सुविधा प्रदान करना है, ताकि वे अपने लंबित पंजीयन कार्यों को समय पर पूरा कर सकें। विशेष रूप से वित्तीय वर्ष की समाप्ति के मद्देनज़र इन दिनों में पंजीयन कार्यों की बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए यह व्यवस्था की गई है। राज्य सरकार ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे इस विशेष सुविधा का अधिकतम लाभ उठाते हुए निर्धारित तिथियों में अपने पंजीयन संबंधी कार्यों का निष्पादन कराएं, जिससे अनावश्यक भीड़ और अंतिम समय की परेशानी से बचा जा सके।

धान के बजाय मक्का से बढ़ा मुनाफा : किसान मालती मोहन बने उन्नत खेती की मिसाल किसान मालती मोहन

रायपुर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम जशपुर जिले के पत्थलगांव विकासखंड अंतर्गत ग्राम काडरो के किसान श्री मालती मोहन के रूप में सामने आया है। पूर्व में ग्रीष्मकालीन धान की खेती करने वाले कृषक श्री मालती मोहन ने इस बार कृषि विभाग के मार्गदर्शन में बदलाव करते हुए 2 एकड़ भूमि में मक्का फसल की खेती की। इस नवाचार से उन्हें बेहतर उत्पादन के साथ 88 हजार 200 रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई। किसान ने बताया कि मक्का की खेती में कुल 11 हजार 800 रुपये का खर्च आया, जिसमें बीज, खाद और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं शामिल हैं। मक्का की बिक्री से उन्हें लगभग 1 लाख रुपये की आय हुई, जिससे अच्छी-खासी शुद्ध कमाई संभव हो सकी। उन्होंने बताया कि धान की तुलना में मक्का की खेती में कम पानी और कम लागत लगती है, जबकि लाभ अधिक प्राप्त होता है। श्री मालती मोहन ने बताया कि ग्रीष्मकालीन धान की खेती में अधिक पानी की आवश्यकता होती है और लागत भी ज्यादा आती है, जबकि मक्का एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आया है। इस बदलाव से न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई है, बल्कि जल संरक्षण के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिला है। किसान ने इस पहल के लिए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का आभार व्यक्त किया है। उनकी यह सफलता अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है, जो अब धान के स्थान पर वैकल्पिक फसलों की खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

क्षेत्रीय भाषाओं में भी विज्ञान के अध्ययन और रिसर्च पेपर लाने की आवश्यकता- उपमुख्यमंत्री शर्मा

रायपुर उपमुख्यमंत्री  विजय शर्मा अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, नया रायपुर (IIIT-NR) में आयोजित 21वें छत्तीसगढ़ युवा वैज्ञानिक सम्मेलन (सीवाईएससी–2026) का शुभारंभ आज उपमुख्यमंत्री  विजय शर्मा ने किया। दो दिवसीय इस सम्मेलन का संयुक्त आयोजन छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा ट्रिपलआईटी नया रायपुर द्वारा किया जा रहा है।       उपमुख्यमंत्री  विजय शर्मा ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि राज्य के विकास में विज्ञान, नवाचार और शोध की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने अपने छात्र जीवन और विज्ञान अध्ययन की यादें साझा करते हुए कहा कि विज्ञान पढ़ने से पहले मुझे अंग्रेजी पढ़नी पड़ती थी जिसके कारण कई लेक्चर मैंने छोड़ दिए पर धीरे धीरे सब सिख गया, आज जो रिसर्च पेपर आए हैं सभी अंग्रेजी में है और शायद परंपरागत शायद अंग्रेजी में ही होते हैं पर हमें अब क्षेत्रीय भाषाओं में भी विज्ञान के अध्ययन और रिसर्च पेपर लाने की आवश्यकता है ताकि एक ग्रामीण परिवेश का व्यक्ति भी ज्ञान अर्जित कर सके इस पर ध्यान देना चाहिए।      उन्होंने भारत में विज्ञान के उद्भव पर चिंतन करते हुए कहा कि विभिन्न विषयों पर भारत के मनीषियों एवं ऋषियों ने उस समय कितने चिंतन कर लिए थे जो आज भी चिंतन का विषय है। किसी एक विषय को समझने के लिए आप प्रायोगिक तरीकों से भी जा सकते हैं और वैचारिक तरीकों से भी जा सकते हैं पर आपको उस विषय को समझना है तो प्रायोगिक के साथ वैचारिक तरीकों का समावेश आवश्यक है। आर्यभट्ट जी ने जो किताब लिखी तो चार भागों में उसमें तीन सूत्र दिए जिनमें न्यूटन के तीन नियमों के संबंध में जानकारी प्राप्त हो जाती है।        उन्होंने कहा कि हमारे छत्तीसगढ़ के यंग साइंटिस्ट के द्वारा प्रस्तुत किए गए 194 पेपर्स को जांचने के लिए देश भर से जो हमारे 45 परीक्षक आए हैं मैं उनका हृदय से आभार करना चाहता हूं। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ की सरकार ने राज्य में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करने के लिए शोधकर्ताओं को भारत के विज्ञान तीर्थों का दर्शन कराने के लिए विज्ञान तीर्थ दर्शन योजना शुरू की जा रही है। जिसमें विज्ञान के विद्यार्थी सीवी रमन, शांति स्वरूप भटनागर, बीरबल साहनी, जगदीश चंद्र बोस, डॉ. होमी जहांगीर भाभा, विक्रम सारा भाई, सत्येंद्रनाथ बोस, हरगोविंद खुराना, सुब्रमण्यम चंद्रशेखर, अबुल कलाम आजाद जैसे भारत के महान वैज्ञानिकों के कार्यस्थल को जाकर देख सकेंगें और विज्ञान के अनुसंधानों की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।         प्रमुख सचिव  सोनमणि बोरा ने अपने संबोधन में कहा कि ने छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा समर्थित विभिन्न योजनाओं और शोध परियोजनाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि राज्य शासन किस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान अनुदान और तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है।         इस अवसर पर प्रो. ओम प्रकाश व्यास ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि ट्रिपल आईटी नया रायपुर में इस सम्मेलन का आयोजन संस्थान की शोध एवं नवाचार को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि विज्ञान के बदलते स्वरूप और 'इंटरडिसिप्लिनरी' सहयोग पर जोर दिया। उन्होंने उपमुख्यमंत्री से अनुरोध किया कि वर्तमान में युवा वैज्ञानिक कांग्रेस में 20 विषय श्रेणियाँ निर्धारित हैं। 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरविषयी अनुप्रयोग' को 21वीं श्रेणी के रूप में जोड़ा जाए, ताकि उभरती डिजिटल तकनीकों में युवा प्रतिभाओं को विशेष मंच मिल सके।"        छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के महानिदेशक  पी. कवीश्वर ने कहा कि छत्तीसगढ़ युवा वैज्ञानिक सम्मेलन राज्य की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य युवा वैज्ञानिक प्रतिभाओं की पहचान कर उन्हें प्रोत्साहित करना और गुणवत्तापूर्ण शोध को बढ़ावा देना है। प्रो. एस. के. पांडेय ने कहा कि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की भूमिका वैज्ञानिक सोच विकसित करने और गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान को प्रोत्साहित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम में प्रमुख सचिव  सोनमणि बोरा, महानिदेशक, छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद  पी. कवीश्वर, पूर्व कुलपति पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय प्रो. एस. के. पांडेय तथा कुलपति एवं निदेशक ट्रिपल आई टी नया रायपुर प्रो. ओम प्रकाश व्यास  उपस्थित रहे।       इस सम्मेलन में ऑनलाइन सबमिशन पोर्टल के माध्यम से कुल 194 शोध-पत्र प्राप्त हुए, जो देश भर के युवा शोधकर्ताओं ने अपने शोध-पत्र 20 विविध वैज्ञानिक विषयों में प्रस्तुत किए हैं। इस दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान स्वीकृत शोध-पत्रों को उनके संबंधित विषय-क्षेत्र में विशेषज्ञों के पैनल के समक्ष प्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे शोधार्थियों को अपने कार्य पर विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और सुझाव प्राप्त होंगे। निर्णायकगण विभिन्न विषय-धाराओं में प्रस्तुत शोध-पत्रों का मूल्यांकन कर प्रत्येक क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्र का चयन करेंगे। इसके माध्यम से उभरते हुए युवा वैज्ञानिकों की पहचान कर उन्हें आगे के मार्गदर्शन, परामर्श और शोध के अवसरों के लिए प्रोत्साहित एवं सम्मानित किया जाएगा।        सम्मेलन के समापन समारोह में 18 मार्च को मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय भी शामिल होंगे। इस अवसर पर वे विभिन्न विषय-धाराओं में चयनित सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्र प्रस्तुत करने वाले युवा वैज्ञानिकों को सम्मानित करेंगे और उन्हें पुरस्कार प्रदान करेंगे। इस समारोह में इटली की प्रतिष्ठित कंपनी स्मार्ट मी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. एंजेलो ज़ाइया भी शामिल होंगे।

कृषि विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों एवं वैज्ञानिकों के लिए ए आई पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण प्रारंभ

रायपुर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में शिक्षण एवं अनुसंधान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीकों के प्रभावी उपयोग पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। कृषि महाविद्यालय रायपुर में 16 से 20 मार्च तक आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की विभिन्न प्रविधियों एवं उपकरणों का प्रभावी उपयोग कर इन क्षेत्रों में उत्कृष्टता हासिल करने के गुर सिखाये जा रहे हैं। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित 17 महाविद्यालयों के प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं।  प्रशिक्षण कार्यक्रम में आई.आई.टी. भिलाई, आई.आई.आई.टी. नया रायपुर, एन.आई.टी. रायपुर, आई. आई. एम. रायपुर, हिदायतुल्लाह नेशनल लॉ यूनिर्वसिटी नया रायपुर, गुरू घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर, आई.सी.ए.आर. – नार्म हैदराबाद तथा आई.सी.ए.आर – एन.आई.बी.एस.एम. बरोण्डा जैसे राष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षणार्थियों को कृषि शिक्षा अनुसंधान में आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस की विभिन्न टेकनिक्स एवं टूल्स के प्रभावी उपयोग के बारे में मार्गदर्शन दिया जा रहा है। इस पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ इदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने किया।  इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.), भिलाई के निदेशक डॉ. राजीव प्रकाश तथा आई.सी.ए.आर.-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान (एन.आई.बी.एस.एम.) बरोण्डा के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। इस अवसर पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. कपिलदेव दीपक सहित कृषि विश्वविद्यालय के निदेशकगण तथा विभिन्न महाविद्यालयों के अधिष्ठातागण उपस्थित थे।     प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने कहा कि विगत कुछ वर्षों में हमारे जीवन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग निरंतर बढ़ता जा रहा है और अब यह हमारी सामान्य दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया है। उन्होंने कहा विशेषकर उच्च शिक्षा अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने अहम योगदान दिया है। यह शिक्षण, शोध और अकादमिक कार्यों को अधिक प्रभावी बना रही है। डॉ. चंदेल ने कहा कि कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान के क्षेत्र में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कृषि शिक्षा जैसे पेशेवर क्षेत्रों में ए आई का उपयोग शिक्षण गुणवत्ता, नवाचार और शोध को बेहतर बनाने के लिए अनिवार्य हो गया है। उन्होंने कहा कि इस पांच दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को पाठ योजना निर्माण, पाठ्य सामग्री निर्माण, मूल्यांकन आदि शिक्षण संबंधी कार्यों तथा शोध लेखन, साहित्य समीक्षा, संदर्भ प्रबंधन आदि शोध संबंधी कार्यों के संबंध में विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत जानकारी दी जाएगी।  इस प्रशिक्षण में प्रतिभागी अपनी कक्षाओं, प्रयोगशाला तथा शोध कार्यों में विभिन्न ए आई तकनीक एवं टूल्स का प्रभावी उपयोग करना सीखेंगे जिससे उनकी कार्यक्षमता और नवाचार क्षमता वृद्धि होगी। आई.आई.टी. भिलाई के निदेशक डॉ. राजीव प्रकाश ने इस अवसर पर कहा कि कोविड काल से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग बढ़ने लगा है। कोविड के दौरान आई.आई.टी. कानपुर ने विभिन्न ए आई टूल्स का उपयोग कर कोविड के केसेस के प्रतिदिन के आकड़ों तथा उसके पीक पीरियड के बारे में सटीक पूर्वानुमान जारी किए थे। उन्होंने कहा कि कृषि के क्षेत्र में भी ए आई तकनीक का उपयोग कर किसानों के लिए मौसम संबंधी पूर्वानुमान तथा कृषि सलाह उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि विभिन्न ए आई टूल्स के माध्यम से वर्षा जल एवं उपलब्ध भूजल के आंकड़ों का उपयोग कर किसानों के लिए उपयुक्त फसलों का चयन किया जा सकता है। इसके साथ ही विगत वर्षों में घटित कीट-बीमारियों के प्रकोप तथा वर्तमान जलवायविक परिस्थितियों का अध्ययन कर फसलों को कीटों एवं बीमारियों के प्रकोप से बचाया जा सकता है।  इसी प्रकार फसल उत्पादन एवं इनके विक्रय हेतु भी ए आई टूल्स का उपयोग किया सकता है। एन.आई.बी.एस.एम. के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने भी प्रतिभागियों को संबोधित किया। एन.आई.टी. रायपुर के निदेशक डॉ. एन.वी. रमन्ना ने भी प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। गौरतलब है कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम दो प्रमुख घटकों में आयोजित किया गया है। पहला घटक नव नियुक्त संकाय सदस्यों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य उन्हें विश्वविद्यालय की दृष्टि, मिशन और शैक्षणिक ढांचे से परिचित कराना है। दूसरा घटक शिक्षण एवं अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर प्रशिक्षण है, जिसके माध्यम से प्रतिभागियों को आधुनिक ए आई टूल्स और तकनीकों से परिचित कराया जाएगा, ताकि वे इनका प्रभावी उपयोग कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, विस्तार गतिविधियों तथा अनुसंधान कार्यों में कर सकें। इन पाँच दिनों के दौरान विशेषज्ञ व्याख्यान, विचार-विमर्श तथा प्रायोगिक सत्रों के माध्यम से प्रतिभागियों को आधारित शिक्षण एवं अनुसंधान की नवीनतम प्रवृत्तियों से अवगत कराया जाएगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम की संयोजक कृषि महाविद्यालय रायपुर की अधिष्ठाता डॉ. आरती गुहे हैं।

प्रदेश में एलपीजी आपूर्ति सुचारु:कमर्शियल उपभोक्ताओं के लिए प्राथमिकता आधारित वितरण व्यवस्था लागू

रायपुर  खाद्य सचिव मती रीना बाबा साहेब कंगाले के दिशानिर्देश पर छत्तीसगढ़ में निर्बाध एलपीजी आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ कमर्शियल गैस कनेक्शन वाले संस्थानों एवं प्रतिष्ठानों के लिए संतुलित और प्राथमिकता आधारित वितरण व्यवस्था केंद्रीय पेट्रोलियम एवं नैसर्गिक गैस मंत्रालय के अधीन लागू करने का निर्णय लिया गया है। खाद्य सचिव मती रीना कंगाले ने कहा कि प्रदेश में घरेलू एलपीजी की आपूर्ति सुचारु रूप से जारी रहे और आम उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि भारत सरकार एवं ऑयल कंपनियों के दिशा-निर्देशों के अनुरूप कमर्शियल उपभोक्ताओं को विगत माहों की खपत के आधार पर अधिकतम 20 प्रतिशत की सीमा के अंदर एलपीजी प्रदाय करने पर सहमति बनी है। कमर्शियल एलपीजी की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए आवश्यक सेवाओं को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया गया है। इसके तहत शैक्षणिक संस्थानों एवं चिकित्सालयों के साथ-साथ सैन्य एवं अर्द्धसैन्य कैंप, जेल, हॉस्टल, समाज कल्याण संस्थान, रेलवे एवं एयरपोर्ट कैंटीन को पूर्ण प्राथमिकता देते हुए 100 प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। वहीं शासकीय कार्यालयों, सार्वजनिक उपक्रमों एवं उनके गेस्ट हाउस और कैंटीन के लिए 50 प्रतिशत, पशु आहार उत्पादक संयंत्र एवं बीज उत्पादक इकाई  तथा रेस्टोरेंट एवं होटल के लिए 20 प्रतिशत आपूर्ति निर्धारित की गई है। उन्होंने कहा कि कमर्शियल एलपीजी के वितरण की दैनिक समीक्षा ऑयल कंपनियों द्वारा की जाएगी तथा इसकी जानकारी प्रतिदिन खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग को उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी एवं प्रभावी बनी रहे।  खाद्य सचिव मती रीना बाबासाहेब कंगाले ने कहा कि आम नागरिकों को निर्बाध एलपीजी आपूर्ति उपलब्ध कराने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है और यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि आवश्यक सेवाओं पर किसी प्रकार का प्रभाव न पड़े, साथ ही सभी वर्गों तक संतुलित रूप से गैस की उपलब्धता बनी रहे।  

बूझमाड़ की बेटी वनिता नेताम ने रचा इतिहास: ‘आदि पर्व 2026’ में वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ नाम

रायपुर अबूझमाड़ की बेटी वनिता नेताम ने ‘आदि पर्व 2026’ में रचा इतिहास नवा रायपुर स्थित आदिवासी संग्रहालय में 13 एवं 14 मार्च 2026 को आयोजित ‘आदि पर्व 2026’ में छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की भव्य झलक देखने को मिली। इस आयोजन में प्रदेश की विभिन्न जनजातियों के प्रतिभागियों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा, लोक नृत्य, गीत और सांस्कृतिक परंपराओं की आकर्षक प्रस्तुति दी। इस कार्यक्रम में नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र से शामिल हुई प्रतिभागी वनिता नेताम ने पारंपरिक जनजातीय वेशभूषा में मंच पर अपनी संस्कृति की शानदार प्रस्तुति दी। उनकी पारंपरिक पोशाक और आभूषणों ने कार्यक्रम में विशेष आकर्षण पैदा किया और उपस्थित दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कार्यक्रम के दौरान आयोजित ट्राइबल अटायर शो को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। इस ऐतिहासिक उपलब्धि में भाग लेकर वनिता नेताम ने भी अपना नाम वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराया, जो नारायणपुर जिले और अबूझमाड़ क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है। आदि पर्व 2026 का आयोजन आदिवासी संस्कृति, परंपरा और विरासत को संरक्षित करने तथा उसे देश-दुनिया तक पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया। इस मंच के माध्यम से जनजातीय समाज की समृद्ध परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को व्यापक पहचान मिल रही है।

बोधघाट का भविष्य: नक्सल खत्म होते ही जंगल आधारित अर्थव्यवस्था में आ सकता है बड़ा बदलाव

जगदलपुर बस्तर के जंगलों में इन दिनों महुआ की खुशबू फैली हुई है। सुबह होते ही आदिवासी महिलाएं और बच्चे टोकरी लेकर पेड़ों के नीचे गिरे फूल बीनने निकल पड़ते हैं। यही महुआ कई परिवारों के लिए नकदी का बड़ा सहारा है। कुछ महीनों बाद बारिश आएगी और खेतों में धान, कोदो व कोसरा बोया जाएगा। फसल कटते ही खेत फिर खाली हो जाएंगे और ग्रामीणों के हाथ भी। यही कारण है कि प्रकृति से संपन्न होने के बावजूद बस्तर का बड़ा हिस्सा आज भी आर्थिक रूप से कमजोर बना हुआ है। दरअसल यहां की खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। बरसात खत्म होते ही खेत सूख जाते हैं और सिंचाई के अभाव में खेती रुक जाती है। ऐसे में ग्रामीणों की आय का बड़ा हिस्सा महुआ, तेंदूपत्ता और अन्य लघु वनोपज पर टिका रहता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की यही कमजोरी लंबे समय तक इस इलाके में माओवादी प्रभाव के फैलने की एक बड़ी वजह बनी। ऐसे में दक्षिण बस्तर की जीवनरेखा कही जाने वाली इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित बोधघाट परियोजना को इस स्थिति को बदलने वाली योजना के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह परियोजना जमीन पर उतरती है तो बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे जिलों में करीब सात लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई मिल सकती है। इससे खेती की तस्वीर बदलने के साथ-साथ उस ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा मिल सकती है, जिसने कभी माओवादी आंदोलन को यहां जमीन दी थी। 60 साल बाद भी अधूरी इंद्रावती की सिंचाई योजनाएं     इंद्रावती नदी पर सिंचाई परियोजनाओं की परिकल्पना वर्ष 1960 में पं. जवाहरलाल नेहरु के दौर में की गई थी।     जनवरी 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बहुउद्देशीय बोधघाट परियोजना की आधारशिला रखी थी।     इसके लिए केंद्र सरकार ने विश्व बैंक से करीब 300 करोड़ रुपये का ऋण भी लिया था।     करीब तीन वर्ष तक काम चलने के बाद वन एवं पर्यावरण संबंधी आपत्तियों और प्रभावित लोगों के विरोध के चलते 1986 में परियोजना पूरी तरह रोक दी गई।     दरअसल 1974 में बस्तर में 233 किमी बहने वाली इंद्रावती नदी पर बोधघाट सहित नौ सिंचाई परियोजनाएं प्रस्तावित हुई थीं।     1975 में नदी जल बंटवारे को लेकर ओडिशा से सहमति भी मिल गई थी, लेकिन आज तक एक भी परियोजना पूरी नहीं हो सकी।     नतीजतन दक्षिण-मध्य बस्तर में केवल लगभग 12 प्रतिशत कृषि भूमि तक ही सिंचाई पहुंच पाई है, जिसके कारण किसान रबी की फसल मुश्किल से ले पाते हैं। बोधघाट पर राजनीति हावी, इसलिए रफ्तार सुस्त राज्य सरकार ने बोधघाट परियोजना को नए स्वरूप में आगे बढ़ाने की पहल की है और केंद्र से भी स्वीकृति मिल चुकी है। लेकिन डूबान क्षेत्र में आने वाले 52 जनजातीय गांवों के पुनर्वास और विस्थापन की चुनौती के कारण परियोजना की रफ्तार सुस्त है। यहीं कारण है कि एक ऐसी परियोजना जो पूरे बस्तर का भविष्य बदल सकती है, राजनीतिक दलों के नेता खुलकर पहल करने से बचते दिख रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यदि विरोध हुआ तो उनकी राजनीतिक जमीन खिसक सकती है। प्रस्ताव के अनुसार बोधघाट को बहुउद्देशीय डैम के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे सिंचाई के साथ बिजली उत्पादन भी संभव होगा। साथ ही इसे नदी जोड़ो योजना से जोड़कर इंद्रावती के जल से बस्तर के बड़े हिस्से तक सिंचाई पहुंचाने की योजना है। इसके अलावा देउरगांव, मटनार और जगदलपुर की महादेव बैराज परियोजनाओं को भी इस बार राज्य बजट में शामिल किया गया है। यदि ये योजनाएं साकार होती हैं, तो बस्तर के हजारों गांवों की कृषि व्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है। बोधघाट बनता तो कमजोर पड़ती माओवाद की जड़ें बस्तर में सिंचाई संकट के समाधान के लिए 1960 के दशक में इंद्रावती नदी की जल क्षमता के उपयोग हेतु बोधघाट परियोजना की अवधारणा बनाई गई थी। यदि यह योजना समय पर पूरी हो जाती, तो दक्षिण बस्तर की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव था। सिंचाई के विस्तार से रोजगार के अवसर बढ़ते और गांवों में आर्थिक स्थिरता आती। 1980 के दशक में जब माओवादी संगठन दंडकारण्य क्षेत्र में सक्रिय हुए, तब उन्होंने इस परियोजना का विरोध शुरू कर दिया। उन्हें आशंका थी कि बड़े विकास कार्यों से क्षेत्र में उनकी पकड़ कमजोर हो जाएगी। विकास के अभाव और कमजोर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का लाभ उठाकर माओवादियों ने अगले चार दशकों तक इस इलाके में अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। इधर पड़ोसियों ने बदली तस्वीर     बस्तर की तुलना यदि पड़ोसी राज्य तेलंगाना और ओडिशा से की जाए तो अंतर साफ दिखाई देता है। बस्तर की सीमा से सटे राज्य महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और ओडिशा जलप्रबंधन और सिंचाई योजनाओं के मामले में 10 गुना आगे है।     इन राज्यों में बड़े पैमाने पर सिंचाई परियोजनाओं, जल प्रबंधन और तालाबों के पुनर्जीवन से खेती की स्थिति में बड़ा सुधार हुआ है।     कई क्षेत्रों में किसान साल में दो से तीन फसल ले रहे हैं।     आंध्रप्रदेश में पोलावरम, तेलंगाना में समक्का सागर परियोजना व गोदावरी-कृष्णा-कावेरी लिंक परियोजना, ओडिशा में खातीगुड़ा, कोलाब व तेलांगिरी डैम जैसी जल प्रबंधन योजनाओं के कारण कृषि उत्पादन और किसानों की आय में वृद्धि हुई है।     इसके विपरीत बस्तर में खेती आज भी मानसून पर निर्भर है। सिचांई परियोजना बदल सकती है जंगल का गणित बस्तर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां नदियां और वर्षा तो भरपूर हैं, लेकिन खेतों तक पानी नहीं पहुंच पाता। दशकों पहले तैयार विकास योजनाओं में बताया गया था कि पूरे बस्तर में केवल एक प्रतिशत क्षेत्र में ही सिंचाई उपलब्ध थी। चार दशक बाद भी यह आंकड़ा मुश्किल से 1.5 से 2 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर देश के करीब 44 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। सिंचाई की कमी के कारण बस्तर के अधिकांश किसान साल में केवल एक ही फसल ले पाते हैं। पानी की नियमित उपलब्धता हो तो किसान दो या तीन फसल उगा सकते हैं, जिससे उनकी आय कई गुना बढ़ सकती है। बस्तर में लगभग छह से सात लाख किसान परिवार खेती पर निर्भर हैं। ऐसे … Read more

पूरा हुआ मनीषा का सपना, मिला सुरक्षित आशियाना मनीषा

रायपुर एक सुरक्षित और पक्का घर हर परिवार के जीवन में स्थिरता, सम्मान और सुकून लेकर आता है। जब वर्षों का सपना हकीकत बनता है, तो वह केवल एक मकान नहीं बल्कि खुशियों और आत्मविश्वास की नई शुरुआत भी होता है। ऐसा ही सुखद बदलाव कोरबा नगर निगम के बुधवारी बाजार की मती मनीषा शुक्ला के जीवन में आया, जब प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) 2.0 के माध्यम से उनका पक्के घर का सपना साकार हुआ। मती मनीषा शुक्ला एक निजी स्कूल में शिक्षिका है। उनके पति  विपिन कुमार शुक्ला और वे लंबे समय से अपने परिवार के लिए एक पक्का मकान बनवाने का विचार कर रहे थे, लेकिन सीमित आय के कारण एक साथ बड़ी राशि जुटा पाना उनके लिए आसान नहीं था। वे जिस पुराने घर में रहते थे, वह पुराना हो चुका था। बारिश के मौसम में घर में पानी टपकने और अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ता था। घर की स्थिति खराब होने के कारण समय-समय पर मरम्मत करानी पड़ती थी और जगह कम होने से मेहमानों के आने पर भी असुविधा होती थी। वर्ष 2025-26 में हुए सर्वे के दौरान उनका नाम प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) 2.0 की सूची में शामिल हुआ। आवश्यक दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी करने के बाद उनका आवास स्वीकृत हो गया। जल्दी ही योजना की पहली किस्त उनके बैंक खाते में आ गई, जिससे उन्होंने अपने सपनों के घर का निर्माण कार्य शुरू कर दिया। मनीषा ने योजना से मिली राशि के साथ अपनी वर्षों की जमा पूंजी भी जोड़ी और एक मजबूत तथा सुंदर पक्का मकान बनवाया। अब उनका घर पूरी तरह तैयार हो चुका है। वे अपने परिवार के साथ नए घर में आराम और सुकून के साथ जीवन व्यतीत कर रही हैं। पक्का मकान बनने से मनीषा की न केवल दैनिक जीवन की परेशानियाँ खत्म हुई हैं, बल्कि समाज में उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी है। अब उनका परिवार सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में रह रहा है। वह कहती हैं प्रधानमंत्री आवास योजना ने उनके जैसे कई परिवारों को पक्के घर का सपना पूरा करने का अवसर दिया है।

HPV टीके का सुरक्षा कवच: सरकार का बड़ा कदम, किशोरियों के लिए मुफ्त वैक्सीनेशन अभियान

जगदलपुर. बस्तर में अब स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। किशोरियों को सर्वाइकल कैंसर से बचाने एचपीवी टीकाकरण शुरू हुआ। जिला अस्पताल में अभियान की शुरुआत के साथ ही टीके लगाए गए। 14 से 15 वर्ष की करीब 9500 किशोरियों को यह वैक्सीन दी जाएगी। यह वही टीका है जो बाजार में महंगा होता है, लेकिन यहां मुफ्त दिया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने इसे सभी ब्लॉकों तक पहुंचाने की तैयारी कर ली है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह टीका कैंसर के खतरे को काफी कम करता है। पिछले वर्षों में इस बीमारी से कई महिलाओं की जान जा चुकी है। अधिकारियों ने कहा समय पर टीकाकरण ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। अभियान स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों में भी चलाया जाएगा। लक्ष्य है कि कोई भी किशोरी इस सुरक्षा से वंचित न रहे। यह पहल बस्तर में महिला स्वास्थ्य को लेकर नई उम्मीद बनकर उभरी है। किशोरियों को मिलेगा कैंसर से सुरक्षा एचपीवी वैक्सीन के माध्यम से महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित की जाती है। यह टीका विशेष रूप से किशोरियों के लिए प्रभावी माना जाता है। टीकाकरण के लिए वही किशोरियां पात्र होंगी जिन्होंने 14 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो, लेकिन 15 वर्ष का जन्मदिन न मनाया हो। आयु प्रमाण के लिए आधार कार्ड या अन्य फोटो पहचान पत्र मान्य होगा। पहचान पत्र उपलब्ध न होने की स्थिति में अभिभावक द्वारा हस्ताक्षरित शपथ पत्र भी मान्य किया जाएगा। टीकाकरण के बाद लाभार्थियों का पंजीकरण यू-विन पोर्टल पर किया जाएगा और उन्हें डिजिटल प्रमाण पत्र प्रदान किया जाएगा। प्रत्येक लाभार्थी को टीकाकरण के बाद 30 मिनट तक निगरानी में रखा जाएगा तथा सभी सत्रों में चिकित्सा अधिकारी की उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी