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Artificial Intelligence बन रही जल संकट की वजह? डेटा सेंटरों की खपत पर वैश्विक प्रदर्शन तेज

 नई दिल्ली दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का क्रेज जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से इसके खतरनाक असर भी सामने आने लगे हैं. कई देशों में एंटी एआई प्रोटेस्ट जमीन पर देखने को मिल रहे हैं। यूएन यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के मुताबिक AI का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल उर्जा, पानी और जमीन जैसे संसाधनों पर बड़ा दबाव डाल रहा है. यह सिर्फ टेक्नोलॉजी का मामला नहीं है, बल्कि अब यह पर्यावरण और फ्यूचर की स्थिरता से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।  अगर सिर्फ बिजली की बात करें तो इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार 2030 तक दुनिया भर के डेटा सेंटर करीब 945 टेरावॉट-आवर बिजली खपत कर सकते हैं. यह आंकड़ा समझने के लिए इसे आसान तरीके से समझिए।  एक देश के बराबर बिजली की खपत!  945 टेरावॉट-आवर बिजली का मतलब है जापान जैसे पूरे देश की सालाना बिजली खपत के बराबर. यानी जो बिजली एक पूरा विकसित देश इस्तेमाल करता है, उतनी बिजली सिर्फ AI और डेटा सेंटर खा जाएंगे. यह ग्लोबल बिजली खपत का करीब 3 प्रतिशत तक हो सकता है।  अब इसे और आसान भाषा में समझें तो अगर एक आम भारतीय घर साल भर में जितनी बिजली इस्तेमाल करता है, उसी बिजली में हजारों घर चल सकते हैं. लेकिन उतनी ही बिजली AI के सर्वर कुछ ही सेकंड में इस्तेमाल कर देते हैं जब लाखों लोग एक साथ AI से सवाल पूछ रहे होते हैं। पहले बिजली फैक्ट्री, घर और ट्रांसपोर्ट में खर्च होती थी. अब एक बड़ा हिस्सा डिजिटल दुनिया खा रही है, जो दिखती नहीं लेकिन असर बहुत बड़ा डालती है।  लेकिन असली संकट पानी है. Earth.Org की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक AI डेटा सेंटर करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी खपत कर सकते हैं. यह पानी सर्वर को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होता है, क्योंकि AI मॉडल्स को चलाने वाले चिप्स बेहद ज्यादा गर्म होते हैं।  1.3 अरब लोगों की जरूरत के बराबर पानी अब इस आंकड़े को समझना जरूरी है. 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी का मतलब है करीब 1.3 अरब लोगों की जरूरत के बराबर पानी. यानी जितना पानी भारत जैसे देश की पूरी आबादी को चाहिए, उतना पानी सिर्फ मशीनों को ठंडा रखने में खर्च हो सकता है।  अगर इसे और आसान तरीके से समझें तो सोचिए एक शहर में रोज पानी की किल्लत होती है, लोग टैंकर मंगाते हैं, पानी बचाने की अपील होती है. वहीं दूसरी तरफ डेटा सेंटर लाखों लीटर पानी सिर्फ अपने सर्वर को ठंडा रखने में खर्च कर रहे हैं. यानी एक तरफ इंसान पानी के लिए जूझ रहा है और दूसरी तरफ मशीनें वही पानी इस्तेमाल कर रही हैं।  अब इस मुद्दे पर सिर्फ एक्सपर्ट ही नहीं, आम लोग भी विरोध करने लगे हैं. खासकर अमेरिका में AI डेटा सेंटर के खिलाफ विरोध तेजी से बढ़ रहा है।  अमेरिका में डेटा सेंटर्स का विरोध रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका के कई शहरों में लोगों ने डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स का विरोध किया है. इसकी सबसे बड़ी वजह है पानी और बिजली की भारी खपत. स्थानीय लोगों का कहना है कि इन डेटा सेंटर की वजह से उनके इलाके में पानी की कमी और बिजली पर दबाव बढ़ सकता है।  कुछ जगहों पर तो प्रोजेक्ट्स को रोकना भी पड़ा. अमेरिका में पिछले साल करीब 200 अरब डॉलर के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स विरोध के चलते या तो रोक दिए गए या देरी का शिकार हुए. यह दिखाता है कि यह सिर्फ टेक्नोलॉजी का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि अब यह पब्लिक इश्यू बन चुका है।  लोगों को डर है कि कंपनियां उनके संसाधनों का इस्तेमाल करके AI चला रही हैं, लेकिन उसका फायदा आम जनता को उतना नहीं मिल रहा. खासकर पानी की कमी वाले इलाकों में यह चिंता और ज्यादा गहरी है।  यूनाइटेड नेशन्स से जुड़ी रिपोर्ट्स में भी साफ चेतावनी दी गई है कि AI का यह बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर पानी, जमीन और क्लाइमेट तीनों पर दबाव बना रहा है. खासकर उन इलाकों में जहां पहले से पानी की कमी है, वहां डेटा सेंटर का विस्तार बड़ी समस्या बन सकता है।  सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि AI की ज्यादातर बिजली खपत ट्रेनिंग में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के इस्तेमाल में होती है. IEA के विश्लेषण के मुताबिक करीब 80 से 90 प्रतिशत ऊर्जा खपत ‘इंफेरेंस’ में होती है, यानी जब आप और हम AI से सवाल पूछते हैं।  मतलब हर बार जब आप ChatGPT से सवाल पूछते हैं, फोटो बनाते हैं या AI वीडियो जनरेट करते हैं, तो उसके पीछे सर्वर चालू होते हैं, बिजली खर्च होती है और उन्हें ठंडा रखने के लिए पानी भी लगता है. यानी AI जितना ज्यादा इस्तेमाल होगा, उतना ही ज्यादा संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।  इसका कोई समाधान है? टेक कंपनियां अब ग्रीन एनर्जी, रीसायकल पानी और नए कूलिंग सिस्टम पर काम कर रही हैं. कई कंपनियां दावा करती हैं कि वे अपने डेटा सेंटर को सोलर या विंड एनर्जी से चलाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन असली चुनौती यह है कि AI की डिमांड इतनी तेजी से बढ़ रही है कि ये प्रयास पीछे छूट सकते हैं।  आज AI हमारी जिंदगी आसान बना रहा है, लेकिन अगर यही टेक्नोलॉजी भविष्य में पानी और बिजली की कमी की वजह बन जाए, तो यह एक नई समस्या पैदा कर सकती है. AI का फ्यूचर जितना स्मार्ट दिखता है, उसका पर्यावरण पर असर उतना ही गंभीर होता जा रहा है।  क्या दुनिया AI और नेचर के बीच बैलेंस बना पाएगी, या फिर टेक्नोलॉजी की यह रफ्तार हमें एक नए संकट की तरफ ले जा रही है? 

साइबर सिक्योरिटी एवं एआई प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे दिन 400 से अधिक विद्यार्थी हुए शामिल

भोपाल  कौशल विकास एवं रोजगार मंत्री  गौतम टेटवाल ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और साइबर सुरक्षा जैसे उभरते क्षेत्र भविष्य की अर्थव्यवस्था और रोजगार के प्रमुख आधार हैं। वर्तमान डिजिटल युग में डेटा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपदा बन चुका है।इसके संरक्षण और सुरक्षित उपयोग में साइबर सुरक्षा की भूमिका निरंतर बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सैनिक देश की भौतिक सीमाओं की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ राष्ट्र की डिजिटल सीमाओं के प्रहरी हैं। मंत्री  टेटवाल शुक्रवार को ग्लोबल स्किल पार्क, भोपाल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय साइबर सिक्योरिटी एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग प्रशिक्षण कार्यक्रम-2026 के दूसरे दिन आयोजित सत्र को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में भोपाल के विभिन्न तकनीकी एवं इंजीनियरिंग संस्थानों के 400 से अधिक विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। मंत्री  टेटवाल ने विद्यार्थियों से निरंतर सीखने, नवाचार को अपनाने, साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक रहने, रोजगार खोजने के बजाय रोजगार सृजक बनने तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार युवाओं को डिजिटल अर्थव्यवस्था की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप दक्ष बनाने और तकनीकी रूप से सशक्त मानव संसाधन तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है। एमपीएसईडीसी की मुख्य महाप्रबंधक सु शिवांगी जोशी ने कहा कि मध्यप्रदेश को प्रौद्योगिकी एवं नवाचार का अग्रणी केंद्र बनाने में कौशल विकास की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम युवाओं को उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप दक्ष बनाने और भविष्य की तकनीकी चुनौतियों के लिए तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। एसएसआरजीएसपी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी  गिरीश शर्मा ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण का अधिकतम लाभ उठाने के लिए प्रेरित करते हुए तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने तथा उद्योगोन्मुख कौशल विकास पर बल दिया। एसएसआरजीएसपी-गोप के वरिष्ठ निदेशक  नीरज सहाय ने ग्लोबल स्किल पार्क को भारत का पहला एकीकृत बहु-कौशल प्रशिक्षण पारिस्थितिकी तंत्र बताते हुए कहा कि संस्थान का उद्देश्य वैश्विक मानकों के अनुरूप दक्ष एवं भविष्य के लिए तैयार कार्यबल विकसित करना है। कार्यक्रम के दूसरे दिन तकनीकी सत्रों में “साइबर डिफेंस फंडामेंटल्स” विषय पर विशेषज्ञों ने साइबर सुरक्षा के मूल सिद्धांतों, साइबर खतरों तथा सुरक्षा उपायों की विस्तृत जानकारी दी। प्रतिभागियों को मालवेयर, रैनसमवेयर, फिशिंग, सोशल इंजीनियरिंग और इनसाइडर रिस्क जैसे प्रमुख साइबर खतरों से अवगत कराया गया। साथ ही साइबर किल चेन फ्रेमवर्क के माध्यम से साइबर हमलों की प्रक्रिया और उन्हें रोकने के उपायों की जानकारी भी दी गई। सत्र में ‘डिफेंस इन डेप्थ’ की अवधारणा, सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग, साइबर हाइजीन, नियमित सॉफ्टवेयर अपडेट एवं पैचिंग जैसी सुरक्षा प्रक्रियाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में उपलब्ध रोजगार एवं करियर अवसरों, विशेष रूप से एसओसी एनालिस्ट जैसी उभरती भूमिकाओं की जानकारी भी विद्यार्थियों के साथ साझा की। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को उद्योग की वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल प्रदान कर डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करना है।  

कृषि विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों एवं वैज्ञानिकों के लिए ए आई पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण प्रारंभ

रायपुर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में शिक्षण एवं अनुसंधान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीकों के प्रभावी उपयोग पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। कृषि महाविद्यालय रायपुर में 16 से 20 मार्च तक आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की विभिन्न प्रविधियों एवं उपकरणों का प्रभावी उपयोग कर इन क्षेत्रों में उत्कृष्टता हासिल करने के गुर सिखाये जा रहे हैं। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित 17 महाविद्यालयों के प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं।  प्रशिक्षण कार्यक्रम में आई.आई.टी. भिलाई, आई.आई.आई.टी. नया रायपुर, एन.आई.टी. रायपुर, आई. आई. एम. रायपुर, हिदायतुल्लाह नेशनल लॉ यूनिर्वसिटी नया रायपुर, गुरू घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर, आई.सी.ए.आर. – नार्म हैदराबाद तथा आई.सी.ए.आर – एन.आई.बी.एस.एम. बरोण्डा जैसे राष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षणार्थियों को कृषि शिक्षा अनुसंधान में आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस की विभिन्न टेकनिक्स एवं टूल्स के प्रभावी उपयोग के बारे में मार्गदर्शन दिया जा रहा है। इस पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ इदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने किया।  इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.), भिलाई के निदेशक डॉ. राजीव प्रकाश तथा आई.सी.ए.आर.-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान (एन.आई.बी.एस.एम.) बरोण्डा के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। इस अवसर पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. कपिलदेव दीपक सहित कृषि विश्वविद्यालय के निदेशकगण तथा विभिन्न महाविद्यालयों के अधिष्ठातागण उपस्थित थे।     प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने कहा कि विगत कुछ वर्षों में हमारे जीवन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग निरंतर बढ़ता जा रहा है और अब यह हमारी सामान्य दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया है। उन्होंने कहा विशेषकर उच्च शिक्षा अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने अहम योगदान दिया है। यह शिक्षण, शोध और अकादमिक कार्यों को अधिक प्रभावी बना रही है। डॉ. चंदेल ने कहा कि कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान के क्षेत्र में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कृषि शिक्षा जैसे पेशेवर क्षेत्रों में ए आई का उपयोग शिक्षण गुणवत्ता, नवाचार और शोध को बेहतर बनाने के लिए अनिवार्य हो गया है। उन्होंने कहा कि इस पांच दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को पाठ योजना निर्माण, पाठ्य सामग्री निर्माण, मूल्यांकन आदि शिक्षण संबंधी कार्यों तथा शोध लेखन, साहित्य समीक्षा, संदर्भ प्रबंधन आदि शोध संबंधी कार्यों के संबंध में विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत जानकारी दी जाएगी।  इस प्रशिक्षण में प्रतिभागी अपनी कक्षाओं, प्रयोगशाला तथा शोध कार्यों में विभिन्न ए आई तकनीक एवं टूल्स का प्रभावी उपयोग करना सीखेंगे जिससे उनकी कार्यक्षमता और नवाचार क्षमता वृद्धि होगी। आई.आई.टी. भिलाई के निदेशक डॉ. राजीव प्रकाश ने इस अवसर पर कहा कि कोविड काल से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग बढ़ने लगा है। कोविड के दौरान आई.आई.टी. कानपुर ने विभिन्न ए आई टूल्स का उपयोग कर कोविड के केसेस के प्रतिदिन के आकड़ों तथा उसके पीक पीरियड के बारे में सटीक पूर्वानुमान जारी किए थे। उन्होंने कहा कि कृषि के क्षेत्र में भी ए आई तकनीक का उपयोग कर किसानों के लिए मौसम संबंधी पूर्वानुमान तथा कृषि सलाह उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि विभिन्न ए आई टूल्स के माध्यम से वर्षा जल एवं उपलब्ध भूजल के आंकड़ों का उपयोग कर किसानों के लिए उपयुक्त फसलों का चयन किया जा सकता है। इसके साथ ही विगत वर्षों में घटित कीट-बीमारियों के प्रकोप तथा वर्तमान जलवायविक परिस्थितियों का अध्ययन कर फसलों को कीटों एवं बीमारियों के प्रकोप से बचाया जा सकता है।  इसी प्रकार फसल उत्पादन एवं इनके विक्रय हेतु भी ए आई टूल्स का उपयोग किया सकता है। एन.आई.बी.एस.एम. के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने भी प्रतिभागियों को संबोधित किया। एन.आई.टी. रायपुर के निदेशक डॉ. एन.वी. रमन्ना ने भी प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। गौरतलब है कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम दो प्रमुख घटकों में आयोजित किया गया है। पहला घटक नव नियुक्त संकाय सदस्यों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य उन्हें विश्वविद्यालय की दृष्टि, मिशन और शैक्षणिक ढांचे से परिचित कराना है। दूसरा घटक शिक्षण एवं अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर प्रशिक्षण है, जिसके माध्यम से प्रतिभागियों को आधुनिक ए आई टूल्स और तकनीकों से परिचित कराया जाएगा, ताकि वे इनका प्रभावी उपयोग कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, विस्तार गतिविधियों तथा अनुसंधान कार्यों में कर सकें। इन पाँच दिनों के दौरान विशेषज्ञ व्याख्यान, विचार-विमर्श तथा प्रायोगिक सत्रों के माध्यम से प्रतिभागियों को आधारित शिक्षण एवं अनुसंधान की नवीनतम प्रवृत्तियों से अवगत कराया जाएगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम की संयोजक कृषि महाविद्यालय रायपुर की अधिष्ठाता डॉ. आरती गुहे हैं।

जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने बदला खेल: AI के 4 ऐतिहासिक बदलाव

नई दिल्ली 2025 का साल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के लिए बहुत बड़ा बदलाव लेकर आया। साल की शुरुआत में AI को लोग एक स्मार्ट टूल की तरह देखते थे। लेकिन दिसंबर आते-आते यह एक बड़ी ताकत बन गया, जो इंटरनेट के ट्रैफिक, जॉब मार्केट, नियम-कानून और देशों की ताकत को प्रभावित करने लगा। अब दुनियाभर में इस पर चर्चा हो रही है कि AI को कैसे कंट्रोल किया जाए, ताकि यह तबाही न मचा सके। साथ ही इस पर बहस हो रही है कि गलती होने पर जिम्मेदारी किसकी होगी। बहरहाल, इस साल ऐ बदलावों ने एआई को घर-घर में पहुंचा दिया। चलिए, जान लेते हैं कि इस साल AI की दुनिया में कौनसे बड़े बदलाव आए जिन्होंने चौंकाया। ताकतवर AI मॉडल लॉन्च हुए इसी साल OpenAI ने अगस्त में GPT-5 लॉन्च किया, जो सबसे ताकतवर मॉडल था। इसमें 'बिल्ट-इन थिंकिंग' फीचर था। इसके अलावा, एंथ्रोपिक ने मई में Claude 4 जारी किया, जिसमें बेहतर सोचने, कोडिंग करने और निर्देशों को फॉलो करने की क्षमता है। अब AI सिर्फ जवाब देने वाला नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर में असिस्टेंट की तरह काम करने लगा। AI इमेज-वीडियो ट्रेंड आए इस साल गूगल का नैनो बनाना टूल भी आया। इसमें प्रॉम्प्ट डालकर लोगों ने मन मुताबिक तस्वीरें बनाईं। विशेषकर, साड़ी वाला ट्रेंड खूब पॉपुलर हुआ। इसका इस्तेमाल कर लोगों ने विंटेज लुक अपनाया। इसी तरह से गिबली ट्रेंड भी लोगों ने इस्तेमाल किया। ताजा ट्रेंड सेलिब्रिटीज के साथ सेल्फी वीडियो बनाने का है। ये ट्रेंड लोगों में खूब मशहूर हुए। AI रोबोट बनाने लगी दुनिया इस साल एआई रोबोट्स सबसे ज्यादा चलन में देखने को मिले। जो कार कंपनियां गाड़ी बनाती थीं, वे अब एआई रोबोट भी बनाने लगी है। इसके अलावा, एलन मस्क की कंपनी भी ऑप्टिमस रोबोट बना रही है, इन्हें दुनिया के सामने रखा भी। इसी तरह चीन में भी UBTECH और Unitree जैसी दिग्गज कंपनियां एआई रोबोट बना रही हैं। चीन ने वियतनाम बॉर्डर पर एआई रोबोट तैनात करने का फैसला भी किया है। CES 2026 में दुनिया भर के ताकतवर एआई रोबोट्स की नुमाइश भी होने वाली है। मल्टीमॉडल और जेनरेटिव एआई की प्रगति एआई मॉडल्स अब टेक्स्ट, इमेज, वीडियो और ऑडियो को एक साथ हैंडल कर रहे हैं, जिससे नेचुरल इंटरैक्शन और कंटेंट क्रिएशन आसान हुआ। जेनरेटिव एआई क्रिएटिव कामों, बिजनेस ऑटोमेशन और एज एआई में प्रमुख ट्रेंड रहा।

वैज्ञानिकों का दावा: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बनाएगी इंसान को 150 साल तक जवान

नई दिल्ली किसी भी इंसान की लंबी से लंबी उम्र 100 साल के आसपास होती है। बहुत कम लोग होते हैं जो इतने साल जिंदा रहते हैं। जबकि इंसान की औसत उम्र तो 72 साल के आसपास ही मानी जाती है। लेकिन क्या हो अगर कोई आपसे कहे कि भविष्य में इंसान 150 साल तक जिंदा रहेंगे। इस बात पर यकीन करना जरा मुश्किल है, लेकिन AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने तो पूरा खेल ही बदल दिया है। अब दावा किया जा रहा है कि AI की मदद से इंसान की उम्र बढ़ाई जा सकती है। लेकिन सवाल उठता है कि AI ऐसा कैसे कर पाएगा? चलिए जानते हैं। वैज्ञानिकों ने खोजा यह तरीका डेटा सोसाइटी की रिपोर्ट बताती है कि हमारा शरीर इसलिए बूढ़ा होता है क्योंकि हमारे सेल के अंदर मौजूद डीएनए धीरे-धीरे खराब होता जाता है। जब खाना-पानी और आराम बहुत होता है, तो शरीर नई कोशिकाएं बनाने में लगा रहता है, मरम्मत नहीं करता। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक नया तरीका ढूंढा है। वे शरीर को थोड़ा 'झटका' देते हैं, जिससे कोशिकाएं खुद-ब-खुद मरम्मत करने लगती हैं। अभी इसकी दवा ट्रायल पर है। AI कैसे लोगों की उम्र बढ़ाएगा? पहले CRISPR नाम की तकनीक से डीएनए बदलते थे, लेकिन वह एक ही समय की तस्वीर दिखाती थी। असल जिंदगी में जीन का व्यवहार हर पल बदलता रहता है, खाने, तनाव और मौसम के साथ। यहां AI कमाल कर रहा है। AI पूरे समय जीन की हरकत पर नजर रखता है और सही समय पर सही इलाज बताता है। इससे इलाज एक-एक व्यक्ति के लिए अलग-अलग और बिल्कुल सटीक बन जाता है। साइड इफेक्ट भी बहुत कम होते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि आने वाले समय में 60-70 साल के लोग भी उतने ही तेज दिमाग वाले रहेंगे जितने 20-25 साल की उम्र में होते हैं। याददाश्त, सोचने की ताकत सब बरकरार रहेगी। लोग सिर्फ लंबा जीवन नहीं, बल्कि स्वस्थ और खुशहाल जीवन भी जिएंगे। 100-120 साल की उम्र में तंदरुस्त रहेंगे लोग डेटा सोसाइटी के को-फाउंडर दिमित्री एडलर कहते हैं, 'AI आपको सुपरहीरो नहीं बनाएगा, लेकिन आपको ज्यादा स्वस्थ, तेज दिमाग वाला और मजबूत बना देगा।' बहुत जल्दी हम उन लोगों को देखेंगे जो 100-120 साल की उम्र में भी जवान जैसे खेल-कूद कर रहे होंगे।