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काफी से अस्थमा का ईलाज

ये तो आप जानते ही होंगे अस्थमा एक सांस संबंधी बीमारी है। अस्थमा से पीड़ित व्यक्ति को मौसम परिवर्तन के साथ ही कई समस्याओं का सामना पड़ता है। इतना ही नहीं अस्थ्मा रोगी को धूल-र्मिीी, प्रदूषण इत्यादि से भी बचकर रहना होता है। अस्थमा के उपचार के लिए आमतौर पर दवाईयों का प्रयोग किया जाता है, लेकिन जिन लोगों में अस्थमा बहुत अधिक बढ़ जाता है उन पर अस्थमा की दवाएं काम करना बंद कर देती हैं। जिसके कारण उन्हें इन्हेलर दिया जाता है। इतना ही नहीं अस्थामा रोगियों को अपने खान-पान का भी खास ख्याल रखना पड़ता है। ऐसे में अस्थमा रोगियों को चाय-कॉफी से परहेज रखने के लिए कहा जाता हैं। अभी तक आम लोगों की भी यही धारणा थी कि वाकई चाय-कॉफी अस्थमा रोगियों को नुकसान पहुंचा सकती है, लेकिन अब ऐसा नहीं। दरअसल, अस्थकमा से जुड़े भ्रम और तथ्य बहुत है। आइए जानें कैसे अब कॉफी से अस्थमा का इलाज संभव है। जी हां, यह सच है। अब अस्थमा रोगियों को ईलाज के लिए कॉफी आराम से दी जा सकती है बिना किसी आशंका के क्योंकि कॉफी नुकसान पहुंचाने के बजाय फायदा ही करती है। हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि कैफीन में मौजूद तत्व अस्थमा की ही दवा हो सकते हैं और इनका इस्तेमाल अस्थमा रोगियों द्वारा अस्थमा नियंत्रण के लिए किया जाता है। कुछ शोधों के दौरान अस्थमा से ग्रसित व्यक्तियों को कॉफी दी गई जिनमें सकारात्मक रूप से प्रभावी लक्षण पाए गए। यानी अब आप भी अस्थमा के उपचार के लिए कॉफी का इस्तेमाल कर सकते हैं। सबसे पहले यह सुनिश्चित कर लें आपको कॉफी किस तरह की पीनी है। आप अपनी पसंद की कॉफी लें जिससे आपको स्वाद भी आएं और ऐसा प्रतीत ना हो कि आप किसी बीमारी के कारण कॉफी पी रहे हैं। जब आपको लगे कि आपको अस्थमा होने की आशंका है या फिर अटैक पड़ने के लक्षण दिखें तो आपको एक कप कॉफी बनानी चाहिए। एक कप कॉफी में 1.3 हिस्सा ही कॉफी का पीएं, इससे आपको भरपूर मात्रा में कैफीन मिल जाएगी। कॉफी पीने के लगभग 10 मिनट बाद तक इंतजार करें। इसमें इस बात पर नजर रखें कि क्या कॉफी के आप पर कोई सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। अगर नहीं, तो आपको 1.3 कॉफी एक बार फिर पीनी होगी। एक बार फिर देखें 10 मिनट के भीतर आप कैसा महसूस कर रहे हैं। आप अगर अभी भी अस्थमा के लक्षणों को महसूस कर रहे हैं और आपके पास कोई और मेडीकल ट्रीटमेंट लेने के लिए नहीं है तो आपको थोड़ी बहुत कॉफी का सेवन और करना होगा, इसके बाद आप आराम करें। तीसरी बार कॉफी पीने के बाद आप कैसा महसूस कर रहे हैं, इस पर गौर फरमाएं। यदि अबकी बार भी आपको आराम नहीं मिला है तो यह देखने की जरूरत है कि अस्थमा के लक्षण कैंसे हैं और यदि आपकी हालत बहुत खराब है तो आपको अतिरिक्त मेडीसन की जरूरत पड़ सकती हैं। कहने का अर्थ है कि यदि अस्थमा के लक्षणों को शुरूआती समय में पहचान लिया जाएं तो कॉफी से आपको आराम मिलेगा लेकिन यदि आपकी हालत बहुत बिगड़ गई है तो संभव है कि कॉफी का आप पर कोई असर ना हो।  

किडनी को नुकसान पहुंचा सकते हैं ये 4 चीज़ें, डॉक्टरों ने दी सतर्क रहने की सलाह

इंदौर शहर में हुई इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी की नेशनल कॉन्फ्रेंस हुई। इसमें डॉक्टरों ने नमक चीनी और बोरिंग के पानी को लेकर हिदायत दी। उन्होंने साफ कहा कि रोजाना इस्तेमाल होने वाला नमक, चीनी, मैदा और कई इलाकों में पीने को मिल रहा बोरिंग का पानी किडनी की बीमारियों का बड़ा कारण बन रहा है। तीन दिनों तक चली इस कॉन्फ्रेंस में देशभर से आए 300 से ज्यादा किडनी विशेषज्ञों ने बढ़ती किडनी की बीमारियों पर चर्चा की । विशेषज्ञों ने कहा कि दूषित पानी और गलत खान-पान की आदतें, मजदूर वर्ग और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए सबसे ज्यादा घातक साबित हो रही हैं। बेहतर इलाज पर फोकस नासिक से आए नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. देओदत्त चाफेकर ने बताया कि इस बार की कॉन्फ्रेंस में हाई बीपी, डायलिसिस प्रबंधन और छोटे शहरों तक बेहतर इलाज पहुंचाने पर फोकस रहा। किडनी ट्रांसप्लांट से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। पानी की शुद्धता पर ध्यान देने को कहा कॉन्फ्रेंस के ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन डॉ. प्रदीप सालगिया ने कहा कि कई किडनी बीमारियां अब भी रहस्य बनी हुई हैं। खासतौर पर गरीब तबके और मजदूरों में पाई जाने वाली सीकेडीयू यानी क्रॉनिक किडनी डिजीज ऑफ अननोन ओरिजिन को लेकर कई शोध चल रहे हैं। यह बीमारी उन लोगों में ज्यादा देखी जा रही है, जो दूषित पानी पीते हैं, धूप में लंबे समय तक काम करते हैं और पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पीते। ऐसे लोगों को बार-बार समझाया जा रहा है कि वे दिनभर काम के दौरान साफ पानी का इस्तेमाल जरूर करें। बीपी की नियमित जांच करें ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ. राजेश भराणी ने बताया कि कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल एक्सपर्ट्स भी ऑनलाइन जुड़े। उन्होंने कहा कि बीपी और शुगर की नियमित जांच, हेल्दी लाइफस्टाइल और साफ पानी का सेवन बीमारियों से बचाव के सबसे आसान तरीके हैं। बोरिंग के पानी का नुकसान बताया बोरिंग के पानी को लेकर डॉक्टरों ने गंभीर चिंता जताई। कई रिपोर्ट्स में पाया गया है कि बोरिंग का पानी जमीन की गहराई से आता है और उसमें फ्लोराइड व अन्य केमिकल की मात्रा अधिक होती है, जो किडनी को सीधा नुकसान पहुंचाते हैं। डॉक्टरों ने सलाह दी कि मजदूर वर्ग और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग हमेशा पानी की शुद्धता पर ध्यान दें। नमक से किडनी को सीधा नुकसान किडनी ट्रांसप्लांट को लेकर मुंबई के डॉ. भरत शाह ने कहा कि अगर मरीज को समय पर इलाज और नई तकनीक का लाभ मिले तो ट्रांसप्लांट की लागत लंबे समय में सस्ती साबित हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि हाई ब्लड प्रेशर वाले मरीज नमक की मात्रा कम करें और जीवनशैली में बदलाव लाएं, क्योंकि हाई बीपी किडनी को सीधा नुकसान पहुंचाता है। तमिलनाडु के डॉ. गोपालकृष्णन ने अंगदान की जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया, वहीं मुंबई की डॉ. श्रुति टापियावाला ने कहा कि चीनी, नमक और मैदा से दूरी और संतुलित खानपान ही किडनी को स्वस्थ रखने का सबसे सरल तरीका है।

स्किन को अंदर से निखारें: ग्लूटाथियोन लेवल बढ़ाने के 6 असरदार नेचुरल उपाय

क्या आप भी बेदाग और दमकती हुई त्वचा चाहते हैं? अगर हां, तो आपको अपने स्किन केयर रूटीन में एक जादुई तत्व को शामिल करना होगा- जिसका नाम है Glutathione… इसे अक्सर 'Master Antioxidant' भी कहा जाता है। यह सिर्फ आपकी स्किन को फेयर नहीं बनाता, बल्कि उसे अंदर से हेल्दी और ग्लोइंग भी बनाता है। लेकिन सवाल यह है कि इस चमत्कारी तत्व को कैसे बढ़ाया जाए? घबराइए नहीं, इसे बढ़ाने के लिए महंगे क्रीम या इंजेक्शन की जरूरत नहीं। आप कुछ आसान और नेचुरल तरीकों से ही अपने शरीर में ग्लूटाथियोन का लेवल बढ़ा सकते हैं। विटामिन C है सबसे बड़ा साथी विटामिन C ग्लूटाथियोन के स्तर को बढ़ाने में सबसे बड़ा रोल प्ले करता है। यह न सिर्फ शरीर में ग्लूटाथियोन के प्रोडक्शन को बढ़ावा देता है, बल्कि उसे एक्टिव रखने में भी मदद करता है। इसके लिए आप संतरा, नींबू, शिमला मिर्च और स्ट्रॉबेरी जैसे फलों और सब्जियों का सेवन करें। सल्फ्यूर रिच डाइट है जरूरी सल्फर ग्लूटाथियोन के निर्माण के लिए एक बहुत ही जरूरी तत्व है। प्याज, लहसुन, ब्रोकली, फूलगोभी और अंडे जैसी चीजों में सल्फर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। अपने रोजाना के खाने में इन चीजों को जरूर शामिल करें। हल्दी और दूध का कमाल हल्दी सिर्फ एक मसाला नहीं, बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर है। इसमें मौजूद करक्यूमिन ग्लूटाथियोन के स्तर को प्राकृतिक रूप से बढ़ाता है। रोज रात में हल्दी वाला दूध पीने से आपको इसके बेहतरीन फायदे मिल सकते हैं। रेगुलर एक्सरसाइज भी है जरूरी एक्सरसाइज सिर्फ बॉडी को फिट नहीं रखती, बल्कि यह ग्लूटाथियोन के लेवल को भी बढ़ाती है। रोजाना 30 मिनट का वर्कआउट, जैसे कि योग, जॉगिंग या साइकिलिंग, आपके शरीर के एंटीऑक्सीडेंट डिफेंस सिस्टम को मजबूत बनाता है। रात की अच्छी नींद अच्छी नींद एक हेल्दी बॉडी और स्किन के लिए बहुत जरूरी है। जब आप गहरी नींद में होते हैं, तो शरीर खुद को ठीक करता है और ग्लूटाथियोन का निर्माण भी तेजी से होता है। कम से कम 7-8 घंटे की नींद लेना सुनिश्चित करें। धूप से बचें तेज धूप और UV किरणें ग्लूटाथियोन के स्तर को कम कर सकती हैं। जब भी आप बाहर निकलें तो सनस्क्रीन (SPF 30+) का इस्तेमाल करें और धूप से बचें। ये 6 आसान तरीके अपनाकर आप बिना किसी साइड इफेक्ट के अपने शरीर में ग्लूटाथियोन का स्तर बढ़ा सकते हैं और पा सकते हैं वो चमकदार, बेदाग त्वचा, जिसका सपना हर कोई देखता है।

ड्राय स्कैल्प के लिए अपनाएं ये 3 घरेलू उपाय

क्या आपको बार-बार सिर में खुजली होती है और बालों में सफेद पपड़ी नजर आती है? अगर हां, तो बता दें कि यह ड्राई स्कैल्प की निशानी है। ड्राई स्कैल्प की वजह से न सिर्फ खुजली होती है, बल्कि बाल भी कमजोर होकर टूटने लगते हैं। जी हां, अगर आप इस समस्या से परेशान हैं, तो इस आर्टिकल में बताए गए 3 घरेलू नुस्खे आपके काम आ सकते हैं। नारियल का तेल नारियल का तेल तो हर घर में मौजूद होता है। यह सिर्फ बालों को पोषण ही नहीं देता, बल्कि ड्राई स्कैल्प के लिए भी रामबाण है। रात में सोने से पहले आप हल्के गरम नारियल तेल से सिर की मालिश कर सकते हैं और सुबह बालों को धो सकते हैं। बता दें, इससे आपको कुछ ही दिनों में आपको फर्क नजर आने लगेगा। एलोवेरा जेल एलोवेरा में मॉइस्चराइजिंग और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो रूखी और खुजली वाले स्कैल्प को शांत करते हैं। इसके लिए, फ्रेश एलोवेरा जेल को सीधे स्कैल्प पर लगाकर 20 मिनट के लिए छोड़ दें और फिर नॉर्मल पानी से बाल धो लें। बता दें, हफ्ते में दो बार ऐसा करने से जल्द ही आपका स्कैल्प हेल्दी हो जाएगा। दही का हेयर मास्क दही में लैक्टिक एसिड मौजूद होता है, जो स्कैल्प को साफ करने और नमी बनाए रखने में मदद करता है। एक कटोरी दही में थोड़ा-सा शहद मिलाकर पेस्ट बना लें। इसे अपनी स्कैल्प पर अच्छी तरह लगाएं और 30 मिनट बाद धो लें। यह मास्क आपकी स्कैल्प को हाइड्रेट करने के साथ-साथ बालों को भी मुलायम बनाएगा। इन आसान उपायों को अपनाकर आप बिना किसी केमिकल के अपनी ड्राई स्कैल्प की समस्या से छुटकारा पा सकते हैं और अपने बालों को हेल्दी बना सकते हैं।

लौकी खाने से पहले सोच लें! इन 5 लोगों को हो सकता है बड़ा नुकसान

क्या आप भी सोचते हैं कि लौकी दुनिया की सबसे सेहतमंद सब्जियों में से एक है? क्या आप भी हर बार इसे प्लेट में देखकर सोचते हैं कि यह सिर्फ फायदे ही देगी? तो ठहरिए! अक्सर हम जिस चीज को फायदेमंद मानते हैं, वही कुछ लोगों के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। आपकी रसोई की यह 'सुपरफूड' लौकी भी कुछ खास लोगों के लिए भारी पड़ सकती है। आइए जानते हैं ऐसे 5 लोग कौन हैं , जिन्हें लौकी खाने से पहले दो बार सोचना चाहिए। लो ब्लड प्रेशर के मरीज अगर आपका ब्लड प्रेशर अक्सर कम रहता है, तो लौकी से दूरी बनाए रखना ही समझदारी है। लौकी में ऐसे गुण होते हैं जो ब्लड प्रेशर को और कम कर सकते हैं। ज्यादा मात्रा में लौकी खाने से चक्कर आना, कमजोरी या बेहोशी जैसी समस्या हो सकती है। पाचन की समस्या वाले लोग जिन लोगों को अक्सर गैस, पेट फूलना या अपच की शिकायत रहती है, उन्हें लौकी सोच-समझकर खानी चाहिए। लौकी में फाइबर और पानी की अधिकता पाचन तंत्र को धीमा कर सकती है, जिससे आपकी समस्या और बढ़ सकती है। खासकर रात के समय लौकी खाने से बचें। किडनी से जुड़ी समस्याएं किडनी के मरीजों के लिए लौकी नुकसानदेह हो सकती है। लौकी में पोटैशियम की मात्रा ज्यादा होती है, जिसे किडनी के लिए फिल्टर करना मुश्किल हो सकता है। शरीर में पोटैशियम का स्तर बढ़ने से किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जो उनकी हालत को और बिगाड़ सकता है। गर्भवती महिलाएं बरतें सावधानी गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को खान-पान का विशेष ध्यान रखना होता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लौकी में मौजूद कुछ टॉक्सिन गर्भ में पल रहे शिशु के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। इसलिए गर्भवती महिलाओं को लौकी का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए। सबसे जरूरी बात अगर आप गलती से भी कड़वी लौकी खा लेते हैं, तो यह आपकी सेहत पर भारी पड़ सकती है। कड़वी लौकी में 'कुकुरबिटासिन' नामक एक टॉक्सिक कंपाउंड होता है, जो उल्टी, दस्त, पेट में तेज दर्द और गंभीर मामलों में फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकता है। यही वजह है कि लौकी की सब्जी या जूस बनाने से पहले हमेशा उसका एक छोटा टुकड़ा चखकर देख लेना चाहिए। अगली बार जब आप लौकी को अपनी डाइट में शामिल करें, तो इन बातों का ध्यान जरूर रखें। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में, अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले हमेशा डॉक्टर की सलाह लेना ही सबसे सही होता है।  

मसूड़ों से खून आने की समस्या को करें दूर, अपनाएं ये कारगर टिप्स

नई दिल्ली क्या आपने कभी ब्रश करते वक्त थूकने पर गुलाबी रंग देखा है या टूथब्रश पर हल्का खून लगा पाया है? अगर हां, तो आप अकेले नहीं हैं। मसूड़ों से खून आना  एक आम समस्या है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना आपकी ओरल हेल्थ के लिए गंभीर समस्याएं खड़ी कर सकता है। दरअसल, मसूड़ों से खून आने की समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है और इसके पीछे कई कारण छिपे होते हैं। अक्सर हम इस समस्या की ही तरह इन कारणों को भी नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन इनके बारे में जानकर आप इस परेशानी से छुटकारा पा सकते हैं। आइए जानें मसूड़ों से खून आने के कारण और बचाव के तरीके। मसूड़ों से खून आने के कारण क्या हैं? जिंजिवाइटिस- यह सबसे आम कारण है। जब दांतों की सही तरह से सफाई नहीं हो पाती, तो दांतों और मसूड़ों के बीच प्लाक जमा हो जाता है। इस प्लाक में मौजूद बैक्टीरिया मसूड़ों में इन्फेक्शन और सूजन पैदा करते हैं, जिसे जिंजिवाइटिस कहते हैं। सूजन की वजह से मसूड़े नाजुक हो जाते हैं और ब्रश करने या फ्लॉस करने पर आसानी से खून बहने लगता है। हार्ड ब्रशिंग- बहुत से लोग सोचते हैं कि जोर से ब्रश करने से दांत अच्छी तरह साफ होते हैं, लेकिन यह गलत धारणा है। हार्ड ब्रिसल्स वाला टूथब्रश या जोर लगाकर ब्रश करने से मसूड़ों के टिश्यूज को नुकसान पहुंचता है और उनसे खून बहने लगता है। तंबाकू और सिगेरट- तंबाकू का इस्तेमाल करने वालों और स्मोक करने वालों में मसूड़ों की बीमारी का खतरा ज्यादा होता है। तंबाकू में मौजूद केमिकल्स मसूड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं और उन्हें कमजोर बनाते हैं। हार्मोनल बदलाव- प्रेग्नेंसी, पीरियड्स या मेनोपॉज के दौरान हार्मोन्स में उतार-चढ़ाव होते हैं। इससे मसूड़े ज्यादा सेंसिटिव हो जाते हैं और खून आसानी से आने लगता है। इसे ‘प्रेग्नेंसी जिंजिवाइटिस’ भी कहा जाता है। कुछ दवाएं- खून पतला करने वाली दवाएं, कुछ तरह की ब्लड प्रेशर की दवाएं और डिप्रेशन दवाएं मसूड़ों से खून आने का कारण बन सकती हैं। पोषण की कमी- विटामिन-सी और विटामिन-के की कमी से भी मसूड़े कमजोर होते हैं और उनमें खून आने लगता है। कुछ हेल्थ कंडीशन- डायबिटीज, ल्यूकेमिया या हीमोफिलिया जैसे हेल्थ कंडीशन के कारण भी मसूड़ों से खून आना एक लक्षण हो सकता है। बचाव के तरीके सही तरीके से ब्रश करें- नरम ब्रिसल्स वाला टूथब्रश इस्तेमाल करें। ब्रश कोमलता से गोल-गोल घुमाते हुए दांतों को साफ करें, जोर-जोर से घिसें नहीं। दिन में दो बार (सुबह और रात को सोने से पहले) कम से कम दो मिनट तक ब्रश करें। नियमित रूप से फ्लॉस करें- केवल ब्रश करने से दांतों के बीच का प्लाक साफ नहीं होता। रोजाना फ्लॉस करने से दांतों के बीच फंसे खाने के टुकड़े और प्लाक निकल जाता है, जिससे जिंजिवाइटिस का खतरा कम होता है। एंटी-बैक्टीरियल माउथवाश का इस्तेमाल- एक अच्छा एंटी-बैक्टीरियल माउथवाश प्लाक बनने से रोकने और मसूड़ों की सूजन कम करने में मददगार साबित हो सकता है। हेल्दी डाइट लें- विटामिन-सी और विटामिन-के से भरपूर फूड्स मसूड़ों को मजबूत बनाते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं- दिन भर में खूब पानी पीने से मुंह साफ रहता है और खाने के कण धुलते रहते हैं। स्मोकिंग और तंबाकू से परहेज- तंबाकू और स्मोकिंग छोड़ना आपकी ओरल हेल्थ में सुधार के लिए सबसे अच्छा कदम है। नियमित डेंटल चेक-अप- साल में कम से कम दो बार डेंटिस्ट से चेकअप करवाएं।  

पुराने iPhone होंगे नए जैसा! iOS 26 अपडेट से आएंगे धमाकेदार फीचर्स और नया लुक

Apple ने हाल ही में अपनी नई iPhone 17 सीरीज लॉन्च की है और इसके साथ ही iOS 26 अपडेट की भी घोषणा की थी. कंपनी ने बताया कि आईओएस 26 का स्टेबल वर्जन 15 सितंबर 2025 से सभी यूजर्स के लिए रोल आउट होना शुरू हो जाएगा. इसे पहली बार जून 2025 में WWDC इवेंट में पेश किया गया था. iOS 26 लंबे समय से बीटा टेस्टिंग में था और अब लगभग तीन महीने बाद यह सभी iPhone यूजर्स के लिए उपलब्ध हो जाएगा. इसका मतलब है कि अगर आप iPhone 16 या उससे पुराने मॉडल इस्तेमाल कर रहे हैं, तो कल से आपके फोन में बड़ा बदलाव नजर आएगा. नया Liquid Glass डिज़ाइन आपके फोन की UI को एक आधुनिक और फ्लूइड लुक देगा. iOS 26 में क्या नया है? आईओएस 26 का सबसे बड़ा बदलाव इसका Liquid Glass इंटरफेस है, जो पूरे सिस्टम को स्मूद और मॉडर्न लुक देगा. इसके अलावा:     Apple Wallet में बड़े विज़ुअल और फंक्शनल बदलाव, जिससे पासेस और ट्रांजैक्शन मैनेज करना आसान होगा.     CarPlay का नया रीडिजाइन इंटरफेस और पर्सनलाइज्ड डैशबोर्ड.     Messages ऐप में नए चैट इफेक्ट्स और AI रिप्लाई सजेशंस. किन iPhones को मिलेगा iOS 26?     iPhone 17 सीरीज     iPhone 16, 16 Plus, 16 Pro, 16 Pro Max     iPhone 15 सीरीज     iPhone 14 सीरीज     iPhone 13 सीरीज     iPhone 12 सीरीज     iPhone 11 सीरीज     iPhone SE (2nd Gen और इसके बाद के मॉडल) iOS 26 अपडेट कैसे डाउनलोड करें?     iPhone में Settings खोलें.     General ऑप्शन पर जाएं.     Software Update पर टैप करें.     आईओएस 26 अपडेट दिखने पर Download and Install पर क्लिक करें.     फोन को Wi-Fi से कनेक्ट रखें और बैटरी चार्ज होनी चाहिए. डाउनलोड के बाद फोन अपने आप रीस्टार्ट होकरआईओएस 26 इंस्टॉल कर देगा. अपडेट के बाद आपके पुराने iPhone का इंटरफेस पूरी तरह नया लगेगा और अनुभव अलग होगा. ध्यान दें कि कुछ पुराने मॉडल में AI फीचर्स उपलब्ध नहीं होंगे.

अब बिजली की चिंता खत्म! ले जाओ, लगाओ और चलाओ – दुनिया का पहला पोर्टेबल बिजलीघर

नई दिल्ली चीन ने तकनीक के मामले में खूब तरक्की कर ली है। जहां एक तरह AI और रोबोटिक्स के क्षेत्र में चीन नए-नए इनोवेशन कर रहा है, वहीं रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली चीजें भी बनाई जा रही हैं। चीन ने दुनिया का पहला सोडियम आयन पोर्टेबल पावर स्टेशन लॉन्च किया है। इसे 'पायनियर ना' (Pioneer Na) नाम दिया गया है। इसकी खासियत है कि यह यह पावर स्टेशन ठंडे मौसम में भी शानदार काम करता है। इसे बर्लिन में आयोजित इनोवेशन फॉर ऑल (IFA) कॉन्फ्रेंस में पहली बार दिखाया गया। इसे कुछ लोग चलता-फिरता बिजली घर भी कह रहे हैं, क्योंकि यह कई डिवाइस को चार्ज और ऑन करने की क्षमता रखता है। चलिए, इसके फीचर्स जान लेते हैं और यह भी पता कर लेते हैं कि यह पावर स्टेशन किस काम आता है? इस पावर स्टेशन से हीटर भी चल जाए पीवी मैगजीन की रिपोर्ट बताती है कि, चीन की कंपनी Bluetti यह पोर्टेबल पावर स्टेशन लॉन्च किया है। आसान भाषा में कहें तो यह एक पोर्टेबल रिचार्जेबल बैटरी है, जिसे आप आसानी से कहीं भी ले जा सकते हैं। इसमें 900 watt-hour की क्षमता है, जो लैपटॉप, मोबाइल या बाकी छोटे डिवाइस के लिए काफी है। इसका नॉर्मल आउटपुट 1500 वाट है, लेकिन 'पावर लिफ्टिंग' मोड में यह 2250 वाट तक पावर दे सकता है। यह मोड उन उपकरणों के लिए है, जो ज्यादा बिजली खाते हैं, जैसे हीटर। यह सिस्टम सोलर पावर से 1900 वाट तक चार्ज हो सकता है और इसकी बैटरी करीब 4000 बार चार्ज हो सकती है। इसका वजन 16 किलो है।   कड़ाके की ठंड में भी चार्ज होता है पोर्टेबल पावर स्टेशन की सबसे बड़ी खासियत है कि यह बहुत ठंडे मौसम में भी अच्छा काम करता है। यह -15 डिग्री सेल्सियस में चार्ज हो सकता है और -25 डिग्री सेल्सियस में भी बिजली दे सकता है।-10 डिग्री सेल्सियस में भी यह 60% तक चार्ज हो सकता है। इस वजह से ब्लूएटी इसे ठंडे इलाकों में रहने वाले और घूमने वाले लोगों को ध्यान में रखकर पेश कर रही है। सोडियम-आयन बैटरी में क्या खास है? पोर्टेबल पावर स्टेशन में लिथियम की जगह सोडियम-आयन बैटरी का इस्तेमाल किया गया है। सोडियम लिथियम से ज्यादा सस्ता और आसानी से उपलब्ध है। यह बैटरी ठंड में बेहतर काम करती है और ज्यादा सुरक्षित भी है। इसमें आग लगने या फटने का खतरा कम है। हालांकि, इसकी एनर्जी डेंसिटी लिथियम से कम है, जिसके कारण यह पावर स्टेशन थोड़ा भारी और बड़ा है।

यूटीआई संक्रमण से बढ़ सकता है हार्ट अटैक का जोखिम, नई रिसर्च में खुलासा

नई दिल्ली हृदय रोगों की समस्या, हार्ट अटैक के मामले हाल के वर्षों में काफी तेजी से बढ़े हैं। उम्रदराज लोगों के अलावा अब कम उम्र वाले भी इसका शिकार हो रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिस तरह से हमारी दिनचर्या गड़बड़ होती जा रही है, हृदय स्वास्थ्य की समस्याएं अब काफी आम हो गई हैं। खान-पान में गड़बड़ी, व्यायाम की कमी, दिन का अधिकतर समय बैठे-बैठे बिता देना हृदय रोगों का प्रमुख कारण माना जाता है। जिसपर सभी उम्र के लोगों को ध्यान देते रहना जरूरी है। अध्ययनों से पता चलता है कि कई स्थितियां ऐसी हैं जो हार्ट अटैक को ट्रिगर करने वाली हो सकती हैं। हाई कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर और वायु प्रदूषण उनमें प्रमुख हैं। पर एक हालिया शोध में विशेषज्ञों की टीम ने बताया है कि दुनियाभर में लाखों लोगों को होने वाले कुछ आम वायरल संक्रमण जैसे यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (यूटीआई) और फ्लू भी हार्ट अटैक की समस्या को ट्रिगर करने वाले हो सकते हैं। हृदय स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए इन संक्रमणों को लेकर भी सावधानी बरतते रहने की आवश्यकता है।यूटीआई और फ्लू किस प्रकार से हार्ट अटैक को बढ़ावा देते हैं, आइए इस बारे में समझते हैं। इससे पहले यूटीआई संक्रमण और हार्ट अटैक के बारे में जान लीजिए यूटीआई यानी यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन महिलाओं में अधिक देखी जाती रही है। इसके पीछे मुख्य वजह है उनकी शरीर की बनावट। महिलाओं की यूरिनरी ट्रैक्ट छोटी होती है जिससे बैक्टीरिया जल्दी अंदर पहुंच जाते हैं। इसके अलावा गर्भावस्था, डायबिटीज, कमजोर इम्यून सिस्टम, ज्यादा देर तक पेशाब रोकना, असुरक्षित यौन संबंध, हार्मोन में बदलाव जैसी स्थितियां भी यूटीआई का जोखिम बढ़ाती हैं। लेकिन केवल महिलाएं ही नहीं कुछ पुरुषों को भी इसका खतरा हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ दिल का दौरा यानी हार्ट अटैक एक गंभीर चिकित्सीय स्थिति है जिसमें हृदय को रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है। आमतौर पर ये रक्त के थक्के बनने के कारण होती है।  हृदय रोग दुनियाभर में मृत्यु का प्रमुख कारण है, जो हर साल अनुमानित 17.9 मिलियन (1.79 करोड़) लोगों की जान ले लेता है। लंबे समय से यही माना जाता रहा है कि कोरोनरी हृदय रोग के साथ-साथ धूम्रपान जैसे कई परिवर्तनशील जीवनशैली कारक दिल के दौरे के जोखिम को बढ़ाते हैं। पर अब विशेषज्ञों ने बताया है कि यूटीआई और फ्लू के कारण भी इसका खतरा हो सकता है। यूटीआई और हार्ट अटैक के बीच कनेक्शन इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने बताया कि धमनियों में वसायुक्त पदार्थ जैसे कोलेस्ट्रॉल के जमाव के कारण हृदय को रक्त की आपूर्ति बाधित होती है। यही कोलेस्ट्रॉल यूटीआई और फ्लू जैसी वायरस को आश्रय दे सकता है जो शरीर में वर्षों तक निष्क्रिय बने रह सकते हैं। फिनलैंड और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार, समय के साथ ये जीवाणु हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और एंटीबायोटिक दवाओं से अपनी रक्षा के लिए एक सुरक्षात्मक बायोफिल्म बना लेते हैं। लेकिन जैसे ही आप बीमार होते है या फिर से कोई वायरल संक्रमण (जैसे कि यूटीआई) होता है तो ये वायरस बायोफिल्म को सक्रिय कर सकता है, जिससे बैक्टीरिया का प्रसार होता है और इंफ्लेमेशन की समस्या बढ़ जाती है। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? वैज्ञानिकों ने बताया कि हाई इंफ्लेमेशन की स्थिति में हृदय में प्लाक के टूटने का खतरा बढ़ जाता है जिसके परिणामस्वरूप संभावित रूप से घातक रक्त का थक्का बनने लगता है जो हार्ट अटैक को बढ़ा देता है। फिनलैंड के टैम्पियर विश्वविद्यालय में जैविक विज्ञान के विशेषज्ञ और अध्ययन के प्रमुख प्रोफेसर पेक्का करहुनेन कहते हैं, कोरोनरी आर्टरी डिजीज में बैक्टीरिया की भागीदारी पर लंबे समय से संदेह किया जाता रहा है, लेकिन प्रत्यक्ष और ठोस सबूतों का अभाव रहा है। इस अध्ययन में बहुत कुछ स्पष्ट होता है।

आयुर्वेद में अमृत है नीम

नीम के वृक्ष का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। प्रकृति की इस महत्वपूर्ण देन नीम के वृक्ष की पत्तियां छाल, कोंपलें प्राकृतिक चिकित्सा में काम आती हैं। प्राकृतिक रूप से मनुष्य की चिकित्सा करने के लिये नीम को आयुर्वेद में सर्वगुण संपन्न वृक्ष माना गया है। नीम में शीतल कृमिनाशक, सूजन नाशक आदि गुण पाए जाते हैं। नीम की भूमिका विभिन्न रोगों में उपयोगी है। यह कुष्ठरोग, वातरोग, विषदोष, खांसी ज्वर, रूधिर दोष, टीबी, खुजली, खून साफ करना आदि दूर करने में सहायक है। प्राकृतिक चिकित्सा में इसका उपयोग प्रमेह, मधुमेह, नेत्ररोग में भी किया जाता है। नीम में साधारण रूप से कीटाणुनाशक शक्ति है। नयी कापलों का नित्य प्रति सेवन करने से शरीर स्वस्थ व प्रसन्न रहता है। नीम के तेल में मार्गसिन नामक नामक उड़नसील तत्व पाया जाता है। इस तेल की मालिश करने से गठिया व लकवा रोग में लाभ होता है। इसके बीच में 39 प्रतिशत तक एक तेल रहता है जो गहरे पीले रंग का कड़ुवा, तीखा व दुर्गंधयुक्त होता है। इस तेल में फोलिक एसिड रहता है। नीम का उपयोग विषम ज्वर में भी किया जाता है। इसके पानी का उपयोग एनिमा व स्पंज बाथ में किया जाता है। बुखार में एक काढ़ा तैयार किया जा सकता है। ज्वर उतारने के लिये नीम के इस काढ़े को आयुर्वेदाचार्यों ने अमृत कहा है। काढ़ा तैयार करने के लिये 240 ग्राम पानी, तुलसी के दस पत्ते, काली मिर्च के दस पत्ते, नींबू एक-एक टुकड़ा, अदरक, नीम की पांच पत्तियां प्रयोग में लाई जाती हैं। सबसे पहले काली मिर्च व अदरक की पीसकर 240 ग्राम पानी में डालकर नींबू का रस व नीम की पत्तियां डालकर अच्छी तरह उबाला जाता है। पानी आधा रहने पर उसको छानकार उस काढ़े को पीकर सो जाते हैं जिससे शरीर में पसीना निकलता है। इससे बुखार, खांसी व सिरदर्द में लाभ होता है। शरीर के घाव चोट आदि ठीक हो जाते हैं। नीम के मरहम में नीम का रस व घी समान मात्रा में मिलाकर नीम का रस छानकर केवल घी बचा रहता है और मरहम तैयार हो जाता है। महिलाओं के श्वेत प्रदर रोग में भी नीम लाभकारी है। इस रोग में नीम व बबूल की छाल का काढ़ा तैयार करके श्वेत प्रदर में उपयोग करने से अच्छा लाभ मिलता है। खुजली में नीम की गिरी नित्य खाते रहने से (धीरे-धीरे उसकी मात्रा बढ़ाते रहें) तथा नीम की कोमल पत्तियां खाने से अच्छा आराम मिलता है। नीम की सूखी पत्तियां, कपड़ों व अनाज में रखने से वे खराब नहीं होते। नीम का वृक्ष आक्सीजन भी अधिक बनाता है अतः इससे पर्यावरण शुध्द होता है। प्राकृतिक चिकित्सा व आयुर्वेद में नीम को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है।