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Live-in रिलेशनशिप पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- ‘रिश्ते टूटने पर पुरुष दुष्कर्म के आरोपों में फंस रहे’

इलाहाबाद  इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) और दुष्कर्म कानूनों को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पश्चिमी विचारधारा के प्रभाव में युवाओं के बीच बिना विवाह किए साथ रहने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। जब ऐसे संबंध समाप्त होते हैं, तो कई मामलों में दुष्कर्म की एफआईआर दर्ज करा दी जाती है। पुराने कानूनों में फंस रहे पुरुष: कोर्ट न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा (प्रथम) की बेंच ने कहा कि चूंकि कानून महिलाओं के पक्ष में बनाए गए हैं, इसलिए पुरुषों को उन प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया जा रहा है, जो उस समय बने थे जब लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा अस्तित्व में ही नहीं थी। आजीवन कारावास की सजा रद्द कोर्ट ने विशेष न्यायाधीश (POSCO Act), महाराजगंज की ओर से मार्च 2024 में अपीलकर्ता चंद्रेश को दी गई आजीवन कारावास की सजा और दोषसिद्धि आदेश को रद्द कर दिया। अपीलकर्ता को IPC की विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराया गया था। पीड़िता बालिग पाई गई अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी ने शिकायतकर्ता की नाबालिग बेटी को शादी का झांसा देकर बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले जाकर शारीरिक संबंध बनाए। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि पीड़िता बालिग थी। अस्थि परीक्षण रिपोर्ट में उसकी उम्र लगभग 20 वर्ष पाई गई, जिस पर ट्रायल कोर्ट ने उचित विचार नहीं किया था। सबूतों में पाई गईं गंभीर खामियां कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत विद्यालय रिकॉर्ड किशोर न्याय नियमों के अनुसार वैध दस्तावेज नहीं थे। पीड़िता की मां (गवाह-1) की ओर से बताई गई उम्र में भी विरोधाभास पाया गया। एफआईआर में उम्र 18½ वर्ष बताई गई थी। पीड़िता ने अपने बयान में स्वीकार किया कि वह स्वेच्छा से घर छोड़कर पहले गोरखपुर और फिर बेंगलुरु गई थी।

यूपी में झूठी FIR पर कार्रवाई, गवाह भी होंगे दायित्व में, HC ने DGP को दिए कड़े निर्देश

प्रयागराज  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने झूठी एफआईआर दर्ज कराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि झूठी एफआईआर दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ता ही नहीं, बल्कि उनके गवाहों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाएगी। न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने आदेश दिया है कि यदि किसी मामले की विवेचना के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई अपराध बनता ही नहीं है और अंतिम/क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाती है, तो विवेचना अधिकारी को शिकायतकर्ता एवं गवाहों के विरुद्ध लिखित शिकायत भी प्रस्तुत करनी होगी। यह शिकायत बीएनएस की धारा 212 और 217 (पूर्व में आईपीसी की धारा 177 व 182) के अंतर्गत होगी, ताकि बीएनएस की धारा 215(1)(ए) (सीआरपीसी की धारा 195(1)(ए)) के तहत संज्ञान लिया जा सके। पुलिस महानिदेशक को दिए निर्देश कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि इस कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी की गई तो विवेचना अधिकारी, थाना प्रभारी, सर्किल अधिकारी ही नहीं, बल्कि संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई और अदालत की अवमानना की कार्यवाही हो सकती है। इस संबंध में हाई कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि वे अधीनस्थ अधिकारियों के लिए आवश्यक आदेश जारी करें। कोर्ट ने कहा कि यदि विवेचना अधिकारी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो केवल रिपोर्ट दाखिल करना पर्याप्त नहीं होगा। उसे पुलिस रेगुलेशन के अनुसार झूठी सूचना देने के लिए विधिवत शिकायत दर्ज कराना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के आचरण के विरुद्ध हाई कोर्ट में उचित कार्रवाई के लिए संपर्क किया जा सकता है। अधीनस्थ अदालतों को निर्देश दिया एकलपीठ ने सभी न्यायिक मजिस्ट्रेटों और अधीनस्थ अदालतों को निर्देश दिया है कि अभियुक्त के पक्ष में क्लोजर रिपोर्ट आने की स्थिति में वे पूरी केस डायरी का अवलोकन करें। साथ ही, जांच अधिकारी को सूचक (वादी) और एफआईआर में नामित गवाहों के विरुद्ध लिखित शिकायत प्रस्तुत करने का निर्देश दें, जैसा कि सीआरपीसी की धारा 195(1)(ए) (तदनुरूप बीएनएसएस की धारा 215(1)(ए)) में प्रावधानित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि संज्ञान लेने से पूर्व न्यायिक मजिस्ट्रेट पूरे अभिलेखों का परीक्षण करें। यदि प्रथमदृष्टया अपराध बनता प्रतीत न हो, तो शिकायतकर्ता से विरोध याचिका (प्रोटेस्ट पिटीशन) आमंत्रित कर उसे सुनें। इसके पश्चात यदि अपराध बनता है, तभी सीआरपीसी की धारा 190(1)(ए) या 190(1)(बी) के तहत संज्ञान लिया जाए। शिकायत भी अनिवार्य रूप से दाखिल करें इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्त, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक यह सुनिश्चित करें कि सभी विवेचना अधिकारी, थाना प्रभारी, सर्किल अधिकारी, अपर पुलिस अधीक्षक एवं लोक अभियोजक अंतिम/क्लोजर रिपोर्ट के साथ आवश्यक शिकायत भी अनिवार्य रूप से दाखिल करें। इस आदेश के अनुपालन के लिए 60 दिनों की समय-सीमा तय की गई है। यह है मामला मामले के अनुसार, अलीगढ़ निवासी उम्मे फारवा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपने पूर्व पति महमूद आलम खान द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को चुनौती दी थी। याची ने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को सही ठहराते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा प्रोटेस्ट याचिका स्वीकार कर केस कायम करने की कार्रवाई को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया था। याची और विपक्षी पहले कोरिया के सियोल में रहते थे। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर विवाद के बाद दोनों का तलाक हो गया। इसके पश्चात पूर्व पति ने अलीगढ़ के क्वार्सी थाने में एफआईआर दर्ज करा दी। पुलिस ने विवेचना के बाद अंतिम रिपोर्ट दाखिल की, लेकिन प्रोटेस्ट याचिका पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मामला कायम रखते हुए याची को समन जारी कर दिया। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की सफाई को आंशिक रूप से संतोषजनक माना और स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का उनके भविष्य के कैरियर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, हाई कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया है कि मामले में नए सिरे से, विधि के अनुसार अभियुक्त को सुनकर निर्णय लिया जाए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली दंगे के आरोपी की जमानत याचिका रद्द की

 प्रयागराज इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच ने बरेली दंगे के आरोपी रेहान की जमानत अर्जी खारिज कर दी है. याचिकाकर्ता पर 'आई लव मोहम्मद' जुलूस के दौरान विवादित नारे लगाने का आरोप है. कोतवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के बाद आरोपी ने राहत के लिए याचिका दायर की थी.  कोर्ट ने अपने 9 पेज के फैसले में नारे को भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा माना है. यह मामला लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाने और कानून के शासन को चुनौती देने से जुड़ा है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले के पैराग्राफ 12 में कहा, "'गुस्ताख ए नबी की एक सजा, सिर तन से जुदा' का नारा देश की अखंडता को चुनौती है." कोर्ट के मुताबिक यह नारा न केवल धारा 152 बीएनएस के तहत दंडनीय है, बल्कि यह लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाता है. जस्टिस देशवाल ने मौलाना तौकीर रजा के सहयोगी रेहान पर लगे इस आरोप को इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ बताया है.  वकीलों की दलीलें और अंतिम फैसला… सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता अखिलेश कुमार द्विवेदी ने जमानत मंजूर करने की अपील की थी. वहीं, जमानत का विरोध करते हुए एडिशनल एडवोकेट जनरल अनूप त्रिवेदी और अपर शासकीय अधिवक्ता नितेश श्रीवास्तव ने कड़े तर्क रखे.  कोर्ट ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता पर गंभीर आरोप हैं. इसके बाद, कोर्ट ने तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आरोपी रेहान की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया.

SC ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर जताई नाराजगी, लड़की के स्तन पकड़ने को रेप का प्रयास नहीं माना

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि यौन हमलों से जुड़े मामलों में असंवेदनशील न्यायिक टिप्पणियों का पीड़िता, उनके परिवार और बड़े पैमाने पर समाज पर ‘डरावना असर’ पड़ सकता है, ऐसे में इस तरह की टिप्पणियों पर लगाम लगाने के लिए उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों के लिए दिशा-निर्देश बनाने पर विचार कर सकता है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ स्वत: संज्ञान याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। फैसले में कहा गया था कि नाबालिग लड़की के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसके कपड़े उतारने का प्रयास और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना दुष्कर्म या दुष्कर्म के प्रयास नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों ने कहा कि इस मामले के अलावा, हाल के दिनों में कई हाईकोर्ट ने यौन हमले के मामलों में इसी तरह की मौखिक और लिखित टिप्पणी की है। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पीठ से कहा कि ‌हाल ही में एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि चूंकि रात थी, इसलिए यह आरोपी के लिए एक ‘आमंत्रण’ था। उन्होंने कलकत्ता और राजस्थान हाईकोर्ट के ऐसे दूसरे मामलों का भी पीठ के समक्ष उल्लेख किया। एक अन्य अधिवक्ता ने पीठ से जिला अदालत के एक मामले का जिक्र किया, जहां बंद कमरे में अदालती कार्यवाही के बावजूद कई लोग मौजूद थे और सुनवाई के दौरान पीड़िता को कथित तौर पर परेशान किया गया। स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना, रेप या रेप का प्रयास नहींः हाईकोर्ट ऐसी टिप्पणियों से समाज पर बुरा असर इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि आप इन सभी मामलों का जिक्र कर सकते हैं तो हम पूरा दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की कोई भी असंवेदनशील बातें और न्यायिक टिप्पणियां पीड़ितों, उनके परिवारों और पूरे समाज पर बुरा असर डाल सकती है। पीड़ितों को मजबूर करने के तरीके हैं इसके साथ ही, कभी-कभी, उन्हें (पीड़ितों को) शिकायतें वापस लेने के लिए मजबूर करने के लिए भी ऐसे तरीके अपनाए जाते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘ये हाईकोर्ट की टिप्पणियां हैं और जिला अदालत के स्तर पर इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए और हम दिशा-निर्देश जारी करना चाहेंगे। इसके साथ ही, पीठ ने वकीलों से अगली सुनवाई की तारीख से पहले संक्षिप्त में लिखित सुझाव देने को कहा।

स्कूलों के विलय पर हाई कोर्ट की मुहर, जनहित याचिका एक बार फिर खारिज

लखनऊ   इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने बेसिक शिक्षा अधिकारी के तहत आने वाले स्कूलों के विलय को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति एआर मसूदी व न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह की खंडपीठ ने गुरवार को ज्योति राजपूत की याचिका पर यह फैसला दिया है। याचिका पर राज्य सरकार ने भी आपत्ति जताकर अपना पक्ष रखा। न्यायालय ने कहा कि इस विषय पर सात जुलाई को एकल पीठ ने निर्णय दिया था, जिसमें विलय के उक्त आदेश के विरुद्ध दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था, वर्तमान जनहित याचिका में एकल पीठ के सात जुलाई के उक्त निर्णय का कोई जिक्र नहीं है लिहाजा इलाहाबाद हाई कोर्ट रुल्स के प्रावधानों के तहत उक्त जनहित याचिका पर सुनवाई नहीं की जा सकती है। कोर्ट ने प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों के विलय के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका को शुरुआती सुनवाई के बाद खारिज कर दिया। इस याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर आपत्ति उठाई गई कि मामले में उठाए गए मुद्दे पहले ही सीतापुर के 51 बच्चों की याचिका में एकल पीठ ने निर्णीत कर दिए हैं। ऐसे में समान मुद्दों को लेकर दाखिल यह पीआईएल सुनवाई के योग्य नहीं है। सरकार की आपत्ति पर गौर करने के बाद कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। स्थानीय अधिवक्ता ज्योति राजपूत की जनहित याचिका में राज्य सरकार के स्कूलों के विलय या दो स्कूलों को जोड़ने के राज्य सरकार के 16 जून के आदेश को चुनौती देकर रद करने का आग्रह किया गया था। याची ने गांवों के दूरदराज इलाकों में रहने वाले गरीबों के बच्चों को स्कूल जाने के लिए परिवहन व्यवस्था करने का आग्रह किया था। याचिका में आरटीई अधिनियम के तहत राज्य सरकार को बच्चों के परिवहन के दिशानिर्देश तय करने के निर्देश देने का भी आग्रह किया गया था। याची ने स्कूलों के विलय को गरीब बच्चों के हितों के खिलाफ बताया था। राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता अनुज कुदेसिया ने मुख्य स्थाई अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह के साथ दलील दी कि इसी सात जुलाई को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने स्कूलों के विलय के खिलाफ सीतापुर के 51 बच्चों की दाखिल याचिका समेत एक अन्य याचिका पर विस्तृत फैसला देकर खारिज कर दिया है। ऐसे में समान मामले में यह जनहित याचिका सुनवाई के लायक नहीं है। कोर्ट ने सरकार की ओर से उठाई गई शुरुआती आपत्ति के मद्देनजर जनहित याचिका खारिज कर दी।