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एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पर योगी सरकार का बड़ा कदम, डॉक्टरों के लिए बनेगा इलाज का स्पष्ट रोडमैप

लखनऊ  प्रदेश में एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध और अनियंत्रित इस्तेमाल से बढ़ रहे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) को रोकने के लिए यूप सरकार नई पहल करने जा रही है। अब प्रदेश में एंटीबायोटिक दवाओं के प्रयोग को लेकर एक नई गाइडलाइन तैयार की जाएगी, ताकि मरीजों को जरूरत के अनुसार ही सही एंटीबायोटिक दी जा सके और दवाओं के प्रति बैक्टीरिया में बढ़ते प्रतिरोध को रोका जा सके। केजीएमयू में वर्ल्ड सेप्सिस डे पर शनिवार को आयोजित दो दिवसीय कान्फ्रेंस के दौरान अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा शिक्षा एवं चिकित्सा स्वास्थ्य अमित कुमार घोष ने इस संबंध में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक दवाओं के बढ़ते प्रयोग के कारण दवा प्रतिरोध एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आ रहा है। इसे नियंत्रित करने के लिए प्रदेश स्तर पर प्रभावी व्यवस्था बनाने की जरूरत है। अपर मुख्य सचिव ने बताया कि नई गाइडलाइन बनाने की प्रक्रिया आखिरी दौर में है। इस माह के आखिरी सप्ताह या अक्टूबर पहले सप्ताह तक शासनादेश जारी हो जाएगा। एंटीबायोटिक के दुरुपयोग पर दैनिक जागरण की ओर से बड़े स्तर पर अभियान चलाया जा चुका है, जिसके बाद सरकार अब महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है। जरूरत के मुताबिक ही होगी एंटीबायोटिक की सलाह अमित घोष का कहना है कि नई गाइडलाइन का उद्देश्य डाक्टरों को एंटीबायोटिक के उचित चयन और उपयोग के लिए एक स्पष्ट रोडमैप उपलब्ध कराना होगा। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि सामान्य संक्रमणों में बिना जरूरत एंटीबायोटिक न दी जाए और गंभीर संक्रमण की स्थिति में मरीज की बीमारी तथा संक्रमण की प्रकृति के अनुसार प्रभावी दवा का चयन किया जाए। एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल कई स्तर पर हो रहा है। वायरल संक्रमण में भी कई बार एंटीबायोटिक का प्रयोग कर लिया जाता है, जबकि वायरस पर एंटीबायोटिक का प्रभाव नहीं होता। इसके अलावा मरीजों द्वारा बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा लेना, निर्धारित अवधि पूरी होने से पहले दवा बंद कर देना और जरूरत से अधिक शक्तिशाली एंटीबायोटिक का इस्तेमाल भी रेजिस्टेंस बढ़ने की प्रमुख वजह है। दवा बेअसर होने का बढ़ रहा खतरा केजीएमयू में पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग करे अध्यक्ष प्रो. वेद प्रकाश के मुताबिक, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की स्थिति में बैक्टीरिया दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। ऐसे में पहले प्रभावी रहने वाली दवाएं संक्रमण पर असर करना बंद कर देती हैं। इसके बाद मरीज के इलाज के लिए दूसरी और अधिक शक्तिशाली दवाओं का सहारा लेना पड़ता है। इससे इलाज जटिल होने के साथ ही खर्च और अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि भी बढ़ सकती है। प्रदेश में भी दवा प्रतिरोध को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। हाल के अध्ययनों में कई बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ने की बात सामने आ चुकी है। अस्पतालों में संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को गंभीर चुनौती माना गया है। अब इसको लेकर प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। डॉक्टरों के लिए भी बनेगा स्पष्ट रोडमैप प्रो. वेद प्रकाश के मुताबिक, प्रस्तावित गाइडलाइन के जरिए चिकित्सकों को विभिन्न प्रकार के संक्रमणों में एंटीबायोटिक के चयन और उसके उचित इस्तेमाल के संबंध में दिशा-निर्देश दिए जारी होंगे। इसका मकसद मरीजों को एक जैसी और वैज्ञानिक आधार पर इलाज की सुविधा उपलब्ध कराना होगा। एंटीबायोटिक शुरू करने से पहले संक्रमण की गंभीरता का आकलन, जरूरत पड़ने पर जांच और कल्चर रिपोर्ट का उपयोग तथा दवा की सही अवधि तय करना रेजिस्टेंस रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गाइडलाइन बनने के बाद सरकारी चिकित्सा संस्थानों के साथ ही अन्य स्वास्थ्य संस्थानों में भी एंटीबायोटिक के जिम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, सर्दी-जुकाम, सामान्य बुखार और कई वायरल संक्रमणों में मरीज स्वयं एंटीबायोटिक लेना शुरू कर देते हैं। यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक हो सकती है। एंटीबायोटिक केवल बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण के इलाज में उपयोगी होती हैं, जबकि वायरल संक्रमण पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसे में आम लोगों को भी जागरूक करने की जरूरत है कि वे डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक न लें और न ही पुरानी बची हुई दवाओं का इस्तेमाल करें।

MP में बिना पर्ची बिक रहीं एंटीबायोटिक्स, हर महीने करोड़ों का अवैध कारोबार

रीवा   जिले में एंटीबायोटिक्स दवाओं का हर माह 7 से 8 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार होता है। इतना ही नहीं प्रतिबंध के बावजूद तमाम दवा विक्रेता एंटीबायोटिक दवाओं की ऑन द काउंटर (ओटीसी) बिक्री भी कर रहे हैं। एंटीबायोटिक्स का बेवजह इस्तेमाल से जहां लोगों का स्वास्थ बिगड़ रहा है वहीं उनकी जेब पर भी असर पहुंच रहा है। दवा कारोबारियों व डॉक्टरों के गठजोड़ के कारण एंटीबायोटिक्स की खपत पर रोक नहीं लग पा रही है। यह गठजोड़ अवैध कमाई का जरिया बन गया है। एंटीबायोटिक दवाओं का जिला भी एक बड़ा बाजार बन चुका है। रीवा एवं मऊगंज जिले को मिलाकर अरमान व रूरल एरिया में कल 1380 मेडिकल स्टोर रजिस्टर्ड है। इनमें ग्रामीण अंचलों में मकड़जाल की तरह पहले झोलाछाप डॉक्टर शामिल नहीं है, जिसमें अंधाधुंध एंटीबायोटिक्स दवाओं की खुलेआम बिक्री हो रही है। बड़े स्तर पर चिकित्सकों ने भी अपने मरीजों को दवा लिखकर मेडिकल स्टोर से खरीदने की बजाय खुद ही बेच रहे हैं। इसके अलावा सर्दी, जुकाम, खांसी, फोड़े-फुन्सी, चोट इत्यादि के उपचार के लिए मरीज सीधे मेडिकल स्टोर पर जाकर काउंटर से एंटीबायोटिक्स खरीदकर कार्य चला रहे हैं और दवा विक्रेता भी धड़ल्ले से वायरल इंफेक्शन, मौसमी विकार व चोट घाव की दवा बिना डाक्टरों की पर्ची मांगे बेच भी रहे हैं।  एंटीबायोटिक्स के इस भयावह स्थिति को लेकर पड़ताल करने का प्रयास किया है। एक हजार से अधिक काउंटर जिले में संचालित: जिले में एंटीबायोटिक्स दवाओं का कारोबार एक बहुत बड़ा और सक्रिय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र का हिस्सा है। यहां थोक विक्रेताओं का एक बड़ा नेटवर्क है जो निमोनिया, संक्रमण और अन्य बीमारियों के लिए एमोक्सिसिलिन, सेफलेक्सिन और डॉक्सीसाइक्लिन जैसे प्रमुख एंटीबायोटिक्स को अस्पतालों, क्लीनिकों और फार्मेसियों में वितरित करते हैं। शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में दवाओं की भारी मांग के कारण थोक और खुदरा कारोबार काफी बड़ा है। यही कारण है कि जहां शहरी क्षेत्र में 681 से अधिक तो ग्रामीण में लगभग 699 दवा काउंटर हैं जो फुटकर में दवाओं की बिक्री कर रहे हैं। इन्हीं काउंटर से माह भर में 7 से 8 करोड़ रुपये से अधिक की सिर्फ एंटीबायोटिक्स दवाओं की बिक्री हो जाती है। मेडिकल स्टोरों पर बिना पर्चे के एंटीबायोटिक्स की बिक्री : ख़ुटेही निवासी अशोक पटेल तीन दिन से सर्दी-जुकाम से पीड़ित हैं। बुधवार को बुखार एवं जुकाम के बाद पास के अन्नपूर्णा मेडिकल स्टोर पहुंचे और अपनी समस्या बताकर दवा ले ली। न दुकान संचालक ने डाक्टर की पर्ची मांगी और न ही पीड़ित ने दी। चिकित्सक कमीशन के खेल में अपनी जेबें भर रहे हैं। एंटीबायोटिक्स के माध्यम से धन कमा बना रहे हैं। जिस दवा कंपनी से इनका कमीशन अधिक मिलता है वे मरीज को वही दवा लिखते हैं। दवा विक्रेता क्या करे, जो मांग आएगी वह उसे ही तो बेचेगा। अब तो डॉक्टर दवाई भी बेचने लगे हैं। निश्चित रूप से सरकार को नियम सख्त करने की जरूरत है। तरुणेद्र सिंह, अध्यक्ष, दवा विक्रेता संघ रीवा। हमने पहले ही सरकारी चिकित्सकों को गाइड लाइन के पालन की सख्त हिदायत देकर रखी हुई है। वायरल इंफेक्शन में तो मरीज को एंटीबायोटिक्स दवा बिल्कुल नहीं देनी चाहिए। इसी तरह सर्दी, जुकाम में भी विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। एक दो दिन में यह अपने आप ठीक हो जाती है। ऐसे में एंटीबायोटिक्स नुकसानदेह है। खासकर हाईडोज से बचना चाहिए। शिशु रोग के मामले में खासकर ध्यान देने की आवश्यकता है। डॉ प्रतिभा पांडे, सिविल सर्जन, कुशाभाऊ ठाकरे जिला अस्पताल बिछिया रीवा।