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भोपाल में विकास कार्यों पर फिर सवाल, करोड़ों का फुटपाथ तैयार; लोगों के लिए पहुंचना बना चुनौती

 भोपाल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में पहले 90 डिग्री वाले रेलवे ओवरब्रिज को लेकर देशभर में चर्चा हुई थी. अब राजधानी का एक और निर्माण कार्य सवालों के घेरे में आ गया है. इस बार मामला किसी पुल का नहीं, बल्कि पैदल यात्रियों के लिए बनाए गए फुटपाथ का है।  शहर के वार्ड-32 स्थित पीएंडटी चौराहे पर सौंदर्याकरण के तहत फुटपाथ का निर्माण कराया गया. लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि फुटपाथ के किनारे इतनी ऊंची लोहे की रेलिंग लगा दी गई कि अब वहां पहुंचना ही मुश्किल हो गया है. यानी जिस सुविधा को पैदल यात्रियों के लिए बनाया गया, उसका इस्तेमाल करना ही चुनौती बन गया है।  स्थानीय रहवासियों के मुताबिक, सड़क किनारे करीब तीन फीट ऊंची लोहे की फेंसिंग लगा दी गई है. कई जगहों पर रेलिंग के साथ पहले से बनी दीवार भी मौजूद है. ऐसे में फुटपाथ पूरी तरह घिरा हुआ नजर आता है।  सबसे बड़ी समस्या यह बताई जा रही है कि कई हिस्सों में फुटपाथ पर चढ़ने या एंट्री करने के लिए पर्याप्त रास्ता ही नहीं छोड़ा गया. नतीजा यह कि लोग फुटपाथ का इस्तेमाल करने के बजाय सड़क पर चलने को मजबूर हैं।  रोजाना सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने वाले यात्रियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि बस या अन्य वाहनों से उतरने के बाद फुटपाथ तक पहुंचने का कोई सीधा रास्ता नहीं बचा है।  ऐसे में यात्रियों को सड़क पर चलना पड़ रहा है, जिससे दुर्घटना का खतरा भी बढ़ सकता है. लोगों का सवाल है कि जब फुटपाथ का उद्देश्य ही पैदल यात्रियों को सुरक्षित रास्ता देना है, तो फिर उसके इस्तेमाल में ऐसी बाधाएं क्यों खड़ी की गईं? फुटपाथ बना या पिंजरा? निर्माण पर उठ रहे सवाल लोगों का आरोप है कि सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के नाम पर ऐसा डिजाइन तैयार किया गया, जिसमें पैदल यात्रियों की जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया गया. उनका कहना है कि योजना बनाते समय जमीनी हकीकत का आकलन नहीं किया गया. लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि फुटपाथ तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाए तो फिर उस पर खर्च किए गए सरकारी धन का क्या मतलब रह जाता है।  रहवासियों ने प्रशासन से मांग की है कि रेलिंग के बीच-बीच में पर्याप्त प्रवेश द्वार या गैप बनाए जाएं, ताकि लोग आसानी से फुटपाथ का उपयोग कर सकें. उनका कहना है कि पैदल यात्रियों की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए डिजाइन में आवश्यक बदलाव किए जाने चाहिए. फिलहाल यह निर्माण कार्य स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।   

भोपाल गैस त्रासदी प्रभावित क्षेत्रों में डिटॉक्सिफिकेशन अभियान, मिट्टी-भूजल सुधार पर सरकार का फोकस

भोपाल  मध्यप्रदेश सरकार ने भोपाल गैस त्रासदी के जहरीले कचरे के खात्मे के बाद अब प्रदेश और भोपाल पर लगे इस त्रासदी के आखिरी दाग को भी धोने की तैयारी शुरू कर दी है। यूनियन कार्बाइड (यूका) परिसर व आसपास के 2 किमी क्षेत्र में दूषित मिट्टी और भूजल का उपचार कराने के साथ जंग लगे यूका प्लांट के ढांचे को हटाने ओर जहर को विसंक्रमण करने का आकलन कराया जा रहा है। प्रक्रिया जल्द शुरू होगी। जमीन और भूजल में घुले जहर को दूर करने के बाद आगे की योजना पर काम शुरू होगा। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) की शुरुआत 1969 में भोपाल में कीटनाशकों के निर्माण के लिए हुई थी। 1979 में मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआइसी) निर्माण के लिए विशेष इकाई लगी। 1984 में गैस त्रासदी के बाद सरकार ने संयंत्र को कब्जे में लिया, फिर यहां कोई काम नहीं हुआ। त्रासदी के बाद यूका के जहरीले कचरे को बोरों में भरकर तलघर में रखवाया गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने पीथमपुर में इसे नष्ट कराया। हाईकोर्ट के निर्देशों पर अमल कर अब सरकार ने परिसर की मिट्टी और भूजल के साथ प्लांट का जहर भी खत्म कराने की तैयारी की है। भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग ने इसके लिए एजेंसियों और संस्थानों से प्रस्ताव मंगाए हैं।  तीन चरणों में होगा काम पहले चरण में साइट का प्रारंभिक आकलन होगा। दूसरे चरण में सूक्ष्मता से इन्वेस्टिगेशन और तीसरे चरण में इम्पैक्ट असेसमेंट स्टडी कराई जाएगी।     पहले चरण में विशेषज्ञों की टीम यूका परिसर के दस्तावेज- नक्शे देखेगी। आसपास के क्षेत्र का अध्ययन व नीरी, सीएसआइआर की पुरानी रिपोर्टों की जांच, फिर परिसर और आसपास के क्षेत्र की हाइड्रोजियोलोजी संबंधी डेटा और रिपोट्र्स देखेगी। परिसर की टोपोग्राफी, जियोलोजी, भूजल के एक्विफर और कैचमेंट एरिया का आकलन होगा। जमीन और भूजल के सैंपल के लिए जगह चिह्नित किए जाएंगे।     हेल्थ और सुरक्षा प्लान बनेगा ताकि किसी को नुकसान न हो। हाइड्रोजियोलोजिकल स्टडी के दौरान सतह की मिट्टी के साथ तालाब, डंप एरिया से सैंपल लिए जाएंगे। प्रदूषण का फैलाव आंकेंगे। यूका परिसर और आसपास 2 किमी एरिया से मिट्टी के 50 सेंपल और भूजल के 15 सेंपल 189 पैरामीटर पर परखेंगे। संक्रमित कचरे का निपटारा होगा। एक रेमेडियल एंड रिहेबिलिटेशन एकशन प्लान भी बनेगा।     खतरनाक अपशिष्ट और दूषित मिट्टी की सेंपलिंग और उपचार, भंडारण, निपटान का आकलन अध्ययन पर्यावरण प्रभाव (ईआइए) के सिद्धांतों और नियमों के अनुसार होगा। इसके तहत क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय आकलन, मिट्टी, भूजल, सतही जल निकायों, स्वास्थ्य प्रभाव परिवहन- निस्तारण के खतरे का आकलन और उससे निपटने की तरीके भी तय किए जाएंगे। प्रमुख बिंदु यूका के दो किलोमीटर क्षेत्र में प्रदूषण दूषित मिट्टी- भूजल होगा शुद्ध विशेषज्ञों की टीम से जांच और समाधान की तैयारी प्रस्ताव मंगाए

दवा विक्रेताओं की हड़ताल का असर, 20 मई को MP में नहीं मिलेंगी दवाएं, निजी मेडिकल स्टोर्स बंद रहेंगे

भोपाल  ऑनलाइन दवा व्यापार और केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में 'मध्य प्रदेश केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन' के आह्वान पर 20 मई को पूरे प्रदेश सहित राजधानी भोपाल के सभी निजी मेडिकल स्टोर्स बंद रहेंगे। भोपाल केमिस्ट संघ के अध्यक्ष जितेंद्र धाकड़ ने बताया कि दवा विक्रेता सुबह 10 बजे दवा बाजार में एकत्रित होंगे और सुबह 11 बजे कलेक्ट्रेट पहुंचकर कलेक्टर को प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपेंगे। ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के उल्लंघन का आरोप एसोसिएशन का आरोप है कि ऑनलाइन दवा व्यापार ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट का खुला उल्लंघन है। बिना फार्मासिस्ट की निगरानी के दवाओं की होम डिलीवरी से नकली और एक्सपायरी दवाओं का खतरा बढ़ रहा है। साथ ही ई-फार्मेसी कंपनियों की लागत से कम कीमत पर दवा बेचने की नीति (प्रेडेटरी प्राइसिंग) से पारंपरिक छोटे और मध्यम दवा व्यवसायियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। मरीजों की सुविधा के लिए खुले रहेंगे जन औषधि केंद्र दवा बाजार बंद रहने के दौरान मरीजों की सुविधा के लिए खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने वैकल्पिक इंतजाम किए हैं। हड़ताल के दौरान सभी सरकारी अस्पतालों, सिविल अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों की फार्मेसी और प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र खुले रहेंगे। इसके अलावा निजी अस्पतालों के अंदर स्थित मेडिकल स्टोर्स को भी बंद से मुक्त रखा गया है, ताकि भर्ती और आपातकालीन मरीजों को परेशान न होना पड़े।  

लग्जरी वृद्धाश्रम में खाली कमरों की स्थिति, 80,000 रुपए तक का किराया रोक रहा बुजुर्गों को

भोपाल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कुछ महीने पहले एक पेड वृद्धाश्रम की शुरुआत हुई थी। यह वृद्धाश्रम आधुनिक सुविधाओं से लैस था। उद्घाटन के इतने दिनों बाद भी इस वृद्धाश्रम में रहने वाला कोई नहीं है। सिर्फ दो बुजुर्गों को छोड़कर यह आधुनिक वृद्धाश्रम पूरी तरह से खाली है। ऐसे में इसकी व्यावहारिकता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। 56 बुजुर्ग नागरिकों को रहने की है व्यवस्था इस हाईटेक वृद्धाश्रम में 34 कमरे हैं। इन 34 कमरों में 56 बुजुर्ग नागरिक रह सकते हैं। कमरों के विकल्पों में सिंगल कमरों से लेकर सुइट तक शामिल हैं, जिन्हें बुजुर्गों को अलग-अलग स्तर पर आराम और प्राइवेसी देने के लिए डिजाइन किया गया है। पहले आओ, पहले पाओ की सुविधा वहीं, इस वृद्धाश्रम में बुकिंग पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर होती है। उद्घाटन के बाद से, दो कमरों को छोड़कर बाकी सभी कमरे खाली पड़े हैं। कमरे पूरी तरह से तैयार हैं लेकिन इन्हें लेने वाला कोई नहीं है। जनवरी में हुआ था उद्घाटन दरअसल, इसका उद्घाटन इसी साल जनवरी महीने में सीएम मोहन यादव ने किया था। इसके संचालन का जिम्मा एक एनजीओ के पास है। अपनी जरूरत के हिसाब से बुजुर्ग बुकिंग कर सकते हैं। खर्च अधिक होने की वजह से खाली पेड वृद्धाश्रम का कैंपस भोपाल के लिंक रोड पर नंबर 3 पर है। यह 5.25 एकड़ में फैला है। साथ ही इसमें काफी अत्याधुनिक सुविधाएं भी हैं। मगर रिस्पॉन्स कम होने की वजह यह है कि यह किसी बुजुर्ग को रखने का खर्च बहुत ज्यादा है। एक व्यक्ति के लिए हर महीने 45,000 रुपए से ज्यादा का खर्च आता है, जिसे कई लोग अपनी पहुंच से बाहर मानते हैं। 24 करोड़ रुपए की लागत से हुआ था निर्माण यहां रहने वाले लोगों की संख्या को देखते हुए राज्य सरकार ने अब इस बुजुर्गों के आश्रय को अपने सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के जरिए चलाने का प्रस्ताव रखा है। इसी विभाग ने 24 करोड़ रुपए की लागत से इस विशाल वृद्धाश्रम का निर्माण करवाया था। सरकार इसे न लाभ, न हानि के आधार पर चलाने की योजना बना रही है, जिससे प्रति व्यक्ति रहने का खर्च कम हो जाएगा और ज्यादा से ज्यादा बुजुर्ग नागरिक इसकी ओर आकर्षित होंगे। एक अधिकारी, सामाजिक न्याय विभाग अत्याधुनिक है वृद्धाश्रम इस आश्रय गृह में एसी कमरे, इंटरटेनमेंट और आराम की जगहें, टहलने के लिए पक्का रास्ता, फिजियोथेरेपी सेंटर, लॉन्ड्री, किचन, मेडिकल रूम और रोजमर्रा की जरूरत की सारी चीजें हैं। साथ ही बुजुर्गों की देखभाल करने वाला स्टाफ भी उपलब्ध है। मुनेश्वर कुमार

3700 एकड़ में डेवलप होगी नई सिटी, 20 अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने किया प्रोजेक्ट में रुचि का इज़हार

भोपाल  मध्यप्रदेश में एक नया शहर डेवलप किया जा रहा है। राज्य की राजधानी भोपाल में इसे नॉलेज एंड एआइ सिटी के नाम से विकसित किया जा रहा है। इसे भौरी क्षेत्र में बनाया जाएगा। नॉलेज एंड एआइ सिटी लगभग 3700 एकड़ भूमि पर विकसित की जाएगी। यहां प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के कैंपस रहेंगे और एआइ रिसर्च पार्क के तहत डेटा सेंटर बनाया जाएगा। एआइ लैब व रिसर्च हब भी विकसित किया जाएगा। खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट पर कई ग्लोबल एजेंसियों की नजर है। भौरी में प्रस्तावित नॉलेज एंड एआइ सिटी के विकास के लिए ऐसी 20 से अधिक एजेंसियोें ने रुचि दिखाई है। अधिकारियों का कहना है कि इसके निर्माण के लिए मुख्य एजेंसी को जल्द ही अंतिम रूप दिया जाएगा। नॉलेज एंड एआइ सिटी भौंरी क्षेत्र में इंदौर-भोपाल कॉरिडोर के पास विकसित होगी प्रस्तावित नॉलेज एंड एआइ सिटी भौंरी क्षेत्र में इंदौर-भोपाल कॉरिडोर के पास विकसित होगी। अभी इसकी विस्तृत योजना तय होनी है। इस प्रोजेक्ट में करीब 38 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। रिसर्च, स्टार्टअप, इंडस्ट्री और ग्लोबल यूनिवर्सिटीज का एक एकीकृत इकोसिस्टम बनाना उद्देश्य नॉलेज एंड एआइ सिटी प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसके लिए बीडीए को नोडल बनाया है। इसका उद्देश्य रिसर्च, स्टार्टअप, इंडस्ट्री और ग्लोबल यूनिवर्सिटीज का एक एकीकृत इकोसिस्टम बनाना है। जिले में इसे लेकर काफी चर्चा है। रोडमैप फॉर नॉलेज एंड एआइ सिटी पर एक महत्वपूर्ण सत्र भी आयोजित हो चुका है। प्रोजेक्ट के लिए अनेक ग्लोबल एजेंसियां लालायित, बीडीए और अन्य संबंधित अधिकारी बताते हैं कि 20 से ज्यादा एजेंसियां यह काम करने को तैयार एआई सिटी प्रोजेक्ट से भौरी क्षेत्र का भी खासा विकास होगा। इस प्रोजेक्ट के विकास के लिए अनेक ग्लोबल एजेंसियां लालायित हैं। बीडीए और अन्य संबंधित अधिकारी बताते हैं कि 20 से ज्यादा एजेंसियां यह काम करने को तैयार हैं। अधिकारियों के अनुसार एआई सिटी के निर्माण के लिए जल्द ही मुख्य एजेंसी को फायनल कर लिया जाएगा। ऐसे बढ़ेगी योजना: ग्लोबल यूनिवर्सिटीज के तहत प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के कैंपस होंगे, एआइ रिसर्च पार्क के तहत डेटा सेंटर और एआइ लैब के साथ एक समर्पित रिसर्च हब इस साल के आखिर तक एआई सिटी का काम जमीन पर उतारने की शुरुआत होगी। ग्लोबल यूनिवर्सिटीज के तहत प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के कैंपस यहां होंगे। एआइ रिसर्च पार्क के तहत डेटा सेंटर और एआइ लैब के साथ एक समर्पित रिसर्च हब तय किया जाएगा। स्टार्टअप इनक्यूबेशन सेंटर में नए उद्यमियों के लिए सुविधाएं दी जाएंगी।

मोहन ने ममता के गढ़ में किया जोरदार प्रदर्शन, कहा- वेस्ट बंगाल में कमल खिलने से कोई ताकत नहीं रोक सकती

भोपाल  पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। इस बीच मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 18 अप्रैल को कोलकाता की दो विधानसभाओं में धुआंधार प्रचार किया। उन्होंने कोलकाता जिले की कमरहाटी विधानसभा में भाजपा प्रत्याशी अरुप चौधरी और मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर सदर विधानसभा में भाजपा प्रत्याशी दिलीप घोष के समर्थन में जनता से समर्थन मांगा। दोनों विधानसभाओं में उन्होंने कहा कि दुनिया की कोई ताकत बंगाल में कमल खिलने से नहीं रोक सकती। पश्चिम बंगाल की जनता जंगलराज और तृणमूल कांग्रेस से त्रस्त हो चुकी है। जनता को अब विकास चाहिए। पश्चिम बंगाल में दहाड़े सीएम मोहन यादव 18 अप्रैल की सुबह सबसे पहले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कमरहाटी विधानसभा पहुंचे। यहां उन्होंने कहा कि बंगाल की जनता अब ठहराव नहीं, परिवर्तन और प्रगति की ओर बढ़ने को तैयार है। कई सालों से विकास की दौड़ में पीछे छूटा पश्चिम बंगाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार में नई ऊर्जा, नई दिशा और तेज प्रगति के साथ आगे बढ़ेगा। यहां के हर वर्ग के जीवन में जमीनी स्तर पर बदलाव नजर आएगा। कोलकाता के अंदरुनी इलाकों में बहुत गरीबी है और हालात बेहतर दयनीय हैं। यहां युवाओं के पास रोजगार नहीं है, मजबूरी में लोगों को परिवार का पालन पोषण करने के लिए पलायन करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि पश्चिम बंगाल में हर क्षेत्र में विकास की असीमित संभावनाएं हैं। अब बंगाल की जनता टीएमसी के कुशासन और जंगलराज से मुक्ति चाहती है। बंगाल लगातार गर्त में जा रहा है, इसके उत्थान के लिए खिलता कमल और भाजपा की सरकार चाहिए। गौरतलब है कि 18 अप्रैल की सुबह सबसे पहले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कमरहाटी विधानसभा पहुंचे। यहां उन्होंने कहा कि बंगाल की जनता अब ठहराव नहीं, परिवर्तन और प्रगति की ओर बढ़ने को तैयार है। कई सालों से विकास की दौड़ में पीछे छूटा पश्चिम बंगाल,  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार में नई ऊर्जा, नई दिशा और तेज प्रगति के साथ आगे बढ़ेगा। यहां के हर वर्ग के जीवन में जमीनी स्तर पर बदलाव नजर आएगा। कोलकाता के अंदरुनी इलाकों में बहुत गरीबी है और हालात बेहतर दयनीय हैं। यहां युवाओं के पास रोजगार नहीं है, मजबूरी में लोगों को परिवार का पालन पोषण करने के लिए पलायन करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि पश्चिम बंगाल में हर क्षेत्र में विकास की असीमित संभावनाएं हैं। अब बंगाल की जनता टीएमसी के कुशासन और जंगलराज से मुक्ति चाहती है। बंगाल लगातार गर्त में जा रहा है, इसके उत्थान के लिए खिलता कमल और भाजपा की सरकार चाहिए। 'बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोकने के लिए SIR जरूरी' मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सहित जहां हर राज्य तेजी से प्रगति कर रहा है, तो वही बंगाल पिछड़ रहा है। बंगाल की जनता प्रचंड बहुमत से राज्य में बीजेपी की सरकार बनाकर विकास की एक नई इबारत लिखना चाहती है। बंगाल चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है। प्रधानमंत्री मोदी देश की युवा शक्ति, नारी शक्ति, गरीब और अन्नदाताओं के कल्याण के लिए पूर्ण समर्पण भाव से कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सभी राज्यों में चुनाव आयोग के निर्देश पर एसआईआर कराया गया है। इस प्रक्रिया में सही मतदाताओं की पहचान की गई। बंगाल की प्रगति और बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोकने के लिए एसआईआर जरूरी है। 'जनता चाहती है बीजेपी का शासन' दूसरी ओर, शाम को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर सदर विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी दिलीप घोष के समर्थन में प्रचार किया। यहां उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की जनता की चेहरे की चमक बता रही है कि दुनिया की कोई ताकत यहां कमल खिलने से नहीं रोक सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी आज विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है और बंगाल में भी भाजपा चुनाव जीतेगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने भाजपा प्रत्याशी दिलीप घोष को बंगाल में भाजपा का शुभंकर बताया। उन्होंने कहा कि जैसे लोहा पारस के संपर्क में आने पर सोना बन जाता है। उसी प्रकार अगर कोई कार्यकर्ता दिलीप के संपर्क में आए तो वह भाजपा का बन जाता है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने दिलीप घोष के समर्थन में भव्य रोड शो भी किया। इस रोड शो में कार्यकर्ताओं के साथ स्थानीय जनता उमड़ पड़ी। रोड शो में उपस्थित लोगों ने भारत माता की जय और जय श्रीराम के नारे लगाए। तेजी से करेंगे विकास मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कमरहाटी विधानसभा क्षेत्र की गलियों में घूमकर जनता से बीजेपी के पक्ष में मतदान करने की अपील की। उन्होंने स्थानीय लोगों की समस्याएं सुनीं और भरोसा दिलाया कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनकल्याण के कार्यों को तेज गति से आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने कहा कि बंगाल देश के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेगा तो विकास की राह पर बहुत आगे बढ़ेगा। पश्चिम बंगाल कभी देश का सबसे अच्छा राज्य था। लेकिन पहले कम्युनिस्ट पार्टी और बाद में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सरकारों ने बंगाल का पूरा बेड़ा गर्क कर दिया। बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोकने के लिए एसआईआर जरूरी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सहित जहां हर राज्य तेजी से प्रगति कर रहा है, तो वही बंगाल पिछड़ रहा है। बंगाल की जनता प्रचंड बहुमत से राज्य में बीजेपी की सरकार बनाकर विकास की एक नई इबारत लिखना चाहती है। बंगाल चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है। प्रधानमंत्री मोदी देश की युवा शक्ति, नारी शक्ति, गरीब और अन्नदाताओं के कल्याण के लिए पूर्ण समर्पण भाव से कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सभी राज्यों में चुनाव आयोग के निर्देश पर एसआईआर कराया गया है। इस प्रक्रिया में सही मतदाताओं की पहचान की गई। बंगाल की प्रगति और बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोकने के लिए एसआईआर जरूरी है। जनता चाहती है बीजेपी का शासन दूसरी ओर, शाम को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर सदर विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी दिलीप घोष के समर्थन में प्रचार किया। यहां उन्होंने कहा कि पश्चिम … Read more

भोपाल टॉकीज तक ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार, काली माता मंदिर से 6 जंक्शन होंगे री-डिजाइन

भोपाल भोपाल शहर में ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए एक अहम कदम उठाया गया है। तलैया स्थित काली माता मंदिर से तीन मोहारा तक करीब 3.2 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर पर ट्रैफिक सुधार की नई योजना पर काम शुरू हो गया है। इस योजना के तहत काली माता मंदिर तिराहा से भोपाल टॉकीज चौराहे के बीच आने वाले 6 प्रमुख जंक्शनों (3 चौराहे और 3 तिराहे) को नए सिरे से डिजाइन किया जाएगा। विस्तृत प्लान पुलिस कमिश्नर के सामने प्रस्तुत किया गया इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा ट्रैफिक पुलिस ने School of Planning and Architecture (SPA) के साथ मिलकर तैयार की है। सोमवार को यह विस्तृत प्लान पुलिस कमिश्नर के सामने प्रस्तुत किया गया, जिसमें हर जंक्शन की मौजूदा समस्याओं और उनके समाधान को चिन्हित किया गया है। इस कॉरिडोर में भोपाल टॉकीज, नादरा बस स्टैंड, अल्पना, संगम, भारत टॉकीज और काली माता तिराहा जैसे व्यस्त जंक्शन शामिल हैं। ट्रायल में सामने आई असली समस्या हमीदिया रोड स्थित भोपाल टॉकीज चौराहे पर किए गए ट्रायल के दौरान यह पाया गया कि ट्रैफिक जाम की मुख्य वजह सड़क की चौड़ाई की कमी नहीं, बल्कि सड़क का गलत उपयोग और खामीपूर्ण डिजाइन है। ट्रायल के दौरान लेन डिसिप्लिन, स्टॉप लाइन और टर्निंग स्पेस में बदलाव कर ट्रैफिक फ्लो को बेहतर बनाया गया। जंक्शनों पर होंगे ये प्रमुख बदलाव नई डिजाइन के तहत ट्रैफिक मूवमेंट को ध्यान में रखते हुए कई सुधार किए जाएंगे:     स्टॉप लाइन, जेब्रा क्रॉसिंग और टर्निंग एंगल में सुधार     अनावश्यक कट और अवैध पार्किंग हटाई जाएगी     पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित फुटपाथ विकसित किए जाएंगे बाजार क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती कॉरिडोर के दोनों ओर घनी कमर्शियल गतिविधियों के कारण ट्रैफिक और पार्किंग का संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। इस समस्या के समाधान के लिए योजना में सड़क किनारे पार्किंग के साथ-साथ जरूरत के अनुसार मल्टीलेवल पार्किंग की व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई है। यह पहल शहर में ट्रैफिक मैनेजमेंट को आधुनिक और सुगम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।  

भोपाल में शुरू हुआ सूखे कचरे से कोयला बनाने का ट्रायल, 220 करोड़ में बना प्लांट

भोपाल भोपाल के आदमपुर छावनी में अब शहर के सूखे कचरे से कोयला बनाया जाएगा। नगर निगम ने पीपीपी मोड में 220 करोड़ रुपये की लागत से टोरिफाइड चारकोल प्लांट स्थापित किया है। इस प्लांट के माध्यम से प्रतिदिन 400 टन सूखे कचरे का निपटारा किया जाएगा और इसका ट्रायल रन भी शुरू कर दिया गया है। टोरिफाइड चारकोल प्लांट का महत्व स्वच्छ भारत मिशन के तहत नगर निगम ने यह कदम शहर में सस्टेनेबल वेस्ट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने के लिए उठाया है। आदमपुर छावनी में स्थापित यह प्लांट नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) के सहयोग से संचालित होगा। यहां से निर्मित टोरिफाइड चारकोल का उपयोग एनटीपीसी अपने औद्योगिक उपयोग में करेगी। ट्रायल रन और कचरे का प्रबंधन नगर निगम ने ट्रायल रन के लिए 3 दिनों में कुल 800 टन सूखा कचरा प्लांट को दिया है। पूरे ट्रायल रन के दौरान लगभग 1800 टन सूखे कचरे को प्रोसेस किया जाएगा। यह प्रक्रिया शहर से निकलने वाले सूखे कचरे के निपटान के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करेगी। तीन दिन में 800 टन कचरा पहुंचा ट्रायल के शुरुआती तीन दिनों में ही प्लांट में 800 टन सूखा कचरा पहुंचाया गया है। अधिकारियों के अनुसार ट्रायल के दौरान कुल 1800 टन कचरे का उपयोग किया जाएगा हर दिन 400 टन कचरे की प्रोसेसिंग 15 एकड़ में फैले इस प्लांट में प्रतिदिन 400 टन सूखे कचरे को प्रोसेस कर टोरिफाइड चारकोल तैयार किया जाएगा। यह तकनीक कचरा निपटान के साथ-साथ ऊर्जा उत्पादन के लिए भी उपयोगी साबित होगी।  बनारस के बाद दूसरा संयंत्र, जहां बिजली का कोयला बनेगा  बनारस के बाद देश में दूसरे टोरिफाइड चारकोल प्लांट के रूप में आदमपुर खंती में स्थापित संयंत्र का ट्रायल रन शुरू हो गया है। इस प्लांट के जरिए रोज 400 टन सूखे कचरे को प्रोसेस कर चारकोल में बदला जाएगा 2021 में हुआ था अनुबंध 12 अक्टूबर 2021 को अनुबंध होने के करीब पांच साल बाद प्लांट का ट्रायल शुरू हुआ। इस दौरान 2023 में खंती में आग लगने, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति में देरी और तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण प्रोजेक्ट तय समय से पीछे चला गया। बनारस में सेग्रीगेशन की कमी से प्लांट प्रभावित, यहां भी यही चुनौती बनारस में एनटीपीसी का करीब 200 टन प्रतिदिन क्षमता वाला टोरिफाइड चारकोल प्लांट 2021-22 में शुरू हुआ था। वहां संचालन के दौरान सबसे बड़ी समस्या साफ और अलग किया हुआ सूखा कचरा लगातार उपलब्ध न होना रही। इसके कारण प्लांट पूरी क्षमता पर नहीं चल पाया। भोपाल में भी ‘सेग्रीगेशन एट सोर्स’ कमजोर है। ऐसे में यदि घर स्तर पर कचरे का सही तरह से अलग नहीं हुआ, तो प्लांट को पर्याप्त गुणवत्ता वाला कचरा मिलना मुश्किल होगा। इससे इसका संचालन प्रभावित हो सकता है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह प्लांट केवल नए सूखे कचरे को ही प्रोसेस करेगा, जबकि खंती में पहले से जमा करीब 6 लाख टन लिगेसी वेस्ट जस का तस बना हुआ है। 400 टन क्षमता वाला बायो-सीएनजी प्लांट अब तक शुरू नहीं आदमपुर छावनी में प्रस्तावित 400 टन प्रतिदिन क्षमता का बायो-सीएनजी प्लांट भी अब तक शुरू नहीं हो सका है। यह प्लांट, जिसे देश का दूसरा सबसे बड़ा बताया गया था, अगस्त 2023 तक शुरू होना था, लेकिन पर्यावरणीय मंजूरी और तकनीकी अड़चनों के कारण इसमें देरी हो रही है। आयुक्त ने किया निरीक्षण नगर निगम आयुक्त Sanskriti Jain ने प्लांट का दौरा कर कार्यप्रणाली का निरीक्षण किया। उन्होंने इसे भोपाल के लिए गौरव का क्षण बताते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कदम बताया। एक नजर में प्रोजेक्ट 12 अक्टूबर 2021 को हुआ अनुबंध 220 करोड़ रुपये की लागत 15 एकड़ में स्थापित प्लांट प्रतिदिन 400 टन कचरे की प्रोसेसिंग क्षमता पर्यावरण को मिलेगा फायदा यह प्रोजेक्ट कचरे के वैज्ञानिक निपटान के साथ कोयले के विकल्प के रूप में उपयोगी होगा। इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और भोपाल देश के चुनिंदा शहरों में शामिल हो सकेगा, जहां कचरे का शत-प्रतिशत उपयोग किया जा रहा है। निगम को होगी लागत में बचत 15 एकड़ क्षेत्र में स्थापित इस प्लांट के संचालन से नगर निगम को सूखे कचरे के निपटान में होने वाले खर्च में बड़ी बचत होगी। पीपीपी मोड में लगाए गए इस प्लांट से नए लेगसी तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और शहर का कचरा प्रबंधन अधिक व्यवस्थित तरीके से होगा। बनारस के बाद भोपाल में दूसरा प्लांट एनटीपीसी के अधिकारियों के अनुसार, बनारस के अनुभव से सीख लेकर भोपाल प्लांट में अपग्रेड टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया है। यह मध्यप्रदेश का पहला ऐसा प्रोजेक्ट है जो शहर के कचरे से टोरिफाइड चारकोल का उत्पादन करेगा। नगर निगम कमिश्नर संस्कृति जैन ने शुक्रवार को प्लांट का निरीक्षण किया और ट्रायल रन की सफलता की जानकारी ली। इस प्रोजेक्ट से शहर का कचरा प्रबंधन और स्वच्छता दोनों ही स्तरों पर मजबूत होगा। निगम को बचत होगी पीपीपी मोड पर लगभग 220 करोड़ रुपए की लागत से आदमपुर छावनी में 15 एकड़ भूमि पर एनटीपीसी ने यह प्लांट स्थापित किया है। प्लांट के संचालन से निगम को सूखे कचरे के निष्पादन पर व्यय होने वाली राशि की बचत होगी और नया लेगसी तैयार नहीं हो पाएगा। बनारस के बाद भोपाल में ही लगा है प्लांट निगम कमिश्नर जैन को एनटीपीसी के अधिकारियों ने बताया कि बनारस के बाद भोपाल में देश का दूसरा ऐसा शहर है, जिसने टोरिफाइड चारकोल प्लांट स्थापित करने के लिए अनुबंध किया था। बनारस के प्लांट के संचालन के अनुभव एवं कार्य व्यवहार से सीख लेकर भोपाल के संयंत्र में अपग्रेड टेक्नालॉजी का उपयोग किया गया है। यह प्रोजेक्ट मध्यप्रदेश में अपने किस्म का पहला प्रोजेक्ट है। इस प्रोजेक्ट के माध्यम से नगर निगम हर रोज सूखे कचरे का निपटारा कर सकेगा।

भोपाल मेट्रोपॉलिटन एरिया का विस्तार: आष्टा और सोनकच्छ तक, छह जिलों के 2500 गांव होंगे शामिल

भोपाल  भोपाल विकास प्राधिकरण (बीडीए) ने भोपाल मेट्रोपॉलिटन एरिया की पहली रिपोर्ट तैयार कर ली है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल मेट्रोपॉलिटन एरिया का कुल क्षेत्रफल 12 हजार वर्ग किलोमीटर होगा। इसमें सीहोर जिले का आष्टा और देवास जिले का सोनकच्छ इलाका भी शामिल होगा, जो भोपाल और इंदौर को जोड़ने वाला बड़ा जंक्शन बनेगा। रिपोर्ट अब नगरीय विकास एवं आवास विभाग को सौंप दी गई है। वहीं इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया का क्षेत्रफल 14 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा हो जाएगा।  छह जिलों की 30 तहसीलें शामिल  भोपाल मेट्रोपॉलिटन एरिया में भोपाल, सीहोर, रायसेन, राजगढ़, विदिशा और नर्मदापुरम जिलों की कुल 30 तहसीलें और लगभग 2500 गांव शामिल किए जाएंगे। नर्मदापुरम जिले का सिर्फ 6 प्रतिशत हिस्सा ही इसमें लिया गया है। इटारसी को इस एरिया में नहीं जोड़ा गया है। इसमें शामिल प्रमुख तहसीलें और इलाके में बैरसिया, हुजूर, कोलार, आष्टा, बुधनी, दोराहा, इछावर, जावर, रेहटी, सीहोर, श्यामपुर, गोहरगंज, रायसेन, सुल्तानपुर, ब्यावरा, खुजनेर, नरसिंहगढ़, पचौर, राजगढ़, सारंगपुर, सुठालिया, गुलाबगंज, विदिशा, डोलरिया, होशंगाबाद, माखन नगर आदि शामिल हैं।  इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया भी बढ़ेगा इंदौर विकास प्राधिकरण ने पहले सर्वे में 39 शहरों और 1786 गांवों को मिलाकर 9989 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल बताया था। लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर अब इसमें और इलाके जोड़े जा रहे हैं। नया क्षेत्रफल 14 हजार वर्ग किलोमीटर तक पहुंच जाएगा। यह फायदा होगा दोनों शहरों की बड़ी परियोजनाएं अब मिलकर बनाई जाएंगी। शहरों को जोड़ने, सड़क-बिजली-नल-पानी जैसी सुविधाएं देने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। जमीन अधिग्रहण, अतिक्रमण या विभागों के बीच तकरार जैसी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। केंद्र सरकार बड़े शहरों के विकास के लिए अलग से पैकेज देगी। ट्रिलियन प्लस आबादी वाले शहरों को विशेष फंड मिलेगा। दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों को भी 5-5 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त मदद मिलेगी। 6 माह में तैयार होगी रिपोर्ट  बीडीए ने सभी शामिल इलाकों की पूरी जानकारी मांगी है। कृषि, राजस्व, परिवहन, लोक निर्माण, उद्योग, पर्यटन, जल संसाधन समेत कई विभागों से जनसंख्या, उद्योग, लोगों की आय और रोजगार संबंधी आंकड़े मांगे गए हैं। रिपोर्ट तैयार करने में 6 महीने और लग सकते हैं। इसके बाद विस्तृत प्लानिंग शुरू होगी। इस फैसले से भोपाल-इंदौर क्षेत्र में विकास की रफ्तार तेज हो जाएगी और लोगों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। 

सिलेंडर की भारी कमी, 25 दिन का नियम कागजों तक ही सीमित, महीने बाद ही मिलेगा नया

भोपाल  पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और ऊर्जा आपूर्ति पर मंडराते संकट के बीच राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के लाखों रसोई गैस उपभोक्ता एक नई डिजिटल समस्या से जूझ रहे हैं। तेल कंपनियों द्वारा लागू किए गए 25 दिन के अंतराल के नियम ने व्यवहार में लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। कागजों में यह नियम पारदर्शिता और जमाखोरी रोकने के लिए बनाया गया है, लेकिन हकीकत में उपभोक्ताओं को दूसरा सिलेंडर पाने के लिए लगभग एक महीने तक इंतजार करना पड़ रहा है। बुकिंग और डिलीवरी की तारीख के बीच बढ़ते अंतर ने डिजिटल सिस्टम को ऐसा जाल बना दिया है, जिसमें आम आदमी की रसोई फंसती नजर आ रही है। डिजिटल नियम बना परेशानी का कारण     राजधानी की विभिन्न गैस एजेंसियों से मिल रही शिकायतों के अनुसार उपभोक्ताओं को दूसरे सिलेंडर के लिए तय समय से अधिक इंतजार करना पड़ रहा है। नियम के अनुसार एक सिलेंडर की बुकिंग के बाद 25 दिन का अंतराल आवश्यक है, लेकिन सिस्टम की गणना का तरीका उपभोक्ताओं के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है।     तेल कंपनियां इस अंतराल की गणना बुकिंग की तारीख से नहीं बल्कि सिलेंडर की डिलीवरी की तारीख से कर रही हैं। यही कारण है कि उपभोक्ता समय पर बुकिंग करने के बावजूद अगला सिलेंडर समय पर नहीं ले पा रहे हैं। डिलीवरी में देरी बढ़ा रही इंतजार     गैस एजेंसियों द्वारा सिलेंडर पहुंचाने में होने वाली देरी भी इस समस्या को और गंभीर बना रही है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी उपभोक्ता ने 20 फरवरी को गैस बुक की और एजेंसी ने सिलेंडर 26 फरवरी को पहुंचाया, तो सिस्टम के अनुसार अगली बुकिंग 24 मार्च से पहले संभव नहीं होगी।     इस स्थिति में उपभोक्ता को लगभग एक महीने तक इंतजार करना पड़ रहा है। एजेंसियों की देरी का सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है, जबकि डिजिटल सिस्टम उन्हें निर्धारित समय से पहले बुकिंग करने से रोक देता है। जरूरत के समय काम नहीं आ रहा सिस्टम     मध्यमवर्गीय परिवारों में अक्सर गैस की खपत स्थिति के अनुसार बदलती रहती है। घर में मेहमान आने, किसी आयोजन या अन्य कारणों से कई बार सिलेंडर 22–23 दिनों में ही खत्म हो जाता है। ऐसे समय में उपभोक्ता नया सिलेंडर बुक नहीं कर पाते।     मोबाइल एप और ऑनलाइन पोर्टल पर उपभोक्ताओं को ‘अभी बुकिंग संभव नहीं’ जैसा संदेश मिलता है। इससे लोगों में नाराजगी भी बढ़ रही है। उपभोक्ताओं का कहना है कि संकट के समय तकनीक सुविधा देने के बजाय बाधा बन रही है। पारदर्शिता के नाम पर बढ़ी दिक्कत     शहर के नागरिकों का कहना है कि पारदर्शिता और जमाखोरी रोकने के उद्देश्य से बनाया गया यह डिजिटल सिस्टम अब आम उपभोक्ता के लिए परेशानी का कारण बन गया है। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण पहले ही गैस और ऊर्जा की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। ऐसे में उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि इस नियम को व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए। यदि डिलीवरी में देरी हो रही है तो उसकी गणना उपभोक्ता के खिलाफ नहीं होनी चाहिए। नियम में लचीलापन जरूरी     उपभोक्ता संगठनों का मानना है कि सरकार और तेल कंपनियों को इस डिजिटल व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार बुकिंग की गणना डिलीवरी की तारीख के बजाय बुकिंग की तारीख से होनी चाहिए या फिर विशेष परिस्थितियों में उपभोक्ताओं को अतिरिक्त छूट दी जानी चाहिए।     यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में यह डिजिटल नियम लाखों परिवारों की रसोई पर और भारी पड़ सकता है।