नीतीश चले दिल्ली: बिहार की सियासत में बड़ा मोड़, क्या भाजपा संभालेगी सीएम की कुर्सी?
पटना बिहार की राजनीति में एक बड़े युग का समापन होने जा रहा है। महज 105 दिन पहले 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार का बिहार की सत्ता छोड़ना राज्य में पीढ़ीगत बदलाव का अंतिम चरण है। उनके इस फैसले ने न केवल जदयू के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी- भाजपा के लिए बिहार की राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके खुद यह जानकारी दी है। नीतीश के राज्यसभा जाने का मतलब है राज्य की सत्ता में बहुत कुछ बदलने जा रहा है। राज्य में नई सरकार बनेगी। महज 105 दिन पहले दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश नौवीं बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। आइये जानते हैं नीतीश के कुर्सी छोड़ने से बिहार के लिए और क्या-क्या बदल जाएगा? 1. पहली बार बिहार की सत्ता की बागडोर संभाल सकती है भाजपा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा के नामांकन की बात कहने के साथ ही यह तय हो गया है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है। बीते नवंबर राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड बहुमत के साथ जीत मिली थी। 89 सीटें जीतकर भाजपा विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। इसके बाद भी चुनाव पूर्व किए वादे के मुताबिक, राज्य की बागडोर 85 सीटें जीतने वाले जदयू के नीतीश कुमार के हाथ में आई। नीतीश के सत्ता संभालने के महज 105 दिन बाद यह तय हो गया है कि बिहार में नीतीश राज का अंत होने जा रहा है। इसके साथ ही इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि राज्य में पहली बार भाजपा अपना मुख्यमंत्री बना सकती है। 2. हिंदी हार्टलैंड का आखिरी किला फतह करेगी भाजपा 1980 में अपने जन्म के साथ ही भाजपा को हिंदी भाषी राज्यों की पार्टी के रूप में पहचना मिली। बीते साढ़े चार दशक में पार्टी दो लोकसभा सीट से 300 से अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी बन चुकी है। एक समय देश के 21 राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार रही। अभी भी पार्टी 20 राज्यों की सत्ता में हिस्सेदार है। इन सबके बावजूद हिंदी हार्टलैंड की पार्टी कही जाने वाली भाजपा देश के दूसरे सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य में अब तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी है। इसके अलावा अन्य हिंदी भाषी राज्यों की बात करें तो यूपी, हरियाणा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश की सत्ता में भाजपा दो या दो से ज्यादा बार से सत्ता में है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पार्टी ने पांच साल बाद फिर से सत्ता में वापसी की है। राजधानी दिल्ली में भी 27 साल बाद पार्टी ने सत्ता में वापसी की है। वहीं, हिमाचल प्रदेश, झारखंड में भी पार्टी अपना मुख्यमंत्री बना चुकी है। बिहार इकलौता हिंदी भाषी राज्य है जहां भाजपा अब तक अपना मुख्यमंत्री बनने का इंतजार कर रही है। 3. नौवीं बार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे नीतीश नीतीश कुमार बीते दो दशक के बिहार की सत्ता का पर्याय बने हुए हैं। इस दौरान उनकी पार्टी राज्य की पहले नंबर की पार्टी रही हो या तीसरे नंबर की मुख्यमंत्री नीतीश ही बनते रहे। 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले नीतीश का पहला कार्यकाल महज सात दिन का रहा था। इसके बाद 2005 में राज्य के मुख्यमंत्री बने नीतीश ने अपना दूसरा कार्यकाल पूरा किया। 2010 में उन्होंने प्रचंड जीत के साथ तीसरी बार शपथ ली, लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। दरअसल, भाजपा ने जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया तो नीतीश ने अपनी राह बदल ली। लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी अकेले उतरी और बुरी तरह हारी। पार्टी को राज्य की 40 में से महज दो सीटों पर जीत मिली। इस हार के बाद नीतीश ने कुर्सी छोड़ दी और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया। महज नौ महीने बाद नीतीश ने फिर से सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली। इसके बाद 2015 का विधानसभा चुनाव नीतीश ने अपने धुर विरोधी लालू यादव के साथ मिलकर लड़ा और एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। 2017 में उन्होंने फिर से भाजपा का दामन थाम लिया और एक बार फिर राज्य की बागडोर संभाली। 2020 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद फिर से नीतीश मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, जबकि उनकी पार्टी सीटों के लिहाज से राज्य में तीसरे स्थान पर खिसक गई थी। 2022 में नीतीश ने फिर से लालू का साथ पकड़ा और फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2024 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले नीतीश फिर से भाजपा के साथ आ गए और फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2025 में विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश ने 10वीं बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शपथ लेने महज 105 दिन बाद यह तय हो गया कि नीतीश नौवीं बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। शायद ये आखिरी बार भी होगा। 4. बिहार की सियासत में पीढ़ीगत बदलाव आपातकाल के दौर में बिहार की सियासत में कई युवा चेहरे उभरे। ये चेहरे दशकों तक बिहार की सियासत का पर्याय रहे। लालू प्रसाद यादव, सुशील मोदी, रामविलास पासवान, शरद यादव, नीतीश कुमार इनमें सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे। इन चेहरों में से रामविलास पासवान, सुशील मोदी और शरद यादव का निधन हो चुका है। लालू यादव चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराए जाने के बाद से सक्रिय सियासत से दूर हैं। अब इस पीढ़ी के आखिरी बड़े चेहरे नीतीश के दिल्ली जाने के साथ ही बिहार की सियासत में एक पीढ़ी का लगभग अंत हो जाएगा। 5. बीस साल से बिहार की सत्ता में काबिज जदयू पहली बार बैक सीट पर होगी पिछले बीस साल और चार चुनाव से बिहार की सत्ता की बागडोर जदयू के हाथ में है। अब अगर राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री बनता है तो जदयू के गठन के बाद यह पहली बार होगा जब जदयू सहयोगी के रूप में बिहार की सत्ता में होगी। 6. दूसरी बार जदयू का शीर्ष नेता बिहार की सत्ता का हिस्सेदार नहीं होगा ये दूसरा मौका होगा जदयू सत्ता की … Read more