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नीतीश चले दिल्ली: बिहार की सियासत में बड़ा मोड़, क्या भाजपा संभालेगी सीएम की कुर्सी?

पटना बिहार की राजनीति में एक बड़े युग का समापन होने जा रहा है। महज 105 दिन पहले 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार का बिहार की सत्ता छोड़ना राज्य में पीढ़ीगत बदलाव का अंतिम चरण है। उनके इस फैसले ने न केवल जदयू के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी- भाजपा के लिए बिहार की राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके खुद यह जानकारी दी है। नीतीश के राज्यसभा जाने का मतलब है राज्य की सत्ता में बहुत कुछ बदलने जा रहा है। राज्य में नई सरकार बनेगी। महज 105 दिन पहले दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश नौवीं बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। आइये जानते हैं नीतीश के कुर्सी छोड़ने से बिहार के लिए और क्या-क्या बदल जाएगा? 1. पहली बार बिहार की सत्ता की बागडोर संभाल सकती है भाजपा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा के नामांकन की बात कहने के साथ ही यह तय हो गया है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है। बीते नवंबर राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड बहुमत के साथ जीत मिली थी। 89 सीटें जीतकर भाजपा विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। इसके बाद भी चुनाव पूर्व किए वादे के मुताबिक, राज्य की बागडोर 85 सीटें जीतने वाले जदयू के नीतीश कुमार के हाथ में आई। नीतीश के सत्ता संभालने के महज 105 दिन बाद यह तय हो गया है कि बिहार में नीतीश राज का अंत होने जा रहा है। इसके साथ ही इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि राज्य में पहली बार भाजपा अपना मुख्यमंत्री बना सकती है।   2. हिंदी हार्टलैंड का आखिरी किला फतह करेगी भाजपा 1980 में अपने जन्म के साथ ही भाजपा को हिंदी भाषी राज्यों की पार्टी के रूप में पहचना मिली। बीते साढ़े चार दशक में पार्टी दो लोकसभा सीट से 300 से अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी बन चुकी है। एक समय देश के 21 राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार रही। अभी भी पार्टी 20 राज्यों की सत्ता में हिस्सेदार है। इन सबके बावजूद हिंदी हार्टलैंड की पार्टी कही जाने वाली भाजपा देश के दूसरे सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य में अब तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी है। इसके अलावा अन्य हिंदी भाषी राज्यों की बात करें तो यूपी, हरियाणा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश की सत्ता में भाजपा दो या दो से ज्यादा बार से सत्ता में है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पार्टी ने पांच साल बाद फिर से सत्ता में वापसी की है। राजधानी दिल्ली में भी 27 साल बाद पार्टी ने सत्ता में वापसी की है। वहीं, हिमाचल प्रदेश, झारखंड में भी पार्टी अपना मुख्यमंत्री बना चुकी है।  बिहार इकलौता हिंदी भाषी राज्य है जहां भाजपा अब तक अपना मुख्यमंत्री बनने का इंतजार कर रही है। 3. नौवीं बार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे नीतीश नीतीश कुमार बीते दो दशक के बिहार की सत्ता का पर्याय बने हुए हैं। इस दौरान उनकी पार्टी राज्य की पहले नंबर की पार्टी रही हो या तीसरे नंबर की मुख्यमंत्री नीतीश ही बनते रहे। 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले नीतीश का पहला कार्यकाल महज सात दिन का रहा था। इसके बाद 2005 में राज्य के मुख्यमंत्री बने नीतीश ने अपना दूसरा कार्यकाल पूरा किया। 2010 में उन्होंने प्रचंड जीत के साथ तीसरी बार शपथ ली, लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। दरअसल, भाजपा ने जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया तो नीतीश ने अपनी राह बदल ली। लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी अकेले उतरी और बुरी तरह हारी। पार्टी को राज्य की 40 में से महज दो सीटों पर जीत मिली। इस हार के बाद नीतीश ने कुर्सी छोड़ दी और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया। महज नौ महीने बाद नीतीश ने फिर से सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली। इसके बाद 2015 का विधानसभा चुनाव नीतीश ने अपने धुर विरोधी लालू यादव के साथ मिलकर लड़ा और एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। 2017 में उन्होंने फिर से भाजपा का दामन थाम लिया और एक बार फिर राज्य की बागडोर संभाली। 2020 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद फिर से नीतीश मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, जबकि उनकी पार्टी सीटों के लिहाज से राज्य में तीसरे स्थान पर खिसक गई थी। 2022 में नीतीश ने फिर से लालू का साथ पकड़ा और फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2024 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले नीतीश फिर से भाजपा के साथ आ गए और फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2025 में विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश ने 10वीं बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शपथ लेने महज 105 दिन बाद यह तय हो गया कि नीतीश नौवीं बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। शायद ये आखिरी बार भी होगा। 4. बिहार की सियासत में पीढ़ीगत बदलाव आपातकाल के दौर में बिहार की सियासत में कई युवा चेहरे उभरे। ये चेहरे दशकों तक बिहार की सियासत का पर्याय रहे। लालू प्रसाद यादव, सुशील मोदी, रामविलास पासवान, शरद यादव, नीतीश कुमार इनमें सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे। इन चेहरों में से रामविलास पासवान, सुशील मोदी और शरद यादव का निधन हो चुका है। लालू यादव चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराए जाने के बाद से सक्रिय सियासत से दूर हैं। अब इस पीढ़ी के आखिरी बड़े चेहरे नीतीश के दिल्ली जाने के साथ ही बिहार की सियासत में एक पीढ़ी का लगभग अंत हो जाएगा। 5. बीस साल से बिहार की सत्ता में काबिज जदयू पहली बार बैक सीट पर होगी पिछले बीस साल और चार चुनाव से बिहार की सत्ता की बागडोर जदयू के हाथ में है। अब अगर राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री बनता है तो जदयू के गठन के बाद यह पहली बार होगा जब जदयू सहयोगी के रूप में बिहार की सत्ता में होगी। 6. दूसरी बार जदयू का शीर्ष नेता बिहार की सत्ता का हिस्सेदार नहीं होगा ये दूसरा मौका होगा जदयू सत्ता की … Read more

आज बसिऔड़ा, कल गुलाल: बिहार में होली मनाने की परंपरा क्यों है सबसे अलग?

पटना मथुरा के बरसाने की लट्ठमार और वृंदावन की फूलों की होली तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसे देखने देश-विदेश से लोग आया करते हैं, लेकिन होली के मामले में बिहार भी पीछे नहीं है। यहां की होली भी रंग-बिरंगी है और रूप अनेक हैं। मतलब, बिहार के अलग-अलग इलाकों में होली कई अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। होली के त्योहार की शुरुआत इस बार 02 मार्च की रात होलिका दहन से हो चुकी है। आज गांव-देहात में धुरखेली जैसी परंपरा के तहत धूल-कीचड़ से होली की शुरुआत हो चुकी है। इस एक स्टोरी में जानिए, होलिका दहन और होली से बिहार में कहां-कैसे संस्कृति को जिंदा रखे हुए है। इसके साथ ही फगुआ या फाग कैसे रंग जमाता है, वह भी पढ़िए। होलिका दहन के पहले गांवों में गोइठा मांगने की रही है परंपरा बिहार के गांवों में होली के आगमन के पहले होलिका दहन करने के लिए घर-घर से चंदा के रूप में गोइठा मांगने की प्राचीन परंपरा रही है। इस परंपरा के तहत युवाओं, खासकर बच्चों की टोली अपने-अपने गांव में बोरियां लेकर घूमती और हर घर जाकर चंदा के रूप में गोइठा मांगती रही है। इस दौरान बच्चे और युवा, "अगजा गोसाईं गोड़ लागे ली, घूम-घूम के गोइठवां मांगे ली" का यह गीत गाते गांव में फिरते हैं। जैसे ही वे किसी के घर पर गोइठा मांगने पहुंचते हैं, तो उनका दूसरा गीत शुरू होता है। घर की मालकिन महिला को संबोधित करते हुए वे गाते हैं, "ए जजमानी तोरा सोने के केवाड़ी, दू (चार, पांच, दस की संख्या) गोइठा दा"। इसके बाद उस घर से गोइठा मिलने के बाद रुख अगले घर की ओर और गीत के वही बोल। यह सिलसिला होलिका दहन का दिन आने तक चलता रहता था। बच्चे और युवक चंदे में मिले गोइठों को अपने गांव में एक स्थान पर जमा करते हैं। इसके बाद जमा किए गए गोइठा होलिका दहन में जलाए जाते हैं। हालांकि, कई गांवों में होलिका दहन के लिए गोइठा मांगने की यह परंपरा अब लुप्त होती जा रही है। दरभंगा में डंफा की थाप पर होलिका दहन परिक्रमा की परंपरा दरभंगा के ग्रामीण इलाकों में डंफा (एक तरह का ढोल) की थाप पर पारंपरिक होली गीतों के गायन के साथ जलती हुई होलिका की परिक्रमा करने की समृद्ध परंपरा रही है। हालांकि, यह परंपरा अब धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। कुछ गांवों में ही इस परंपरा का निर्वहन हो रहा है। फगुआ (फाग) गायन अब गांव से शहरों तक पहुंचा हुआ है होली के आगमन के पहले बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) के दिन से बिहार में फगुआ (फाग) गायन की समृद्ध परंपरा रही है। यह परंपरा आज भी जीवित है। इसके तहत गांवों में सार्वजनिक स्थान पर और शहरी इलाकों में देवी-देवताओं के मंदिरों के परिसर में फगुआ गाए जाते हैं। फगुआ गायन बसंत पंचमी से शुरू होकर होली तक चलता है। इस दौरान लोग राम-सीता, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, विष्णु-लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं के होली खेलने के गीत गाते हैं। होली के दिन फाग गायन के समाप्त होने के बाद चैत्र (चैत) माह के शुरू होने के साथ ही चैता गायन शुरू होता है, जो रामनवमी तक चलता है। इस दौरान "चैत मासे लिहले जनमवा हो रामा चैत मासे…" आदि पारंपरिक लोकगीत उमंग के साथ गाए जाते हैं। बिहार में होली के साथ कुछ गंदी परंपराएं भी चली आ रही हैं। इनमें हंड़िया टांगने और कीचड़ वाली होली शामिल है। हंड़िया टांगने वाली परंपरा पूरी तरह शरारत से भरी है। इस परंपरा में गांवों में शरारती किस्म के युवक मिट्टी की हांडी की गर्दन में रस्सी बांधते हैं और हांडी में मल-मूत्र, गंदगी या कीचड़ भर कर रात में किसी घर के मुख्य दरवाजे पर टांग देते हैं। साथ ही दरवाजे पर कीचड़, गंदगी या मल-मूत्र बिखेर देते हैं। यहां तक कि किसी छोटे जानवर का मृत शरीर भी घर के दरवाजे पर टांग देते हैं। सुबह होते ही घर का मालिक या परिवार का कोई सदस्य जैसे ही दरवाजा खोलता है, वह हंड़िया से टकरा जाता है और सारी गंदगी उस पर गिर जाती है तथा पैर भी दरवाजे पर गिराई गई गंदगी से सन जाते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसा जिस घर के साथ होगा, उस घर के लोग ऐसा करने वालों को गालियां देंगे; और ऐसा करने वाले लोग भी उसी टोले-मुहल्ले के होते हैं, जो गालियां सुनकर खुद मजे लेते हैं तथा उन्हें और गाली देने के लिए प्रेरित भी किया करते हैं। गांवों में शरारती किस्म के युवक हंड़िया टांगने वाला काम बहुधा उन्हीं घरों पर करते हैं, जिस घर के लोग चिढ़ने और गुस्सा करने वाले होते हैं। होली की दूसरी गंदी और गलत परंपरा कीचड़ तथा गंदगी वाली होली है। इस होली में लोग नाली के कीचड़, गोबर, मिट्टी, मल-मूत्र से होली खेलते हैं। इस तरह की होली झगड़े का भी सबब बन जाती है। सुखद बात यह है कि सभ्यता के विकास के दौर में होली से जुड़ी ये गलत परंपराएं अब समाप्त हो रही हैं।

रहस्यमय ढंग से गायब हुईं बिहार की 5 नाबालिग बच्चियां, लखनऊ में बरामद

सहरसा बिहार के सहरसा जिले से लापता हुई पांच लड़कियों का मामला सुलझा लिया गया है। ये पांचों लड़कियां उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐशबाग रेलवे स्टेशन से सुरक्षित बरामद कर ली गई हैं। 27 फरवरी को घास काटने के लिए घर से निकली इन लड़कियों के अचानक गायब होने से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया था, जिसके बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एसआईटी (SIT) का गठन किया था। ऐसे मिली सफलता जांच के दौरान पुलिस को संदेह था कि लड़कियां ट्रेन के जरिए कहीं बाहर जा सकती हैं। इसी संभावना को देखते हुए एसआईटी ने प्रदेश के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर अलर्ट जारी कर दिया था और लड़कियों की तस्वीरें जीआरपी (GRP) और आरपीएफ (RPF) को साझा की थीं। 28 फरवरी को जब ये लड़कियां लखनऊ के ऐशबाग स्टेशन पर देखी गईं, तो रेलवे पुलिस और आरपीएफ के जवानों ने तुरंत उनकी पहचान कर ली और उन्हें सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया। आखिर लखनऊ कैसे पहुंचीं लड़कियां? लड़कियों के सकुशल मिलने की खबर मिलते ही उनके परिजनों ने राहत की सांस ली है। वहीं, सहरसा पुलिस की एक टीम उन्हें लाने के लिए लखनऊ रवाना हो चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि घास काटने निकली ये पांच लड़कियां बिहार से इतनी दूर लखनऊ कैसे पहुंचीं? क्या इसके पीछे कोई साजिश है या वे स्वयं घर से निकली थीं? इन तमाम सवालों के जवाब अब बिहार पुलिस लड़कियों से पूछताछ के बाद ही साफ कर पाएगी। जांच में जुटी पुलिस सहरसा पुलिस का कहना है कि लड़कियों के सुरक्षित मिलने के बाद अब प्राथमिकता इस बात की जांच करना है कि वे घर से कैसे निकलीं और लखनऊ तक किन परिस्थितियों में पहुंचीं। पुलिस इस पूरे मामले के हर पहलू को खंगाल रही है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।

बिहार में निवेश की बड़ी घोषणा: श्याम स्टील का 5,000 करोड़ का प्लांट, 8,000 लोगों को मिलेगा रोजगार

पटना बिहार में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने की दिशा में सरकार की पहल पर श्याम स्टील ने राज्य में 5,000 करोड़ रुपए का निवेश करने पर सहमति जताई है। कंपनी गया-डोभी रोड स्थित प्रस्तावित औद्योगिक गलियारे में एक अत्याधुनिक स्टील कारखाना स्थापित करेगी। यह जानकारी बृहस्पतिवार को उद्योग मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने दी। उन्होंने बताया कि श्याम स्टील इस परियोजना के तहत 10 लाख टन सालाना क्षमता की स्टील विनिर्माण इकाई लगाएगी। इस परियोजना से राज्य में औद्योगिक गतिविधियों को गति मिलने के साथ-साथ लगभग 8,000 लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार मिलने की संभावना है। डॉ. जायसवाल ने बताया कि निवेश आकर्षित करने के लिए राज्य सरकार ने बेहतर प्रोत्साहन औद्योगिक नीति बनाई है, जिसके तहत निवेशकों को राज्य में लाने के लिए विशेष कदम उठाए जा रहे हैं। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया कि राज्य सरकार उन कंपनियों से सामग्री की खरीद को प्राथमिकता देगी, जिनकी उत्पादन इकाइयां बिहार में स्थापित होंगी। इसी नीति के तहत निवेश को बढ़ावा देने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उद्योग विभाग के अनुसार, प्रस्तावित कारखाने के स्थापित होने से गया-डोभी औद्योगिक गलियारे के विकास को गति मिलेगी और क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों का विस्तार होगा। श्याम स्टील की ओर से उद्योग विभाग को दिए गए प्रस्ताव के अनुसार, इस कारखाने के लिए 500 एकड़ जमीन की मांग की गई है।  

लाइब्रेरी में पढ़ रहा था छात्र, बाहर निकला तो बना दूल्हा! बिहार में पकड़ौआ विवाह का वीडियो वायरल

समस्तीपुर  बिहार से 'पकड़ौआ विवाह' का मामला फिर सामने आया है। यहां एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र को बंधक बनाकर उसकी मर्जी के खिलाफ शादी कराई गई है। इस पूरी घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा हैं। जानकारी के अनुसार, समस्तीपुर जिले के शाहपुर पटोरी थाना क्षेत्र के चकरांजली गांव की है। बताया जा रहा है कि 23 वर्षीय छात्र युवक घर से लाइब्रेरी जाने की बात कहकर निकला था, लेकिन देर रात तक वापस नहीं लौटा तो परिवार के लोग चिंतित हो गए। काफी तलाशने के बाद पता चला कि उसे गांव के ही कुछ लोगों ने रोक रखा है और जबरन शादी करवाई जा रही है। वायरल वीडियो में लड़का मंडप पर बैठा अचेत अवस्था में दिख रहा है। इसी हालत में ही उससे शादी की रस्में करवाई जा रही है। वीडियो में युवक खुद को कमरे में बंद बताए जाने और मदद की गुहार लगाते हुए नजर आ रहा है। वह दावा कर रहा है कि उसे करीब 24 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया। इधर पुलिस का कहना है कि अब तक पुलिस को लड़के के परिजनों की ओर से कोई लिखित शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। प्रारंभिक जांच में यह बात भी सामने आई है कि छात्र और युवती के बीच पहले से जान-पहचान या कथित प्रेम संबंध हो सकता है। पुलिस ने कहा कि घटना की जानकारी सोशल मीडिया के जरिए मिली है। वायरल वीडियो की सत्यता की जांच की जा रही है। सत्यापन के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटी है। 

होली में घर जाना होगा आसान: दुर्ग से मधुबनी के बीच चलेगी स्पेशल ट्रेन, समय-सारिणी जारी

रायपुर मार्च महीने में होली के महापर्व पर घर जाने वाले यात्रियों की भारी भीड़ को देखते हुए दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR) ने एक बड़ी राहत दी है। रेलवे प्रशासन ने दुर्ग से बिहार के मधुबनी के बीच ‘होली स्पेशल ट्रेन’ चलाने का निर्णय लिया है। यह ट्रेन छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्टेशनों जैसे रायपुर, बिलासपुर, चांपा और रायगढ़ से होते हुए झारखंड और बंगाल के रास्ते बिहार पहुंचेगी। होली के दौरान भीड़ नियंत्रण के लिए रेलवे विशेष पहल बता दें कि अक्सर होली के दौरान नियमित ट्रेनों में वेटिंग लिस्ट लंबी हो जाती है, जिससे यात्रियों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या को सुलझाने और यात्रियों को सुगम सफर प्रदान करने के लिए रेलवे द्वारा गाड़ी संख्या 08753/08754 का परिचालन किया जा रहा है। ट्रेन की समय-सारणी और रूट 1. दुर्ग-मधुबनी होली स्पेशल (08753): यह ट्रेन 1 मार्च 2026 को दुर्ग से रवाना होगी।     प्रस्थान: दुर्ग से रात 00:30 बजे।     प्रमुख स्टॉपेज: रायपुर (01:20), बिलासपुर (03:30), रायगढ़ (05:28), झारसुगुड़ा (07:15), हटिया (12:10), रांची (12:30), धनबाद (17:00), जसीडीह (20:25), बरौनी (00:40) और दरभंगा (03:15)।     आगमन: मधुबनी स्टेशन पर 2 मार्च को सुबह 04:45 बजे। 2. मधुबनी-दुर्ग होली स्पेशल (08754): वापसी में यह ट्रेन 2 मार्च 2026 को मधुबनी से प्रस्थान करेगी।     प्रस्थान: मधुबनी से सुबह 06:15 बजे।     वापसी का मार्ग: समस्तीपुर (08:40), क्यूल (12:00), चितरंजन (16:05), बोकारो स्टील सिटी (21:35), राउरकेला (03:18) और बिलासपुर (09:50)।     आगमन: रायपुर (11:40) और दुर्ग दोपहर 12:45 बजे (3 मार्च)। कोच संरचना यात्रियों की सुविधा के लिए इस स्पेशल ट्रेन में कुल 18 कोच लगाए गए हैं, जिसका विवरण निम्नानुसार है:     एसी थ्री टायर: 02 कोच     स्लीपर क्लास: 09 कोच     जनरल (सामान्य): 05 कोच     एसटीआरडी (गार्ड एवं दिव्यांग): 02 कोच     यात्रियों के लिए सलाह: रेलवे ने अपील की है कि यात्री अपनी टिकट रेलवे काउंटर या आधिकारिक वेबसाइट www.indianrail.gov.in के माध्यम से समय रहते बुक करा लें ताकि अंतिम समय की अफरा-तफरी से बचा जा सके।

कोडिंग की दुनिया में बिहार का परचम, सूर्य शेखर ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता 2026 में रचा इतिहास

पटना बिहार की मिट्टी ने एक बार फिर अपनी मेधा का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया है। पूर्णिया जिले के निवासी सूर्य शेखर ने अहमदाबाद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कोडिंग प्रतियोगिता 2026 में पहला स्थान हासिल कर न केवल अपने जिले, बल्कि पूरे भारत का नाम वैश्विक मंच पर रोशन किया है। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही सूर्य शेखर अब दुनिया के उभरते हुए सर्वश्रेष्ठ सॉफ्टवेयर डेवलपर्स की श्रेणी में शामिल हो गए हैं। यह विश्वस्तरीय प्रतियोगिता दुनिया की प्रतिष्ठित टेक कंपनियों के सहयोग से और प्रसिद्ध वेब फ्रेमवर्क लारावेल (Laravel) की देखरेख में आयोजित की गई थी। इस प्रतियोगिता में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान समेत 20 से अधिक विकसित देशों के करीब 1200 चुनिंदा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था। कड़े राउंड, जटिल चुनौतियां और सूर्य की शानदार जीत प्रतियोगिता के दौरान कोडिंग के जटिलतम लॉजिक्स को सुलझाने, तकनीकी दक्षता दिखाने और आधुनिक सॉफ्टवेयर चुनौतियों का समाधान करने जैसे कई कड़े राउंड आयोजित किए गए थे। सूर्य शेखर ने अपनी तार्किक क्षमता और बेहतरीन कोडिंग स्किल्स के दम पर सभी वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ते हुए सर्वोच्च स्थान हासिल किया। टेलर ओटवेल ने किया सम्मानित, मिला MacBook M4 सूर्य की इस असाधारण सफलता पर लारावेल फ्रेमवर्क के संस्थापक और दुनिया के दिग्गज प्रोग्रामर टेलर ओटवेल (Taylor Otwell) ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया। सम्मान के तौर पर सूर्य को नवीनतम MacBook M4 प्रदान किया गया। सूर्य शेखर ने बताया कि टेलर ओटवेल जैसे तकनीकी विजनरी से मिलना और उनसे भविष्य की तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और वेब डेवलपमेंट पर चर्चा करना उनके जीवन का सबसे सुखद अनुभव रहा। माता-पिता और बड़े भाई को दिया सफलता का श्रेय अपनी इस बड़ी उपलब्धि पर सूर्य शेखर भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि उनकी इस सफलता के पीछे उनके माता-पिता और बड़े भाई राजशेखर का मार्गदर्शन है। उल्लेखनीय है कि राजशेखर खुद एक अनुभवी सॉफ्टवेयर डेवलपर हैं, जिन्होंने सूर्य को तकनीक की बारीकियों से रूबरू कराया। सूर्य ने कहा, “यह जीत मेरे करियर का एक बड़ा पड़ाव है। मुझे उम्मीद है कि इससे छोटे शहरों के दूसरे छात्रों को भी बड़े वैश्विक लक्ष्यों की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।” बिहार में जश्न का माहौल, युवाओं के लिए बनी मिसाल सूर्य शेखर की इस अंतरराष्ट्रीय सफलता की खबर मिलते ही पूर्णिया समेत पूरे बिहार में जश्न का माहौल है। सोशल मीडिया पर उन्हें लगातार बधाइयाँ दी जा रही हैं। शिक्षाविदों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस उपलब्धि को बिहार के युवाओं के लिए एक मील का पत्थर बताया है। यह सफलता इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यदि युवाओं को सही मार्गदर्शन और उचित अवसर मिलें, तो वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी किसी से पीछे नहीं हैं।  

बिहार के युवाओं से लेकर बुजुर्गो तक को सौगात

पटना. देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में बजट 2026 पेश किया है। मोदी सरकार के इस बजट से बिहार को भी काफी उम्मीदें हैं। वित्त मंत्री ने लोकसभा में माघ पूर्णिमा और गुरु रविदास जयंती का जिक्र करते हुए कहा कि यह बजट देश के लिए शुभ अवसरों के बीच पेश किया जा रहा है। आज पेश होने वाले केंद्रीय बजट पर बिहार के युवा, महिलाओं, और नौकरीपेशा से लेकर बुजुर्गो तक की निगाहें हैं। इस बजट में एक्सप्रेस-वे और फोरलेन को संजीवनी मिलने की उम्मीद है। वहीं, स्लीपर वंदे भारत और किसानों को राहत की उम्मीद भी है। संसद में वित्त मंत्री ने ऐलान किया है कि पटना में अब पानी के जहाजों की मरम्मत होगी। इस बजट में बिहार राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबित परियोजनाओं के अलावा नये प्रोजेक्ट के तौर पर ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे का निर्माण शुरू होने उम्मीद पूरी हो सकती है। यह एक्सप्रेस-वे पूर्वी चम्पारण में नेपाल के सीमाई शहर रक्सौल से पश्चिम बंगाल के हल्दिया तक बनाया जाना है। इसके लिए इस बजट में जमीन अधिग्रहण के अलावा निर्माण के लिए भी राशि आवंटन की घोषणा की उम्मीद है। फिलहाल इसका अलाइनमेंट तय कर इससे प्रभावित होने वाले इलाकों का चयन किया जा चुका है। इस बार बजट में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए राशि का प्रावधान का अनुमान है।

ना फूल–ना बेलपत्र, यहां बैगन से होती है पूजा—बिहार के अनूठे शिवधाम की खास परंपरा

वैशाली वैशाली जिले के जंदाहा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत वसंतपुर धधुआ स्थित बाबा बटेश्वरनाथ धाम देश का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट काले रंग का शिवलिंग विराजमान है। यह प्राचीन और आस्था का केंद्र मंदिर दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के लिए जाना जाता है, जहां बड़ी संख्या में भक्त पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। बैगन चढ़ाने की अनोखी परंपरा बाबा बटेश्वरनाथ धाम के गर्भगृह में स्थापित भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर श्रद्धालु प्रसाद के रूप में बैगन (सब्जी) अर्पित करते हैं। क्षेत्र के किसान अपने खेतों में सब्जी की खेती करने के बाद पहली उपज के रूप में बैगन भगवान भोलेनाथ को चढ़ाते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें यहां अवश्य पूरी होती हैं और मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु बैगन चढ़ाने जरूर आते हैं। मंदिर के उपाध्यक्ष अनिल कुमार सिंह ने बताया कि यह एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है, जिसकी स्थापना का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। मान्यता है कि शिवलिंग स्वयं वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट हुआ है। मंदिर परिसर में भगवान नंदी महाराज की प्रतिमा भी स्थापित है और यहां शिवलिंग के साथ-साथ नंदी महाराज की भी विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। राजा जनक से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यता अनिल कुमार सिंह ने बताया कि एक मान्यता के अनुसार, राजा जनक जब जनकपुर से चंपा घाट स्नान के लिए आते थे, तो उनका हाथी, जिस पर पुष्पक विमान सजा होता था, बाबा बटेश्वरनाथ धाम में रुकता था। राजा जनक यहां भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने के बाद ही जनकपुर की ओर प्रस्थान करते थे। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र कृषि प्रधान है। जब किसानों की सब्जी की फसल तैयार होती है, तो वे सब्जियों में से बैगन को प्रसाद और चढ़ावे के रूप में बाबा बटेश्वरनाथ को अर्पित करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए बिहार के वैशाली, छपरा, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, पटना समेत कई जिलों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके अलावा असम के सिलचर, साथ ही नेपाल और रूस जैसे देशों से भी भक्त यहां आकर आशीर्वाद प्राप्त कर चुके हैं। अनिल कुमार सिंह ने बताया कि रूस से आए एक शिवभक्त ने रूस की मुद्रा चढ़ावे के रूप में अर्पित की थी, जिसे मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। मंदिर प्रशासन का दावा है कि पूरे विश्व में इस आकार और स्वरूप का काले रंग का शिवलिंग कहीं और नहीं है, जो वटवृक्ष के कंदरा से प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ हो। यही कारण है कि बाबा बटेश्वरनाथ धाम की पहचान देश-विदेश तक फैली हुई है। महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी पर भव्य मेला उन्होंने बताया कि महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी के अवसर पर मंदिर परिसर में भव्य मेला लगता है। महाशिवरात्रि पर एक माह तक मेला आयोजित होता है, जिसमें सैकड़ों क्विंटल बैगन भगवान को चढ़ाया जाता है। वहीं, बसंत पंचमी पर एक दिन का मेला लगता है, जिसमें भी बैगन चढ़ाया जाता है, हालांकि मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। मेले में तेजपत्ता और लकड़ी से बने सामानों की खूब बिक्री होती है। इसके अलावा सावन माह में भी पूजा-अर्चना और जलाभिषेक को लेकर शिवभक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। पूरा मंदिर परिसर और आसपास का वातावरण भक्ति और श्रद्धा से सराबोर नजर आता है।

इस साल कर्तव्य पथ पर क्यों नहीं दिखेगा बिहार?

पटना 26 जनवरी को होने वाले गणतंत्र दिवस समारोह में इस बार कर्तव्य पथ पर बिहार की झांकी नजर नहीं आएगी। दिल्ली में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय परेड के लिए बिहार को झांकी नहीं पेश की जाएगी। जानकारी के अनुसार, झांकी चयन को लेकर पिछले कुछ वर्षों में विवाद बढ़ने के बाद रक्षा मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए नई रोटेशन नीति लागू की है। इस नीति के तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को तीन साल में कम से कम एक बार झांकी दिखाने का अवसर दिया जाएगा।  इसी रोटेशन नीति के चलते इस बार बिहार को झांकी की सूची में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि राज्य हाल के वर्षों में अपनी झांकी प्रस्तुत कर चुका है। इस बार 30 झांकियां, आत्मनिर्भर भारत थीम पर परेड इस साल गणतंत्र दिवस परेड में कुल 30 झांकियां शामिल होंगी। झांकियों की मुख्य थीम ‘आत्मनिर्भर भारत’ रखी गई है। इसके साथ ही वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने की झलक भी झांकियों के माध्यम से दिखाई जाएगी। झांकियां देश की एकता, आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास को दर्शाएंगी। इन राज्यों और मंत्रालयों की झांकियां रहेंगी आकर्षण का केंन्द्र इस वर्ष जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियां परेड में शामिल होंगी, उनमें असम, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, केरल, महाराष्ट्र, मणिपुर, नगालैंड, ओडिशा, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और पंजाब शामिल हैं। राज्यों के अलावा कई केंद्रीय मंत्रालय और विभाग भी अपनी झांकियां पेश करेंगे। इनमें सेना, वायु सेना, नौसेना, संस्कृति मंत्रालय, आयुष मंत्रालय, गृह मंत्रालय, शिक्षा विभाग, पंचायती राज मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय और कौशल विकास मंत्रालय शामिल हैं।