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PAK में सियासी तूफान: Board of Peace विवाद पर PM शहबाज शरीफ निशाने पर

दावोस ,स्विट्जरलैंड संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजदूत रह चुकीं मलीहा लोधी ने इस बोर्ड ऑफ पीस की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाए हैं और कहा है कि यह लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान अपने बहुप्रतीक्षित 'बोर्ड ऑफ पीस' (शांति बोर्ड) को औपचारिक तौर पर लॉन्च कर दिया है। इसे संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने वाला चार्टर बताया जा रहा है। हालांकि, इस अंतरराष्ट्रीय निकाय के चार्टर पर हस्ताक्षर समारोह के दौरान ट्रम्प ने साफ किया कि उन्होंने भले ही अतीत में संयुक्त राष्ट्र की आलोचना की है, लेकिन वह चाहते हैं कि उनका यह नया बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर काम करे। उन्होंने कहा कि “एक बार जब यह बोर्ड पूरी तरह से गठित हो जाएगा, तो हम जो चाहें, कर सकेंगे और हम इसे संयुक्त राष्ट्र के साथ तालमेल बिठाकर करेंगे।” गाजा में सांति स्थापना के लिुए बनाए गए ट्रंप के इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पाकिस्तान समेत कई देश शामिल हुए है, जबकि यूरोपीय देशों समेत कुछ मुल्कों ने इसका सदस्य बनने का निमंत्रण ठुकरा दिया है। पाकिस्तान में बवाल इधर, पाकिस्तान में अब बवाल उठ खड़ा हुआ है। लोग इसके लिए शहबाज शरीफ सरकार की आलोचना कर रहे हैं और उन्हें ट्रंप का चाटुकार बता रहे हैं। शहबाज शरीफ सरकार के इस कदम के आलोचकों में पूर्व राजदूत से लेकर कई डिप्लोमेट्स, एक्सपर्ट और बुद्धिजीवी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजदूत रह चुकीं मलीहा लोधी ने इस बोर्ड ऑफ पीस की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाए हैं और कहा है कि यह लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा। उन्होंने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा है, 'पाकिस्तान ने एक ऐसे संगठन (बोर्ड ऑफ पीस) में शामिल होने का फैसला किया है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप संयुक्त राष्ट्र के विकल्प की तरह पेश कर रहे हैं। यह पहल सीधे तौर पर ट्रंप से जुड़ी है और उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद इसके टिके रहने की संभावना नहीं दिखती। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ट्रंप को खुश करना सिद्धांतों पर टिके रहने से ज्यादा अहम हो गया है?' यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है पूर्व डिप्लोमेट ने इस बात पर आपत्ति जताई कि पाकिस्तान ने उस बोर्ड में शामिल होने का फैसला किया है, जिसमें पहले से इजरायल शामिल है। उन्होंने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि एक तरफ पाकिस्तान ने अब तक इजरायल को मान्यता नहीं दी है, दूसरी तरफ उसके शामिल बोर्ड में शामिल हो रहा है। पूर्व डिप्लोमेट के मुताबिक, यह शहबाज शरीफ सरकार की फिलिस्तीन के प्रति गद्दारी है। फिलिस्तीनी मुद्दे के साथ गद्दारी पाकिस्तान के पूर्व कानून मंत्री बाबर अवान ने भी शरीफ सरकार के इस कदम की आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि सिर्फ ट्रंप को खुश करने के लिए शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर ने बोर्ड ऑफ पीस में सामिल होने का फैसला किया है, जो युद्ध अपराधों के लिए बदनाम बेंजामिन नेतन्याहू जैसे अपराधियों को जिम्मेदार बताना और फिलिस्तीनी मुद्दे के साथ गद्दारी है। अवान ने लिखा कि ट्रंप के बूट पॉलिश की आदत ने पाकिस्तान को कहां से कहां पहुंचा दिया है। उन्होंने इसे ऐतिहासिक भूल करार दिया है। मुस्लिम दुनिया का सबसे बड़ा पाखंड पाक पत्रकार बकीर सज्जाद ने भी एक्स पर लिखा, 'अफसोस है कि यही वो शांति बोर्ड है जो कुछ मुस्लिम देश ट्रंप की खुशामद और चापलूसी करके बेबस फिलिस्तीनियों के लिए हासिल कर पाए हैं। उन्होंने लिखा कि यह मुस्लिम दुनिया की सबसे बड़ी पाखंड वाली राजनीतिक मिसाल है। पाकिस्तान के पूर्व सीनेटर और वकील मुस्तफा नवाज खोखर ने एक्स पर लिखा, 'पाकिस्तान का बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का फैसला बिना किसी पब्लिक डिबेट और संसद की राय के लिया गया है, इसलिए यह अमान्य है।

गाजा मुद्दे पर दोहरा रवैया? ट्रंप की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल हुए मुस्लिम देश

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गाजा के लिए चर्चित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में कई मुस्लिम देश शामिल हो गए हैं। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने हाल ही में संयुक्त बयान जारी कर गाजा संघर्ष को खत्म करने के लिए चल रहे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को लेकर अपना समर्थन दोहराया है। हालांकि मुस्लिम देशों का यह फैसला विवादों के घेरे में आ गया है जहां यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि फिलिस्तीन की स्वायत्तता को लेकर चिंता जाहिर करने वाले देश अब किसी दूसरे प्रशासन को गाजा की जिम्मेदारी सौंपे जाने का समर्थन कैसे कर सकते हैं।   इससे पहले बुधवार को कतर, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई ने एक संयुक्त बयान जारी कर बोर्ड ऑफ पीस का समर्थन किया। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने कहा कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से अपने नेताओं को भेजे गए निमंत्रण का स्वागत करते हैं और सामूहिक रूप से ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का फैसला कर रहे हैं। बयान में यह भी कहा गया है कि सभी देश अपने-अपने कानूनी और जरूरी प्रक्रियाओं के तहत बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करेंगे। क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’? गौरतलब है कि ट्रंप का यह शांति बोर्ड गाजा में एक ट्रांजिशनल एडमिनिस्ट्रेशन के रूप में काम करेगा। अमेरिका का कहना है कि इसका मकसद स्थायी सीजफायर को मजबूत करना, गाजा के पुनर्निर्माण में मदद करना और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को एक न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ना है, ताकि पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता कायम हो सके। यह बोर्ड गाजा के लिए फंड जुटाने का काम भी करेगा। मुस्लिम देशों के फैसले पर सवाल कई जानकार इसे मुस्लिम देशों का ट्रंप के आगे सरेंडर बता रहे हैं। पाकिस्तानी सीनेट के विपक्ष के नेता अल्लामा राजा नासिर हुसैन ने इस बोर्ड को गलत बताते हुए कहा है कि इसे जंग के बाद गाजा को बाहरी लोगों द्वारा चलने के लिए बनाया गया था, जो असल में फिलीस्तीन के लोगों से उनका खुद का राज चलाने का अधिकार छीन लेता है और यह नए जमाने की गुलामी जैसा लगता है। भारत ने अभी तक नहीं लिया कोई फैसला इस बीच भारत ने अभी तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शांति बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए दिए गए आमंत्रण पर कोई फैसला नहीं लिया है। मामले से परिचित लोगों ने बुधवार को यह जानकारी दी है। बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने बोर्ड में शामिल होने के लिए कई वैश्विक नेताओं को आमंत्रित किया था। इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल हैं। मामले से परिचित लोगों ने बताया कि भारत इस पहल के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रहा है क्योंकि इसमें संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं।