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आरक्षण पर सुप्रीम मोड़: क्या महाराष्ट्र में विजेता उम्मीदवार भी हो जाएंगे बेदख़ल?

नई दिल्ली  ओबीसी आरक्षण विवाद में फंसे महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है और चुनाव का रास्ता सशर्त साफ कर दिया है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार (28 नवंबर) को महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग को उन स्थानीय निकायों में 50% से ज़्यादा आरक्षण को नोटिफाई करने से रोक दिया है, जहाँ अभी चुनाव की अधिसूचना होनी बाकी है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि जिन नगर परिषदों और नगर पंचायतों में पहले से 50 फीसदी से अधिक आरक्षण अधिसूचित हो चुका है, वहां चुनाव तो तय कार्यक्रम के अनुसार होंगे, लेकिन उनके नतीजे रिट याचिकाओं के अंतिम फैसले से प्रभावित होंगे। CJI जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने महाराष्ट्र लोकल बॉडीज में OBC रिजर्वेशन को चुनौती देने वाली रिट पिटीशन पर सुनवाई करते हुए ये आदेश दिया है। यानी इन सीटों पर हो सकता है कि कुछ उम्मीदवारों को जीतकर भी हारना पड़ सकता है या उन्हें जीत का स्वाद चखने से वंचित रहना पड़ सकता है क्योंकि जिन सीटों पर आरक्षण रद्द होगा, वहां जीते उम्मीदवार को विजेता होने के सुख से वंचित होना पड़ सकता है। 2 दिसंबर को मतदान होने हैं राज्य निर्वाचन आयोग की तरफ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट बलबीर सिंह ने बेंच को बताया कि 246 नगर परिषद और 42 नगर पंचायत हैं, जहां चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और वहां 2 दिसंबर को मतदान होने हैं। इनमें से 40 नगर परिषद और 17 नगर पंचायत ऐसी हैं, जहां आरक्षण 50% से ज़्यादा दिया गया है। हालांकि, उन्होंने पीठ को बताया कि राज्य में 29 नगर परिषदों, 32 ज़िला पंचायतों और 346 पंचायत समितियों के चुनाव अभी भी नोटिफाई होने बाकी हैं। रिट पिटीशन के नतीजे से प्रभावित होंगे चुनाव परिणाम इसके बाद CJI सूर्यकांत ने इस मामले को तीन जजों की बेंच को भेज दिया और 21 जनवरी को सुनवाई की तारीख तय करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा कि जहां भी चुनाव अधिसूचित हो चुके हैं, वहां तय समय पर चुनाव कराए जाएं। बेंच ने आदेश दिया, "इस बीच, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के चुनाव नोटिफाइड शेड्यूल के हिसाब से बिना देरी के हो सकते हैं। हालांकि, जिन नगर परिषदों, नगर पंचायतों और में आरक्षण 50% से ज़्यादा है, उनके नतीजे रिट पिटीशन के नतीजे पर निर्भर करेंगे।" समाज को जाति की रेखाओं में नहीं बांटना चाहिए सुनवाई के दौरान आयोग के वकील ने कोर्ट को यह भी बताया कि राज्य में केवल दो महानगरपालिकाएं ऐसी हैं, जहां आरक्षण 50 प्रतिशत से ऊपर जाने की संभावना है। इस पर अदालत ने कहा कि इनके चुनाव भी अधिसूचित किए जा सकते हैं, लेकिन इनके परिणाम भी रिट याचिकाओं के नतीजों से प्रभावित होंगे। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि हम जो भी करें, समाज को जाति की रेखाओं में नहीं बांटना चाहिए। स्थानीय निकाय चुनाव दिसंबर 2021 से अटके हुए बता दें कि महाराष्ट्र में ओबीसी आरक्षण की वजह से स्थानीय निकाय चुनाव दिसंबर 2021 से अटके हुए हैं। दिसंबर 2021 में, सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इसे 'ट्रिपल-टेस्ट' को पूरा करने के बाद ही लागू किया जा सकता है। बाद में, राज्य सरकार ने लोकल बॉडी चुनावों में OBC रिज़र्वेशन के मुद्दे की जांच के लिए मार्च 2022 में जयंत कुमार बंठिया कमीशन का गठन किया था। बंठिया आयोग ने जुलाई 2022 में अपनी रिपोर्ट दी थी। मई 2025 में, कोर्ट ने बंठिया कमीशन की रिपोर्ट से पहले के कानून के हिसाब से OBC रिज़र्वेशन देकर चार महीने के अंदर चुनाव कराने का निर्देश दिया था। पिछले हफ़्ते, कोर्ट ने कहा कि राज्य के अधिकारियों ने इस आदेश का गलत मतलब निकाला है कि रिज़र्वेशन 50% से ज़्यादा हो सकता है। यह साफ़ करते हुए कि बंठिया से पहले की स्थिति के हिसाब से चुनाव कराने का निर्देश 50% की लिमिट पार करने की इजाज़त नहीं है, बेंच ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि रिज़र्वेशन तय लिमिट यानी 50 फीसदी की सीमा के अंदर ही होना चाहिए।  

भारतीय न्यायपालिका को विदेशी उदाहरणों की ज़रूरत क्यों? CJI-डिज़िग्नेट सूर्यकांत ने उठाया अहम सवाल

नई दिल्ली  भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वदेशी न्यायशास्त्र को अपनाने की दिशा में बल दिए जाने को एक स्वाभाविक कदम बताया। उन्होंने कहा कि 75 वर्षों में न्यायालय ने जो मजबूत और आधिकारिक न्याय-निर्णय का संग्रह बनाया है, उसके बाद अब समय आ गया है कि सर्वोच्च न्यायालय अपनी स्वयं की न्यायिक विचारधारा को गहरा करे।   न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्यायपालिका के लिए अपने स्वयं के दर्शन पर निर्भर रहना क्यों आवश्यक है। उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट के हजारों ऐतिहासिक निर्णय देने के 75 वर्षों के बाद जब हमारे निर्णयों को अन्य विभिन्न क्षेत्राधिकारों द्वारा उद्धृत किया जा रहा है और जब हमने अपने दम पर न्यायिक ज्ञान का भंडार अर्जित कर लिया है। हमें अपने देश से संबंधित किसी भी मुद्दे पर राय बनाते समय दूसरे देशों के निर्णयों को क्यों देखना चाहिए?" उन्होंने जोर दिया कि भौगोलिक, स्थानीय, सामाजिक, और राजनीतिक परिदृश्य जैसे महत्वपूर्ण कारक अन्य देशों में भिन्न हो सकते हैं, इसलिए भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं का न्यायशास्त्र विकसित करने की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि CJI के रूप में उनकी तत्काल प्राथमिकताओं में लंबी अवधि से लंबित मामलों को निपटाना और संस्थागत सुधारों को आगे बढ़ाना शामिल है। उनकी प्राथमिकता विशेष रूप से सात और नौ न्यायाधीशों वाली संवैधानिक पीठों का गठन करना है, ताकि महत्वपूर्ण मामलों का शीघ्र निपटारा किया जा सके। उन्होंने लंबित मामलों की संख्या (90,000 तक) को स्वीकार किया लेकिन वह इसे लेकर आशावादी हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि हाल ही में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता के साथ दिए गए उनके एक निर्णय में ऐसे निर्देश थे, जिससे अंततः 1,000 मामले निपटाए जा सकेंगे। उनका लक्ष्य लंबित मामलों को शून्य तक लाना नहीं है, लेकिन स्थिति को प्रबंधनीय बनाना है। उन्होंने कहा कि वह सर्वोच्च न्यायालय में सभी रिक्तियों को भरेंगे, हालांकि उन्होंने महिला प्रतिनिधित्व पर अभी विचार नहीं किया है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार का कर मामलों के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण है और 5 करोड़ के लिए मुकदमेबाजी नहीं लड़ी जानी चाहिए। उन्होंने अंतिम राय बनाने के लिए एक ऐसे तंत्र के विकास की आवश्यकता पर बल दिया जिससे समय बर्बाद न हो। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने CJI कार्यालय से जुड़े दबावों और सोशल मीडिया की आलोचना पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि CJI के पद के लिए व्यक्ति को सोशल मीडिया की टिप्पणियों से अलग रहने की आवश्यकता होती है। उन्होंने जोर देकर कहा, "न्यायाधीश या CJI दबाव में नहीं आ सकते और नहीं आना चाहिए। मैं कभी दबाव में नहीं रहा। एकमात्र तरीका है कि सोशल मीडिया की टिप्पणियों को अनदेखा करें।"