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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को पांच नए जस्टिस मिले, दो जस्टिस आनंद सिंह बेहरावत और हिमांशु जोशी इंदौर के

 इंदौर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को नए न्यायाधीश मिले हैं। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की 2 जुलाई को हुई बैठक में हाईकोर्ट के लिए छह नामों को मंजूरी दी गई है। पांच न्यायिक अधिकारियों के नाम भी हाई कोर्ट मप्र के लिए अप्रूव हुए हैं। कॉलेजियम द्वारा जिन नामों को स्वीकृति दी गई है, उनमें जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता, आनंद सिंह बेहरावत, आलोक अवस्थी, अजय कुमार निरनकरी, जयकुमार पिल्लई और हिमांशु जोशी शामिल हैं। इन सभी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। इस सूची में विशेष बात यह है कि जस्टिस आनंद सिंह बेहरावत और हिमांशु जोशी इंदौर से ताल्लुक रखते हैं, जिससे शहर के न्यायिक क्षेत्र में गौरव बढ़ा है। यह बने न्यायिक अधिकारी इसके अलावा, कॉलेजियम ने हाईकोर्ट के लिए पांच न्यायिक अधिकारियों के नाम भी मंजूर किए हैं। इनमें रमेश कुमार गुप्ता, आलोक अवस्थी, रत्नेश चंद्र बिसेन, भगवती प्रसाद शर्मा और प्रदीप मित्तल शामिल हैं। यह नियुक्तियां मध्य प्रदेश न्यायपालिका को नई ऊर्जा प्रदान करेंगी।  

दिल्ली हाईकोर्ट में तीन, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दस, जबकि तेलंगाना हाईकोर्ट में चार न्यायाधीशों की नियुक्ति को हरी झंडी दी

नई दिल्ली   देश की न्यायपालिका को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दिल्ली, पंजाब-हरियाणा, तेलंगाना, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पटना समेत कई उच्च न्यायालयों में नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश की है. इस प्रस्ताव के तहत, दिल्ली हाईकोर्ट में तीन, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दस, जबकि तेलंगाना हाईकोर्ट में चार न्यायाधीशों की नियुक्ति को हरी झंडी दी गई है. इसके अलावा राजस्थान, गुवाहाटी और अन्य हाईकोर्ट में भी नियुक्तियों को मंजूरी प्रदान की गई है. इन नियुक्तियों से न्यायिक व्यवस्था को तेजी मिलेगी और कई लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी. भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम की बैठक 1 और 2 जुलाई को हुई, जिसमें देश के अलग-अलग हाई कोर्ट में नए न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावों को स्वीकृति दे दी है. इस निर्णय के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में तीन, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में दस तथा तेलंगाना, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों के हाईकोर्ट में भी न्यायाधीशों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीन न्यायिक अधिकारियों को दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद पर नियुक्त करने की सिफारिश की है. दिल्ली हाईकोर्ट के जजों के रूप में शैल जैन, मधु जैन और विनोद कुमार के नामों को कॉलेजियम ने मंजूरी दी है. पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के लिए 10 न्यायाधीश कॉलेजियम ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में 10 न्यायिक अधिकारियों की बतौर न्यायाधीश नियुक्ति को अपनी मंजूरी दे दी है. जिसमें विरिंदर अग्रवाल, मनदीप पन्नू, प्रमोद गोयल, शालिनी सिंह नागपाल, अमरिंदर सिंह ग्रेवाल, सुभाष मेहला, सूर्या प्रताप सिंह, रूपिंदरजीत चहल, आराधना साहनी और यशवीर सिंह राठौड़ के नाम शामिल हैं. कॉलेजियम ने तेलंगाना उच्च न्यायालय में न्यायाधीश पद के लिए चार वकीलों के नामों को स्वीकृति दी है. गौस मीरा मोहिउद्दीन, चलपति राव सुड्डाला, वाकीति रामकृष्ण रेड्डी और गादी प्रवीण कुमार इन वकीलों में शामिल होले वाले वाले नाम हैं. कॉलेजियम में शामिल न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने राजस्थान उच्च न्यायालय के लिए एक न्यायाधीश और एक वकील को जज के लिए मंजूरी दी है. वहीं, तुहिन कुमार गेडेला को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद पर नियुक्त किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है. स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश न्यायमूर्ति विश्वदीप भट्टाचार्य, जो कि वर्तमान में अतिरिक्त न्यायाधीश के पद पर हैं, इन्हें कॉलेजियम द्वारा मेघालय उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की गई है, अतिरिक्त न्यायाधीश के पद को स्थायी न्यायाधीश के पद में परिवर्तित किया गया है. दो न्यायिक अधिकारियों प्रांजल दास और संजीव कुमार शर्मा और दो वकीलों, अंजन मोनी कलिता और राजेश मजूमदार को गुवाहाटी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पांच वकीलों के नामों को मंजूरी दे दी गई है. इन पांच वकीलों में पुष्पेंद्र यादव, आनंद सिंह बहरावत, अजय कुमार निरंकारी, जय कुमार पिल्लई और हिमांशु जोशी का नाम मंजूर हुआ है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के रूप में पांच न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम ने मंजूरी दी है. जिसमें राजेश कुमार गुप्ता,आलोक अवस्थी,रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन भगवती प्रसाद शर्मा,प्रदीप मित्तल के नाम शामिल हैं. कॉलेजियम ने पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अजीत कुमार और प्रवीण कुमार को नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इन नियुक्तियों से न्यायिक व्यवस्था को गति मिलेगी. बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 2 जुलाई, 2025 को आयोजित अपनी बैठक में अधिवक्ता तुहिन कुमार गेडेला को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। एक अन्य निर्णय में कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति बिस्वदीप भट्टाचार्जी, अतिरिक्त जज को मेघालय हाईकोर्ट के स्थायी जज के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की। इसके अलावा दो न्यायिक अधिकारियों प्रांजल दास और संजीव कुमार शर्मा और दो अधिवक्ताओं, अंजन मोनी कलिता और राजेश मजूमदार को गुवाहाटी हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 1 जुलाई, 2025 को हुई अपनी बैठक में पांच अधिवक्ताओं को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। ये अधिवक्ता पुष्पेंद्र यादव, आनंद सिंह बहरावत, अजय कुमार निरंकारी, जय कुमार पिल्लई और हिमांशु जोशी हैं। इसके अलावा पांच न्यायिक अधिकारियों राजेश कुमार गुप्ता, आलोक अवस्थी, रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन, भगवती प्रसाद शर्मा और प्रदीप मित्तल को भी हाईकोर्ट के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।  

भोपाल रियासत के अंतिम नवाब की संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में हाईकोर्ट ने नए सिरे से सुनवाई करने के दिए निर्देश

भोपाल /जबलपुर  भोपाल रियासत के अंतिम नवाब मोहम्मद हमीदुल्ला खान की संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में दायर अपील की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा साल 2000 में पारित आदेश को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट जस्टिस संजय द्विवेदी की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए निर्देशित किया है कि सम्पत्ति उत्तराधिकारी विवाद की सुनवाई नए सिरे की जाए। एकलपीठ अपने आदेश में कहा कि है कि इसे एक साल की निर्धारित समय अवधि में किया जाए। भोपाल रियायत के वंशज का दावा करते हुए बेगम सुरैया रशीद, बेगम मेहर ताज नवाब साजिदा सुल्तान, नवाबजादी कमर ताज राबिया सुल्तान, नवाब मेहर ताज साजिदा सुल्तान एवं अन्य ने भोपाल जिला न्यायालय द्वारा पारित आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में साल 2000 में दो अपील में दायर की थीं। अपील में कहा गया था कि भोपाल रियासत का भारत संध में विलय 30 अप्रैल 1949 में हुआ था। लिखित समझौते के अनुसार विलय के बाद नवाब के विशेष अधिकार जारी रहेंगे और निजी संपत्ति के पूर्ण स्वामित्व के उत्तराधिकार भोपाल सिंहासन उत्तराधिकार अधिनियम 1947 के तहत होंगे। नवाब की मृत्यु के बाद साजिदा सुल्तान को नवाब घोषित किया गया था। भारत सरकार ने 10 जनवरी 1962 को पत्र जारी की संविधान के अनुच्छेद 366 (22) के तहत व्यक्तिगत संपत्ति का उल्लेख निजी संपत्ति के रूप में किया था। नवाब मोहम्मद हमीदुल्ला खान की मृत्यु के पश्चात उनकी निजी संपत्ति का बंटवारा मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार वादीगण और प्रतिवादियों के बीच होना चाहिए था। भोपाल जिला न्यायायनल में संपत्ति उत्ताधिकारी की मांग करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया गया था। जिला न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय पारित निर्णय के आधार पर उनका आवेदन खारिज कर दिया था। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने मामले के अन्य पहलुओं पर विचार किए बिना इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुसार प्रकरण को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट इस तथ्य पर विचार करने में विफल रहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विलय करने पर सिंहासन उत्तराधिकार अधिनियम को खारिज कर दिया गया था। विचाराधीन मामला विरासत के विभाजन का है, इसलिए सीपीसी के 14 नियम 23 ए के प्रावधान के मद्देनजर मेरी राय है कि इन मामलों को नए सिरे से तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट में वापस भेजा जाए। ट्रायल कोर्ट बदली हुई कानूनी स्थिति के मद्देनजर पक्षों को सबूत पेश करने की अनुमति दे सकता है।  

छत्तीसगढ़ में दुष्कर्म पीड़िताओं के लिए 40 करोड़ रुपए स्वीकृत, वितरण की प्रक्रिया शुरू

बिलासपुर प्रदेश में दुष्कर्म की घटनाओं से प्रभावित महिलाओं को मुआवजा न मिलने को लेकर दायर जनहित याचिका पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने  अंतिम सुनवाई की है । हाई कोर्ट ने मामले का निराकरण कर दिया है। कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िताओं को मुआवजा वितरण के लिए प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट को सूचित किया गया कि राज्य शासन ने 40 करोड़ रुपये की राशि जारी कर दी है, जो अब जिलों के जरिए पीड़िताओं को प्रदान की जाएगी। केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं के लिए एक विशेष मुआवजा योजना लागू की थी, जिसका उद्देश्य उनके पुनर्वास और सहायता सुनिश्चित करना था। योजना के तहत प्रदेश में अब तक लगभग 6,000 आवेदन प्राप्त हुए थे, लेकिन बड़ी संख्या में पीड़ितों को अब तक मुआवजा नहीं मिल पाया था। शासन की ओर से इस योजना को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की जिम्मेदारी बताते हुए शुरुआत में अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। केवल उन्हीं पीड़ितों को मुआवजा मिल सका जिन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। 36 मामलों के आधार पर दायर हुई थी जनहित याचिका समाजसेवी सत्यभामा अवस्थी ने अधिवक्ता देवेश कुमार के माध्यम से हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर मांग की थी कि 2018 की इस योजना का पूर्ण और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए। याचिका में यह भी बताया गया कि प्रदेश में ऐसे 36 मामले सामने आए हैं, जिनमें पीड़िताओं को मुआवजा नहीं मिल पाया। जिस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने उसका निराकरण किया। गृह सचिव ने बताया, प्रक्रिया हुई शुरू बुधवार को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति की डिवीजन बेंच में इस मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान राज्य शासन की ओर से गृह सचिव ने एक शपथपत्र दाखिल किया। जिसमें कोर्ट को अवगत कराया कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (सालसा) के निर्देश पर पीड़ित महिलाओं के मुआवजे के लिए 40 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी। इस राशि को अब सभी जिलों में वितरित करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। राज्य शासन ने बताया कि यह राशि संबंधित जिलों के जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेज दी गई है। वे आवेदनकर्ताओं को मुआवजा प्रदान करने की प्रक्रिया में लगे हैं। याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि वर्ष 2018 से अब तक कुल 5,500 आवेदन सालसा को प्राप्त हुए हैं, जिनमें से अधिकांश पर अब कार्रवाई की जा रही है।

स्टंट करने के दौरान जो लोग अपनी ही गलती से जान गंवाते हैं, उन लोगों को मुआवजा देने के लिए बीमा कंपनी बाध्य नहीं : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली रफ्तार के शौकीनों और लापरवाही से गाड़ी चलाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत का कहना है कि स्टंट करने के दौरान जो लोग अपनी ही गलती से जान गंवाते हैं, उन लोगों को मुआवजा देने के लिए बीमा कंपनी बाध्य नहीं है। एक शख्स की मौत के बाद अदालत पहुंचे उसके माता पिता को अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया। 18 जून, 2014 को एनएस रविश मल्लासांद्रा गांव से अरासिकरे के बीच फिएट लीनिया से यात्रा कर रहे थे। उस दौरान कार में उनके पिता, बहन और बच्चे बैठे हुए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रविश बहुत लापरवाही से तेज रफ्तार में गाड़ी चला रहे थे और मैलानाहल्लीके पास गाड़ी का नियंत्रण खोने से पहले उन्होंने ट्रैफिक नियम तोड़े थे। यात्रा के दौरान गाड़ी रोड पर पलट गई। उस हादसे में रविश की मौत हो गई। उनकी पत्नी, बेटा और माता-पिता 80 लाख रुपये के मुआवजे की मांग कर रहे थे। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और दावा किया कि रविश के लापरवाही से गाड़ी चलाने के कारण हादसा हुआ। मोटर एक्सीडेंटल ट्रिब्युनल ने उनका दावा खारिज कर दिया था। बाद में वह कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचे और दावा किया कि टायर फटने के कारण हादसा हुआ। कोर्ट ने कहा, 'जब मृतक के कानूनी प्रतिनिधि की तरफ से दावा किया जाता है, तो यह साबित किया जाना जरूरी है कि मृतक लापरवाही से गाड़ी चलाने के लिए खुद जिम्मेदार तो नहीं है। साथ ही यह भी साबित किया जाना जरूरी है कि मृतक पॉलिसी में कवर हो ताकि बीमा कंपनी कानूनी हकदारों को भुगतान करें।' कोर्ट ने कहा, 'इस मामले में दुर्घटना तेज और लापरवाही से वाहन चलाने के कारण हुई और वह खुद को नुकसान पहुंचाने वाला व्यक्ति है। उसके कानूनी उत्तराधिकारी मुआवजे के लिए दावा नहीं कर सकते।' सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने जान गंवाने वाले परिवार को रहत नहीं दी। बेंच ने कहा कि परिवार बीमा कंपनी से भुगतान की उस स्थिति में मांग नहीं कर सकते, जब हादसा बगैर किसी बाहरी वजह के जान गंवाने वाले की गलती से ही हुआ हो।

CG में प्राचार्य पदोन्नति पर हाईकोर्ट से बड़ी राहत: डिवीजन बेंच ने हटाया स्टे, याचिकाएं खारिज, 3500 स्कूलों में अब जल्द होगी नियुक्ति

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ में प्राचार्यों की बहुप्रतीक्षित पदोन्नति का रास्ता अब पूरी तरह से साफ हो गया है। राज्य सरकार द्वारा जारी प्रमोशन सूची पर लगी हाईकोर्ट की रोक को डिवीजन बेंच ने हटा दिया है। साथ ही, कोर्ट ने राज्य सरकार की प्रमोशन नीति को वैध ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं की तमाम आपत्तियों को खारिज कर दिया है। यह अहम फैसला मंगलवार को जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सुनाया। इससे पहले 15 दिन पहले कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट में उठे थे बीएड और वरिष्ठता के मुद्दे प्राचार्य पदोन्नति फोरम सहित कई याचिकाकर्ताओं ने बीएड डिग्री की अनिवार्यता और वरिष्ठता को लेकर आपत्ति जताई थी। कोर्ट में दलील दी गई कि कई शिक्षकों को पहले ही नियमों के विरुद्ध प्रमोशन देकर पदस्थ किया गया था, जो न्यायालय की अवमानना है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पहले जारी की गई सभी ज्वॉइनिंग को अमान्य कर दिया था और स्थगन आदेश जारी किया था। हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थी दरअसल, प्राचार्य पदोन्नति फोरम के साथ ही प्रमोशन को लेकर हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थी। इसमें बताया गया है कि, पहले कोर्ट के आदेश के बावजूद कई शिक्षकों को प्राचार्य पद पर प्रमोशन देकर ज्वॉइन करा दिया गया है। इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा था कि, यह न्यायालय की अवमानना का मामला है। शुरुआती सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने आगामी आदेश तक की गई सभी ज्वॉइनिंग को अमान्य कर दिया था। बीएड की अनिवार्यता को दी थी चुनौती इस मामले की सुनवाई जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच में बीते 11 जून से 16 जून तक लगातार हुई। इस दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने अपनी बहस पूरी करते हुए बीएड डिग्री को प्राचार्य पद के लिए अनिवार्य बताया। इसके अलावा, उन्होंने माध्यमिक स्कूलों के प्रधान पाठकों से लेक्चरर बने शिक्षकों की वरिष्ठता का मुद्दा भी उठाया। शासन ने कहा- नियमों के अनुसार दी पदोन्नति हाईकोर्ट में चल रही याचिकाओं में एक मामला साल 2019 से जुड़ा हुआ है, जबकि अन्य याचिकाएं 2025 में बीएड और डीएलएड योग्यता से संबंधित हैं। इस दौरान राज्य सरकार की तरफ से कहा गया कि प्रमोशन नियम को लेकर सभी कैटेगरी के शिक्षकों के हितों का ध्यान रखा गया है। इसमें कोई गड़बड़ी नहीं की गई है। स्टे हटने के बाद तत्काल पोस्टिंग दे राज्य सरकार इधर, शिक्षक साझा मंच के प्रदेश संचालक संजय शर्मा ने कहा कि व्याख्याता संवर्ग के शिक्षकों को अपने हक के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। शिक्षा विभाग ने 30 अप्रैल को प्राचार्य पदोन्नति की सूची जारी की थी, जिस पर 1 मई को हाईकोर्ट ने स्थगन आदेश जारी कर दिया। इस दौरान याचिकाकर्ताओं के साथ ही शिक्षक संघ और शासन ने पक्ष रखा। संजय शर्मा ने कहा कि अब हाईकोर्ट का फैसला आ गया है। जिसमें स्थगन आदेश को हटाकर सभी याचिकाएं खारिज की गई है। ऐसे में अब जारी प्रमोशन सूची के आधार पर राज्य सरकार तत्काल प्राचार्यों की पोस्टिंग आदेश जारी करे। ताकि, शिक्षा सत्र शुरू होते ही प्रदेश के 3500 स्कूलों में प्राचार्यों की नियुक्ति हो सके।