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15 साल की कानूनी लड़ाई पर MP हाईकोर्ट की टिप्पणी, पहले दस्तावेज देखें फिर मांगें कॉपी

जबलपुर  मध्य प्रदेश राजभवन से राज्यपाल द्वारा केंद्र सरकार को भेजी जाने वाली मासिक रिपोर्टों और केंद्र से मिलने वाले पत्रों व निर्देशों की जानकारी हासिल करने की 15 साल पुरानी कानूनी लड़ाई में हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत आवेदक को संबंधित अभिलेखों का पहले निरीक्षण करने का अवसर दिया जाना चाहिए। इसके बाद वह अपनी जरूरत के दस्तावेजों को चिह्नित कर उनकी प्रमाणित प्रतियां मांग सकता है। मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने दो नवंबर 2026 को यह व्यवस्था देते हुए एकलपीठ के पूर्व आदेश में संशोधन किया। इस फैसले से आवेदक के लिए राजभवन के संबंधित रिकॉर्ड तक पहुंचने की प्रक्रिया स्पष्ट हो गई है। 2011 में मांगी थी राज्यपाल की रिपोर्टों की जानकारी दरअसल, भोपाल निवासी अजय दुबे ने 12 दिसंबर 2011 को राजभवन सचिवालय के लोक सूचना अधिकारी के समक्ष आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें एक जनवरी 2011 के बाद राज्यपाल की ओर से प्रदेश के शासन-प्रशासन और राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर केंद्र सरकार को भेजी गई मासिक रिपोर्टों की जानकारी मांगी गई थी। इसके साथ ही इन रिपोर्टों के आधार पर भारत सरकार द्वारा राजभवन को भेजे गए पत्रों और निर्देशों से जुड़े दस्तावेज भी मांगे गए थे। आवेदन अस्पष्ट बताकर कर दिया था खारिज राजभवन के लोक सूचना अधिकारी ने 29 दिसंबर 2011 को आवेदन को अस्पष्ट बताते हुए निरस्त कर दिया था। इसके खिलाफ प्रथम अपील की गई। प्रथम अपीलीय अधिकारी ने 23 फरवरी 2012 को आवेदक को संबंधित अभिलेखों का निरीक्षण करने और इसके बाद जरूरी दस्तावेजों की प्रतियां मांगने की अनुमति दे दी थी। मामला राज्य सूचना आयोग पहुंचा, जहां 17 अगस्त 2015 को प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश को प्रभावी बनाए रखा गया। इसके बाद इस आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। एकलपीठ के आदेश को युगलपीठ में दी चुनौती मामले की सुनवाई के दौरान एकलपीठ ने 17 अगस्त 2026 को राज्य सूचना आयोग और प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश निरस्त कर दिए थे। साथ ही आवेदक को दस्तावेजों का स्पष्ट विवरण देते हुए 15 दिन के भीतर नया आरटीआई आवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी थी। इस आदेश से असंतुष्ट अजय दुबे ने रिट अपील दायर की। युगलपीठ ने सुनवाई के बाद एकलपीठ के निर्देश में संशोधन करते हुए कहा कि आवेदक पहले लोक सूचना अधिकारी के समक्ष संबंधित अभिलेखों के निरीक्षण के लिए आवेदन कर सकता है। पहले फाइलें देख सकेंगे, फिर मांग सकेंगे प्रमाणित प्रतियां हाई कोर्ट की व्यवस्था के मुताबिक, आवेदक को पहले उपलब्ध अभिलेखों का निरीक्षण करने का अवसर मिलेगा। निरीक्षण के दौरान वह अपनी जरूरत के दस्तावेजों की पहचान कर उन्हें चिह्नित कर सकेगा। इसके बाद संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करने के लिए आवेदन किया जा सकेगा। आवेदक की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार चंद ने पैरवी की, जबकि शासन की तरफ से उप महाधिवक्ता विवेक शर्मा उपस्थित हुए।

‘कागजों में नहीं, सड़कों पर दिखे कार्रवाई’, स्कूली वाहनों की मनमानी पर हाईकोर्ट नाराज

ग्वालियर  ग्वालियर हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने स्कूली वाहनों में ओवरलोडिंग और नियमों की धज्जियां उड़ाने के मामले पर सख्त रुख अपनाया है। प्रशासन द्वारा पेश की गई पालन प्रतिवेदन (एक्शन टेकन) रिपोर्ट पर गहरी नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने दो टूक कहा है कि "हम सब जानते हैं कि स्कूली वाहनों में बच्चों को भूसे की तरह भरा जा रहा है। प्रशासन कागजी आंकड़े न दिखाए, कार्रवाई धरातल और सड़कों पर दिखनी चाहिए।" कोर्ट ने इस बात पर भी कड़ा ऐतराज जताया कि वर्ष 2017 के आदेश के तहत नियमित स्टेटस रिपोर्ट पेश की जानी थी, लेकिन 2019 के बाद से कोई रिपोर्ट दाखिल ही नहीं की गई। अदालत ने चेतावनी दी कि प्रशासन को जगाना कोर्ट का काम नहीं है; यदि अधिकारी सतत पालन का शपथ-पत्र पेश नहीं करते, तो यह सीधे तौर पर अवमानना का मामला बनता है। कोर्ट में पेश की गई यह एक्शन रिपोर्ट अवधेश सिंह भदौरिया द्वारा दायर अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान आरटीओ और पुलिस प्रशासन की ओर से स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें यह बताया गया है।     190 लाइसेंस सस्पेंड: नियमों का उल्लंघन करने वाले 190 चालकों के ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित किए गए हैं।     अक्टूबर में चालानी कार्रवाई: परिवहन विभाग और पुलिस के संयुक्त अभियान में क्षमता से अधिक बच्चे बैठाने, बिना परमिट, बिना फिटनेस और बीमा के दौड़ रहे 87 वाहनों के चालान काटे गए। इससे पहले भी 83 और 38 चालान बनाए जा चुके हैं।     फिटनेस स्टेशन को निर्देश: चारों ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशनों को सख्त हिदायत दी गई है कि जिस ऑटो में अतिरिक्त सीट या फट्टी लगी हो, उसे फिटनेस सर्टिफिकेट न दिया जाए। ऐसे वाहनों को ब्लैकलिस्ट भी किया जा रहा है। प्रभारी SP ने मांगा समय, कहा- जमीनी सुधार दिखेगा सुनवाई के दौरान ग्वालियर के प्रभारी पुलिस अधीक्षक ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्होंने हाल ही में पदभार संभाला है। उन्होंने कोर्ट से अगली सुनवाई तक का समय मांगते हुए भरोसा दिलाया कि वे इस व्यवस्था की निरंतर निगरानी करेंगे और जमीनी स्तर पर ठोस नतीजे पेश करेंगे। ग्वालियर ही नहीं, संभाग के 9 जिलों में बदतर हालात याचिकाकर्ता अवधेश सिंह भदौरिया ने कोर्ट का ध्यान ग्वालियर संभाग के अन्य जिलों की ओर भी आकर्षित कराया। उन्होंने बताया कि स्कूली वाहनों की यह खतरनाक स्थिति सिर्फ ग्वालियर तक सीमित नहीं है, बल्कि संभाग के अन्य 9 जिलों में भी व्यवस्था बेहद खराब है और प्रशासनिक निगरानी न के बराबर है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित पक्षों को अपने सुझाव लिखित में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

हाई कोर्ट के आदेश के 3 साल बाद भी मुआवजे का इंतजार, परेशान हो रहे मजदूरों के परिजन

इंदौर   हाई कोर्ट के आदेश के तीन वर्ष बाद भी हुकमचंद मिल के 400 से ज्यादा मजदूरों के स्वजन परिसमापक कार्यालय के चक्कर लगाकर परेशान हैं। इन लोगों को अब तक मुआवजा राशि ही नहीं मिली। ये वो लोग हैं जिनके परिवार का कोई सदस्य कभी मिल में मजदूरी करता था और मिल बंद रहने के दौरान उस सदस्य की मृत्यु हो गई है। तकनीकी रूप से इन्हें थर्ड पार्टी कहा जाता है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद इनके मुआवजा क्लेम तो निर्धारित हो गए, लेकिन भुगतान नहीं हुआ। यह है मामला 12 दिसंबर 1991 को हुकमचंद मिल बंद होने के बाद से मिल के 5895 मजदूर और उनके स्वजन अपने हक के लिए भटक रहे थे। 6 अगस्त 2007 को हाई कोर्ट ने मिल के मजदूरों के पक्ष में 228 करोड़ 79 लाख 79 हजार 208 रुपये का मुआवजा तय किया था। यह भुगतान मिल की जमीन बेचकर दिया जाना था लेकिन मिल की जमीन बिक ही नहीं सकी। बाद में निगम और मप्र गृह निर्माण मंडल ने मिल की जमीन पर संयुक्त रूप से आवासीय और व्यवसायिक प्रोजेक्ट लाने की योजना बनाई। 25 दिसंबर 2023 को हाउसिंग बोर्ड ने मजदूरों के भुगतान के लिए राशि बैंक खाते में जमा करा दी। इसके बाद मजदूरों को मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया शुरू हो गई। 5100 मजदूरों को मिल चुका है मुआवजा हुकमचंद मिल मजदूर, कर्मचारी, अधिकारी संघ के नरेंद्र श्रीवंश ने बताया कि कोर्ट के आदेश के बाद अब तक लगभग 5100 मजदूरों को मुआवजा मिल चुका है। 418 परिवार ऐसे हैं जिनमें क्लेम की राशि का निर्धारण तो हो चुका है। सूची परिसमापक को सौंपी भी जा चुकी है, बावजूद इसके भुगतान नहीं हो रहा। ये परिवार परिसमापक कार्यालय के चक्कर लगाकर परेशान हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिल रहा। ऐसी स्थिति में आशंका है कि इस साल भी इन परिवारों की दीपावली बगैर मुआवजा ही बीतेगी।  

आय से अधिक संपत्ति का मामला, पूर्व संयुक्त संचालक सुनीता सिंह पर लोकायुक्त का शिकंजा

 भोपाल  नगर तथा ग्राम निवेश (टीएंडसीपी) भोपाल की पूर्व संयुक्त संचालक सुनीता सिंह के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस ने आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया है। लोकायुक्त महानिदेशक योगेश देशमुख के निर्देश और उप पुलिस महानिरीक्षक मनोज कुमार सिंह के मार्गदर्शन में विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त भोपाल ने यह कार्रवाई की है। आय से अधिक संपत्ति का मामला प्राथमिक जांच में सामने आया है कि उन्होंने सेवाकाल के दौरान स्वयं और परिजनों के नाम पर कुल वैध आय की तुलना में करीब 250 प्रतिशत अधिक असमानुपातिक चल-अचल संपत्ति जुटाई है। जांच में भोपाल शहर में उनके कई मकान, शॉपिंग कांप्लेक्स, फार्म हाउस और पेट्रोल पंप जैसी संपत्तियों का पता चला है। लोकायुक्त पुलिस ने उनके खिलाफ धारा 13(1)बी सहपठित 13(2) के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विस्तृत विवेचना शुरू कर दी है। पेट्रोल पंप से चर्चा में आईं सुनीता सिंह दिसंबर 2025 में सेवानिवृत्त हुई थीं। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने अपनी सेवा का सर्वाधिक समय टीएंडसीपी में ही बिताया। इसके अलावा वे भोपाल नगर निगम, मप्र हाउसिंग बोर्ड और मंडी बोर्ड में भी विभिन्न पदों पर पदस्थ रहीं। रायसेन रोड स्थित पेट्रोल पंप से उनका नाम सबसे ज्यादा चर्चा में आया था। अधिकारियों का कहना है कि दर्ज अपराध की विवेचना के दौरान संपत्तियों का नए सिरे से मूल्यांकन किया जा रहा है, जिससे कई अन्य खुलासे हो सकते हैं।  

मध्य प्रदेश में ADPO भर्ती नियमों पर हाईकोर्ट की रोक, प्रमोशन के लिए आरक्षित 10% कोटा निरस्त

ग्वालियर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (एडीपीओ) के पदों पर विभागीय कर्मचारियों को मिलने वाला 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटा असंवैधानिक घोषित कर दिया है। फैसले के बाद एडीपीओ के पदों पर आगे कोई नहीं होगी पदोन्नति कोर्ट ने वर्ष 2002 में किए गए नियम संशोधन को संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर दिया। स्पष्ट किया कि इस फैसले के बाद एडीपीओ के पदों पर आगे कोई पदोन्नति नहीं की जा सकेगी। हालांकि, फैसले से पहले इस कोटे के तहत हो चुकी पदोन्नतियां प्रभावित नहीं होंगी। न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने रोहन शर्मा और करण श्रीवास्तव सहित अन्य की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। लिपिकीय कर्मचारियों को सीधे अधिकारी बनाने पर सवाल मामले में वर्ष 2002 में मध्य प्रदेश लोक अभियोजन (राजपत्रित सेवा) भर्ती नियम, 1991 में संशोधन कर एडीपीओ के 10 प्रतिशत पद विभागीय पदोन्नति से भरने का प्रविधान किया गया था। इसके तहत सीआरपीसी क्लर्क, सहायक ग्रेड-तीन और एपीसीडी ग्रेड-तीन के ऐसे कर्मचारियों को पात्र बनाया गया था, जिनके पास विधि स्नातक की डिग्री, सात वर्ष का विभागीय अनुभव और निर्धारित आयु सीमा की शर्तें थीं। शेष 90 प्रतिशत पद सीधी भर्ती से भरे जाने थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये कर्मचारी मूल रूप से लिपिकीय काम करते हैं। उन्हें अदालत में पैरवी करने, गवाहों से पूछताछ करने या मुकदमों का संचालन करने का अनुभव नहीं होता। इसके बावजूद केवल विधि की डिग्री के आधार पर उन्हें द्वितीय श्रेणी के अभियोजन अधिकारी के पद पर पदोन्नति का रास्ता देना उचित नहीं है। सरकार नहीं बता सकी संशोधन का आधार कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि एक ही लिपिकीय संवर्ग में विधि स्नातक कर्मचारियों को अलग श्रेणी में रखकर सीधे एडीपीओ बनाने का आधार क्या था। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि इन कर्मचारियों के लिए पहले से तृतीय श्रेणी के संवर्ग में पदोन्नति की व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में एक ही पद से दो अलग-अलग पदोन्नति मार्ग बनाना उचित नहीं है। कोर्ट के अनुसार लोक अभियोजक का दायित्व केवल सरकारी पक्ष रखना नहीं, बल्कि निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से न्यायिक प्रक्रिया में सहायता करना है। इसके लिए कानून का व्यावहारिक ज्ञान और वकालत का अनुभव महत्वपूर्ण है। अदालत ने कहा कि लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों को सीधे एडीपीओ बनाने की व्यवस्था मनमानी है और इससे न्याय व्यवस्था तथा नागरिकों के अधिकारों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।  

सतना में हाईकोर्ट के निर्देश पर बड़ी कार्रवाई, ट्रांसमिशन लाइन कॉरिडोर में बने 94 निर्माणों को नोटिस

हाई कोर्ट के निर्देश पर सतना में ट्रांसमिशन लाइनों के प्रतिबंधित कॉरिडोर में निर्माणों पर कार्रवाई 94 निर्माणों को नोटिस सतना मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के निर्देशों के पालन तथा विद्युत दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए मध्यप्रदेश पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी (एमपी ट्रांसको) द्वारा सतना जिले में ट्रांसमिशन लाइनों के प्रतिबंधित कॉरिडोर में किए गए निर्माणों के विरुद्ध अभियान चलाया जा रहा है। अभियान के तहत जिले में पांच ट्रांसमिशन लाइनों के प्रतिबंधित कॉरिडोर में निर्माण करने पर संबंधित लोगों को कुल 94 नोटिस जारी किए गए हैं। इनमें अधिकांश निर्माण डिलौरा क्षेत्र के हैं। एमपी ट्रांसको द्वारा स्थानीय प्रशासन के सहयोग से लोगों को प्रतिबंधित कॉरिडोर में निर्माण से होने वाले गंभीर विद्युत जोखिमों के प्रति जागरूक भी किया जा रहा है। पांच ट्रांसमिशन लाइनों के कॉरिडोर में निर्माण चिह्नित सतना में 132 केवी सतना सीमेंट, 132 केवी सतना-प्रिज्म सीमेंट, 132 केवी सतना-रामपुर, 132 केवी सतना-उचेहरा तथा 220 केवी सतना-कटनी ट्रांसमिशन लाइनों के प्रतिबंधित कॉरिडोर में किए गए निर्माणों के संबंध में नोटिस जारी किए गए हैं। इन लाइनों के नीचे और आसपास सुरक्षा मानकों के विपरीत किए गए निर्माणों से लोगों की जान को खतरा हो सकता है। तेज हवा या अन्य कारणों से विद्युत तारों के झूलने की स्थिति में मकानों, दुकानों और अन्य संरचनाओं के समीप दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है। तारों के सीधे संपर्क के अलावा विद्युत आर्क से भी जानलेवा हादसा हो सकता है। 132 केवी लाइन के लिए 27 और 220 केवी के लिए 35 मीटर प्रतिबंधित कॉरिडोर निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुसार, 132 केवी ट्रांसमिशन लाइन के दोनों ओर 27 मीटर तथा 220 केवी लाइन के दोनों ओर 35 मीटर का प्रतिबंधित कॉरिडोर निर्धारित है। इस क्षेत्र में सुरक्षा मानकों के विपरीत निर्माण करना गंभीर विद्युत जोखिम पैदा कर सकता है। एमपी ट्रांसको द्वारा संबंधित निर्माण स्वामियों को नोटिस देकर सुरक्षा मानकों की जानकारी दी जा रही है और प्रतिबंधित कॉरिडोर में निर्माण नहीं करने के लिए समझाइश दी जा रही है। विद्युत दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए अभियान एमपी ट्रांसको का यह अभियान मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के निर्देशों के पालन के साथ ही संभावित विद्युत दुर्घटनाओं की रोकथाम और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। कंपनी ने नागरिकों से अपील की है कि वे ट्रांसमिशन लाइनों के प्रतिबंधित कॉरिडोर में किसी भी प्रकार का निर्माण न करें तथा निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करें।  

रेस कोर्स मस्जिद में नमाज पर रोक बरकरार, दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र ने रखी अपनी बात

नई दिल्ली दिल्ली के ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद परिसर में नमाज अदा करने की इजाजत मांगने वाले नमाजियों को दिल्ली हाईकोर्ट से फिलहाल कोई फौरी राहत नहीं मिली है. अदालत ने 29 अक्टूबर को मस्जिद में इबादत की अनुमति देने वाली अर्जी पर राहत देने से साफ इनकार कर दिया. हालांकि, सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने जस्टिस अनीश दयाल की बेंच को यह पुख्ता भरोसा जरूर दिया कि जब तक मस्जिद से जुड़े ज्ञापन पर कोई अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक ढांचे पर कोई बुलडोजर नहीं चलेगा और किसी भी तरह की तोड़फोड़ की कार्रवाई नहीं की जाएगी।  यह पूरा मामला सैयद अहमद सऊद की उस याचिका पर सामने आया है, जिसमें मस्जिद गिराए जाने की आशंका जताते हुए वहां जाने पर लगी कथित पाबंदियों से सुरक्षा मांगी गई थी. केंद्र सरकार के स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने अदालत को बताया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा सौंपे गए प्रतिवेदन पर जल्द से जल्द, यानी चार सप्ताह के भीतर फैसला ले लिया जाएगा. उन्होंने कहा, “इस बीच, हम कोई कार्रवाई नहीं करेंगे.” मामले की अगली सुनवाई 16 दिसंबर को होगी।  27 अक्टूबर को हुई पिछली सुनवाई में अदालत ने जब पूछा था कि इलाके में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ होने के बावजूद याचिकाकर्ता मस्जिद को सुरक्षा देने की मांग कैसे कर रहा है, तो सिद्दीकी ने कहा था कि मस्जिद द्वितीय-ग्रेड की संरक्षित इमारत है और इसलिए उसमें किसी भी तरह का बदलाव करने के लिए विरासत एवं संरक्षण समिति की मंजूरी जरूरी है. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा था कि मस्जिद 1977 से अधिसूचित वक्फ संपत्ति है, लेकिन दिल्ली वक्फ बोर्ड ने यह सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया कि लोगों को वहां आने-जाने की अनुमति मिलती रहे।  आजादी से पहले बनी यह मस्जिद नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) की विरासत सूची में ग्रेड-2 स्मारक के रूप में दर्ज है. हालांकि, एलडीओ का कहना है कि यह ढांचा सरकारी जमीन पर बना है और इसे अतिक्रमण मानता है. रेस कोर्स रोड इलाके में जारी ध्वस्तीकरण अभियान के कारण करीब 700 परिवारों के विस्थापित होने की आशंका है. अधिकारियों के अनुसार, इलाके के निवासियों को परिसर खाली करने के लिए कहा गया है और उन्हें कुछ किलोमीटर दूर वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराए गए हैं।   

TET Exam Update: पात्रता परीक्षा की शर्त को हाईकोर्ट में चुनौती, सरकार और SSC से मांगा जवाब

जबलपुर   शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) 2024 की नियम पुस्तिका में निर्धारित पात्रता शर्त में सिर्फ अंतिम वर्ष में अध्ययनरत अभ्यर्थी शामिल होने के लिए योग्य माने जाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी. इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने अहम आदेश दिया है. याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने राज्य सरकार और कर्मचारी चयन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।  टीईटी के लिए प्रकाशित विज्ञापन का मामला याचिकाकर्ता परमानंद गुजराती एवं अन्य की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि टीईटी 2024 के लिए प्रकाशित विज्ञापन में केवल शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के अंतिम वर्ष में अध्ययनरत अभ्यर्थियों को परीक्षा में शामिल होने के लिए पात्र माना गया था. याचिका में कहा गया था कि विवादित शर्त राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के दिशा-निर्देशों के विपरीत है. इतना ही नहीं, याचिका में ये भी तर्क दिया गया कि विवादित शर्त सुप्रीम कोर्ट के ओमकार सिंह व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में दिए गए फैसले के विपरीत है।  अंतिम वर्ष की बाध्यता के आधार पर वंचित करना सही नहीं याचिका में आगे कहा गया कि यह शर्त संविधान में प्राप्त समानता के अधिकार के विपरित है. शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में प्रवेश लेकर अध्ययन कर रहे अभ्यर्थियों को केवल अंतिम वर्ष की बाध्यता के आधार पर टीईटी में शामिल होने से वंचित नहीं किया जा सकता. एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए अपने आदेष में कहा है कि याचिकाकर्ताओं को केवल विवादित शर्त के आधार पर अयोग्य घोषित नहीं किया जाए. एकलपीठ ने अंतरिम व्यवस्था के तहत याचिकाकर्ताओं को विवादित शर्त के आधार पर अयोग्य घोषित करने पर रोक लगा दी है।  सरकार और एसएस सी से मांगा जवाब एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सरकार व एसएसी को नोटिस जारी करते हुए जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश जारी किए हैं. याचिका पर अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता आलोक बागरेजा तथा अधिवक्ता विशाल बघेल ने पैरवी की।   

महिला वकीलों को मिलेगी बड़ी सुविधा, देशभर की अदालतों में अलग टॉयलेट और बार रूम बनाने की तैयारी

 नई दिल्ली न्याय की चौखट पर जाकर दूसरों को हक दिलाने वाली महिला वकीलों के लिए खुद अदालतों के भीतर बुनियादी सुविधाएं न होना एक गंभीर और कड़वी हकीकत है. इस पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और सभी हाई कोर्ट्स को सख्त आदेश दिया है कि देश की हर एक अदालत में महिलाओं के लिए अलग और सुरक्षित बार रूम और टॉयलेट बनाए जाएं।   CJI ने साफ शब्दों में कहा, 'महिलाओं के लिए बुनियादी ढांचा और सुविधाएं न होने का कोई भी बहाना या औचित्य स्वीकार नहीं किया जा सकता. बार के सभी सदस्यों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना राज्यों और हाई कोर्ट्स की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है।  सुप्रीम कोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े सुनवाई के दौरान एमिकस ने कोर्ट को बताया कि राज्यों द्वारा दाखिल किए गए 16-17 हलफनामों में यह बात सामने आई है कि महिला वकीलों के लिए अदालतों में टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाएं नाममात्र की हैं या हैं ही नहीं:    हरियाणा: राज्य ने अभी तक इस संबंध में कोई निरीक्षण तक नहीं किया है.    पंजाब: राज्य के 67 जिला अदालत परिसरों में से केवल 9 अदालतों में महिला वकीलों के लिए वॉशरूम उपलब्ध हैं।  कोलकाता: काउंसलिंग के दौरान एडवोकेट मनिका ने ध्यान दिलाया कि कोलकाता जैसी जगह की अदालतों में भी महिला वकीलों के लिए टॉयलेट उपलब्ध नहीं हैं।  सुप्रीम कोर्ट के 5 बड़े और सख्त निर्देश 1. अलग और एक्सक्लूसिव सुविधाएं: जिला अदालतों, सब-डिविजनल और तालुका कोर्ट में जहां भी महिला वकील प्रैक्टिस करती हैं, वहां उनके लिए अलग और एक्सक्लूसिव 'वीमेन बार रूम' और वॉशरूम का निर्माण किया जाए।  2. फंड और जमीन का आवंटन: सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे इसके लिए तुरंत आवश्यक फंड और जरूरत पड़ने पर जमीन आवंटित करें।  3. हाई कोर्ट की बिल्डिंग कमेटी को प्राथमिकता: सभी हाई कोर्ट्स की बिल्डिंग कमेटियों को निर्देश दिया गया है कि वे इस काम को पहली प्राथमिकता पर लें और अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया के कार्यालय को नियमित प्रोग्रेस रिपोर्ट सौंपें।  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर में एक जैसा पैटर्न हो, महिलाओं के लिए बनने वाले टॉयलेट्स और सुविधाओं का डिजाइन व पैटर्न सभी राज्यों और जिलों में एक समान होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर तय की है, जहां सभी राज्यों को अपनी कम्प्लायंस (अनुपालन) रिपोर्ट पेश करनी होगी. यह आदेश देश की न्याय प्रणाली में काम कर रही हजारों महिला वकीलों के लिए एक बड़ी राहत और उनके सम्मान की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है। 

नर्सिंग छात्रों की शिफ्टिंग पर हाईकोर्ट की सख्ती, अपात्र कॉलेजों को लेकर मांगा नया मॉड्यूल

 जबलपुर मध्य प्रदेश के नर्सिंग कॉलेजों में मान्यता और संचालन से जुड़ी अनियमितताओं के मामले में हाई कोर्ट ने विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने अपात्र कॉलेजों के विद्यार्थियों को दूसरे संस्थानों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में आ रही व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करने के लिए नया शिफ्टिंग मॉड्यूल तैयार करने को कहा है। इसके लिए याचिकाकर्ता और मध्य प्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल को आपसी समन्वय से प्रस्तावों व आपत्तियों पर विचार करना होगा। संशोधित मॉड्यूल अगली सुनवाई पर 3 नवंबर को कोर्ट में पेश करना होगा। विद्यार्थियों की पसंद और प्रशिक्षण की पारदर्शिता पर उठे सवाल न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ में लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता विशाल बघेल की जनहित याचिका सहित संबंधित मामलों की सुनवाई हुई। इस दौरान मध्य प्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल ने अपात्र कॉलेजों के विद्यार्थियों के स्थानांतरण और डबल शिफ्ट में प्रशिक्षण से संबंधित स्टेटस रिपोर्ट तथा शिफ्टिंग मॉड्यूल पेश किया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आलोक वागरेचा ने इस मॉड्यूल पर आपत्तियां दर्ज कराईं। उन्होंने विद्यार्थियों के प्रशिक्षण में पारदर्शिता, पसंद के संस्थान में स्थानांतरण, आवश्यक बुनियादी सुविधाओं और प्रशिक्षण पर आने वाले खर्च जैसे मुद्दे उठाए। उनका कहना था कि शिफ्टिंग की प्रक्रिया तय करते समय विद्यार्थियों की जरूरतों और भविष्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अपात्र कॉलेजों की बैंक गारंटी से हो पढ़ाई के खर्च की भरपाई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने मांग की कि अपात्र कॉलेजों के कारण प्रभावित विद्यार्थियों की आगे की पढ़ाई पर होने वाले खर्च की भरपाई संबंधित संस्थानों की बैंक गारंटी से की जाए। साथ ही स्थानांतरण की प्रक्रिया ऐसी बनाने पर जोर दिया गया, जिससे विद्यार्थियों को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े। अदालत ने दोनों पक्षों को प्रस्तावों और आपत्तियों पर समन्वय बनाकर संशोधित मॉड्यूल तैयार करने के निर्देश दिए। साथ ही दोषी संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के पहलू पर भी जोर दिया। 3 नवंबर को फिर होगी सुनवाई हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिफ्टिंग प्रक्रिया तैयार करते समय विद्यार्थियों के हितों और प्रशिक्षण की व्यवस्था से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए। अब याचिकाकर्ता और नर्सिंग काउंसिल के बीच समन्वय के बाद तैयार होने वाले नए मॉड्यूल पर अगली सुनवाई में विचार किया जाएगा। नर्सिंग काउंसिल की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने पक्ष रखा।