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पेंशनरों के लिए खुशखबरी: छत्तीसगढ़ HC ने बकाया एरियर देने का आदेश जारी किया

 रायपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के पेंशनरों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सरकार को उनके बकाया एरियर का भुगतान 120 दिनों के भीतर करने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम-2000 की धारा 49 के तहत दिया गया है। यह मामला छत्तीसगढ़ पेंशनर्स समाज के प्रांताध्यक्ष चेतन भारती द्वारा 12 अगस्त 2021 को दायर याचिका से जुड़ा है। उन्होंने लंबे समय तक मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ शासन के मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर पेंशनरों की समस्याओं से अवगत कराया था। शासन स्तर पर समाधान नहीं मिलने के बाद उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने स्पष्ट की धारा 49 की व्याख्या न्यायालय ने मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम-2000 की धारा 49(6) की व्याख्या करते हुए कहा कि वित्तीय भुगतान को लेकर राज्यों के बीच सहमति की अनिवार्यता पेंशनरों के अधिकारों में बाधा नहीं बन सकती। अदालत ने डॉ. सुरेंद्र नारायण गुप्ता के मामले का हवाला देते हुए छठे और सातवें वेतनमान (7th Pay commission) के एरियर भुगतान का मार्ग प्रशस्त किया। इन कर्मचारियों को मिलेगा लाभ न्यायालय के फैसले के अनुसार, एक जनवरी 2006 से पहले सेवानिवृत्त कर्मचारियों को 32 माह का एरियर दिया जाएगा। यह एरियर 01 जनवरी 2006 से 31 अगस्त 2008 तक की अवधि का होगा। वहीं, एक जनवरी 2016 से पहले सेवानिवृत्त कर्मचारियों को 27 माह का एरियर मिलेगा, जो 01 जनवरी 2016 से 31 मार्च 2018 तक की अवधि के लिए निर्धारित किया गया है। चार माह में भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49(8) के तहत यह पूरा भुगतान चार माह के भीतर सुनिश्चित किया जाए। इस फैसले के बाद राज्य के हजारों पेंशनरों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

अनुकंपा नियुक्ति में नौकरी में प्राथमिकता मिलेगी, लेकिन संपत्ति का हक नहीं: हाईकोर्ट

इंदौर  अनुकंपा नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस जयकुमार पिल्लई की एकलपीठ ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति संपत्ति का अधिकार नहीं, बल्कि संकटग्रस्त परिवार को तात्कालिक राहत देने की योजना है। कोर्ट ने पिता की नौकरी पर दावा करने वाली बेटी की याचिका खारिज कर दी। रतलाम जिला अस्पताल में पदस्थ ड्राइवर रमेशवान गोस्वामी का 22 जून 2020 को सेवा के दौरान निधन हो गया था। इसके बाद पुत्र रितेश वान ने दिसंबर 2021 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। इसी पद पर रितेश की बहन और रमेशवान की बेटी अनीता वान ने भी दावा प्रस्तुत किया। दोनों के दावे सामने आने पर विभाग ने 23 जनवरी 2024 और 6 फरवरी 2024 को पत्र जारी कर सक्सेशन सर्टिफिकेट प्रस्तुत करने को कहा। इसे चुनौती देते हुए भाई-बहन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। दोनों पक्षों ने रखे तर्क रितेश की ओर से दलील दी गई कि उनका नाम पिता ने सेवा के दौरान नामिनी के तौर पर शामिल किया था। पूरा परिवार पिता की आय पर निर्भर था और उनकी बहन शादीशुदा होने के कारण अलग रहती है। अनीता हलफनामा देकर उन्हें नियुक्ति की सहमति दे चुकी है। अनीता ने खुद को वैध वारिस बताते हुए सेवा लाभों में बराबरी का अधिकार जताया और नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट को फर्जी बताया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का हवाला भी दिया, जिसमें कहा है कि नामिनी संरक्षक होता है, मालिक नहीं। सरकार की ओर से दलील दी थी कि दोनों के दावे होने के कारण सही वारिस तय करने के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट मांगा गया। नीति में सबकुछ स्पष्ट हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अनुकंपा नियुक्ति में सक्सेशन सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती। यह नियुक्ति राहतकारी नीति है। विभाग द्वारा सक्सेशन सर्टिफिकेट मांगना मनमाना और कानून के विपरीत है। हाईकोर्ट ने कहा कि 2014 में अनुकंपा नियुक्ति नीति बनी थी। कर्मचारी की मृत्यु 2020 में हुई थी, इसलिए उस समय की नीति ही लागू होगी। 2023 में नीति में हुआ बदलाव इस पर लागू नहीं होगा। 2014 की नीति में अनुकंपा नियुक्ति के लिए प्राथमिकता क्रम तय है। इसमें पति/पत्नी, फिर पुत्र या अविवाहित पुत्री, उसके बाद विधवा-तलाकशुदा पुत्री और अंत में कोर्ट ने निर्देश दिया कि नियुक्ति से पहले रितेश को हलफनामा देना होगा कि वे अपनी मां और अन्य आश्रितों का भरण-पोषण करेंगे। यदि वे ऐसा करने में असफल रहते हैं तो उनकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है।

सेना प्रमुख और रक्षा सचिव की सैलरी में कटौती, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला रिटायर्ड मेजर की याचिका पर

चंडीगढ़  पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक रिटायर्ड मेजर की पेंशन के मामले में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह पर ही 2 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि यह रकम दोनों की सैलरी से काटकर याचिकाकर्ता को दी जाए। रिपोर्ट के मुताबिक सेवा के दौरान ही मेजर को 24 सर्जरी करवानी पड़ी थी। इसके अलावा उनकी किडनी डैमेज हो गई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक पुणे के रहने वाले मेजर राजदीप दिनकर पांडेर (रिटायर्ड) साल 2012 में भारतीय सेना में कमीशन हुए थे। उस समय वह एकदम फिट थे। उन्हें लद्दाख में ऊंचाई वाले इलाके में पोस्टिंग दी गई। सेवा के पांच साल के बाद वह बुरी तरह बीमार हो गए। इसके बाद दिल्ली छावनी में उन्हें सिक लीव मेडिकल बोर्ट के सामने पेश किया गया। जांच में पता चला कि उन्हें 'सिस्टाइटिस सिस्टिका ग्लैंडुलरिस ' है। इसमें मत्रूशय में छोटी-छोटी गांठें बन जाती हैं। अकसर पेशाब में संक्रमण की वजह से यह होता है। इसके बदा मेजर पंडेर की सर्जरी हुई और उन्हें 'लो मेडिकल कैटिगरी' में डाल दिया गया। 2022 में उन्हें पंचकूला में चंडीमंदिर वेस्टर्न कमांड हॉस्पिटल की सिफारिश पर लो मेडिकल कैटिगरी में रखते हुए ही रिलीज कर दिया गया जबकि वह 15 फीसदी तक दिव्यांग हो गए थे। उन्होंने दिव्यांग पेंशन के लिए आवेदन किया जिसे खारिज कर दिया गया। चंडीमंदिर आर्म्ड फोर्सेज ट्राइब्यूनल ने माना कि मेडिकल बोर्ड की सिफारिश पर कई बार उनकी सर्जरी हुई और सेवा के दौरान ही वह दिव्यांग हुए थे। बेंच ने कहा, हमें समझ नहीं आता कि जब सेवा के दौरान ही वह 15 फीसदी तक दिव्यांग हो गए थे तब उनको रिलीज करते हुए यह क्यों कहा गया कि यह सैन्य सेवा के दौरान नहीं हुई है। ट्राइब्यूनल ने ही 2008 के एक फैसले में कहा था कि जब किसी की सीरम क्रिएटनिन 1,13 है तो उसे 40 फीसदी दिव्यांगता की श्रेणी में रखा जाए। इस हिसाब से उन्हें 40 से 50 फीसदी की दिव्यांगता श्रेणी में ऱखा जा सकता था। ट्राइब्यूनल के आदेश के खिलाफ 2025 में केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में याचिका फाइल की थी जिसे खारिज कर दिया गया था। मेजर पंडेर ने रक्षा सचिव राजेश कुमार और सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी के खिलाफ कंटेंप्ट पिटीशन फाइल करके कहा कि उन्होंने हाई कोर्ट और ट्राइब्यूनल के आदेश का पालन नहीं किया है। 30 अप्रैल को जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने कहा कि आखिरी सुनवाई के दौरान भी कोई जवाब नहीं दिया गया है इसलिए 2 लाख का जुर्माना लगाया जाएगा। यह रकम रक्षा सचिव और सेना प्रमुख की सैलरी से काटकर डिमांड ड्राफ्ट के जरिए याचिकाकर्ता को दी जाए।

हाईकोर्ट ने खारिज किया केस: सगी बहनें पतियों का आदान-प्रदान करना चाहती थीं, बड़ी बहन को हुआ छोटी के पति से प्यार

ग्वालियर एमपी हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे सुनकर सभी लोग हैरान हैं। ये मामला दो बहनों का है, जो आपस में अपनी पतियां बदलना चाहती हैं। बड़ी बहन को छोटी बहन के पति से प्यार हो गया है। वहीं, छोटी का दिल भी अपने जीजा पर आ गया है। इसके बाद यह मामला पूरी तरह से उलझ गया है। दतिया निवासी ने लगाई थी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दरअसल, दतिया के रहने वाले गिरिजा शंकर ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगाई थी। इसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि मायाराम नाम के व्यक्ति ने मेरी पत्नी और बेटी को बंधक बना रखा है। इसके बाद हाईकोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिए कि महिला को कोर्ट में पेश किया जाए। महिला की एंट्री से केस में ट्विस्ट वहीं, एमपी हाईकोर्ट के निर्देश पर महिला कोर्ट में पेश हुई है। इसके बाद पूरे मामले में ट्विस्ट आ गया। महिला ने कोर्टरूम में कहा कि उसका अपहरण नहीं हुआ है। मैं अपनी मर्जी से मायाराम के साथ गई हूं। मायाराम महिला की छोटी बहन का पति है। साथ ही महिला ने कहा कि हमने अपने पति से तलाक के लिए याचिका लगा रखी है। छोटी बहन ने नहीं जताई आपत्ति यह मामला सुनवाई के दौरान तब और दिलचस्प हो गया, जब मायाराम की पत्नी और उस महिला की छोटी बहन ने कोई आपत्ति नहीं जताई। उसने कह दिया कि हमारी बड़ी बहन हमारे पति के साथ रहना चाहती है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मुझे भी अपने जीजा के साथ रहने की अनुमति दें। अपने-अपने पतियों के साथ नहीं रहना चाहती हैं महिलाएं     ग्वालियर हाईकोर्ट में हैरान करने वाला मामला सामने आया     दो सगी बहनें आपस में बदलना चाहती हैं पति     दोनों को एक-दूसरे के पति से हो गया है प्यार     हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज वैवाहिक जीवन से संतुष्ट नहीं हैं दोनों बताया जा रहा है कि दोनों बहनें अपनी शादीशुदा जिंदगी से संतुष्ट नहीं हैं। दोनों सहमति और मर्जी से एक-दूसरे के पति के साथ वैवाहिक जीवन शुरू करना चाहती हैं। वहीं, दोनों बहनों के बच्चे भी हैं लेकिन बच्चे को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज वहीं, दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया है। साथ ही कह दिया है कि यह अपहरण का मामला नहीं है। यह पूरी तरह से पारिवारिक विवाद का मामला है। दोनों महिलाएं बालिग हैं, अपनी मर्जी से फैसला ले रही हैं।

गुजारा-भत्ता पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘पुरुष पल्ला नहीं झाड़ सकता’

ग्वालियर  शादी के बाद पत्नी का भरण-पोषण करना पति का न केवल नैतिक, बल्कि अनिवार्य कानूनी दायित्व है। हाईकोर्ट ने एकल पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पति स्वस्थ और काम करने में सक्षम है, तो वह यह कहकर गुजारा भत्ता देने से नहीं बच सकता कि उसकी आय कम है या वह बेरोजगार है। जस्टिस अमित सेठ की एकल पीठ ने पति और पत्नी दोनों की ओर से दायर पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को यथावत रखा है। मैकेनिक नहीं बल्कि एक गैराज में महज हेल्पर दरअसल शबीना व शाहिद (दोनों के परिवर्तित नाम) का निकाह नवंबर 2019 में मुस्लिम रीति-रिवाजों से हुआ था। पत्नी का आरोप था कि निकाह के बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, जिसके कारण उसे मायके में शरण लेनी पड़ी। पत्नी ने फैमिली कोर्ट में आवेदन देकर बताया कि उसका पति मैकेनिक है और 30 हजार रुपए महीना कमाता है, इसलिए उसे भरण पोषण दिलाया जाए।  दूसरी ओर पति ने कोर्ट में दलील दी कि वह मैकेनिक नहीं बल्कि एक गैराज में महज हेल्पर है और उसकी मासिक आय केवल 5,000 रुपए है। उसने दलील दी कि इतनी कम आय में वह 4,000 रुपए गुजारा भत्ता नहीं दे सकता। वहीं पत्नी ने गुजारा भत्ता की राशि बढ़ाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दिक्कतें अपनी जगह, हक अपनी जगह     कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125 सीआरपीसी का उद्देश्य महिला को दर-दर भटकने से बचाना और उसे गरिमापूर्ण जीवन देना है। यदि पति शारीरिक रूप से स्वस्थ है, तो उसे एक 'अकुशल श्रमिक' के बराबर कमाकर पत्नी को पैसा देना ही होगा।     पति ने अपनी सही आय के पुख्ता सबूत नहीं दिए, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा कलेक्टर रेट (न्यूनतम मजदूरी) के आधार पर 4,000 रुपए का अंतरिम गुजारा भत्ता तय करना पूरी तरह उचित है। क्या होता है गुजारा भत्ता जानकारी के लिए बता दें कि गुजारा भत्ता (Alimony/Maintenance) तलाक या अलग होने के बाद एक पति/पत्नी द्वारा दूसरे को दी जाने वाली कानूनी और वित्तीय सहायता है। इस सहायता का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर साथी को विवाह के दौरान की जीवनशैली बनाए रखने में मदद करना है। यह राशि अदालत द्वारा या आपसी सहमति से तय की जा सकती है। ये भी जानें -मुख्य उद्देश्य तलाक के बाद आर्थिक असमानता को दूर करना।-यह स्थायी (जीवनभर) या अस्थायी (पुनर्वास के लिए) हो सकता है। -यह आमतौर पर पति की आय का 25-33% हो सकता है, जो पति-पत्नी की संपत्ति, उम्र और वैवाहिक अवधि पर निर्भर करता है। -यह आमतौर पर प्राप्तकर्ता के पुनर्विवाह करने या मौत होने तक जारी रहता है।

गुरु ग्रंथ साहिब कानून पर हाई कोर्ट में सुनवाई, समानता और धर्मनिरपेक्षता पर उठे गंभीर सवाल

चंडीगढ़  पंजाब सरकार के बहुचर्चित “जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026” के खिलाफ अब पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में एक और संवैधानिक चुनौती पहुंच गई है। एंग्लिकन चर्च ऑफ इंडिया (सीआईपीबीसी) ने इस संशोधन कानून को धर्म-विशेष आधारित, भेदभावपूर्ण और संविधान विरोधी बताते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इसके क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने तथा इसे रद्द घोषित करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि पंजाब सरकार ने एक विशेष धार्मिक ग्रंथ को पृथक और अधिक कठोर दंडात्मक संरक्षण देकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 का उल्लंघन किया है। चर्च का तर्क है कि राज्य किसी एक धर्म या उसके पवित्र प्रतीक को ऐसा विशिष्ट विधायी संरक्षण नहीं दे सकता, जिससे अन्य धार्मिक समुदायों के बीच असमानता की भावना उत्पन्न हो। याचिका में इसे संविधान की मूल संरचना में शामिल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कदम बताया गया है। अन्य धर्म भी प्रभावित हो सकते हैं इंडियन चर्च एक्ट, 1927 के तहत गठित धार्मिक निकाय होने का दावा करने वाले याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि पंजाब सरकार स्वयं अपने पूर्व प्रस्तावित “पंजाब प्रिवेंशन ऑफ ऑफेंसेज अगेंस्ट होली स्क्रिप्चर्स बिल, 2025” में स्वीकार कर चुकी थी कि पवित्र ग्रंथों के अपमान की घटनाएं केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब तक सीमित नहीं, बल्कि गीता, कुरान और अन्य धार्मिक ग्रंथ भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में 2026 के संशोधन के जरिए केवल एक धार्मिक ग्रंथ के लिए पृथक कठोर आपराधिक ढांचा तैयार करना राज्य की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। प्रावधानों पर विशेष आपत्ति याचिका में संशोधन कानून के उन प्रावधानों पर विशेष आपत्ति जताई गई है, जिनमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूपों की प्रिंटिंग, प्रकाशन, भंडारण और वितरण पर कड़ा नियामक नियंत्रण, एसजीपीसी के माध्यम से केंद्रीय रजिस्टर, अपराधों को संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौतायोग्य बनाना तथा गंभीर मामलों में आजीवन कारावास तक की सजा शामिल है। चर्च का कहना है कि इस प्रकार का विशेष दंड विधान अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथों को तुलनात्मक रूप से कमतर कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। एसआर बोम्मई, केशवानंद भारती और शायरा बानो जैसे सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि राज्य धार्मिक तटस्थता से विचलित नहीं हो सकता। एक धर्मग्रंथ को कानून संरक्षण साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 सहित मौजूदा केंद्रीय कानून धार्मिक भावनाओं से जुड़े अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं, इसलिए पृथक राज्य कानून विधायी संतुलन और संवैधानिक वैधता दोनों पर सवाल खड़े करता है। चर्च की जनरल काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि वह सभी धर्मग्रंथों के सम्मान और अंतर-धार्मिक सौहार्द के पक्ष में है, लेकिन किसी एक धर्मग्रंथ को विशिष्ट कानूनी संरक्षण देकर अन्य आस्थाओं को अपेक्षाकृत कमतर दर्जा देना संवैधानिक समानता के विरुद्ध है।  

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस के वर्चुअल मीटिंग में पोर्न वीडियो चला, आनन-फानन में रोकनी पड़ी बैठक

नई दिल्ली  दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की अदालत में आज (बुधवार, 29 अप्रैल को) कुछ ऐसा हुआ, जिसे देखकर सब दंग रह गए। दरअसल, जब चीफ जस्टिस देवेंद्र उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने नियमित मामलों की सुनवाई शुरू की तो वर्चुअली यानी ऑनलाइन तरीके से जुड़े एक अनजान यूजर ने अपनी स्क्रीन पर पोर्न वीडियो चलाना शुरू कर दिया और उसे शेयर कर दिया। इसे देख कोर्ट रूम में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में वर्चुअल मीटिंग (VC) को बंद करना पड़ा। जब कुछ देर बाद दोबारा ऑनलाइन कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई तो फिर से उस शख्स ने पोर्न वीडियो चलाना शुरू कर दिया। ऐसा होता देख कोर्ट के अधिकारियों ने VC को बंद कर दिया गया और फिर उसे ऑन नहीं किया गया। जानकारी के मुताबिक, ये पोर्न वीडियो वर्चुअल कॉन्फ्रेंसिंग (VC) सिस्टम के जरिए अमेरिका से ब्रॉडकास्ट किए गए थे। ये कंटेंट श्रीधर सरनोबत और शीतजीत सिंह नाम के यूजर के अकाउंट से चलाए गए। हालांकि, इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि होनी बाकी है। पीछे से आवाज भी आ रही थी बार एंड बेंच के मुताबिक, पोर्न वीडियो के साथ ही पीछे से आवाज भी आ रही थी, "यह यूनाइटेड स्टेट्स से किया गया एक हैक है। मीटिंग को अभी तुरंत बंद कर दो। इसे दोबारा कभी चालू मत करना। तुम हैक हो चुके हो।" दिल्ली हाई कोर्ट में इस तरह की यह पहली घटना है। ये वाकया दोपहर करीब 12:56 बजे हुई। बता दें कि चीफ जस्टिस की अदालत में बुधवार का दिन जनहित याचिकाओं (PIL) की सुनवाई के लिए तय होता है, और आज बेंच के सामने सुनवाई के लिए लगभग 100 मामले हैं। मामले की जांच जारी है इस घटना के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) इंटरफेस पर संभावित साइबर अटैक की जांच की जा रही है। बताया जा रहा है कि पोर्न वीडियो दो बार चलने से कोर्ट रूम में मौजूद जज, वकील, कोर्ट अफसर और अन्य लोग हैरान रह गए। फिलहाल इस मामले की जांच जारी है और जिम्मेदारी तय किए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

हरियाली से महका मनेन्द्रगढ़ न्यायालय परिसर, फलदार वृक्ष बने आकर्षण का केंद्र

मनेन्द्रगढ़/एमसीबी जिला मुख्यालय स्थित मनेन्द्रगढ़ न्यायालय परिसर इन दिनों अपनी हरियाली और फलदार वृक्षों के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। परिसर में लगे लीची, आम और कटहल के पेड़ न केवल पर्यावरण की सुंदरता को बढ़ा रहे हैं, बल्कि यहां आने वाले लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान के बीच ये घने वृक्ष परिसर में ठंडी छाया और सुकून का एहसास करा रहे हैं। न्यायालय में आने वाले अधिवक्ता, कर्मचारी और पक्षकार इन पेड़ों की छांव में राहत महसूस कर रहे हैं। परिसर में विशेष रूप से लीची के गुच्छेदार फल, आम के कच्चे-पके फलों की बहार और कटहल के बड़े आकार के फल इसे किसी बाग-बगीचे जैसा मनोहारी स्वरूप दे रहे हैं। यह प्राकृतिक सौंदर्य लोगों के लिए खास आकर्षण का विषय बन गया है। अधिवक्ता श्रीमती पूनम गुप्ता के अनुसार, न्यायालय परिसर में इस प्रकार की हरियाली न केवल वातावरण को शुद्ध करती है, बल्कि मानसिक शांति भी प्रदान करती है। साथ ही यह पर्यावरण संरक्षण का एक सकारात्मक संदेश भी देती है। यदि न्यायालय प्रशासन और अधिवक्ता संघ द्वारा इस हरियाली को और बढ़ावा दिया जाए, तो आने वाले समय में यह परिसर एक आदर्श उदाहरण बन सकता है, जहां न्यायिक कार्यों के साथ-साथ प्राकृतिक संतुलन का सुंदर समन्वय देखने को मिलेगा।

पुलिस ने लूट को झपटमारी में बदलकर सजा कम करने की कोशिश की, हाई कोर्ट ने DSP और जांच अधिकारी को किया तलब

चंडीगढ़   पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। एक मामले में सजा कम करने के उद्देश्य से पुलिस ने लूटमार की घटना को झपटमारी में बदल दिया। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया लूटमार का मामला होने के बावजूद इसे झपटमारी में परिवर्तित करना न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है। यह मामला जालंधर में दर्ज एक एफआईआर से संबंधित है, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि तीन अज्ञात हमलावरों ने बेसबाल बैट और ‘दातर’ जैसे हथियारों से हमला कर उसे और उसके साथी को घायल किया और मोबाइल फोन, नकदी तथा मोटरसाइकिल छीनकर फरार हो गए। इन तथ्यों के बावजूद पुलिस ने लूटमार की गंभीर धाराओं के बजाय झपटमारी से संबंधित प्रविधानों में मामला दर्ज किया। सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह ने टिप्पणी की कि एफआईआर में वर्णित घटनाक्रम स्पष्ट रूप से लूटमार की श्रेणी में आता है। अदालत ने जांच अधिकारी और संबंधित डीएसपी को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि लूटमार के मामले को झपटमारी में क्यों बदला गया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में लापरवाही या जानबूझकर की गई त्रुटियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। हमलावरों ने हथियारों से हमला कर जालंधर में की थी लूट आरोपित को दी जमानत कोर्ट ने कहा कि इस तरह की त्रुटियां तकनीकी नहीं होतीं, बल्कि इससे पूरे मामले की गंभीरता, सजा की प्रकृति और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। आरोपित को नियमित जमानत भी प्रदान की, यह कहते हुए कि आरोपित सात महीने से हिरासत में है और जांच पूरी हो चुकी है। सह-आरोपितों को पहले ही मिल चुकी है।  

कलकत्ता हाईकोर्ट का चुनाव आयोग पर हमला, तुगलकी फरमान को लेकर सुनाई तीखी आलोचना

कलकत्ता   पश्चिम बंगाल में पहले चरण की वोटिंग के दिन यानी गुरुवार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की जमकर क्लास लगाई. हाईकोर्ट ने बुधवार को भी आयोग को फटकार लगाई थी. गुरुवार को हाईकोर्ट ने कोलकाता और दक्षिण 24 परगना में मोटरबाइकों पर 48 घंटे की पाबंदी लगाने के आदेश को तुगलकी फरमान करार देते हुए इसे नागरिक अधिकारों के खिलाफ बताया. गुरुवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि सिर्फ अधिकार होना किसी भी तरह के आदेश लागू करने का आधार नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि अगर आप सब कुछ बंद करना चाहते हैं तो आपातकाल घोषित कर दीजिए, लेकिन इस तरह नागरिकों के अधिकारों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता. इससे पहले बुधवार को भी हाईकोर्ट ने चुनाव को झटका दिया था. उसने राज्य में आयोग की ओर से करीब 800 लोगों को उपद्रवी करार देने के फैसले को पटल दिया था।   रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग ने 21 अप्रैल को एक अधिसूचना जारी कर 27 अप्रैल शाम 6 बजे से 29 अप्रैल तक मोटरसाइकिलों के उपयोग पर सख्त प्रतिबंध लगाया था. आदेश के अनुसार इस दौरान बाइक केवल सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक ही चलाई जा सकती थी. इसके अलावा पिलियन राइडिंग (पीछे बैठकर सफर) और बाइक रैलियों पर भी रोक लगा दी गई थी. हालांकि मेडिकल इमरजेंसी, पारिवारिक कार्यक्रम और आवश्यक सेवाओं को छूट दी गई थी  आयोग ने बचाव में कही ये बातें चुनाव आयोग ने अपने आदेश का बचाव करते हुए कहा था कि यह कदम स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने तथा किसी भी तरह की हिंसा, डराने-धमकाने या अवांछित घटनाओं को रोकने के लिए उठाया गया है. आयोग का मानना था कि इस तरह के प्रतिबंध से मतदान का माहौल बेहतर और सुरक्षित बनेगा. लेकिन, अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं था. जस्टिस राव ने सुनवाई के दौरान आयोग के वकील से सवाल किया कि क्या अन्य राज्यों में भी इस तरह के आदेश जारी किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि आपके पास पुलिस व्यवस्था और सीसीटीवी कैमरे हैं, फिर इतनी कड़ी पाबंदी की जरूरत क्यों? यह एक असंगत प्रयास है जिससे सब कुछ ठप करने की कोशिश हो रही है  आयोग से हाईकोर्ट के तीखे सवाल अदालत ने यह भी पूछा कि पिछले पांच वर्षों में मोटरसाइकिल चालकों के खिलाफ कितने मामले दर्ज हुए हैं, जिससे यह साबित हो सके कि ऐसा प्रतिबंध आवश्यक था. साथ ही आयोग को निर्देश दिया गया कि वह शुक्रवार तक शपथपत्र (एफिडेविट) दाखिल कर इस फैसले के पीछे की ठोस वजह बताए. हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद राज्यभर में दोपहिया वाहन चालकों ने राहत की सांस ली है. खासकर कोलकाता के मध्यवर्गीय नागरिकों और गिग इकॉनमी से जुड़े लोगों के लिए यह फैसला बड़ी राहत लेकर आया है।  शहर के कई प्रमुख चौराहों पर बाइक सवारों ने कहा कि अदालत ने वही सवाल उठाए हैं, जो वे अधिसूचना जारी होने के बाद से पूछ रहे थे. विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए ऐसे कदम उठाना जो आम नागरिकों के दैनिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित करें, उचित नहीं है. अदालत ने भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी प्रशासन की है, न कि आम जनता पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाकर समस्या का समाधान किया जाए।