samacharsecretary.com

बच्चों की कस्टडी मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम बयान, विदेशी अदालतों के आदेशों पर कही बड़ी बात

 नई दिल्ली  एनआरआई (NRI) कपल के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर होने वाले विवाद अक्सर अंतरराष्ट्रीय कानूनी लड़ाई में बदल जाते हैं। कई बार ऐसा होता है कि एक पक्ष को विदेशी अदालत से अपने पक्ष में आदेश मिल जाता है, जबकि दूसरा पक्ष भारतीय अदालत का दरवाजा खटखटाता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय अदालतों को स्वतंत्र रूप से यह तय करना चाहिए कि बच्चे के हित में क्या है। विदेशी अदालत के फैसले को अपने आप नहीं मान लेना चाहिए, उस पर उचित विचार जरूर किया जाना चाहिए। 'निपटाए गए मामले बार-बार सामने आ रहे' जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि विदेशी अदालतों द्वारा पहले ही निपटाए जा चुके मामले बार-बार उनके सामने आ रहे हैं। ऐसे मामलों का फैसला करना आसान नहीं होता, क्योंकि इनमें बेहद भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दे शामिल होते हैं। इसमें आगे कहा गया कि बच्चे के कल्याण को सबसे व्यापक अर्थ में समझा जाना चाहिए, न कि केवल पैसे या भौतिक सुख-सुविधाओं के नजरिए से। बेंच ने कहा, "यह स्थिति दो आधारों पर टिकी है। पहला यह कि एक बार जब कोई मामला अदालत के सामने आता है तो वह अपने पेरेंट्स पैट्रिया अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करती है। इस अधिकार क्षेत्र के तहत अदालत का यह कर्तव्य है कि वह बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखते हुए मामले पर खुद विचार करे और उसका आकलन करे। दूसरा यह कि ऐसे मामलों में फैसला पक्षों के कानूनी अधिकारों के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चे के कल्याण के आधार पर लिया जाता है। कस्टडी और संरक्षकता से जुड़े हमारे कानूनों में भी कानूनी अधिकारों के बजाय बच्चे के कल्याण पर ही सबसे ज्यादा जोर दिया गया है।" पीठ ने आगे कहा, "ये कानून स्पष्ट करते हैं कि भले ही किसी व्यक्ति को कस्टडी या संरक्षकता पाने का कानूनी अधिकार हो, फिर भी उसे यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, अगर ऐसा करना बच्चे के कल्याण के लिए सही न हो। इसलिए, इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी विदेशी अदालत के आदेश के मुकाबले बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है।” 'विदेशी अदालतों के आदेश का आंख मूंदकर पालन नहीं कर सकते' सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, "दूसरे शब्दों में कहें तो इस देश की कोई अदालत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय किसी विदेशी अदालत के आदेश का आंख मूंदकर पालन नहीं कर सकती और न ही केवल उस आदेश को लागू करने वाली अदालत के रूप में काम कर सकती है।" सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी माता-पिता द्वारा विदेशी अदालत के आदेश की अवहेलना करने का मतलब यह नहीं है कि भारतीय अदालत को उस आदेश को अपने आप लागू करना ही पड़े। साथ ही, बच्चे के कल्याण को सबसे ऊपर रखने का यह भी मतलब नहीं है कि विदेशी अदालत के आदेश को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाए। बेंच ने कहा, "बच्चे के कल्याण के लिए क्या जरूरी है, यह तय करते समय अदालत को अपना स्वतंत्र निर्णय लेना चाहिए। हालांकि, ऐसा करते समय उसे विदेशी अदालत के आदेश को भी उचित महत्व देना चाहिए।" अदालत का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अमेरिकी नागरिक सात साल की बच्ची को वापस अमेरिका भेज दिया जाए। बच्ची को उसकी मां कैलिफोर्निया के कस्टडी आदेश का उल्लंघन करके भारत ले आई थी। क्या है मामला? कैलिफोर्निया की एक अदालत ने 2022 में इस जोड़े को बच्चे की संयुक्त कस्टडी दी थी और विशेष रूप से यह निर्देश दिया था कि लिखित सहमति या अदालत के आदेश के बिना बच्चे को कैलिफोर्निया से बाहर नहीं ले जाया जा सकता। अदालत के इस आदेश का उल्लंघन करते हुए दो हफ्ते बाद ही मां बच्चे को लेकर भारत आ गई। इसके बाद पिता ने भारत में उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने उस पिता की याचिका स्वीकार कर ली। यह याचिका कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें पिता की अर्जी खारिज कर दी गई थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि बच्ची का भला इसी में है कि वह अमेरिका में ही रहे।

चंडीगढ़ में बच्ची को ससुराल वालों ने मां से किया था अलग, हाईकोर्ट ने मां को सौंपी कस्टडी

चंडीगढ़  पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने छह साल की बच्ची की अभिरक्षा मां को सौंपने का आदेश दिया है। बच्ची अक्तूबर 2025 से पिता के परिवार के पास रह रही थी। मां ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर बेटी को पेश कराने और कस्टडी देने की मांग की थी। सुनवाई में अदालत ने बच्ची की कम उम्र और कल्याण पर विचार करते हुए कहा कि उसके विकास में मां की देखभाल और स्नेह महत्वपूर्ण हैं। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर बच्ची की कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी स्थायी अभिरक्षा के प्रश्न पर सक्षम अदालत तथ्यों और परिस्थितियों का विस्तृत आकलन कर निर्णय ले सकती है। चंडीगढ़ निवासी याचिकाकर्ता की शादी दिसंबर 2014 में हुई थी और मार्च 2020 में बेटी का जन्म हुआ। महिला का पति रोजगार के सिलसिले में कुवैत चला गया था। महिला ने आरोप लगाया कि ससुराल में उसके साथ दुर्व्यवहार हुआ और शिकायत करने पर उसकी बात नहीं सुनी गई। इसके बाद वह चार अक्तूबर 2025 को बेटी के साथ ससुराल से निकल गई। महिला के अनुसार, रास्ते में ससुराल पक्ष के लोगों ने उससे बच्ची को अलग कर दिया। उसने पुलिस से शिकायत की और परिवार स्तर पर भी बच्ची की वापसी का प्रयास किया, लेकिन बेटी की कस्टडी नहीं मिली। इसके बाद उसने हाई कोर्ट का रुख किया। ससुराल पक्ष ने महिला के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि बच्ची की उचित देखभाल की जा रही है। उनका पक्ष था कि महिला अपनी मर्जी से ससुराल छोड़कर गई थी।

सरकारी वकीलों की ड्राफ्टिंग पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, AG-डिप्टी AG से पूछा सवाल

ग्वालियर ग्वालियर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के चुनाव कराने को लेकर स्टेट बार काउंसिल और बार एसोसिएशन के बीच विवाद अब अदालत तक पहुंच गया है।स्टेट बार काउंसिल की ओर से गठित तदर्थ समिति को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकारी वकीलों की ड्राफ्टिंग पर मौखिक रूप से सवाल उठाए। वहीं, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पवन पाठक के मुताबिक, अदालत ने चुनाव हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से गठित निर्वाचन समिति से कराने और 31 दिसंबर तक प्रक्रिया पूरी करने की बात कही है। विस्तृत लिखित आदेश आना अभी बाकी है। सरकारी वकीलों की ड्राफ्टिंग पर मौखिक टिप्पणी सुनवाई के दौरान अदालत ने महाधिवक्ता (AG), डिप्टी एडवोकेट जनरल और डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया की कानूनी तैयारी और याचिका की ड्राफ्टिंग पर तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने सवाल किया कि यदि याचिका में ऐसी कमियां हैं, तो सरकारी पक्ष की पैरवी कैसे की जाएगी। मामले में अदालत की मौखिक टिप्पणियों का विस्तृत ब्यौरा लिखित आदेश आने के बाद स्पष्ट होगा। छह दिन में बनी दूसरी कमेटी, चुनाव को लेकर खींचतान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पिछले चुनाव 20 अप्रैल 2023 को हुए थे। कार्यकारिणी का दो साल का कार्यकाल 20 अप्रैल 2025 को समाप्त हो गया था, लेकिन चुनाव नहीं हो सके।चुनाव कराने के लिए स्टेट बार काउंसिल ने 15 अक्टूबर को एडवोकेट राजेंद्र जैन के संयोजकत्व में नौ सदस्यीय तदर्थ समिति गठित की थी। इसके बाद बुधवार को बार एसोसिएशन अध्यक्ष पवन पाठक की अध्यक्षता में बैठक हुई। चुनाव अधिकारी एडवोकेट अरुण पटेरिया ने चुनाव कराने में असमर्थता जताई, जिसके बाद सर्वसम्मति से आठ सदस्यीय नई निर्वाचन समिति गठित की गई। इसमें पीसी चांदिल, संजीव कुमार मिश्र, अनिल श्रीवास्तव, रागिनी मिश्रा, शूरवीर चाहर, पुरुषोत्तम पांडेय, सोमवीर यादव और ऋषि कुमार कटारे शामिल हैं। बैठक में ये पदाधिकारी रहे मौजूद बैठक में अध्यक्ष पवन पाठक, वरिष्ठ उपाध्यक्ष जितेंद्र दीक्षित, सचिव महेश गोयल, मनीष शर्मा, आबिद खान, अखिलेश गुप्ता, प्रभात हिन्नारिया और ऐश्वर्य जोशी प्रत्यक्ष रूप से मौजूद रहे। वहीं, सरनाम सिंह, हरियोगेंद्र भदौरिया, दिलीप पाठक, योगेश सिंघल, आशीर्वाद द्विवेदी, कीर्ति द्विवेदी और अंशु गुप्ता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े। बार एसोसिएशन अध्यक्ष पवन पाठक ने दैनिक भास्कर से चर्चा में बताया कि स्टेट बार काउंसिल की चुनाव समिति के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणियां कीं। उनके मुताबिक, अदालत ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की निर्वाचन समिति से चुनाव कराने और 31 दिसंबर तक प्रक्रिया पूरी करने की बात कही है।

25 साल पुराने केस में पंजाब सरकार की मुश्किलें बढ़ीं, हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को किया तलब

 चंडीगढ़  पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 25 साल पुराने मामले में बार-बार अवसर मिलने के बावजूद जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर पंजाब सरकार के प्रति नाराजगी जताई है। जस्टिस संदीप मोदगिल की एकल पीठ ने पंजाब के मुख्य सचिव को 28 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुख्य सचिव पर लगाए गए दो लाख रुपये के जुर्माने पर खंडपीठ की रोक से व्यक्तिगत पेशी के निर्देश और अवमानना संबंधी कारण बताओ नोटिस पर रोक नहीं लगी है। सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने बताया कि मुख्य सचिव पर जुर्माना लगाने के आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी गई थी और वहां से जुर्माने पर रोक मिल गई है। नोटिस का जवाब देने के निर्देश बरकरार एकल पीठ ने संबंधित आदेशों का अवलोकन करने के बाद कहा कि रोक केवल जुर्माने पर है। मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से पेश होने और अवमानना संबंधी नोटिस का जवाब देने के निर्देश बरकरार हैं। मुख्य सचिव को अदालत में स्पष्ट करना होगा कि इतने लंबे समय से लंबित मामले में बार-बार अवसर मिलने के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने लिखित जवाब क्यों दाखिल नहीं किया। सरकार की दलीलों पर सवाल हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार के रुख पर असंतोष जताते हुए कहा कि खंडपीठ के समक्ष रखी गई पांचों दलीलें न्यायिक रिकार्ड के विपरीत हैं। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि गलत तथ्य पेश कर अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया गया। जवाब दाखिल करने में देरी पर अदालत ने मुख्य सचिव से स्पष्टीकरण मांगा। करीब 25 साल से लंबित इस मामले में जवाब दाखिल नहीं होने पर हाईकोर्ट ने पहले मुख्य सचिव पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया था और उनके खिलाफ अवमानना संबंधी कारण बताओ नोटिस जारी कर व्यक्तिगत पेशी का निर्देश दिया था। सरकार ने जुर्माने के आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी, जहां उस पर रोक लगाई गई। एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि जुर्माने पर रोक से पेशी और नोटिस संबंधी निर्देश निष्प्रभावी नहीं होंगे।

6 दिन में मस्जिद तोड़ने का आदेश, ओवैसी ने जताया विरोध; अब हाईकोर्ट का रुख करेंगे

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सरकारी आवास 7 लोक कल्याण मार्ग के पास स्थित ऐतिहासिक 'रेस कोर्स मस्जिद' को लेकर विवाद मंगलवार को और गहरा गया। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, AAP नेता अमानतुल्लाह खान और कश्मीर के मुख्य धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने मस्जिद को खाली करने के लिए दिए गए 6 दिन के नोटिस पर चिंता जताई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कहा है कि वह इस नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देगी। ओवैसी ने केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब 1977 से ही इस मस्जिद को एक गजटेड वक्फ संपत्ति माना गया है, तो दिल्ली वक्फ बोर्ड ने इस आदेश को चुनौती क्यों नहीं दी? उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि 2023 से दिल्ली वक्फ बोर्ड का गठन ही नहीं हुआ है, जबकि बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) इस मामले में हस्तक्षेप कर सकते थे। मीरवाइज ने भी की आलोचना मीरवाइज ने भी मस्जिद खाली करने के लिए दी गई 6 दिन की समय-सीमा की आलोचना की। उन्होंने इसे बेहद चिंताजनक बताया और मस्जिद का बचाव करने में वक्फ अधिकारियों की कथित विफलता पर सवाल उठाए। उन्होंने इस विवाद को वक्फ संशोधनों और मुस्लिम धार्मिक संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण से जुड़ी व्यापक बहस से जोड़कर देखा। दिल्ली वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अमानतुल्लाह खान ने भी इस कार्रवाई पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यह मस्जिद आजादी से पहले की है और नई दिल्ली नगर परिषद (NDMC) की अधिसूचित हेरिटेज लिस्ट में शामिल है। उन्होंने कहा कि वह खुद मौके पर जाकर स्थिति का जायजा लेंगे। दिल्ली हाईकोर्ट तक जाएगा मामला जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने का कहना है कि मस्जिद खाली करने के नोटिस के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी। इससे पहले भी इस मामले को चुनौती देने की कोशिश की गई थी, लेकिन याचिकाकर्ता के सही पक्ष नहीं होने के कारण उसे खारिज कर दिया गया था। इस बार AIMIM के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉ. शोएब जमाई मस्जिद समिति की ओर से याचिका दायर कर सकते हैं। 'दिल्ली वक्फ बोर्ड से नहीं मिली मदद' मस्जिद के इमाम मोहम्मद हारून ने बताया कि उन्होंने पिछले छह महीनों में कई बार दिल्ली वक्फ बोर्ड से संपर्क किया, लेकिन उन्हें कोई ठोस मदद नहीं मिली। उन्होंने आरोप लगाया है कि बिजली और पानी की आपूर्ति काट दी गई है। सोमवार को जमीयत के एक प्रतिनिधिमंडल ने रिजिजू से मुलाकात की और बिजली-पानी की आपूर्ति बहाल करने, नमाजियों के लिए मस्जिद तक पहुंच सुनिश्चित करने और मस्जिद और उससे सटे कब्रिस्तान की सुरक्षा की मांग की। क्या है विवाद? आपको बता दें कि मुख्य विवाद उस जमीन को लेकर है जिस पर मस्जिद बनी है। भूमि और विकास कार्यालय द्वारा जारी बेदखली का नोटिस केवल मस्जिद तक सीमित नहीं है। इसका असर पास की एक झुग्गी बस्ती पर भी पड़ रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिकारियों को इस बस्ती में रहने वाले लगभग 700 परिवारों को वहां से हटाने और उन्हें लगभग 45 किमी दूर स्थित सरकारी पुनर्वास कॉलोनी सावदा घेवरा में भेजने की अनुमति दी है। अधिकारियों को पुनर्वास स्थल पर शिक्षा, परिवहन और स्वच्छता जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। आपको बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा इस जगह को खाली करने के लिए दिया गया छह सप्ताह का समय 6 अक्टूबर को समाप्त हो गया।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, बगलामुखी मंदिर के पास अब नहीं टूटेंगे 4 और निर्माण

 इंदौर  आगर-मालवा जिले में नलखेड़ा स्थित मां बगलामुखी मंदिर के पास निजी जमीन पर बनी यज्ञशालाओं को हटाने के चार और मामलों में जमीन मालिकों को राहत मिली है। रविवार को अवकाश के बावजूद न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की विशेष पीठ ने सुनवाई की और अगली सुनवाई तक यहां किसी भी तरह की तोड़फोड़ या अन्य कार्रवाई पर रोक लगा दी। मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए निजी जमीन पर बने यज्ञ, हवन और पूजन कराने के उद्देश्य से बनाए गए अस्थायी ढांचों को हटाने के लिए नलखेड़ा नगर परिषद ने नोटिस जारी किए थे। इसके पहले शनिवार को भी हाई कोर्ट ने ऐसे चार मामलों में परिषद के नोटिस पर स्टे किया था। 48 घंटे में हटाने के आदेश दिए गए थे अधिवक्ता गौरव श्रीवास्तव और परितोष श्रीवास्तव ने बताया कि नगर परिषद नलखेड़ा द्वारा 12 अक्टूबर को जारी नोटिस याचिकाकर्ता को 16 अक्टूबर की शाम मिले थे। इसमें निजी भूमि पर बने अस्थायी निर्माण को 48 घंटे में हटाने के निर्देश दिए गए थे। नगर परिषद के नोटिस में कहा गया कि बगैर अनुमति और भवन अनुज्ञा के ही यज्ञशाला का निर्माण किया गया है। दो सप्ताह में जवाब पेश के लिए कहा वहां हवन-यज्ञ के दौरान आग प्रज्वलित की जाती है, लेकिन अग्नि सुरक्षा और अग्निशामक उपकरणों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि संबंधित जमीन निजी स्वामित्व की है और अस्थायी निर्माण की अनुमति के लिए आवेदन भी स्थानीय निकाय को दिया गया था।  

पिता की मौत के दशकों बाद भी बेटी का संपत्ति पर अधिकार, भाई की अपील हाईकोर्ट ने की खारिज

बिलासपुर  पिता की मृत्यु वर्ष 1980 में होने के आधार पर बेटी को पैतृक संयुक्त संपत्ति में हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 के संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए भाई की दूसरी अपील खारिज कर दी। न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने बहन को जमीन के आधे हिस्से का बंटवारा और अलग कब्जा देने के निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा। बेमेतरा की 7.120 हेक्टेयर जमीन का है मामला मामला बेमेतरा जिले के धंगांव गांव की 7.120 हेक्टेयर कृषि भूमि से जुड़ा है। जमीन पिता नानकू साहू के नाम दर्ज थी। उनकी मृत्यु 15 सितंबर 1980 को हो गई थी। इसके बाद बेटे डुलार साहू ने जमीन अपने नाम दर्ज करा ली। बेटी दुलारा बाई ने इस नामांतरण को चुनौती देते हुए वर्ष 2007 में जमीन में अपना हिस्सा मांगा। भाई ने हिस्सा देने से इनकार किया तो उसने बंटवारे और अलग कब्जे के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया। निचली अदालतों ने बहन के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आधे हिस्से का बंटवारा और अलग कब्जा देने का आदेश दिया था, जिसे भाई ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। गहने देना अधिकार छोड़ने का प्रमाण नहीं भाई की ओर से दलील दी गई कि बहन को माता-पिता की मृत्यु के बाद सोने-चांदी के गहने दिए गए थे, इसलिए उसने जमीन पर अपना अधिकार छोड़ दिया था। यह भी कहा गया कि लंबे समय से जमीन पर खेती करने के कारण उसका प्रतिकूल कब्जा हो गया है और संपत्ति का बंटवारा पहले ही हो चुका है। हाई कोर्ट ने कहा कि केवल गहने या दूसरी चल संपत्ति दिए जाने के दावे से यह नहीं माना जा सकता कि बेटी ने अचल संपत्ति में अपना अधिकार छोड़ दिया। इसके लिए संबंधित व्यवस्था, पक्षकारों की मंशा और अधिकार समाप्त करने के कानूनी आधार का प्रमाण जरूरी है। इसी तरह, केवल 12 वर्ष से अधिक समय तक खेती करने से प्रतिकूल कब्जा साबित नहीं होता। संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में एक सह-हिस्सेदार का कब्जा सामान्यतः सभी की ओर से माना जाता है, जब तक दूसरे के अधिकार को स्पष्ट रूप से समाप्त करने का प्रमाण न हो। सुप्रीम कोर्ट के विनीता शर्मा फैसले का हवाला अपील में भाई ने तर्क दिया कि पिता की मृत्यु संशोधित कानून लागू होने से पहले हो गई थी, इसलिए बहन को 2005 के संशोधन का लाभ नहीं मिलना चाहिए। बहन की ओर से सुप्रीम कोर्ट के विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा फैसले का हवाला दिया गया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संशोधित धारा 6 के तहत बेटी को बेटे के समान सहदायिकी अधिकार जन्म से मिलता है। इसके लिए यह जरूरी नहीं कि पिता 9 सितंबर 2005 को जीवित रहे हों। हालांकि, 20 दिसंबर 2004 से पहले हुए बताए जाने वाले बंटवारे को कानून में निर्धारित कसौटियों पर परखना होगा। केवल मौखिक बंटवारे का दावा पर्याप्त नहीं है; इसके समर्थन में ठोस प्रमाण जरूरी हैं। अदालत ने माना कि निचली अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप का आधार नहीं है। दूसरी अपील खारिज कर दी गई।

शादी की रस्मों पर विवाद से विवाह शून्य नहीं होता: हाईकोर्ट ने पति की याचिका ठुकराई

बिलासपुर  फेसबुक पर दोस्ती के बाद मंदिर में शादी करने वाले पति ने सात फेरे नहीं होने का हवाला देकर शादी को अमान्य घोषित करने की मांग की थी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी है।जस्टिस पीपी साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की बेंच ने कहा कि सिर्फ शादी की रस्में पूरी नहीं होने से विवाह को अमान्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 में शादी को अमान्य घोषित करने के कुछ तय आधार हैं। केवल रस्मों को लेकर विवाद होने पर शादी को शून्य घोषित नहीं किया जा सकता। मामला जांजगीर-चांपा जिले के राहौद के युवक-युवती से जुड़ा है, जिन्होंने 3 फरवरी 2022 को मंदिर में शादी की थी। बाद में पति ने शादी को मानने से इनकार करते हुए दावा किया कि सात फेरे नहीं हुए और दबाव डालकर शादी के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। वहीं, पत्नी का कहना था कि शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी और पति भरण-पोषण से बचने के लिए इसे अमान्य घोषित कराना चाहता है। इस मामले में डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट का फैसला निरस्त कर दिया, लेकिन पति की मूल याचिका भी खारिज कर दी। अब जानिए पूरा मामला दरअसल, जांजगीर-चांपा जिले के राहौद के रहने वाले युवक और युवती की पहचान फेसबुक के जरिए हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए। फिर उन्होंने शादी करने का फैसला किया। हालांकि, जब युवक युवती के परिवार वालों से मिला, तो उसने कहा कि वह पहले अपने परिवार की सहमति लेगा। धमकी देकर दस्तावेजों में हस्ताक्षर कराने का आरोप इस दौरान दोनों ने 3 फरवरी 2022 को मंदिर में शादी कर ली और शादी से जुड़े दस्तावेज भी बनवा लिए। लेकिन कुछ समय बाद दोनों के बीच मनमुटाव होने लगा। इसके बाद युवक ने शादी को मानने से इनकार कर दिया। युवक का आरोप था कि युवती ने उसे अपने घर बुलाया और शादी करने के लिए दबाव बनाया। उसने यह भी आरोप लगाया कि आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देकर शादी के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। इसके बाद चिरमिरी के शिव मंदिर में जल्दबाजी में शादी करा दी गई। युवक का कहना था कि शादी के दौरान सात फेरे भी नहीं हुए थे। सात फेरे की रस्में नहीं हुई थीं पूरी युवक का कहना था कि शादी के दौरान हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अग्नि के सामने सात फेरे लेने की रस्म नहीं हुई थी। इसलिए उसने शादी को अमान्य घोषित करने की मांग की। इसके लिए युवक ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। भरण-पोषण देने से बचने के लिए विवाह शून्य करने की मांग वहीं, युवती ने युवक के आरोपों को गलत बताया। उसका कहना था कि शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। शादी के बाद युवक ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार भी किया और दोनों करीब डेढ़ महीने तक साथ रहे। युवती ने आरोप लगाया कि युवक भरण-पोषण देने से बचने के लिए शादी को अमान्य घोषित कराने की कोशिश कर रहा है। फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दी थी अर्जी फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने और सबूत देखने के बाद युवक की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट का कहना था कि सिर्फ सात फेरे नहीं होने से शादी को अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता। इसके बाद युवक ने हाईकोर्ट में अपील की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5, 7 और 11 पर विचार किया। कोर्ट ने बताया कि धारा 7 के तहत हिंदू विवाह संबंधित लोगों के रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार होता है। अगर उन रीति-रिवाजों में सात फेरे या अग्नि के सामने सात कदम लेने की रस्म शामिल है, तो सातवां कदम लेने के बाद ही विवाह पूरा माना जाता है। फैमिली कोर्ट ने नियम की अनदेखी की हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने मामले के कानूनी पहलुओं पर ध्यान देने के बजाय शादी की रस्मों और उसकी वैधता पर फैसला दिया था। जबकि, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत यह देखना जरूरी था कि शादी में धारा 5 की शर्तों का उल्लंघन हुआ है या नहीं। इस कानूनी गलती के कारण हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। हालांकि, इससे युवक को शादी को अमान्य घोषित कराने में कोई राहत नहीं मिली और उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान: बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर नहीं रखा जा सकता

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट के इस्तेमाल को हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार बताया है. कोर्ट ने कहा है कि यह अधिकार बच्चों को भी हासिल है. उन्हें इससे पूरी तरह वंचित करना गलत होगा. बेंच ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं. बच्चों को दोनों का अधिकार है।  सोशल मीडिया और दूसरी ऑनलाइन सेवाओं पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री पर चिंता जताने वाली एक याचिका पर आदेश देते हुए कोर्ट ने यह बातें कहीं हैं. जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने इस तरह की सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने की व्यवस्था मजबूत करने का निर्देश दिया है।  इंटरनेट का इस्तेमाल भी मौलिक अधिकार फैसले में जजों ने माना है कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) के तहत इंटरनेट का इस्तेमाल भी एक मौलिक अधिकार है. बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना उनकी सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का समाधान नहीं हो सकता. इंटरनेट पर बच्चों के लिए कई खतरे हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की नाकामी है. इसे लेकर कदम उठाए जाने चाहिए।  सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अगर बच्चों के इंटरनेट के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया तो इसके बुरे परिणाम हो सकते हैं. प्रतिबंध के बावजूद बच्चे इंटरनेट इस्तेमाल कर सकते हैं और ऐसे अनियंत्रित प्लेटफॉर्म पर जा सकते हैं, जहां उनके लिए खतरा ज्यादा हो. प्रतिबंध के चलते बच्चे ऑनलाइन धमकी या शोषण के बारे में माता-पिता या भरोसेमंद लोगों को बताने से भी डर सकते हैं।  बेंच ने कहा कि इंटरनेट विचारों, रचनात्मक अभिव्यक्ति और जानकारी का बड़ा माध्यम है. दूरदराज के इलाकों में रहने वाले कई बच्चों के लिए यह सीखने और जानकारी हासिल करने का एकमात्र साधन हो सकता है. विशेष जरूरतों वाले बच्चों को भी इंटरनेट के जरिए अपने जैसे दूसरे लोगों से जुड़ने का अवसर मिलता है।  शिकायत पर 24 घंटे में देना होगा रेफरेंस नंबर सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी वेबसाइट और ऐप पर शिकायत अधिकारी की जानकारी और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों के लिए अलग शिकायत विकल्प देना होगा। हर शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर रेफरेंस नंबर देना होगा। प्रशिक्षित अधिकारी शिकायत की जांच करेंगे और फैसले के साथ उसका कारण भी बताएंगे। कोर्ट ने केंद्र से आईटी नियमों में जरूरी बदलाव करने को कहा है। नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर जुर्माने पर विचार कोर्ट ने आईटी कानून और नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर आर्थिक जुर्माना लगाने की व्यवस्था पर विचार करने को कहा है। जुर्माना तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, अवधि, बार-बार हुई चूक और कंपनी के आकार और कारोबार को ध्यान में रखने का सुझाव दिया गया है। पेड और सब्सक्रिप्शन वाली सेवाओं की भी जांच होगी, ताकि इनके जरिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ा कंटेंट न फैलाया जाए। सरकार से ऐसी सामग्री से हुई कमाई जब्त करने के विकल्प पर भी विचार करने को कहा गया है। स्कूली पढ़ाई में शामिल होगी ऑनलाइन सुरक्षा कोर्ट ने बच्चों को ऑनलाइन खतरे पहचानना, निजी जानकारी सुरक्षित रखना और गलत व्यवहार की शिकायत करना सिखाने पर जोर दिया है। उम्र के हिसाब से सहमति, सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श और ऑनलाइन शोषण जैसे विषय पढ़ाए जाने चाहिए। NCERT और राज्य शैक्षिक संस्थाओं को विशेषज्ञों की मदद से पढ़ाई की सामग्री तैयार करने को कहा गया है। डिजिटल सुरक्षा और उम्र के अनुसार यौन शिक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने पर भी जोर दिया गया है। केंद्र सरकार को 10 दिसंबर तक देनी होगी रिपोर्ट केंद्र सरकार को निर्देश लागू करने के लिए जरूरी दिशानिर्देश और प्रक्रियाएं तैयार करनी होंगी। जरूरत के मुताबिक आईटी कानून और नियमों में बदलाव भी करने होंगे। सरकार को हलफनामा देकर निर्देशों पर हुई प्रगति की जानकारी देनी है। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होगी। डेटाबेस में असली फोटो-वीडियो नहीं, उनकी डिजिटल पहचान होगी जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने निर्देश दिया कि डेटाबेस में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े प्रमाणित कंटेंट की डिजिटल पहचान यानी हैश और उन वेबसाइटों के लिंक रखे जाएंगे, जहां यह सामग्री मौजूद है। इसे मौजूदा सहयोग पोर्टल पर या अलग से बनाया जा सकता है।     तीन विशेषज्ञ करेंगे जांच: किसी सामग्री को डेटाबेस में दर्ज करने से पहले उसकी जांच होगी। कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से तय करेंगे कि वह बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी है या नहीं। शुरुआती जांच में सॉफ्टवेयर की मदद ली जा सकती है।     गलत जानकारी हटाने की व्यवस्था: जांच का रिकॉर्ड रखा जाएगा। डेटाबेस तक किसने पहुंच बनाई, इसकी जानकारी भी दर्ज होगी और समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट किया जाएगा। गलत तरीके से दर्ज सामग्री को हटाने और इसकी शिकायत करने की व्यवस्था भी बनानी होगी।     एक प्लेटफॉर्म से हटाया कंटेंट दूसरे पर भी पहचाना जाएगा: सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री का मिलान डेटाबेस से कर सकेंगी। इससे वही कंटेंट दोबारा अपलोड होने पर भी पहचाना जा सकेगा। कंटेंट हटाने के बाद कंपनियां पुलिस को रिपोर्ट करेंगी कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसे मामलों की जानकारी संबंधित विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU), स्थानीय पुलिस या साइबर क्राइम पोर्टल को देनी होगी। इसके लिए तीन स्थितियों में अलग समयसीमा तय की गई है।     कंपनी को अपनी जांच में कंटेंट मिले: अज्ञात स्रोत का ऐसा कंटेंट हटाने पर दो घंटे के भीतर रिपोर्ट देनी होगी।     शिकायत के बाद कंटेंट हटाया जाए: शिकायत का निपटारा होने के तुरंत बाद रिपोर्ट देनी होगी। किसी भी स्थिति में इसमें दो घंटे से ज्यादा समय नहीं लगना चाहिए।     डेटाबेस से मिलान होने पर कंटेंट हटे: राष्ट्रीय डेटाबेस में दर्ज सामग्री से मिलान के कारण हटाए गए कंटेंट की जानकारी संबंधित प्राधिकरण को हर सप्ताह एक साथ देनी होगी। कोर्ट ने 2020 और 2025 के फैसले का किया जिक्र इस फैसले में कोर्ट ने 2020 के 'अनुराधा भसीन' और 2025 के 'प्रज्ञा प्रसून' फैसलों का भी ज़िक्र किया है. कोर्ट ने कहा कि इन फैसलों में इंटरनेट के इस्तेमाल से अभिव्यक्ति की आजादी और डिजिटल … Read more

सुसाइड केस में हाईकोर्ट का फैसला, 2009 के मामले में तीन अपीलकर्ताओं की सजा रद्द

बिलासपुर   छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वर्ष 2009 के एक आत्महत्या उकसाने के मामले में तीन जीवित अपीलकर्ताओं की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया है. अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अभियुक्तों की मंशा मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाने की थी।  न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने निचली अदालत के अप्रैल 2013 के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार किया, जिसमें अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और धारा 34 के तहत 10 साल के कठोर कारावास और ₹500 के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।  यह मामला अंबिकापुर का है, जहाँ 18 अप्रैल 2009 को एक महिला ने जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी. अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना से ठीक पांच दिन पहले (13 अप्रैल 2009 को) महिला और उसके होने वाले पति के साथ अभियुक्तों (जो महिला के दूर के रिश्तेदार थे) ने मारपीट की थी, क्योंकि उन्हें दोनों के एक साथ होने पर आपत्ति थी।  अपीलकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में तर्क दिया कि केवल मारपीट की घटना से उकसावे का अपराध सिद्ध नहीं होता और कथित सुसाइड नोट से जुड़ी हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट को भी अदालत में कानूनी रूप से साबित नहीं किया गया था।  मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि साक्ष्यों से मारपीट की घटना तो साबित होती है, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत अपराध गठित करने के लिए आवश्यक आपराधिक मंशा (इरादा) साबित नहीं हुई।  अदालत ने टिप्पणी की कि घटना आत्महत्या से लगभग पांच दिन पहले हुई थी और रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं लाया गया है जिससे यह पता चले कि अभियुक्तों ने महिला को खुदकुशी के लिए उकसाने के मकसद से मारपीट की थी।  सभी साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने निचली अदालत के 2013 के सजा के आदेश को निरस्त कर दिया और अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया. साथ ही, अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 481 के प्रावधानों के तहत उनके जमानत मुकले (बेल बॉन्ड) को छह महीने की अवधि के लिए प्रभावी रखने का निर्देश दिया है।