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कोर्ट का अहम फैसला, पत्नी की टिप्पणी को बताया उकसावे वाला; पति की सजा की अवधि घटाई

छिंदवाड़ा मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पत्नी की हत्या मामले में पति की सजा कम कर दी है। कोर्ट ने अपने पति पर पत्नी की इस टिप्पणी, कि तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं को उकसावा माना है। इस केस में पति ने तैश में आकर अपनी पत्नी की हत्या कर दी थी। ट्रायल कोर्ट ने मामले में पति को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अब हाई कोर्ट ने इस सजा को बदलकर सात साल के सश्रम कारावास में तब्दील कर दिया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अननिंद्र कुमार सिंह की बेंच ने इस तरह की टिप्पणी, दिखाती है कि पति की कोई वैल्यू नहीं है। यह न सिर्फ पति बल्कि उसके इंसानी अस्तित्व के लिए भी खतरा है। ऐसी टिप्पणी सुनकर पति ने आपा खो दिया और घटना को अंजाम दिया। क्या है मामला यह मामला, मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिला स्थित चौरई का है। यहां पर 18-19 जुलाई की रात शिवा और उसकी पत्नी किरण के बीच झगड़ा हुआ। यह झगड़ा कुलबहेरी नदी के खर्रा घाट के पास हुआ। आरोप के मुताबिक झगड़े के दौरान किरण ने अपने पति पर कटाक्ष करते हुए कहाकि तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं। इसके बाद शिवा ने गुस्से में पत्थर उठाकर अपनी पत्नी के ऊपर दे मारा और उसकी मौत हो गई। जानकारी के मुताबिक बाद में शिवा ने फोन करके पुलिस और पत्नी के परिजनों को घटना के बारे में पूरी जानकारी दी। शिवा की तरफ से पेश वकील ने पक्ष रखते हुए कहाकि शिवा के खिलाफ भरोसे लायक सबूत नहीं हैं। इसके अलावा, साक्ष्यों में विरोधाभास भी है। इस आधार पर उसने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करने की मांग उठाई थी। हाई कोर्ट ने क्या कहा हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने माना कि शिवा ने अपनी पत्नी को चोट पहुंचाई और इससे उसकी मौत हुई। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहाकि यह घटना अचानक झगड़े के चलते हुई। कहीं से भी यह सिद्ध नहीं होता कि आरोपी हत्या की योजना बनाकर वहां पहुंचा था। इसके अलावा कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि घटना के तुरंत बाद आरोपी ने पुलिस और अपनी पत्नी के रिश्तेदारों को फोन करके इसकी जानकारी दी थी। इसके अलावा कोर्ट ने पत्नी की टिप्पणी को गंभीर और अचानक उकसावे वाला मामला बताया। सुप्रीम कोर्ट का हवाला जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अननिंद्र कुमार सिंह की बेंच ने मामले में यह भी कहाकि अगर आरोपी अपनी पत्नी की हत्या के इरादे से वहां गया होता तो वह घटना को अंजाम देने के बाद फरार हो जाता। वह इसके बारे में पुलिस या पत्नी के रिश्तेदारों को जानकारी नहीं देता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसके मुताबिक अगर कोई शख्स अचानक उकसावे के चलते खुद पर से नियंत्रण खो देता है तो अपराध का आंकलन उसी आधार पर होना चाहिए। अदालत ने यह भी कहाकि यह साबित नहीं होता कि आरोपी ने बार-बार पत्नी के ऊपर पत्थर से हमला किया। कुछ चोटें घटनास्थल पर मौजूद पत्थरों पर गिरने के चलते भी लग सकती हैं।

पहचान छिपाकर विवाह विवाद में बड़ा फैसला, पत्नी और बेटी को हर महीने ₹20 हजार देने होंगे

 इंदौर  धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और बाद में मतांतरण के लिए दबाव बनाने से जुड़े मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की एकल पीठ ने कहा कि यदि किसी महिला से धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह किया और उससे संतान भी जन्मीं हो, तो केवल विवाह की वैधता के तकनीकी आधार पर महिला को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पीड़िता और उसकी अवयस्क पुत्री के लिए 10-10 हजार रुपये, यानी कुल 20 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण मंजूर किया है। याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता राजेश जोशी ने बताया कि 23 फरवरी 2020 को कोरोना के दौरान मुस्तफा ने स्वयं को हिंदू बताकर एक महिला से मंदिर में विवाह किया था। जब महिला गर्भवती हुई, तब उसे आधार कार्ड के माध्यम से पति की वास्तविक धार्मिक पहचान का पता चला। आरोप है कि इसके बाद पति ने उस पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट भी की गई। महिला ने परिवार न्यायालय में भरण-पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन 2023 में परिवार न्यायालय ने यह कहते हुए उसका आवेदन निरस्त कर दिया कि वह कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है। अदालत ने केवल उसकी पुत्री के लिए दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण मंजूर किया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए महिला ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। जिसके बाद अदालत ने परिवार न्यायालय के फैसले को पलटते हुए दोनों के लिए प्रतिमाह 20 हजार रुपये भरण-पोषण की राशि का आदेश दिया।  

MP हाईकोर्ट की नई गाइडलाइन, पार्किंग समस्या के समाधान के लिए अधिवक्ताओं को कार पूलिंग अपनाने की सलाह

 जबलपुर कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने गुरुवार को हाई कोर्ट के सामने प्रस्तावित 117 करोड़ रुपये के अधिवक्ता चैंबर और मल्टीलेवल पार्किंग प्रोजेक्ट को लेकर दायर याचिका का महत्वपूर्ण दिशा निर्देश सहित पटाक्षेप कर दिया। कोर्ट ने केवल अधिवक्ता चैंबर निर्माण प्रक्रिया लंबित होने पर असंतोष जताया। इसके साथ ही हाई कर्ट परिसर के आसपास बढ़ते यातायात और पार्किंग संकट पर महत्वपूर्ण गाइडलाइन जारी कर दी। दिलचस्प यह है कि अदालत की टिप्पणियों और निर्देशों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा समय-समय पर दिए गए कार पूलिंग और यातायात अनुशासन के संदेशों की प्रतिध्वनि भी सुनाई दी। युगलपीठ ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष धन्य कुमार जैन की याचिका का निराकरण करते हुए स्पष्ट किया कि अब जबकि टेंडर प्रक्रिया जारी हो चुकी है, याचिका को लंबित रखने का औचित्य नहीं रह जाता। हालांकि कोर्ट ने यह रास्ता खुला रखा कि यदि भविष्य में राज्य सरकार परियोजना को लेकर अनावश्यक विलंब करती है तो याचिकाकर्ता पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। कोर्ट ने परियोजना को लेकर संतोष जताया मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि हाई कोर्ट के गेट नंबर-चार के सामने आधुनिक अधिवक्ता चैंबर और बहुस्तरीय पार्किंग निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। इसका टेंडर भी जारी कर दिया गया है। इसके बाद कोर्ट ने परियोजना को लेकर संतोष व्यक्त किया। आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पार्किंग व्यवस्था को लेकर रहा। कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे हाई कोर्ट परिसर के निकट अनावश्यक वाहन खड़े करने के बजाय पिक एंड ड्राप व्यवस्था को बढ़ावा दें। अधिवक्ताओं से भी वाहन साझा (कार पूलिंग) करने की व्यवस्था अपनाने की अपेक्षा जताई गई। वहीं यातायात पुलिस को क्षेत्र की सतत निगरानी कर पार्किंग अनुशासन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। केवल नई पार्किंग बनाना ही समाधान नहीं दरअसल, चार मई 2025 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी, न्यायमूर्ति एससी शर्मा, न्यायमूर्ति सूर्यकांत व तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत की उपस्थिति में परियोजना का भूमिपूजन हुआ था, लेकिन निर्माण कार्य शुरू नहीं होने से बार एसोसिएशन ने चिंता जताई थी। न्यायालय के आदेश ने यह संदेश भी दिया है कि केवल नई पार्किंग बनाना ही समाधान नहीं है। यातायात अनुशासन, कार पूलिंग और पिक एंड ड्राप संस्कृति अपनाए बिना न्यायालय परिसर की भीड़भाड़ कम नहीं होगी। यही कारण है कि एक साधारण दिखने वाली याचिका का पटाक्षेप, न्यायालय परिसर की भावी यातायात व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण नजीर बनकर उभरा है।

OBC आरक्षण पर बड़ा फैसला करीब? सात साल से लंबित मामले की 24 जून से होगी लगातार सुनवाई

 जबलपुर मध्य प्रदेश के बहुचर्चित और सात वर्षों से लंबित ओबीसी आरक्षण विवाद मामले में अब सुनवाई की प्रक्रिया तेज होने जा रही है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की विशेष युगलपीठ ने मामले की गंभीरता और इससे प्रभावित हजारों अभ्यर्थियों के हितों को देखते हुए 24 जून 2026 से प्रतिदिन सुनवाई (डे-टू-डे हियरिंग) करने का फैसला लिया है। प्रशासनिक न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की विशेष युगलपीठ के समक्ष मंगलवार को यह मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। हालांकि सामान्य वर्ग की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं की अनुपस्थिति के कारण मामले में कोई ठोस सुनवाई नहीं हो सकी। इस दौरान ओबीसी आरक्षण विवाद से संबंधित 91 याचिकाएं और संबद्ध प्रकरण सूचीबद्ध थे। सुनवाई के दौरान ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने न्यायालय से मुख्य याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई शुरू करने का आग्रह किया। उन्होंने वैकल्पिक रूप से सुप्रीम कोर्ट द्वारा 18 फरवरी 2026 को दिए गए आदेश के संदर्भ में अंतरिम आदेशों को निरस्त करने से जुड़े लंबित आवेदनों पर विचार करने की मांग भी रखी। अधिवक्ता ठाकुर ने दलील दी कि आरक्षण विवाद के कारण बड़ी संख्या में शासकीय नियुक्तियां वर्षों से लंबित हैं और हजारों अभ्यर्थी करीब सात साल से अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में मामले का शीघ्र निराकरण आवश्यक है। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला पहली बार उनके समक्ष सूचीबद्ध हुआ है और सभी पक्षों को विस्तृत सुनवाई का समुचित अवसर मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इतने व्यापक और बहुस्तरीय विवाद का न्यायसंगत समाधान तभी संभव है, जब सभी पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनी जाएं। इसी को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने 24 जून से प्रतिदिन सुनवाई करने का निर्णय लिया है। माना जा रहा है कि नियमित सुनवाई से लंबे समय से लंबित इस विवाद के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है और नियुक्तियों का रास्ता भी साफ हो सकता है।     ओबीसी आरक्षण विवाद से राज्य की विभिन्न भर्ती प्रक्रियाएं, चयन सूचियां व हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। लिहाजा, अब निगाहें जाहिर तौर पर 24 जून पर टिकी हैं, जब हाई कोर्ट इस बहुप्रतीक्षित मामले की नियमित सुनवाई आरंभ करेगा। उम्मीद की जा रही है कि लगातार सुनवाई से वर्षों से लंबित इस संवेदनशील संवैधानिक विवाद के समाधान की दिशा में निर्णायक प्रगति हो सकेगी।     -संदीप जैन, अधिवक्ता, मप्र हाई कोर्ट।  

पति की जिम्मेदारी बरकरार: पत्नी ज्यादा कमाती हो तब भी कानूनी और यात्रा खर्च देना होगा

 बिलासपुर  हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पत्नी सरकारी नौकरी में हो और उसकी आय पति से अधिक हो, तब भी उसे अदालती कार्यवाही में शामिल होने के लिए आवश्यक यात्रा, भोजन और मुकदमे का खर्च पाने का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की खंडपीठ ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय के आदेश को सही ठहराते हुए पति आशीष राय की अपील खारिज कर दी। क्या है पूरा मामला? मामले के अनुसार अंबिकापुर निवासी आशीष राय और विश्रामपुर निवासी अंजलि राय के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। पति ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की।  

हाईकोर्ट का अहम फैसला: रेल हादसे में पोती खोने वाले दादा को मिलेगा मुआवजा, 28 साल बाद न्याय

चंडीगढ़  वर्ष 1998 के खन्ना रेल दुर्घटना मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। करीब 28 वर्ष बाद पोती की मौत पर उसके दादा को दिए गए चार लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा गया है।  अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की निर्भरता का आकलन केवल आर्थिक आधार पर नहीं किया जा सकता। परिवार के भीतर मिलने वाला प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनात्मक सहारा भी निर्भरता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जस्टिस पंकज जैन ने केंद्र सरकार और उत्तरी रेलवे की अपील खारिज कर दी। उन्होंने रेलवे दावा अधिकरण के आदेश को सही ठहराया। 26 नवंबर 1998 को खन्ना-लुधियाना रेलखंड पर भीषण हादसा हुआ था। इसे देश के सबसे भयावह रेल हादसों में गिना जाता है। इस दुर्घटना में दावेदार की पोती सहित परिवार के कई सदस्य मारे गए थे। कोलकाता जा रही सियालदह एक्सप्रेस पटरी से उतरे अमृतसर जाने वाली ट्रेन के छह डिब्बों से टकरा गई थी। दोनों ट्रेनों में करीब 2500 यात्री सवार थे। हादसे में करीब 212 लोगों की मौत हुई थी। मुआवजे पर रेलवे का तर्क  पोती की मृत्यु के बाद रेलवे दावा अधिकरण ने दादा के पक्ष में चार लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। केंद्र सरकार और उत्तरी रेलवे के महाप्रबंधक ने इस आदेश को चुनौती दी। उन्होंने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। उनका तर्क था कि रेलवे अधिनियम के तहत केवल वही व्यक्ति मुआवजे का दावा कर सकता है जो मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर हो। निर्भरता की व्यापक अवधारणा सुनवाई के दौरान जस्टिस जैन ने खंडपीठ के एक पूर्व फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि निर्भरता की अवधारणा को संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। परिवार के सदस्यों के बीच भावनात्मक जुड़ाव, स्नेह, संरक्षण और देखभाल भी महत्वपूर्ण है। यह आर्थिक सहायता जितनी ही अहमियत रखती है। अदालत ने निर्भरता को केवल वित्तीय दायरे तक सीमित रखने से इन्कार किया। दादा-पोती का भावनात्मक रिश्ता अदालत ने कहा कि दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच एक विशेष भावनात्मक रिश्ता होता है। ऐसे में दादा अपनी पोती पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे, इस आधार पर उन्हें मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता। दावेदार का कोई अन्य पोता या पोती नहीं था। हाईकोर्ट ने कहा कि दादा-दादी की अपने पोते या पोती पर प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनात्मक सहारे के लिए निर्भरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया मुआवजा पूरी तरह न्यायसंगत है। अदालत ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज करते हुए चार लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा। 

रेप पीड़िता की 31 हफ्ते से अधिक की प्रेग्नेंसी पर हाईकोर्ट सख्त, भ्रूण की धड़कन रोकने की अनुमति नहीं

जबलपुर  हाईकोर्ट जस्टिस विवेक जैन ने नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की गर्भावस्था 31 सप्ताह से अधिक होने के कारण गर्भपात की अनुमति देने से इंकार कर दिया। बता दें कि नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति के लिए मंडला जिला न्यायालय द्वारा भेजे गए प्रकरण की सुनवाई संज्ञान याचिका के रूप में हाईकोर्ट कर रहा था। पीड़िता की उम्र 15 साल 10 माह है और मेडिकल रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद एकलपीठ ने पाया कि 27 अप्रैल 2026 की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता की गर्भावस्था 26 हफ़्ते और 5 दिन थी। मेडिकल जांच को हुए 32 दिनों से अधिक का समय हो गया है। वर्तमान में उसकी गर्भावस्था 31 सप्ताह से अधिक है। उसका हीमोग्लोबिन 7.5 है। मेडिकल बोर्ड की राय के अनुसार भ्रूण जीवित है और यह एक व्यवहार्य गर्भावस्था है। इस चरण में गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करना संभव नहीं है। एकलपीठ ने सुनवाई के बाद याचिका को खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता भी नहीं चाहती थी कि यह न्यायालय ऐसा कोई निर्देश जारी करे। सुनवाई के दौरान उसने न्यायालय को इस बारे में सूचित किया था। दिल की धड़कन रोकने का निर्देश न होने की स्थिति में जीवित भ्रूण को जीवन भर शारीरिक और मानसिक विकलांगता का गंभीर खतरा बना रहेगा। मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टें अपने आप में सब कुछ स्पष्ट कर देती हैं। बच्चे का जन्म जीवित अवस्था में होता है, तो राज्य उस बच्चे की पूरी देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। 

हाईकोर्ट में जज साहब क्यों भड़के? बोले- अदालत के आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं

प्रयागराज  कोर्ट की अवमानना से जुड़े एक मामले में की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अदालत पर मामलों के बोझ की बात कही है। कोर्ट का कहना है कि कार्यवाहियों को पूरा होने में समय लगता है, लेकिन इस दौरान पक्षों को अदालत के आदेशों के उल्लंघन की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने इसके खिलाफ सीधी चेतावनी दे दी है। याचिका पर सुनवाई कर रहे जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र ने कहा है कि कई बार अदालतों में एक दिन में 800 से ज्यादा केस आते हैं। जस्टिस शैलेंद्र ने कहा, '“इलाहाबाद उच्च न्यायालय जैसे अत्यधिक बोझ से दबे संवैधानिक न्यायालयों में जहां हर दिन प्रत्येक न्यायाधीश के समक्ष लगभग 400, 500, 600 और कभी कभी 800 से अधिक मामले सूचीबद्ध होते हैं, न्यायिक कार्यवाही के निपटारे में काफी समय लग सकता है। कभी-कभी वर्ष और कभी-कभी दशक भी। फिर भी लोग ऐसे अत्यधिक कार्यभार वाले न्यायाधीशों से हमेशा काम करने वाले सुपर रोबोट, सुपर कंप्यूटर या सुपरह्यूमन बनने की उम्मीद करते हैं।' दे दी चेतावनी उन्होंने कहा कि न्यायिक कार्यवाही के निपटारे में समय लग सकता है। उन्होंने कहा कि इस लंबित प्रक्रिया के दौरान कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। जज ने कहा, 'कानून ऐसी हिम्मत को बर्दाश्त नहीं करता है।' उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऐसी स्थिति की अनुमति दी गई, तो न्याय प्रशासन अराजकता में चला जाएगा। क्या था मामला दरअसल, कोर्ट एक अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आरोप थे कि शिक्षक की सैलरी से जुड़े आदेश को लागू नहीं किया गया था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, गाजीपुर जिला विद्यालय निरीक्षक ने 18 अप्रैल 2022 को जारी एक आदेश को लागू नहीं किया था। इसपर राज्य ने कहा कि उनकी तरफ से कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक आवेदन दिया गया है, जिसके चलते आदेश का पालन नहीं हुआ। भड़क गया कोर्ट अब राज्य की तरफ से मिले इस जवाब पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा है कि संवैधानिक अदालत का आदेश सिर्फ एडवाइजरी नहीं है और न ही सिर्फ कागज का टुकड़ा है, जिसे नजरअंदाज कर दिया जाए। कोर्ट ने कहा, 'इसके साथ संविधान की पूरी शक्ति और कानून के शासन का गंभीर आदेश जुड़ा होता है। जिस पल मुकदमों में शामिल पक्षों को अदालती आदेशों को अपनी मर्जी या विकल्प के तौर पर मानने की छूट दे दी जाएगी, उसी पल संवैधानिक शासन की बुनियाद कमजोर होने लगेगी।' कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी हुई है, वह तय नहीं कर सकता कि इसका पालन करना है या नहीं। बेंच ने कहा कि इस तरह के आवेदन अदालत के आदेश को कमजोर नहीं कर सकते। महात्मा गांधी का किया जिक्र कोर्ट ने कहा कि यह न्यायपालिका की अथॉरिटी पर हमला करने जैसा है। इ दौरान अदालत ने महात्मा गांधी 'My Experiments with Truth' का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, 'महात्मा गांधी की एक मशहूर बात है, जो उन्होंने अपनी किताब 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' में लिखी थी कि 'आपकी इजाजत के बिना कोई आपका अपमान नहीं कर सकता।' यह बात कोर्ट की अवमानना के मामले में भी पूरी तरह लागू होती है। एक बड़े कोर्ट ने जो आदेश दे दिया, जब तक वह लागू है और रद्द नहीं हुआ है, तब तक उसे मानना ही पड़ेगा और उसका पूरा सम्मान करना होगा। अगर ऐसे आदेश को खुलेआम ताक पर रख दिया जाए और कोर्ट सिर्फ इसलिए चुप रह जाए या कोई कार्रवाई न करे क्योंकि उस आदेश को बदलने या हटाने की कोई अर्जी अभी कोर्ट के सामने पेंडिंग है, तो इससे कोर्ट की जो साख और ताकत कम होगी, उसके लिए सिर्फ आदेश तोड़ने वाला ही जिम्मेदार नहीं माना जाएगा।' क्या हुआ फैसला चार सालों तक आदेश लागू नहीं होने के मद्देनजर अदालत ने विद्यालय निरीक्षक को कोर्ट की अवमानना का दोषी पाया। साथ ही 8 जुलाई को आरोप तय किए जाने की बात कही है। कोर्ट ने कहा कि वह चाहें तो अभी भी साल 2022 के अदालती आदेश का पालन कर सकता है। वह ऐसा करके खुद को कोर्ट की अवमानना के आरोप से बचा सकता है।

तस्करी मामलों की सुनवाई में देरी पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता, गवाहों की अनुपस्थिति पर उठाए सवाल

चंडीगढ़  पंजाब में नशा तस्करी से जुड़े मामलों की सुनवाई में हो रही देरी पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चिंता जताई है। कोर्ट ने राज्य सरकार को पुलिस बल की जनशक्ति की उच्चस्तरीय समीक्षा करने और भर्ती प्रक्रिया को गति देने के निर्देश दिए हैं।  अदालत ने कहा कि पंजाब सरकार युद्ध नशे विरुद्ध अभियान चला रही है लेकिन पुलिसकर्मियों की कमी के कारण सरकारी गवाह समय पर अदालतों में पेश नहीं हो पा रहे हैं। इसका सीधा असर एनडीपीएस मामलों के ट्रायल पर पड़ रहा है। जस्टिस संजय वशिष्ठ की पीठ के समक्ष हेरोइन बरामदगी से जुड़े एक मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया। पंजाब सरकार की ओर से विशेष डीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) प्रवीण कुमार सिन्हा के हलफनामे और एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स से जुटाए गए आंकड़े अदालत के समक्ष पेश किए गए।  अदालत ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है जबकि पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। राज्य स्तर पर इस समस्या पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है ताकि अदालतों में गवाही देने के लिए पर्याप्त पुलिसकर्मी उपलब्ध कराए जा सकें।  अदालत ने टिप्पणी की कि नशे के खिलाफ सख्त अभियान चलाने के बावजूद वास्तविक स्थिति यह है कि कई मामलों में पुलिस गवाहों की अनुपस्थिति के कारण ट्रायल लंबित हो रहे हैं और आरोपियों को जमानत मिलने का आधार बन रहा है।   

मोबाइल नंबर ब्लॉक करने पर हाईकोर्ट सख्त, पति की शिकायत को बताया गलत

प्रयागराज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ पुलिस को फटकार लगाई है। साथ ही साइबर सेल को निर्देश दिया है कि वह एक महिला के ब्लॉक किए गए मोबाइल नंबर को तुरंत बहाल करे। कोर्ट ने पुलिस की इस कार्रवाई को गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए साफ किया कि राज्य की एजेंसियों की लापरवाही के कारण किसी नागरिक को इस तरह परेशान नहीं किया जा सकता। न्यूज़ वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक यह आदेश जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने महिला द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता महिला और उसके पति के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। पति ने आपसी अनबन के कारण पत्नी के खिलाफ साइबर सेल में एक झूठी शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके आधार पर पुलिस ने बिना पूरी जांच किए महिला का मोबाइल नंबर ब्लॉक कर दिया। हाईकोर्ट ने पुलिस के रवैये पर जताई नाराजगी अदालत ने लखनऊ के साइबर सेल इंचार्ज द्वारा दाखिल व्यक्तिगत हलफनामे पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या-5 (पति) के बीच स्पष्ट रूप से वैवाहिक विवाद है और शिकायत भी पति की ओर से की गई है। लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की साइबर सेल के प्रभारी अधिकारी द्वारा दाखिल व्यक्तिगत शपथपत्र में अपनाया गया रुख बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। उन्होंने साइबर पोर्टल से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर खातों या सेवाओं को ब्लॉक, डेबिट अथवा फ्रीज करने संबंधी गृह मंत्रालय के आदेशों का हवाला दिया है। ऐसे आदेशों का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। बेंच ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य की एजेंसियों की इस तरह की लापरवाही या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के कारण किसी भी नागरिक के अधिकारों का दमन नहीं किया जा सकता। जियो और पुलिस को एक हफ्ते का अल्टीमेटम हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की साइबर सेल के प्रभारी अधिकारी संबंधित टेलीकॉम सेवा प्रदाता, जो प्रथम दृष्टया जियो टेलीकॉम सर्विसेज लिमिटेड प्रतीत होती है। उससे संपर्क कर याचिकाकर्ता का मोबाइल नंबर तत्काल बहाल कराने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। साथ ही एक सप्ताह के भीतर इस संबंध में किए गए कार्यों का शपथ पत्र अदालत में दाखिल करें। अदालत ने महिला के पति को भी नोटिस जारी कर पूछा है कि निराधार और तुच्छ शिकायत दर्ज कराने के लिए उस पर हर्जाना क्यों न लगाया जाए। बता दें कि इस मामले में याचिकाकर्ता महिला की ओर से अधिवक्ता प्रशांत पांडेय ने पक्ष रखा था।