samacharsecretary.com

गुजारा-भत्ता पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘पुरुष पल्ला नहीं झाड़ सकता’

ग्वालियर  शादी के बाद पत्नी का भरण-पोषण करना पति का न केवल नैतिक, बल्कि अनिवार्य कानूनी दायित्व है। हाईकोर्ट ने एकल पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पति स्वस्थ और काम करने में सक्षम है, तो वह यह कहकर गुजारा भत्ता देने से नहीं बच सकता कि उसकी आय कम है या वह बेरोजगार है। जस्टिस अमित सेठ की एकल पीठ ने पति और पत्नी दोनों की ओर से दायर पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को यथावत रखा है। मैकेनिक नहीं बल्कि एक गैराज में महज हेल्पर दरअसल शबीना व शाहिद (दोनों के परिवर्तित नाम) का निकाह नवंबर 2019 में मुस्लिम रीति-रिवाजों से हुआ था। पत्नी का आरोप था कि निकाह के बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, जिसके कारण उसे मायके में शरण लेनी पड़ी। पत्नी ने फैमिली कोर्ट में आवेदन देकर बताया कि उसका पति मैकेनिक है और 30 हजार रुपए महीना कमाता है, इसलिए उसे भरण पोषण दिलाया जाए।  दूसरी ओर पति ने कोर्ट में दलील दी कि वह मैकेनिक नहीं बल्कि एक गैराज में महज हेल्पर है और उसकी मासिक आय केवल 5,000 रुपए है। उसने दलील दी कि इतनी कम आय में वह 4,000 रुपए गुजारा भत्ता नहीं दे सकता। वहीं पत्नी ने गुजारा भत्ता की राशि बढ़ाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दिक्कतें अपनी जगह, हक अपनी जगह     कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125 सीआरपीसी का उद्देश्य महिला को दर-दर भटकने से बचाना और उसे गरिमापूर्ण जीवन देना है। यदि पति शारीरिक रूप से स्वस्थ है, तो उसे एक 'अकुशल श्रमिक' के बराबर कमाकर पत्नी को पैसा देना ही होगा।     पति ने अपनी सही आय के पुख्ता सबूत नहीं दिए, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा कलेक्टर रेट (न्यूनतम मजदूरी) के आधार पर 4,000 रुपए का अंतरिम गुजारा भत्ता तय करना पूरी तरह उचित है। क्या होता है गुजारा भत्ता जानकारी के लिए बता दें कि गुजारा भत्ता (Alimony/Maintenance) तलाक या अलग होने के बाद एक पति/पत्नी द्वारा दूसरे को दी जाने वाली कानूनी और वित्तीय सहायता है। इस सहायता का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर साथी को विवाह के दौरान की जीवनशैली बनाए रखने में मदद करना है। यह राशि अदालत द्वारा या आपसी सहमति से तय की जा सकती है। ये भी जानें -मुख्य उद्देश्य तलाक के बाद आर्थिक असमानता को दूर करना।-यह स्थायी (जीवनभर) या अस्थायी (पुनर्वास के लिए) हो सकता है। -यह आमतौर पर पति की आय का 25-33% हो सकता है, जो पति-पत्नी की संपत्ति, उम्र और वैवाहिक अवधि पर निर्भर करता है। -यह आमतौर पर प्राप्तकर्ता के पुनर्विवाह करने या मौत होने तक जारी रहता है।

गुरु ग्रंथ साहिब कानून पर हाई कोर्ट में सुनवाई, समानता और धर्मनिरपेक्षता पर उठे गंभीर सवाल

चंडीगढ़  पंजाब सरकार के बहुचर्चित “जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026” के खिलाफ अब पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में एक और संवैधानिक चुनौती पहुंच गई है। एंग्लिकन चर्च ऑफ इंडिया (सीआईपीबीसी) ने इस संशोधन कानून को धर्म-विशेष आधारित, भेदभावपूर्ण और संविधान विरोधी बताते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इसके क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने तथा इसे रद्द घोषित करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि पंजाब सरकार ने एक विशेष धार्मिक ग्रंथ को पृथक और अधिक कठोर दंडात्मक संरक्षण देकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 का उल्लंघन किया है। चर्च का तर्क है कि राज्य किसी एक धर्म या उसके पवित्र प्रतीक को ऐसा विशिष्ट विधायी संरक्षण नहीं दे सकता, जिससे अन्य धार्मिक समुदायों के बीच असमानता की भावना उत्पन्न हो। याचिका में इसे संविधान की मूल संरचना में शामिल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कदम बताया गया है। अन्य धर्म भी प्रभावित हो सकते हैं इंडियन चर्च एक्ट, 1927 के तहत गठित धार्मिक निकाय होने का दावा करने वाले याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि पंजाब सरकार स्वयं अपने पूर्व प्रस्तावित “पंजाब प्रिवेंशन ऑफ ऑफेंसेज अगेंस्ट होली स्क्रिप्चर्स बिल, 2025” में स्वीकार कर चुकी थी कि पवित्र ग्रंथों के अपमान की घटनाएं केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब तक सीमित नहीं, बल्कि गीता, कुरान और अन्य धार्मिक ग्रंथ भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में 2026 के संशोधन के जरिए केवल एक धार्मिक ग्रंथ के लिए पृथक कठोर आपराधिक ढांचा तैयार करना राज्य की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। प्रावधानों पर विशेष आपत्ति याचिका में संशोधन कानून के उन प्रावधानों पर विशेष आपत्ति जताई गई है, जिनमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूपों की प्रिंटिंग, प्रकाशन, भंडारण और वितरण पर कड़ा नियामक नियंत्रण, एसजीपीसी के माध्यम से केंद्रीय रजिस्टर, अपराधों को संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौतायोग्य बनाना तथा गंभीर मामलों में आजीवन कारावास तक की सजा शामिल है। चर्च का कहना है कि इस प्रकार का विशेष दंड विधान अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथों को तुलनात्मक रूप से कमतर कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। एसआर बोम्मई, केशवानंद भारती और शायरा बानो जैसे सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि राज्य धार्मिक तटस्थता से विचलित नहीं हो सकता। एक धर्मग्रंथ को कानून संरक्षण साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 सहित मौजूदा केंद्रीय कानून धार्मिक भावनाओं से जुड़े अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं, इसलिए पृथक राज्य कानून विधायी संतुलन और संवैधानिक वैधता दोनों पर सवाल खड़े करता है। चर्च की जनरल काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि वह सभी धर्मग्रंथों के सम्मान और अंतर-धार्मिक सौहार्द के पक्ष में है, लेकिन किसी एक धर्मग्रंथ को विशिष्ट कानूनी संरक्षण देकर अन्य आस्थाओं को अपेक्षाकृत कमतर दर्जा देना संवैधानिक समानता के विरुद्ध है।  

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस के वर्चुअल मीटिंग में पोर्न वीडियो चला, आनन-फानन में रोकनी पड़ी बैठक

नई दिल्ली  दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की अदालत में आज (बुधवार, 29 अप्रैल को) कुछ ऐसा हुआ, जिसे देखकर सब दंग रह गए। दरअसल, जब चीफ जस्टिस देवेंद्र उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने नियमित मामलों की सुनवाई शुरू की तो वर्चुअली यानी ऑनलाइन तरीके से जुड़े एक अनजान यूजर ने अपनी स्क्रीन पर पोर्न वीडियो चलाना शुरू कर दिया और उसे शेयर कर दिया। इसे देख कोर्ट रूम में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में वर्चुअल मीटिंग (VC) को बंद करना पड़ा। जब कुछ देर बाद दोबारा ऑनलाइन कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई तो फिर से उस शख्स ने पोर्न वीडियो चलाना शुरू कर दिया। ऐसा होता देख कोर्ट के अधिकारियों ने VC को बंद कर दिया गया और फिर उसे ऑन नहीं किया गया। जानकारी के मुताबिक, ये पोर्न वीडियो वर्चुअल कॉन्फ्रेंसिंग (VC) सिस्टम के जरिए अमेरिका से ब्रॉडकास्ट किए गए थे। ये कंटेंट श्रीधर सरनोबत और शीतजीत सिंह नाम के यूजर के अकाउंट से चलाए गए। हालांकि, इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि होनी बाकी है। पीछे से आवाज भी आ रही थी बार एंड बेंच के मुताबिक, पोर्न वीडियो के साथ ही पीछे से आवाज भी आ रही थी, "यह यूनाइटेड स्टेट्स से किया गया एक हैक है। मीटिंग को अभी तुरंत बंद कर दो। इसे दोबारा कभी चालू मत करना। तुम हैक हो चुके हो।" दिल्ली हाई कोर्ट में इस तरह की यह पहली घटना है। ये वाकया दोपहर करीब 12:56 बजे हुई। बता दें कि चीफ जस्टिस की अदालत में बुधवार का दिन जनहित याचिकाओं (PIL) की सुनवाई के लिए तय होता है, और आज बेंच के सामने सुनवाई के लिए लगभग 100 मामले हैं। मामले की जांच जारी है इस घटना के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) इंटरफेस पर संभावित साइबर अटैक की जांच की जा रही है। बताया जा रहा है कि पोर्न वीडियो दो बार चलने से कोर्ट रूम में मौजूद जज, वकील, कोर्ट अफसर और अन्य लोग हैरान रह गए। फिलहाल इस मामले की जांच जारी है और जिम्मेदारी तय किए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

हरियाली से महका मनेन्द्रगढ़ न्यायालय परिसर, फलदार वृक्ष बने आकर्षण का केंद्र

मनेन्द्रगढ़/एमसीबी जिला मुख्यालय स्थित मनेन्द्रगढ़ न्यायालय परिसर इन दिनों अपनी हरियाली और फलदार वृक्षों के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। परिसर में लगे लीची, आम और कटहल के पेड़ न केवल पर्यावरण की सुंदरता को बढ़ा रहे हैं, बल्कि यहां आने वाले लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान के बीच ये घने वृक्ष परिसर में ठंडी छाया और सुकून का एहसास करा रहे हैं। न्यायालय में आने वाले अधिवक्ता, कर्मचारी और पक्षकार इन पेड़ों की छांव में राहत महसूस कर रहे हैं। परिसर में विशेष रूप से लीची के गुच्छेदार फल, आम के कच्चे-पके फलों की बहार और कटहल के बड़े आकार के फल इसे किसी बाग-बगीचे जैसा मनोहारी स्वरूप दे रहे हैं। यह प्राकृतिक सौंदर्य लोगों के लिए खास आकर्षण का विषय बन गया है। अधिवक्ता श्रीमती पूनम गुप्ता के अनुसार, न्यायालय परिसर में इस प्रकार की हरियाली न केवल वातावरण को शुद्ध करती है, बल्कि मानसिक शांति भी प्रदान करती है। साथ ही यह पर्यावरण संरक्षण का एक सकारात्मक संदेश भी देती है। यदि न्यायालय प्रशासन और अधिवक्ता संघ द्वारा इस हरियाली को और बढ़ावा दिया जाए, तो आने वाले समय में यह परिसर एक आदर्श उदाहरण बन सकता है, जहां न्यायिक कार्यों के साथ-साथ प्राकृतिक संतुलन का सुंदर समन्वय देखने को मिलेगा।

पुलिस ने लूट को झपटमारी में बदलकर सजा कम करने की कोशिश की, हाई कोर्ट ने DSP और जांच अधिकारी को किया तलब

चंडीगढ़   पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। एक मामले में सजा कम करने के उद्देश्य से पुलिस ने लूटमार की घटना को झपटमारी में बदल दिया। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया लूटमार का मामला होने के बावजूद इसे झपटमारी में परिवर्तित करना न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है। यह मामला जालंधर में दर्ज एक एफआईआर से संबंधित है, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि तीन अज्ञात हमलावरों ने बेसबाल बैट और ‘दातर’ जैसे हथियारों से हमला कर उसे और उसके साथी को घायल किया और मोबाइल फोन, नकदी तथा मोटरसाइकिल छीनकर फरार हो गए। इन तथ्यों के बावजूद पुलिस ने लूटमार की गंभीर धाराओं के बजाय झपटमारी से संबंधित प्रविधानों में मामला दर्ज किया। सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह ने टिप्पणी की कि एफआईआर में वर्णित घटनाक्रम स्पष्ट रूप से लूटमार की श्रेणी में आता है। अदालत ने जांच अधिकारी और संबंधित डीएसपी को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि लूटमार के मामले को झपटमारी में क्यों बदला गया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में लापरवाही या जानबूझकर की गई त्रुटियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। हमलावरों ने हथियारों से हमला कर जालंधर में की थी लूट आरोपित को दी जमानत कोर्ट ने कहा कि इस तरह की त्रुटियां तकनीकी नहीं होतीं, बल्कि इससे पूरे मामले की गंभीरता, सजा की प्रकृति और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। आरोपित को नियमित जमानत भी प्रदान की, यह कहते हुए कि आरोपित सात महीने से हिरासत में है और जांच पूरी हो चुकी है। सह-आरोपितों को पहले ही मिल चुकी है।  

कलकत्ता हाईकोर्ट का चुनाव आयोग पर हमला, तुगलकी फरमान को लेकर सुनाई तीखी आलोचना

कलकत्ता   पश्चिम बंगाल में पहले चरण की वोटिंग के दिन यानी गुरुवार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की जमकर क्लास लगाई. हाईकोर्ट ने बुधवार को भी आयोग को फटकार लगाई थी. गुरुवार को हाईकोर्ट ने कोलकाता और दक्षिण 24 परगना में मोटरबाइकों पर 48 घंटे की पाबंदी लगाने के आदेश को तुगलकी फरमान करार देते हुए इसे नागरिक अधिकारों के खिलाफ बताया. गुरुवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि सिर्फ अधिकार होना किसी भी तरह के आदेश लागू करने का आधार नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि अगर आप सब कुछ बंद करना चाहते हैं तो आपातकाल घोषित कर दीजिए, लेकिन इस तरह नागरिकों के अधिकारों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता. इससे पहले बुधवार को भी हाईकोर्ट ने चुनाव को झटका दिया था. उसने राज्य में आयोग की ओर से करीब 800 लोगों को उपद्रवी करार देने के फैसले को पटल दिया था।   रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग ने 21 अप्रैल को एक अधिसूचना जारी कर 27 अप्रैल शाम 6 बजे से 29 अप्रैल तक मोटरसाइकिलों के उपयोग पर सख्त प्रतिबंध लगाया था. आदेश के अनुसार इस दौरान बाइक केवल सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक ही चलाई जा सकती थी. इसके अलावा पिलियन राइडिंग (पीछे बैठकर सफर) और बाइक रैलियों पर भी रोक लगा दी गई थी. हालांकि मेडिकल इमरजेंसी, पारिवारिक कार्यक्रम और आवश्यक सेवाओं को छूट दी गई थी  आयोग ने बचाव में कही ये बातें चुनाव आयोग ने अपने आदेश का बचाव करते हुए कहा था कि यह कदम स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने तथा किसी भी तरह की हिंसा, डराने-धमकाने या अवांछित घटनाओं को रोकने के लिए उठाया गया है. आयोग का मानना था कि इस तरह के प्रतिबंध से मतदान का माहौल बेहतर और सुरक्षित बनेगा. लेकिन, अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं था. जस्टिस राव ने सुनवाई के दौरान आयोग के वकील से सवाल किया कि क्या अन्य राज्यों में भी इस तरह के आदेश जारी किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि आपके पास पुलिस व्यवस्था और सीसीटीवी कैमरे हैं, फिर इतनी कड़ी पाबंदी की जरूरत क्यों? यह एक असंगत प्रयास है जिससे सब कुछ ठप करने की कोशिश हो रही है  आयोग से हाईकोर्ट के तीखे सवाल अदालत ने यह भी पूछा कि पिछले पांच वर्षों में मोटरसाइकिल चालकों के खिलाफ कितने मामले दर्ज हुए हैं, जिससे यह साबित हो सके कि ऐसा प्रतिबंध आवश्यक था. साथ ही आयोग को निर्देश दिया गया कि वह शुक्रवार तक शपथपत्र (एफिडेविट) दाखिल कर इस फैसले के पीछे की ठोस वजह बताए. हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद राज्यभर में दोपहिया वाहन चालकों ने राहत की सांस ली है. खासकर कोलकाता के मध्यवर्गीय नागरिकों और गिग इकॉनमी से जुड़े लोगों के लिए यह फैसला बड़ी राहत लेकर आया है।  शहर के कई प्रमुख चौराहों पर बाइक सवारों ने कहा कि अदालत ने वही सवाल उठाए हैं, जो वे अधिसूचना जारी होने के बाद से पूछ रहे थे. विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए ऐसे कदम उठाना जो आम नागरिकों के दैनिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित करें, उचित नहीं है. अदालत ने भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी प्रशासन की है, न कि आम जनता पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाकर समस्या का समाधान किया जाए।   

हरियाली की गोद में न्याय का मंदिर:मनेन्द्रगढ़ न्यायालय परिसर बना प्रकृति का मनमोहक आंगन

हरियाली की गोद में न्याय का मंदिर:मनेन्द्रगढ़ न्यायालय परिसर बना प्रकृति का मनमोहक आंगन लीची, आम और कटहल से लदे वृक्षों ने बढ़ाई रौनक, तपती गर्मी में भी सुकून का एहसास मनेन्द्रगढ़/एमसीबी जिला मुख्यालय स्थित मनेन्द्रगढ़ न्यायालय परिसर इन दिनों केवल न्यायिक गतिविधियों का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्रकृति की अनुपम छटा का जीवंत उदाहरण बन गया है। परिसर में लगे लीची, आम और कटहल के घने एवं फलदार वृक्ष इसे एक सजीव बाग-बगीचे का रूप प्रदान कर रहे हैं, जहां हरियाली की ठंडक और फलों की बहार लोगों का मन मोह लेती है। गर्मी के इस तीखे मौसम में, जब चारों ओर तपिश और उमस से लोग बेहाल हैं, वहीं न्यायालय परिसर में प्रवेश करते ही वातावरण बदल जाता है। पेड़ों की घनी छांव, पत्तों से छनकर आती धूप और हवा में घुली ताजगी एक अलग ही सुकून का अनुभव कराती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो न्याय के इस मंदिर में प्रकृति ने स्वयं अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी हो। परिसर में लगे लीची के गुच्छेदार फल, आम के कच्चे-पके रंग और कटहल के विशाल फलों की भरमार न केवल आंखों को आनंदित करती है, बल्कि यहां आने वाले अधिवक्ताओं, कर्मचारियों और पक्षकारों के लिए भी विशेष आकर्षण का केंद्र बन गई है। हर ओर फैली हरियाली और फलदार वृक्षों की छटा इस स्थान को किसी उद्यान से कम नहीं रहने देती। अधिवक्ता श्रीमती पूनम गुप्ता का कहना है कि न्यायालय परिसर में इस प्रकार की हरियाली वातावरण को शुद्ध करने के साथ-साथ मानसिक शांति भी प्रदान करती है। उनका मानना है कि यह नजारा केवल सुंदरता ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक सशक्त संदेश भी देता है। यदि न्यायालय प्रशासन और अधिवक्ता संघ द्वारा इस हरियाली को और अधिक प्रोत्साहन दिया जाए, तो आने वाले समय में यह परिसर एक आदर्श उदाहरण बन सकता है—जहां न्यायिक प्रक्रियाओं के साथ प्रकृति का संतुलन भी सहज रूप से दिखाई दे। यहां का हर पेड़, हर फल और हर छांव मानो यही संदेश देता है कि विकास और पर्यावरण एक साथ कदम बढ़ा सकते हैं।

‘हिन्दू तो हिन्दू है, किसी भी मंदिर में जा सकता है’; जस्टिस नागरत्ना का अहम बयान

तिरुवनंतपुरम केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ में आज (गुरुवार, 23 अप्रैल को) आठवें दिन भी सुनवाई जारी है। सुनवाई के दौरान आज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि, “एक हिंदू आखिरकार तो हिंदू ही है और वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।” दरअसल, मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली ये संविधान पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि क्या धार्मिक संप्रदाय अपने विशिष्ट रीति-रिवाजों के आधार पर दूसरों को मंदिर में प्रवेश से रोक सकते हैं। इस पीठ में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। संविधान पीठ न्यायिक समीक्षा के दायरे, अनुच्छेद 25 , 26 और अनुच्छेद 14 के बीच संतुलन ,'संवैधानिक नैतिकता' की भूमिका और धार्मिक मामलों में जनहित याचिकाओं की स्वीकार्यता से संबंधित प्रमुख सवालों की जांच कर रही है। हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और मंदिरों को संप्रदाय की रेखाओं पर एकदूसरों को बाहर नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा अलगाव अंततः संप्रदाय को ही कमजोर करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि दक्षिण भारत में भले ही पूजा के विभिन्न रूप (जैसे शैव या वैष्णव) प्रचलित हों और वे संरक्षित हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक हिंदू दूसरे संप्रदाय के मंदिर में नहीं जा सकता। एक हिंदू, आखिरकार हिंदू ही होता है जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, “कोई भी हिंदू किसी भी मंदिर में जा सकता है। एक तरीका है 'संप्रदाय'… मंदिर शैव, वैष्णव या श्री वैष्णव पूजा पद्धति का पालन करता है। कम से कम दक्षिण भारत में तो ऐसा ही होता है। ये ही वहाँ की प्रचलित प्रथाएँ हैं। इसलिए, इसे एक 'संप्रदाय' कहा जाता है। अब, अगर पूजा की पद्धति शैव प्रकार की है, तो वैष्णव संप्रदाय के लोग यह नहीं कह सकते कि इसे वैष्णव पद्धति के अनुसार ही होना चाहिए; क्योंकि उन दोनों पूजा पद्धतियों में अंतर होता है… इसलिए, पूजा के उस विशिष्ट स्वरूप को संरक्षण प्राप्त है। इसका किसी 'संगठन' के होने या न होने से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसा होना जरूरी नहीं है। एक हिंदू, आखिरकार हिंदू ही होता है। वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।” 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' और व्यक्तिगत विचार सुनवाई के दौरान एक रोचक मोड़ तब आया जब वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि ज्ञान और ज्ञान के स्रोतों का स्वागत है, लेकिन "व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी" से नहीं। मुख्य न्यायाधीश ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि अदालत सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों का सम्मान करती है, लेकिन "व्यक्तिगत राय केवल व्यक्तिगत राय होती है।" सामाजिक सुधार में राज्य की भूमिका न्यायालय ने सामाजिक सुधारों के संदर्भ में राज्य की शक्ति पर भी चर्चा की। पीठ ने टिप्पणी की कि राज्य कोई अजनबी या विदेशी संस्था नहीं है, बल्कि वह लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। अगर जनता किसी सामाजिक बुराई को सुधारना चाहती है, तो राज्य के पास उस शक्ति का प्रयोग करने का अधिकार है। जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत सामाजिक सुधार के लिए बनाया गया कानून धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों पर प्रभावी हो सकता है। संविधान पीठ के सामने प्रमुख कानूनी प्रश्न क्या हैं? इस नौ सदस्यीय संविधान पीठ के सामने सात मुख्य प्रश्न हैं, जिनमें शामिल हैं: -संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा क्या है? -अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के बीच क्या संबंध है? -क्या 'नैतिकता' शब्द में 'संवैधानिक नैतिकता' भी शामिल है? -क्या कोई व्यक्ति जो उस संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उसकी प्रथाओं को चुनौती दे सकता है? -संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत किसी धार्मिक प्रथा की न्यायिक समीक्षा का दायरा और विस्तार क्या है? -संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (b) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति "हिंदुओं के वर्ग" का क्या अर्थ है? दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं कर सकते वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णन वेणुगोपाल ने इस मामले के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस फैसले का असर देश के लगभग 1.5 अरब लोगों पर पड़ेगा और दुनिया भर के संवैधानिक विद्वान इसकी समीक्षा करेंगे। उन्होंने धर्म के मामलों में राज्य के बढ़ते हस्तक्षेप पर भी चिंता व्यक्त की। फिलहाल सुनवाई जारी है और इसका परिणाम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन को नई दिशा देगा। बुधवार को शीर्ष अदालत ने कहा था कि धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं से उत्पन्न होने वाले मुद्दों पर निर्णय देते समय सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता है लेकिन न्यायालय ने यह संकेत भी दिया कि वह ऐसी प्रथाओं से संबंधित जनहित याचिकाओं के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट का कड़ा रुख: दिव्यांग बच्चों को स्कूल से निकालने पर चीफ जस्टिस ने DEO से रिपोर्ट मांगी

जबलपुर जबलपुर के जबलपुर में दिव्यांग बच्चों को स्कूल से बाहर किए जाने के मामले में हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव न सिर्फ गलत है, बल्कि किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं किया जाएगा। मामला शहर के विजडम वैली स्कूल और जीडी गोयनका स्कूल से जुड़ा है। इन पर आरोप है कि स्पेशल (दिव्यांग) बच्चों को स्कूल से बाहर किया जा रहा था। शिकायत सामने आने के बाद इस मुद्दे पर जनहित याचिका दायर की गई। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा की डिवीजन बेंच ने तत्काल प्रभाव से दिव्यांग बच्चों को निकाले जाने पर रोक लगा दी। साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को आदेश दिया कि जबलपुर के सभी स्कूलों में पढ़ रहे विशेष बच्चों को लेकर विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाए। मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल तय की गई है। कानून होने के बावजूद जमीनी हकीकत कमजोर याचिकाकर्ता सौरभ सुबैया की ओर से दायर याचिका में बताया गया कि जबलपुर में करीब 50 सरकारी और 200 निजी स्कूल संचालित हो रहे हैं, जहां बड़ी संख्या में दिव्यांग छात्र पढ़ते हैं। इनमें कई बच्चे ऐसे हैं जो न बोल सकते हैं और न ही सुन सकते हैं। ‘स्पेशल एजुकेटर’ नहीं, कानूनों का पालन अधूरा याचिका में यह भी बताया गया कि स्कूलों में आज भी विशेष शिक्षक नियुक्त नहीं हैं। जबकि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत यह अनिवार्य है। इन कानूनों का पालन न होना पूरी तरह अवैधानिक है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शिवेंद्र पाण्डेय ने कोर्ट को बताया कि निजी स्कूलों द्वारा स्पेशल बच्चों को बाहर करना सीधे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इस पर कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए तुरंत हस्तक्षेप किया। समावेशी शिक्षा पर बड़ा संदेश याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि हाईकोर्ट का यह अंतरिम आदेश कई मायनों में अहम माना जा रहा है। इससे न सिर्फ समावेशी शिक्षा को मजबूती मिलेगी, बल्कि निजी स्कूलों की मनमानी पर भी लगाम लगेगी। साथ ही दिव्यांग बच्चों के अधिकारों की न्यायिक सुरक्षा को लेकर एक मजबूत संदेश गया है।  

आप अनपढ़ हैं, शक्तियां नहीं जानते: HC ने कलेक्टर को कड़ी फटकार लगाई

भरूच गुजरात हाई कोर्ट ने  भरूच के जिला कलेक्टर को जबरदस्त फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि आप कलेक्टर हैं, लेकिन आप एक अनपढ़ आदमी हैं। आपको उन नियमों की जानकारी नहीं है जिनका पालन आपको करना चाहिए। आपको तो अपनी खुद की शक्तियों के बारे में भी पता नहीं है। मामला एक जनहित याचिका के जवाब से जुड़ा था। बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक जनहित याचिका के जवाब में एक अस्पष्ट हलफनामा दायर करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट ने शुक्रवार को भरूच के जिला कलेक्टर को फटकार लगाई। याचिका में अमोनियम नाइट्रेट भंडारण इकाइयों द्वारा सुरक्षा नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीएन राय की बेंच ने कहा कि कलेक्टर अनपढ़ हैं। उन्हें संबंधित नियमों की जानकारी नहीं हैं। यहां तक कि उन्हें अपनी खुद की शक्तियों के बारे में भी कोई ज्ञान नहीं था। अमोनियम नाइट्रेट के भंडारण से जुड़ा मामला चीफ जस्टिस ने कहा कि तो आप एक अनपढ़ आदमी हैं। आप कलेक्टर हैं, लेकिन आप एक अनपढ़ आदमी हैं। आपको उन नियमों की जानकारी नहीं है, जिनका पालन आपको करना चाहिए। आपको अपनी खुद की शक्तियों के बारे में भी पता नहीं है। कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया गया था कि जिले में अमोनियम नाइट्रेट (विस्फोटक पदार्थ) के भंडारण और प्रोसेसिंग में लगी औद्योगिक इकाइयां जरूरी सुरक्षा नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। इस मामले के केंद्र में मौजूद इस केमिकल को भारतीय कानून के तहत लंबे समय से एक खतरनाक पदार्थ माना जाता रहा है। इसे खतरनाक रसायनों के निर्माण, भंडारण और आयात नियम, 1989 के तहत सूचीबद्ध किया गया है, जिन्हें भोपाल गैस त्रासदी के बाद बनाया गया था। यह अमोनियम नाइट्रेट नियम, 2012 द्वारा भी शासित होता है। किसी भी तरह की चूक के विनाशकारी परिणाम होंगे याचिका के अनुसार, इन नियमों में सख्त लाइसेंसिंग व्यवस्था लागू की गई है। साथ ही इसके निर्माण, भंडारण, परिवहन और संचालन के लिए विस्तृत सुरक्षा उपाय निर्धारित किए गए हैं, क्योंकि यह अत्यधिक विस्फोटक पदार्थ है। याचिका के अनुसार, इन नियमों का प्रवर्तन मुख्य रूप से पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) के अधीन कार्यरत मुख्य विस्फोटक नियंत्रक, जिला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) और स्थानीय पुलिस के अधीन है। याचिका में चेतावनी दी गई कि नियमों के पालन में किसी भी तरह की चूक के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। विशेष रूप से उन सघन औद्योगिक क्षेत्रों में जहां अमोनियम नाइट्रेट की बड़ी मात्रा को अन्य खतरनाक कार्यों और रिहायशी इलाकों के बेहद करीब ही संभाला जाता है। कलेक्टर द्वारा पेश किया गया हलफनामा खारिज कोर्ट ने कलेक्टर द्वारा पेश किए गए हलफनामे को खारिज कर दिया और यह टिप्पणी की कि 2012 के नियमों से पहले भी अमोनियम नाइट्रेट विस्फोटक नियम 2008 के नियामक दायरे में आता था। पुरानी इकाइयों के लिए सुरक्षा मानदंडों की अनदेखी नहीं की जा सकती थी। कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि क्या राज्य ने उन पिछली रिपोर्टों पर कोई कार्रवाई की थी, जिनमें मानदंडों के उल्लंघन का खुलासा हुआ था। हलफनामे में दिया गया यह बयान अस्पष्ट है, क्योंकि इसमें यह साफ नहीं है कि कौन सी इकाई निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन नहीं कर रही थी। ऐसा लगता है कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है और न ही जिला कलेक्टर के शपथ-पत्र में ऐसा कुछ है जिससे यह पता चले कि 19 मार्च 2025 और 23 मार्च 2026 की रिपोर्टों पर जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर द्वारा कोई कार्रवाई की गई हो। कोर्ट ने वकील की आलोचना की कोर्ट ने अधिकारियों द्वारा पेश एक नई रिपोर्ट पर संदेह व्यक्त किया, क्योंकि यह बिना किसी उचित स्पष्टीकरण के उल्लंघन से संबंधित पिछली निष्कर्षों के उलट थी। इसके अलावा, कोर्ट ने राज्य के एक वकील की आलोचना की, जिन्होंने उसके समक्ष इतना अस्पष्ट हलफनामा दायर किया था। कोर्ट ने कहा कि आप अधिकारियों के मुखपत्र नहीं हैं। इस तरह का हलफनामा दायर करके आप अधिकारियों के मुखपत्र बन जाते हैं, जबकि आप एक वकील हैं। आप हमें हल्के में ले नहीं सकते कोर्ट ने कहा कि हम सब्र रख रहे हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आप हमें हल्के में ले सकते हैं। जब वकील ने हलफनामा वापस लेने और उसकी जगह नया हलफनामा दाखिल करने की अनुमति मांगी तो अदालत ने इसकी इजाजत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हम आपको इसे यूं ही वापस लेने की अनुमति नहीं देंगे। मुख्य मुद्दा केवल यह नहीं था कि कौन से नियम लागू होते हैं, बल्कि यह था कि क्या विस्फोटक के भंडारण के लिए निर्धारित सुरक्षा मानदंडों का वास्तव में पालन किया जा रहा था। कलेक्टर को निर्देश दिया इसके बाद कोर्ट ने अंकलेश्वर के मामलतदार और कार्यपालक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे समय-समय पर लागू नियमों को ध्यान में रखते हुए प्रतिवादी इकाइयों का एक नया निरीक्षण करें। कोर्ट ने कलेक्टर को यह भी निर्देश दिया कि वे इन निष्कर्षों की स्वतंत्र रूप से जांच करें। यदि कोई उल्लंघन पाया जाता है तो की गई कार्रवाई की रिपोर्ट के साथ एक नया हलफनामा दाखिल करें। इस मामले की अगली सुनवाई जून में होगी।