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26 साल बाद न्याय, कोर्ट ने CBI के जॉइंट डायरेक्टर और रिटायर्ड DP एसीपी को दोषी करार दिया

नई दिल्ली दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 26 साल बाद दो बड़े अधिकारियों को एक मामले में दोषी ठहराया है। इनमें सीबीआई के मौजूदा जॉइंट डायरेक्टर और दिल्ली पुलिस के एक रिटायर्ड एसीपी शामिल हैं। दोनों को मारपीट, आपराधिक घुसपैठ और शरारत के मामलों में दोषी ठहराया गया है। कोर्ट ने सजा पर दलीलें सुनने के लिए मामले को 27 अप्रैल को सूचीबद्ध किया है। ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग से जुड़े एक अहम फैसले में तीस हजारी कोर्ट ने शनिवार को सीबीआई के मौजूदा जॉइंट डायरेक्टर और दिल्ली पुलिस के एक रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर (एसीपी) को मारपीट, आपराधिक घुसपैठ और शरारत के मामलों में दोषी ठहराया। यह मामला लगभग 26 साल पहले पूर्व आईआरएस अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ तड़के की गई एक छापेमारी से जुड़ा है। कोर्ट ने इसे न्यायिक आदेशों को दरकिनार करने की एक बदनीयत कोशिश बताया। दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर रामनीश और दिल्ली पुलिस के एक रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर वीके पांडे को मारपीट, आपराधिक घुसपैठ और शरारत के एक मामले में दोषी ठहराया। यह मामला साल 2000 में किए गए अपराध से जुड़ा है। सजा पर 27 को होगी बहस प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट शशांक नंदन भट्ट ने रामनीश (वर्तमान में सीबीआई में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं) और वीके पांडे (दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी) को भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 427, 448 और 34 के तहत हमला, आपराधिक घुसपैठ और शरारत करने के अपराध में दोषी ठहराया है। रामनीश साल 2000 में सीबीआई में पुलिस उपाधीक्षक और वीके पांडे सीबीआई में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थे। कोर्ट ने सजा पर दलीलें सुनने के लिए इस मामले को 27 अप्रैल को सूचीबद्ध किया है। शिकायतकर्ता भी आईआरएस अधिकारी शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी हैं। उस समय वह ईडी में दिल्ली जोन के उप निदेशक के पद पर कार्यरत थे। कोर्ट ने उनके खिलाफ चल रहे सीबीआई के दोनों मामलों से बरी कर दिया। आरोपियों को दोषी ठहराते हुए कोर्ट ने माना कि 19 अक्तूबर 2000 को की गई तलाशी और गिरफ्तारी की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण तरीके से की गई थी। इसका एकमात्र उद्देश्य 28 सितंबर 2000 के कैट के उस आदेश को निष्प्रभावी करना था, जिसमें शिकायतकर्ता के 'मानित निलंबन' (डीम्ड सस्पेंशन) की चार सप्ताह के भीतर समीक्षा करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने शक्तियों का घोर उल्लंघन बताया कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपियों ने कानून द्वारा उन्हें प्रदत्त शक्तियों का घोर उल्लंघन किया। उनके कृत्य सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के दायरे में नहीं आते हैं। इसलिए वे सीआरपीसी की धारा 197 या दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 140 के तहत मिलने वाली सुरक्षा के हकदार नहीं हैं। कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने शिकायतकर्ता के घर का मुख्य स्लाइडिंग दरवाजा तोड़ दिया था जो कि नुकसान पहुंचाने और आपराधिक घुसपैठ का मामला बनता है। इस बात की पुष्टि तो आरोपी द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट में पेश की गई अपनी खुद की सर्च लिस्ट से भी होती है। छापेमारी के दौरान शिकायतकर्ता के दाहिने हाथ में चोट लगी थी। इस बात की पुष्टि प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही, शिकायतकर्ता की एमएलसी रिपोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में आरोपी वीके पांडे द्वारा दायर किए गए जवाबी हलफनामे से भी होती है। सीबीआई अधिकारियों ने गुप्त बैठक की कोर्ट ने यह भी पाया कि कैट के निर्देशानुसार 18 अक्तूबर 2000 तक इनकम टैक्स विजिलेंस डायरेक्टोरेट को जरूरी जवाब भेजने के बजाय सीबीआई अधिकारी ने 18 अक्टूबर 2000 की शाम को एक गुप्त बैठक की और ठीक अगली सुबह ही शिकायतकर्ता के घर पर छापा मारने और उसे गिरफ्तार करने का फैसला कर लिया। मिलीभगत करके शिकायत दर्ज कराई शिकायतकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट शुभम आसरी ने दलील दी कि प्रभावशाली लोगों से जुड़े संवेदनशील फेरा मामलों की जांच करते समय उन्हें अपने वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से लगातार दबाव का सामना करना पड़ा। उन्होंने 1998 और 1999 के बीच अपनी जांच में हो रहे हस्तक्षेप के संबंध में राजस्व सचिव को सात बार अपनी बात रखी। वकील ने दलील दी कि कथित बदले की भावना से अभिषेक वर्मा नाम के एक व्यक्ति ने (जिसकी जांच शिकायतकर्ता कर रहे थे) सीबीआई अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी। बाउंड्री वॉल फांदकर घर में घुसे आरोप लगाया गया था कि 19 अक्टूबर 2000 को सुबह लगभग 5 बजे सीबीआई अधिकारियों की एक टीम शिकायतकर्ता के घर पहुंची। जब सुरक्षा गार्ड ने पहचान का सबूत मांगा तो उसे पीटा गया। टीम ने बाउंड्री वॉल फांदकर घर में प्रवेश किया, मुख्य स्लाइडिंग दरवाजा तोड़ दिया, परिवार के सदस्यों को एक कमरे में बंद कर दिया और शिकायतकर्ता को उसके बेडरूम से उसके अंतर्वस्त्रों में ही घसीटकर बाहर निकाल लिया। सीढ़ियों पर धक्का दिया गया यह भी आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता के साथ जोर-जबरदस्ती की गई और उसे सीढ़ियों पर धक्का दिया गया, जिससे उसकी दाहिनी बांह में चोटें आईं। उसे सुबह 8:45 बजे डीडीयू अस्पताल में पेश किए जाने से पहले पीरागढ़ी चौक के पास किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया था। उसे धमकी दी गई थी कि यदि उसने सीबीआई कोर्ट के समक्ष यह मुद्दा उठाया तो उसके परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। बचाव पक्ष की दलीलें खारिज कीं आरोपियों को दोषी ठहराते हुए कोर्ट ने बचाव पक्ष की दलीलों को विरोधाभासों से भरा बताते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी की अपनी तलाशी सूची (जो दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की गई थी) से यह पुष्टि हुई कि मुख्य दरवाजा टूटा हुआ था। जबकि ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष के गवाहों ने दावा किया था कि सिर्फ एक कुंडी अपनी जगह से हट गई थी। कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि मेडिको-लीगल केस साबित नहीं हुआ था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी वीके पांडे ने खुद इसे स्वीकार किया था और यह दिल्ली हाई कोर्ट में उनके अपने हलफनामे का हिस्सा था। इसमें शिकायतकर्ता के शरीर पर मामूली चोटों का जिक्र था। शिकायत दर्ज करने में हुई देरी के मामले में कोर्ट ने कहा कि शिकायत दर्ज करने … Read more

1 लाख कमाने वाली पत्नी का मेंटिनेंस अनुरोध, कोर्ट ने सुनाया विवादास्पद फैसला

जबलपुर  महीने के एक लाख से ज्यादा कमाने वाली महिला के मेंटिनेंस मांगने को गलत बताते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है। जस्टिस विवेक जैन ने अंग्रेजी साहित्यकार शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक 'मर्चेंट ऑफ वेनिस' का एक डायलॉग का जिक्र करते हुए कहा कि यह तो उसी तरह है जैसे किसी के शरीर से मांस का टुकड़ा मांग लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि महिला पहले से ही इतना कमाती है कि वह अपना घर बहुत अच्छी तरह चला सकती है। 1 लाख से ज्यादा महिला की मासिक आय जस्टिस जैन ने कहा, यह याचिका कुछ और नहीं बल्कि पति के मांस नोचने जैसा है। इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि महिला पहले से ही अच्छा कमा रही है और रख-रखाव के लिए उनका कोई बच्चा भी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि महिला की हर महीने की आय 1 लाख से ज्यादा है। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि महिला को कोई मेंटिनेंस देने की जरूरत नहीं है। 18 फरवरी 2026 को फैमिली कोर्ट ने आदेश सुनाया था कि तलाक की प्रक्रिया पूरी होने तक महिला को कोई मेंटिनेंस नहीं दिया जाएगा। दंपती का विवाह 4 नवंबर 2022 को हुआ था। 2023 से ही वे दोनों अलग रह रहे हैं। पति ने ही कोर्ट में तलाक की याचिका फाइल की थी। पत्नी का कहना है कि जब तक तलाक पर फैसला नहीं आ जाता पति उसे मेंटिनेंस दे। याचिका में महिला ने स्वीकार किया था कि वह नौकरी करती है और साल में 20 लाख के करीब कमाती हैं। उन्होंने कहा कि उनके पति साल का 30 लाख से भी ज्यादा कमाते हैं। इसपर फैमिली कोर्ट ने भी कहा था कि महिला की आय पर्याप्त है। उनका कोई बच्चा भी नहीं है और इसलिए अलग से कोई मुआवजा नहीं बनता है। मामला जब हाई कोर्ट पहुंचा तो महिला ने कहा कि अब परिस्थितियां बदल गई हैं और उसकी आय साल की 14 लाख ही रह गई है। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर इसको भी सही मान लिया जाए तो भी उसकी आय पर्याप्त है। वह महीने का लगभग 1.25 लाख रुपये कमाती है। ऐसे में वह आर्थिक रूप से कमजोर नहीं हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का फैसला एकदम सही है। कोर्ट ने कहा कि मेंटिनेंस तब बनता है जब कि पत्नी पति पर पूरी तरह से आश्रित हो या फिर उनका कोई बच्चा हो जिसके रखरखाव पर खर्च होना हो।

कोर्ट का आदेश: लिव-इन में यौन शोषण, 10 साल की सजा, शारीरिक संबंध बनाना है गंभीर अपराध

इंदौर  मध्य प्रदेश की इंदौर जिला अदालत ने लिव-इन रिलेशनशिप और विवाह के झूठे वादे से जुड़े एक गंभीर मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पीड़िता को शादी का झांसा देकर शारीरिक शोषण करने वाले दोषी को 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी है। फैसले के दौरान न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि विवाह का प्रलोभन देकर संबंध बनाना एक गंभीर सामाजिक अपराध है, जिसमें अपराधियों को कड़ा सबक मिलना अनिवार्य है। विवाह का झांसा देकर बनाया संबंध आरोपी ने विवाह का आश्वासन देकर पीड़िता के साथ करीब तीन माह तक शारीरिक संबंध बनाए। 25 जून 2022 तक दोनों साथ रहे। इसके बाद आरोपी जबलपुर चला गया। जब पीड़िता ने उससे संपर्क किया तो उसने बताया कि उसकी सगाई पहले से तय है और वह विवाह नहीं कर सकता। परिजनों से संपर्क करने पर भी विवाह से इंकार कर दिया गया। एफआईआर के बाद कार्रवाई धोखा मिलने के बाद पीड़िता ने आजाद नगर थाना में आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोपी को दोषी पाया। 10 अप्रैल को उसे 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। मामले में शासन की ओर से पैरवी एजीपी जयंत दुबे ने की। क्या था पूरा मामला? यह मामला साल 2021 से शुरू हुआ था। मूल रूप से जबलपुर की रहने वाली पीड़िता इंदौर में एक पार्टी के दौरान आरोपी के संपर्क में आई थी।     संपर्क और सहायता: सितंबर 2021 में पीड़िता इंदौर शिफ्ट हुई। जब आरोपी ने नौकरी की तलाश की बात कही, तो पीड़िता ने उसे अपनी जान-पहचान से एक फैक्ट्री में काम दिलवाया।     लिव-इन और वादा: मार्च 2022 में जब पीड़िता इंदौर छोड़ने वाली थी, तब आरोपी ने उसे रुकने के लिए मनाया और साथ में रहने लगा। आरोप है कि उसने शादी का वादा कर करीब तीन महीने तक पीड़िता का यौन शोषण किया।     धोखाधड़ी का खुलासा: जून 2022 में आरोपी अचानक जबलपुर चला गया। जब पीड़िता ने शादी का दबाव बनाया, तो उसने खुलासा किया कि उसकी सगाई कहीं और हो चुकी है। कानूनी कार्रवाई और सजा पीड़िता ने हिम्मत दिखाते हुए आजाद नगर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। कोर्ट में अभियोजन पक्ष की ओर से एजीपी जयंत दुबे ने ठोस पैरवी की। गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने माना कि आरोपी की मंशा शुरू से ही धोखाधड़ी की थी। 10 अप्रैल को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए दोषी को जेल भेज दिया।

महिला सहकर्मी के शरीर को घूरना: हाई कोर्ट का अहम फैसला, यह ताक-झांक नहीं

मुंबई  बॉम्बे हाई कोर्ट ने महिला को कथित तौर पर घूरने को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी महिला सहकर्मी के शरीर को घूरना अनैतिक व्यवहार है, लेकिन इसे ताक-झांक (Voyeurism) का अपराध नहीं माना जाएगा। जस्टिस अमित बोरकर ने कहा कि ऐसे काम नैतिक रूप से गलत हैं, लेकिन वे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354C के तहत कानूनी मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। बता दें कि यह धारा ताक-झांक के अपराध को परिभाषित करती है और उसके लिए सजा तय करती है। इस धारा के तहत किसी महिला को कोई निजी काम करते हुए देखना, उसकी तस्वीरें लेना या उन तस्वीरों को फैलाना शामिल है। यह उस हालात में लागू होता है जहां शरीर के निजी अंग खुले हों, कोई महिला शौचालय का इस्तेमाल कर रही हो, या कोई ऐसा यौन कृत्य कर रही हो जो आमतौर पर सार्वजनिक रूप से नहीं किया जाता। हालांकि, इसके तहत ऑफिस के माहौल में किसी को घूरना इस श्रेणी में नहीं आता। एक मामले में एक इंश्योरेंस कंपनी के एग्जीक्यूटिव के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। उनकी एक महिला सहकर्मी ने उन पर आरोप लगाया था कि मीटिंग के दौरान वे उनसे नजरें मिलाने के बजाय उनके शरीर को घूरते थे, और साथ ही गलत टिप्पणियां भी करते थे। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि कानून को उसकी लिखी हुई बातों से ज्यादा नहीं खींचा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे हालात में आपराधिक मामला जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा। कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कंपनी की इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (ICC) ने पहले ही आरोपी को बरी कर दिया था। इन दावों को देखते हुए कोर्ट ने इस मामले में व्यक्ति के ऊपर दर्ज एफआईआर को रद्द करने का फैसला किया। जस्टिस अमित बोरकर की सिंगल जज बेंच ने कहा, "आरोप सिर्फ इतना है कि उन्होंने ऑफिस मीटिंग के दौरान महिला के सीने को घूरा था। किसी को घूरना, भले ही यह सच भी मान लिया जाए, आईपीसी की धारा 354-C के तहत आने वाले 'ताक-झांक' के अपराध जैसा नहीं है।''

हाईकोर्ट का अहम फैसला: दिव्यांग रेप पीड़िता को गर्भ गिराने की अनुमति, महिला की इच्छा को रखा प्राथमिकता

ग्वालियर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में 30 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता विधवा महिला को गर्भपात की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। पीड़िता को 19 माह का गर्भ है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि महिला की शारीरिक और मानसिक सेहत सर्वोपरि है। ऐसे मामलों में उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखना उसके अधिकारों का उल्लंघन होगा। अदालत के आदेश के अनुसार गर्भपात की प्रक्रिया 11 अप्रैल को कराई जाएगी। पीड़िता दिव्यांग है और सुनने व बोलने में असमर्थ है, जिससे उसकी स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई है। मामले में पीड़िता की ओर से उसके भाई ने याचिका दायर कर गर्भपात की अनुमति मांगी थी। याचिका में बताया गया कि गर्भावस्था यौन शोषण का परिणाम है, जिससे महिला को गंभीर मानसिक आघात और शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ रही है। कोर्ट के निर्देश, डॉक्टरों की निगरानी में सुरक्षित तरीके से हो प्रक्रिया हाईकोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और पीड़िता की स्थिति को ध्यान में रखते हुए गर्भपात की अनुमति दी। साथ ही मेडिकल कॉलेज के डीन को निर्देश दिया गया कि अनुभवी डॉक्टरों की विशेष टीम गठित की जाए, जिसमें मेडिसिन और कार्डियोलॉजी विशेषज्ञ भी शामिल हों, ताकि पूरी प्रक्रिया सुरक्षित तरीके से संपन्न हो सके। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट अहम कोर्ट के निर्देश पर गजराराजा मेडिकल कॉलेज और कमलाराजा अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने पीड़िता की जांच की। रिपोर्ट में गर्भ लगभग 19 सप्ताह का पाया गया और विशेषज्ञों ने उचित चिकित्सा सुविधाओं के साथ सुरक्षित गर्भपात संभव बताया।

हाईकोर्ट का सख्त रुख: ध्वनि प्रदूषण पर जागरूकता जरूरी, डीजे की तेज आवाज है खतरे की घंटी

जबलपुर  ध्वनि प्रदूषण के कारण बढ़ती बीमारियों तथा डीजे की तेज आवाज से लोगों को हार्ट अटैक आने और ब्लड प्रेशर बढ़ने को चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई थी। याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से पेश किए गए जवाब में बताया गया कि कान फाड़ देने वाली डीजे की तेज आवाज जनसमस्या बन गई है। कोलाहल एक्ट के तहत निर्धारित सीमा से अधिक आवाज में डीजे बजने पर जुर्माने की कार्रवाई की जाती है। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा तथा जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए तल्ख टिप्पणी की कि इस समस्या के समाधान के लिए नागरिकों का जागरूक होना आवश्यक है। नाना देशमुख वेटनरी यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति गोविंद प्रसाद मिश्रा (उम्र 83 वर्ष), सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी आर.पी. श्रीवास्तव (उम्र 100 वर्ष) सहित अन्य चार की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि शादियों व धार्मिक आयोजनों के दौरान बहुत तेज आवाज में डीजे बजाए जाते हैं। मानव शरीर 75 डेसिबल तक की आवाज की तीव्रता सहन कर सकता है। इससे अधिक आवाज ध्वनि प्रदूषण की श्रेणी में आती है। डीजे की आवाज की तीव्रता 100 डेसिबल से अधिक होती है, जिससे लोगों को गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ता है। तेज आवाज के कारण हार्ट अटैक से मौत के मामले भी सामने आए हैं। इसके अलावा लोग बहरेपन और उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) जैसी समस्याओं का शिकार हो रहे हैं। याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश जवाब में इसे जनसमस्या बताते हुए कहा गया कि कोलाहल एक्ट के तहत जुर्माने की कार्रवाई की जाती है। याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए युगलपीठ को बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी ध्वनि प्रदूषण को गंभीर समस्या माना है, जिसका प्रतिकूल असर मानव जीवन पर पड़ रहा है और लोग विभिन्न बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। डीजे की तेज आवाज के कारण हार्ट अटैक से कई लोगों की मौत भी हुई है। केवल जुर्माने की कार्रवाई से इस समस्या पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगाया जा सकता।

लखनऊ कोर्ट ने रोहिंग्या-बांग्लादेशी मानव तस्करी केस में 9 आरोपियों को दोषी करार, 7-8 साल की सजा

लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मानव तस्करी के एक बड़े मामले में अदालत ने फैसला सुनाया है. NIA और यूपी एटीएस से जुड़े इस केस में विशेष न्यायाधीश जैनेंद्र कुमार पांडेय की अदालत ने नौ लोगों को दोषी करार देते हुए उन्हें सजा सुनाई है।  अदालत ने जिन्हें सजा सुनाई है, उनमें मोहम्मद नूर समेत रहमतुल्ला, शबीउररहमान, इस्माइल, अब्दुल शकूर, आले मियां, मोहम्मद रफीक, बप्पन और मोहम्मद हुसैन शामिल हैं. इन सभी को मानव तस्करी का दोषी पाया गया है. इनमें से मोहम्मद नूर सहित कई को 8 साल की सजा सुनाई गई, जबकि अन्य को 7 साल की कैद हुई है. सभी दोषियों पर अलग-अलग राशि का जुर्माना भी लगाया गया है।  जांच एजेंसियों के अनुसार, यह एक अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी गिरोह था, जो भारत-बांग्लादेश बॉर्डर के जरिए रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को अवैध रूप से भारत में एंट्री दिलाता था. इस गैंग का नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ था और यह लंबे समय से एक्टिव था।  गैंग का तरीका बेहद संगठित और सुनियोजित था. महिलाओं को शादी का झांसा देकर उन्हें बेच दिया जाता था, जबकि पुरुषों और बच्चों को फैक्ट्रियों में काम दिलाने के नाम पर शोषण का शिकार बनाया जाता था. इस तरह यह गिरोह मानव तस्करी कर रहा था।  इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ, जब यूपी एटीएस ने मोहम्मद नूर को सर्विलांस पर लिया. इसके बाद 26 जुलाई 2021 को उसे गाजियाबाद रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया. उसकी गिरफ्तारी के बाद कई पीड़ितों को मुक्त कराया गया और गिरोह के अन्य सदस्यों तक पहुंच बनाई गई।  जांच के दौरान दिल्ली समेत अन्य स्थानों पर छापेमारी की गई और गैंग के बाकी सदस्यों को भी गिरफ्तार किया गया. पूछताछ में यह भी सामने आया कि त्रिपुरा बॉर्डर के जरिए पैसों लेकर अवैध तरीके से घुसपैठ कराई जाती थी, जिसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में भेज दिया जाता था. इस पूरे ऑपरेशन के जरिए सुरक्षा एजेंसियों ने एक नेटवर्क का पर्दाफाश किया। 

एमपी के इस बड़े शहर को लेकर हाईकोर्ट की चेतावनी: पहाड़ियां बचाना जरूरी, नहीं तो बनेगा रेगिस्तान

 ग्वालियर  प्राकृतिक धरोहर और पहचान रही पहाडिय़ों पर लैंड माफिया के अवैध कब्जों व मुरम के बेखौफ उत्खनन को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला केवल कानूनी या प्रशासनिक नहीं है, बल्कि हमारे अस्तित्व से जुड़ा है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि इन पहाडिय़ों को समय रहते नहीं बचाया गया, तो इनका पूरी तरह समाप्त होना तय है, जिसका गंभीर पर्यावरणीय खामियाजा शहर की आने वाली पीढिय़ों को भुगतना पड़ेगा। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए माना कि राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक ढिलाई और पुलिस की निष्क्रियता के कारण लैंड माफिया बेखौफ होकर पहाडिय़ों को छलनी कर रहे हैं। विशेष रूप से गुड़ा-गुड़ी के नाके और आसपास के क्षेत्रों में पहाड़ों को भारी नुकसान पहुंचाया गया है। कोर्ट ने ​पब्लिक ट्रस्ट डॉकि्ट्रन (सार्वजनिक न्यास सिद्धांत) का हवाला देते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करना राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी है, जिसमें प्रशासन पूरी तरह विफल दिख रहा है। अब 'सिटी फॉरेस्ट' के रूप में पहचानेंगे पहाड़ : कोर्ट ने एक दूरगामी कल्पना पेश करते हुए इन पहाडिय़ों को 'सिटी फॉरेस्ट' के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया है। यहाँ मॉर्निंग वॉक, योग और पारिवारिक पिकनिक के लिए स्थान विकसित किए जाएंगे। इससे न केवल शहर का पर्यावरण सुधरेगा, बल्कि ग्वालियर में हर साल बढ़ती भीषण गर्मी से भी राहत मिल सकेगी। कोर्ट ने इस मॉडल को अन्य जिलों के लिए भी नजीर बनाने पर जोर दिया है। कलेक्टर की अध्यक्षता में बनी हाई-लेवल कमेटी मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने ग्वालियर कलेक्टर की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं। इस कमेटी में नगर निगम, पुलिस, वन विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति, आयुर्वेद विशेषज्ञ और समाज के प्रबुद्ध नागरिकों को शामिल किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहाडिय़ों को माफिया से मुक्त कराकर वहां फेंसिंग की जाए और बड़े पैमाने पर औषधीय व फलदार पौधे लगाए जाएं। हाई-पावर कमेटी में ये रहेंगे .     अध्यक्ष: जिला कलेक्टर, ग्वालियर     समन्वयक/सचिव: विवेक खेडकर (एडिशनल एडवोकेट जनरल)     सदस्य: पुलिस अधीक्षक, नगर निगम आयुक्त, डीएफओ, कुलपति (कृषि विवि)     विशेषज्ञ: गौरीशंकर दुबे (पूर्व प्रिंसिपल रजिस्ट्रार), डॉ. धर्मेन्द्र रिछारिया (आयुर्वेद), डॉ. आशुतोष गुप्ता (सीनियर वेटरनरी सर्जन), प्रशांत शर्मा (अधिवक्ता) प्रमुख बिंदु चार बिंदुओं पर 23 अप्रेल को मांगी रिपोर्ट हाई लेवल कमेटी का विधिवत गठन और सभी सदस्यों की सहमति। कमेटी की पहली बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों का ब्यौरा। पहाडिय़ों के सर्वे और फेंसिंग के लिए तैयार की गई प्रारंभिक कार्ययोजना। सिटी फॉरेस्ट प्रोजेक्ट को लेकर धरातल पर शुरू की गई कार्रवाई।

हाईकोर्ट ने खारिज किया कर्मचारियों का वेतनवृद्धि दावा, प्रदेश में बड़ा झटका

ग्वालियर एमपी में वेतनवृद्धि पर कर्मचारियों को बड़ा झटका लगा है। निजी सहायता प्राप्त (ग्रांट-इन-एड) स्कूलों के कर्मचारी शिक्षकों को ग्वालियर हाईकोर्ट ने यह झटका दिया है। कोर्ट ने इन कर्मचारियों का वेतनवृद्धि का दावा खारिज कर दिया है। निजी सहायता प्राप्त (ग्रांट-इन-एड) स्कूलों के कर्मचारी शिक्षकों ने बीएड पर दो अतिरिक्त वेतनवृद्धियां देने की मांग की थी जिसे हाईकोर्ट ने साफ तौर पर नकार दिया। इन शिक्षकों ने खुद को सरकारी शिक्षकों के समान बताते हुए वेतनवृद्धि का लाभ मांगा था। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने निजी सहायता प्राप्त (ग्रांट-इन-एड) स्कूलों के कर्मचारी शिक्षकों को बड़ा झटका देते हुए बीएड डिग्री के आधार पर दो अतिरिक्त वेतनवृद्धि (एडवांस इंक्रीमेंट) देने की मांग खारिज कर दी है। रामदास यादव एवं अन्य बनाम राज्य एवं अन्य में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे लाभ केवल शासकीय शिक्षकों के लिए लागू होते हैं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि उन्होंने स्वयं के खर्च पर बीएड डिग्री हासिल की है और पूर्व सरकारी आदेशों के अनुसार उन्हें दो अतिरिक्त वेतनवृद्धि मिलनी चाहिए। उनका कहना था कि वे भी अनुदान प्राप्त संस्थानों में कार्यरत हैं, इसलिए सरकारी शिक्षकों के समान लाभ मिलना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि भले ही सरकार से अनुदान मिलता हो, लेकिन वे शासकीय कर्मचारी नहीं हालांकि कोर्ट ने उनका दावा मानने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता निजी संस्थानों में कार्यरत हैं, भले ही उन्हें सरकार से अनुदान मिलता हो, लेकिन वे शासकीय कर्मचारी नहीं हैं। इसलिए वे सरकारी शिक्षकों के बराबर अतिरिक्त लाभ का दावा नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने दिया एक और अहम आदेश, 'शौर्य दीदी' की निगरानी में भेजा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक और मामले में अहम फैसला दिया। हैबियस कॉर्पस याचिका की सुनवाई के दौरान पारिवारिक विवाद सुलझाते हुए हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया। सुशील सिंह चौहान बनाम राज्य एवं अन्य मामले में कोर्ट ने काउंसलिंग के बाद पत्नी को पति के साथ रहने की अनुमति दी और 'शौर्य दीदी' की निगरानी में रखने के निर्देश दिए। मामले में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी लापता है और उसे अवैध रूप से कहीं रखा गया है। सुनवाई के दौरान पुलिस ने महिला को कोर्ट में पेश किया। महिला ने बताया कि पति के बुरे व्यवहार और प्रताडऩा से परेशान होकर वह घर छोड़कर आगरा में रह रही थी। कोर्ट के निर्देश पर काउंसलिंग कराई गई, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच सहमति बन गई। पत्नी ने शर्त रखी कि यदि पति अच्छा व्यवहार करेगा, तो वह उसके साथ रहने को तैयार है। पति ने भी कोर्ट के समक्ष भविष्य में किसी प्रकार की प्रताडऩा न करने का भरोसा दिलाया।

पंचायत चुनावों में उपायुक्तों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण पर कोर्ट ने लगाई रोक

शिमला  हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए पंचायत चुनावों में उपायुक्तों को 5 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की दी गई शक्तियों पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने इस प्रावधान को प्रथम दृष्टया असंवैधानिक मानते हुए स्पष्ट किया कि इसके तहत तैयार किसी भी आरक्षण सूची को लागू नहीं किया जाएगा। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सभी जिलों के उपायुक्तों को निर्देश दिए हैं कि वे पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण सूची 7 अप्रैल सायं 5 बजे तक हर हाल में अंतिम रूप देकर लागू करें। विस्तृत आदेश का इंतजार है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता नंद लाल ने सरकार के इस निर्णय को मनमाना और संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध बताया। उन्होंने कहा कि 30 मार्च को किए गए संशोधन के तहत उपायुक्तों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने की शक्ति दी गई, जो आर्टिकलट 243डी का उल्लंघन है। अदालत के आदेशों के बाद कुल्लू, शिमला, मंडी, कांगड़ा और हमीरपुर जिलों में जारी की गई वे सभी आरक्षण सूचियां, जिनमें यह 5 प्रतिशत आरक्षण शामिल है, अब दोबारा तैयार करनी पड़ सकती हैं। राज्य में 3,600 से अधिक पंचायतों और 73 शहरी निकायों में 31 मई से पहले चुनाव कराए जाने हैं। शहरी निकायों की आरक्षण सूचियां पहले ही जारी हो चुकी हैं, जबकि कई जिलों में पंचायत चुनावों की सूचियां अभी लंबित हैं। पंचायती राज मंत्री अनुरुद्ध सिंह ने कहा कि सरकार अदालत के आदेशों का पूरी तरह पालन करेगी और निर्देशों के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे सरकार के लिए शर्मनाक बताया। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर पंचायत चुनावों को असंवैधानिक तरीके से प्रभावित करने का आरोप लगाया। हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हो चुका है, जिसके बाद नए चुनाव आवश्यक हो गए हैं। सरकार ने 30 मार्च 2026 को नियमों में संशोधन कर उपायुक्तों को 5 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का अधिकार दिया था, जिसे अदालत में चुनौती दी गई। इससे पहले मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था, जहां चुनाव प्रक्रिया पूरी करने की समयसीमा बढ़ाकर 31 मई 2026 कर दी गई थी। अब हाईकोर्ट के 7 अप्रैल तक आरक्षण सूची अंतिम करने के आदेश के बाद चुनाव प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।