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कोर्ट का अहम फैसला: 19 साल की पत्नी को प्रेमी के साथ रहने की मिली इजाजत, पति से रिश्ते में नहीं आया सामंजस्य

 ग्वालियर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक महत्वपूर्ण मामले में 19 साल की युवती को उसकी इच्छा के अनुसार प्रेमी के साथ रहने की अनुमति दी है. अदालत ने साफ किया कि बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा अधिकार है और उसकी मर्जी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।  ग्वालियर से सामने आए इस मामले में एक पति ने अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए 'कोर्ट में पेश कराने की याचिका (हेबियस कॉर्पस)' दायर की थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि उसकी पत्नी को एक युवक ने अपने पास अवैध रूप से रखा हुआ है. मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस ने युवती को बरामद कर वन स्टॉप सेंटर में रखा और बाद में उसे कोर्ट में पेश किया गया. सुनवाई के समय युवती के माता-पिता, पति और कथित प्रेमी भी अदालत में मौजूद थे. अदालत ने जब युवती से उसकी इच्छा पूछी तो उसने साफ तौर पर कहा कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से रह रही है. उसने यह भी कहा कि वह न तो अपने पति के साथ रहना चाहती है और न ही अपने माता-पिता के साथ. युवती ने अदालत को बताया कि उसका वैवाहिक जीवन ठीक नहीं चल रहा था।  युवती ने कहा कि उसकी उम्र 19 साल है, जबकि उसके पति की उम्र 40 साल है. दोनों के बीच 21 साल का अंतर है, जिसके कारण उनके रिश्ते में सामंजस्य नहीं बन पाया. उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके साथ दुर्व्यवहार हुआ है. अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए युवती की काउंसलिंग कराई. इसके बावजूद युवती अपने फैसले पर कायम रही और उसने दोबारा कहा कि वह अपनी इच्छा से अपने प्रेमी के साथ रहना चाहती है. युवती के प्रेमी ने भी अदालत को भरोसा दिलाया कि वह उसकी देखभाल करेगा और उसके साथ किसी तरह का गलत व्यवहार नहीं करेगा. सभी पक्षों की बात सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि युवती बालिग है और अपनी इच्छा से निर्णय ले रही है. ऐसे में उसे उसकी मर्जी के खिलाफ कहीं रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।  अदालत ने युवती को उसके प्रेमी के साथ जाने की अनुमति दे दी. साथ ही उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए छह महीने के लिए निगरानी व्यवस्था भी तय की गई है. इसके तहत संबंधित अधिकारी समय-समय पर युवती से संपर्क में रहेंगे और उसकी स्थिति पर नजर रखेंगे. कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद युवती को वन स्टॉप सेंटर से मुक्त किया जाए। 

अदालत ने चोरी के आरोप में फंसे जज को जमानत देने से किया मना, कानून की जीत

चंडीगढ़  पंजाब की एक अदालत में हाल ही में एक अनोखा मामला पहुंचा। यहां एक जज पर लगे चोरी के आरोप पर सुनवाई करते समय अदालत भी हैरान रह गई। जज पर अन्य लोगों के साथ मिलकर साथी जज के घर से चोरी के इल्जाम लगे हैं, वह भी तब जब जज की लाश अस्पताल में पड़ी थी। इस मामले पर सुनवाई करते हुए हुए पंजाब के पटियाला की एक अदालत ने बीते बुधवार को कहा है कि कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता और जज की अग्रिम जमानत की याचिका भी खारिज कर दी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरिंदर सिद्धू ने अपने आदेश में कहा कि एक कार्यरत न्यायिक अधिकारी पर लगे आरोप बेहद गंभीर हैं और यह एक पब्लिक सर्वेंट, खासकर न्यायिक अधिकारी से अपेक्षित ईमानदारी पर सवाल उठाते हैं। यह मामला 1 अगस्त 2025 की रात से जुड़ा है, जब जज कंवलजीत सिंह का पटियाला के अमर अस्पताल में निधन हो गया था। आरोप हैं कि सिविल जज (जूनियर डिविजन) बिक्रमदीप सिंह ने मृतक के घर की घरेलू सहायक अमरजोत कौर उर्फ पिंकी, सरकारी अधिकारी गौरव गोयल और एक अन्य अज्ञात व्यक्ति के साथ मिलकर साजिश रची। कैसे हुई चोरी? जानकारी के मुताबिक जब जज का शव अस्पताल में था, तब यह लोग विकास कॉलोनी स्थित जज के घर में घुसे और सोना, जेवर और नकदी निकाल ली। सीसीटीवी फुटेज में आरोपी जज और उनके साथी घर में आते-जाते और बैग और डिब्बे ले जाते दिखे हैं। इसके बाद डॉ. भूपिंदर सिंह विर्क, जो पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में लॉ प्रोफेसर हैं, की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई थी। क्या बोला कोर्ट? कोर्ट ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज पहली नजर में आरोपी की मौजूदगी और भूमिका को साबित करती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फुटेज में आरोपियों की बॉडी लैंग्वेज और सामान ले जाने का तरीका साफ दिखाता है कि यह काम गुपचुप तरीके से किया गया। कोर्ट ने बचाव पक्ष की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें व्हाट्सऐप चैट और कॉल के जरिए अनुमति मिलने की बात कही गई थी। अदालत ने पाया कि ये बातचीत कथित चोरी के बाद हुई थी। फुटेज रात करीब 9:50 बजे तक की है, जबकि पहला मैसेज 10:17 बजे का बताया गया। कोर्ट ने कहा कि इन संदेशों में सिर्फ शोक जताया गया है, किसी तरह की अनुमति का संकेत नहीं मिलता। कानून से ऊपर कोई नहीं कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका पद कुछ भी हो, कानून से ऊपर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम गुजरात राज्य (1991) मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यह दिशानिर्देश सिर्फ मनमानी गिरफ्तारी से बचाते हैं, पूरी छूट नहीं देते। अदालत ने कहा कि इस मामले में कस्टोडियल इंटरोगेशन जरूरी है, क्योंकि अभी भी काफी सामान बरामद नहीं हुआ है और पूरी साजिश का खुलासा होना बाकी है। कोर्ट ने कहा कि गंभीर मामलों में अग्रिम जमानत जांच में बाधा नहीं बननी चाहिए।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘दावेदार की मौत से नहीं रुकता पीड़ित का मुआवजा दावा

चंडीगढ़  पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना से जुड़े मुआवजा मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी दावेदार की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो केवल इसी आधार पर उसकी याचिका खारिज नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मृतक के कानूनी वारिस दावा आगे बढ़ा सकते हैं। अदालत एक अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसे मूल दावेदार के कानूनी प्रतिनिधियों ने दाखिल किया था। अपील में मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल के 20 मार्च 1999 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें दावेदार की मृत्यु के बाद यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी गई थी कि मुकदमा जारी रखने का अधिकार समाप्त हो गया है। मूल दावेदार एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गई थी और लंबे समय तक अस्पताल में इलाजरत रही। उसकी मृत्यु हो गई। ट्रिब्यूनल ने यह मानते हुए कि मृत्यु के बाद दावा जीवित नहीं रहता, याचिका को खारिज कर दिया। परिजनों ने हाईकोर्ट में दलील दी कि मौत दुर्घटना में लगी चोटों के कारण हुई और उन्हें साबित करने का अवसर दिया जाना चाहिए था। ट्रिब्यूनल ने केवल दावेदार की मृत्यु के आधार पर याचिका खारिज कर दी, जबकि उसे परिजनों को सबूत पेश करने का अवसर देना चाहिए था। अदालत ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसका उद्देश्य पीड़ितों को न्यायसंगत और उचित मुआवजा देना है।

हाईकोर्ट का निर्णय: दूसरे राज्य के सर्टिफिकेट पर आरक्षण नहीं, कोर्ट ने कहा- जाति जन्म से निर्धारित होती है

 ग्वालियर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने आरक्षण पर एक अहम फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी अन्य राज्य से जारी ओबीसी OBC जाति प्रमाणपत्र के आधार पर मध्यप्रदेश में आरक्षण का लाभ नहीं लिया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर होगा , विवाह या​ निवास परिवर्तन से नहीं। इसी के साथ हाईकोर्ट ने दूसरे राज्य का ओबीसी प्रमाणपत्र अमान्य करते हुए याचिका भी खारिज कर दी। कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह के आधार पर भी किसी महिला को अपने पति की जाति का आरक्षण लाभ नहीं मिल सकता। कोर्ट ने बताया कि यह मुद्दा पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट किया जा चुका है। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की निवासी अर्चना दांगी ने याचिका दायर कर अपनी उम्मीदवारी निरस्त किए जाने को चुनौती दी थी। उन्होंने उच्च माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा-2018 उत्तीर्ण की थी, लेकिन दस्तावेज सत्यापन के दौरान चयन इस आधार पर निरस्त कर दिया गया कि उनका ओबीसी प्रमाणपत्र उत्तर प्रदेश का है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि दांगी जाति उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश दोनों राज्यों में ओबीसी श्रेणी में शामिल है। साथ ही उन्होंने यह भी दलील दी कि विवाह के बाद वे मध्यप्रदेश की निवासी हो गई हैं, इसलिए उन्हें यहां आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। वहीं राज्य शासन की ओर से कहा गया कि जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर होता है, न कि विवाह या निवास परिवर्तन से। साथ ही, दूसरे राज्य से जारी प्रमाणपत्र मध्यप्रदेश में मान्य नहीं होता। आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह के बाद महिला अपने पति की जाति का सामाजिक रूप से हिस्सा बन सकती है, लेकिन उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता, क्योंकि आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है, जो जन्म से निर्धारित होता है। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि संबंधित अधिकारियों का निर्णय सही और विधिसम्मत है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुकी यह मुद्दा कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि यह मुद्दा पहले ही सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न न्यायालयों द्वारा स्पष्ट किया जा चुका है। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि कोई भी व्यक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने पर अपनी जाति की आरक्षण स्थिति साथ नहीं ले जा सकता, भले ही वह जाति दोनों राज्यों में समान नाम से सूचीबद्ध है।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने हटाई सेना के जवानों की डिसेबिलिटी पेंशन पर रोक

चंडीगढ़  भारतीय सेना के जवानों के हितों की रक्षा करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सशस्त्र बलों के सदस्यों को दी जाने वाली डिसेबिलिटी पेंशन (Disability Pension) को तकनीकी आधार पर नहीं रोका जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार और सैन्य अधिकारियों को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया है कि सेवा के दौरान दिव्यांग हुए जवानों को उनका जायज हक तुरंत दिया जाए। यह फैसला उन हजारों पूर्व सैनिकों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया है जो लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। 1. कोर्ट का कड़ा रुख: "सेवा की परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकते" हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सेना की ड्यूटी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में होती है। यदि कोई जवान सेवा के दौरान किसी शारीरिक अक्षमता या बीमारी का शिकार होता है, तो यह माना जाना चाहिए कि वह 'Attributable to Military Service' (सैन्य सेवा के कारण) है। कोर्ट ने उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि जवान की बीमारी का ड्यूटी से सीधा संबंध नहीं है। 2. पेंशन रोकने के नियमों पर सवाल अदालत ने पाया कि कई मामलों में सैन्य अधिकारियों द्वारा पेंशन के दावों को यह कहकर खारिज कर दिया जाता है कि दिव्यांगता 'अग्रवेटेड' (Aggravated) नहीं है। हाई कोर्ट ने साफ किया कि अगर मेडिकल बोर्ड ने भर्ती के समय जवान को पूरी तरह फिट घोषित किया था, तो सेवा के दौरान पैदा हुई किसी भी अक्षमता के लिए विभाग ही जिम्मेदार है। 3. पूर्व सैनिकों को मिलेगी बड़ी राहत इस फैसले के बाद अब उन जवानों के लिए पेंशन का रास्ता साफ हो गया है जिन्हें 'डिस्चार्ज' के समय मेडिकल ग्राउंड पर अनफिट घोषित कर घर भेज दिया गया था। कोर्ट ने आदेश दिया है कि पिछले बकाया (Arrears) के साथ पेंशन का भुगतान निर्धारित समय सीमा के भीतर किया जाए। 4. सैन्य नियमों की व्याख्या में स्पष्टता हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कल्याणकारी नियमों की व्याख्या हमेशा लाभार्थी (जवान) के पक्ष में होनी चाहिए। प्रशासन को संवेदनशीलता दिखाते हुए ऐसे मामलों में अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचना चाहिए।

हाईकोर्ट का आदेश: घर में प्रेयर या मीटिंग करने वालों को परेशान नहीं किया जा सकता, पुलिस नोटिस रद्द

बिलासपुर   छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति को अपने निजी आवास में शांतिपूर्वक प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए पूर्व से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने पुलिस द्वारा जारी नोटिसों को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ताओं को अनावश्यक रूप से परेशान न करने के निर्देश दिए। प्रार्थना सभा का आयोजन यह मामला तब सामने आया जब याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर पुलिस थाना नवागढ़ द्वारा जारी नोटिसों को चुनौती दी। याचिका में यह भी कहा गया था कि उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा की जाए और 7 दिसंबर 2025 के एक आदेश को रद्द किया जाए।  याचिकाकर्ता, जो ग्राम गोधन, तहसील नवागढ़, जिला जांजगीर-चांपा के निवासी हैं, ने 2016 से अपने निजी मकान की पहली मंजिल पर प्रार्थना सभा आयोजित की थी। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि इन प्रार्थना सभाओं में किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि या शांति भंग नहीं होती है। प्रार्थना सभा पर रोक  हालांकि, थाना नवागढ़ के प्रभारी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 94 के तहत बार-बार नोटिस जारी कर प्रार्थना सभा पर रोक लगाने का प्रयास किया था। साथ ही ग्राम पंचायत गोधन द्वारा पहले जारी ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ को भी दबाव में वापस ले लिया गया। राज्य सरकार के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं और वे जेल भी जा चुके हैं। इसके अलावा, प्रार्थना सभा के लिए किसी भी सक्षम प्राधिकारी से अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए पुलिस ने नोटिस जारी किए। निजी मकान में प्रार्थना सभा कानूनी उल्लंघन नहीं हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद फैसला दिया कि याचिकाकर्ता अपने निजी मकान में 2016 से प्रार्थना सभा आयोजित कर रहे हैं और यह कोई कानूनी उल्लंघन नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि प्रार्थना सभा के दौरान कोई कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होती है, तो संबंधित प्राधिकरण विधि अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ सभा आयोजित करने पर हस्तक्षेप उचित नहीं है। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं के नागरिक अधिकारों में हस्तक्षेप न करें और उन्हें जांच के नाम पर परेशान न करें। अदालत ने 18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और 1 फरवरी 2026 को जारी सभी नोटिसों को भी निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: शादीशुदा और बालिग महिला की सहमति से संबंध को रेप नहीं माना जाएगा

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक बड़े फैसले के चर्चे हो रहे हैं। दरअसल कोर्ट ने एक बालिग और शादीशुदा महिला की सहमति से बने शारीरिक संबंधों पर अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सहमति से बने शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया कि किसी बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी और सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध को रेप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज करके बड़ा फैसला दिया । ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ पीड़िता की अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी से बनाए शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। इस फैसले को काफी अहम और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिला बेमेतरा से जुड़ा है ये मामला आपको बता दें कि यह मामला बेमेतरा जिले से जुड़ा है, जहां पीड़िता ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की मंजूरी मांगी थी लेकिन हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट के निर्णय को ही सही माना और याचिका खारिज कर दी। आखिर क्या था पूरा मामला मामला कृषि महाविद्यालय में मजदूरी करने वाली महिला से जुड़ा है,वहीं पर आरोपी भी काम करता था। इसी दौरान आरोपी  ने उससे बात करना शुरू किया और शादी करने का वादा किया। आरोपी उसे अपने  घर ले गया और दुष्कर्म किया। लेकिन महिला पहले से ही तीन माह के गर्भ से थी। लोक लाज से किसी को  ये बात नहीं बताई लेकिन पति के पूछने पर सारी वारदात बताई और फिर थाने में रिपोर्ट लिखाई। ट्रायल कोर्ट ने गवाहों एवं मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आरोपित को बरी कर दिया गया जिस पर पीड़िता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। लेकिन सुनवाई में पता चला कि महिला ने  सहमति से शारीरिक संबंध बनाया था। इसी पर  कोर्ट ने कहा कि एक बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी और सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध में दुष्कर्म का मामला नहीं बनता है। कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

OBC आरक्षण मामले में SC का फैसला, 87-13 फार्मूले को चुनौती, 2 मामलों को किया रिकॉल

जबलपुर  सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के मामले में एक नया आदेश पारित किया है। दो याचिकाओं को हाई कोर्ट से रिकाल कर लिया है और 52 मामले जो पिछली बार सुप्रीम कोर्ट में ही रह गए थे, ट्रांसफर आर्डर में दर्ज नहीं हुए थे, उनको हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया है। अब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मामले में अंतिम बहस शुरू होगी। वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर और विनायक प्रसाद शाह ने बताया कि हाई कोर्ट में ओबीसी आरक्षण के संबंध में विचार अधीन सभी मामलों को मध्य प्रदेश शासन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था। सभी मामले सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग खंडपीठ के समक्ष पेंडिंग थे। जानकारी के अनुसार कोर्ट ने 87-13 के फार्मूले को चुनौती देने वाले मामले को रिकॉल किया गया है, जिसकी सुनवाई अप्रैल के दूसरे सप्ताह में होगी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 54 और याचिकाएं जबलपुर हाईकोर्ट में ट्रांसफर की हैं। ओबीसी आरक्षण से जुड़ी 103 याचिकाओं पर हाईकोर्ट 2 से 15 अप्रैल तक नियमित सुनवाई करेगा। 52 प्रकरण हाईकोर्ट ट्रांसफर किए गए ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से कोर्ट में दलील देने वाले सीनियर अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण के प्रकरणों में 19 फरवरी 26 को पारित आदेश में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए 52 प्रकरणों को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट वापस भेजा है। ट्रांसफर केसो में से दो प्रकरण में अब सुप्रीम कोर्ट ही सुनवाई करेगा। संशोधित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण के बकाया 52 प्रकरणों को जबलपुर हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया गया है। इन प्रकरणों में ओबीसी वर्ग का शासन की ओर से पक्ष रखने के लिए राज्यपाल द्वारा नियुक्त विशेष अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं विनायक प्रसाद शाह ने बताया कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट जबलपुर में ओबीसी आरक्षण के विचाराधीन सभी प्रकरणों को मध्य प्रदेश सरकार (महाधिवक्ता) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराए गए थे, जो दो अलग-अलग बंचों में अलग-अलग खंडपीठ के समक्ष पेंडिंग थे। जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे के समक्ष एक दर्जन मामले नियत थे। जिनमें ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेसर ने नियमित सुनवाई के आवेदन दाखिल किए थे। इनमें सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी को फाइनल आदेश पारित कर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को वापस भेज दिए थे और सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति से उक्त समस्त प्रकरणों को विशेष बेंच गठित कर 3 महीने के अंदर निराकृत करने के आदेश पारित किए थे। एसोसिएशन रिव्यू याचिका पर लिया निर्णय ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा दीपक कुमार पटेल के नाम से एक रिव्यू याचिका MA/529/26 दाखिल की गई थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने खुले न्यायालय में 20 मार्च को विस्तृत सुनवाई करते हुए 19 फरवरी को पारित आदेश में संशोधन कर 52 प्रकरण जो मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ट्रांसफर कराए गए थे, उनको भी 20 मार्च के आदेश से मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को वापस भेज दिए हैं, तथा दो विशेष अनुमत याचिकाएं जो पूर्व में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को वापस की गई थीं उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने आदेश दिनांक 20/3/26 जो वेवसाइड पर 30/03/26 को अपलोड हुआ हैं । उक्त आदेश मे सुप्रीम कोर्ट ने दो एसएलपी जिनमे दीपक कुमार पटेल विरूध मध्य प्रदेश शासन एवं हरिशंकर बरोदिया विरुद्ध मध्य प्रदेश शासन को अपने समक्ष सुनवाई के लिए वापस रिकॉल कर लिए गए हैं, शेष आदेश दिनांक 19 फरवरी यथावत रहेगा। ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से कोर्ट में दलील देने वाले सीनियर अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, विनायक प्रसाद शाह, वरुण ठाकुर ने पक्ष रखा उन समस्त मामलों को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 2 अप्रैल 2026 को सुनवाई नियत हैं।  

हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में महिलाओं के लिए दो नए पद, रजिस्ट्रार को भेजी गई जानकारी

इंदौर  सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कार्यकारिणी में महिला आरक्षण को लेकर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी चार नए पद आरक्षित करने का निर्णय लिया है। इसमें कोषाध्यक्ष और पुस्तकालय सचिव के दो नए पद सृजित किए जाएंगे जबकि दो पद कार्यकारिणी सदस्य के लिए रहेंगे। इस संबंध मे हाई कोर्ट रजिस्ट्रार द्वारा मांगी गई जानकारी के मुताबिक हाई कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा यह जानकारी भेज दी गई। बार अध्यक्ष मनीष यादव ने बताया कि वर्तमान में कोषाध्यक्ष और पुस्तकालय सचिव के पद हाई कोर्ट बार में नहीं है, इसलिए इनका सृजन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि वर्तमान में हाई कोर्ट बार में कुल करीब 6 हजार सदस्यों में से 1165 महिला वकील सदस्य हैं। इधर, कल इंदौर अभिभाषक संघ में भी कोषाध्यक्ष का पद और कार्यकारिणी सदस्य के तीन पद महिला वकीलों के लिए आरक्षित करने पर सहमति हुई है। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने बार एसोसिएशन में महिलाओं को 30% आरक्षण के निर्देश दिए गए हैं। इसी के चलते स्टेट बार काउंसिल के आगामी 12 मई को होने जा रहे 25 सदस्यों के चुनाव में 7 पद महिला वकीलों के लिए आरक्षित किए गए हैं।  

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शादीशुदा पुरुष का लिव-इन में रहना नहीं है अपराध

 प्रयागराज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने कहा है कि एक शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई अपराध नहीं है. कोर्ट ने कहा कि सामाजिक नैतिकता नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के कोर्ट के कर्तव्य पर हावी नहीं हो सकती।  आपको बता दें कि याचिका दाखिल कर लिव इन में रह रहे शादीशुदा कपल ने लिए सुरक्षा की मांग की थी. इस याचिका में कहा गया था कि कपल को महिला के परिवार से धमकियां मिल रही हैं. महिला के परिवार के वकील ने दलील दी कि चूंकि वह व्यक्ति पहले से ही शादीशुदा है, इसलिए किसी दूसरी महिला के साथ रहना उसके लिए एक अपराध है. हालांकि, कोर्ट ने टिप्पणी की कि कानून को सामाजिक नैतिकता से अलग रखा जाना चाहिए।  हाईकोर्ट के मुताबिक, 'ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसके तहत कोई शादीशुदा व्यक्ति, किसी वयस्क के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है. ऐसे व्यक्ति को किसी भी तरह के अपराध के लिए अभियोजित किया जा सके. कोर्ट ने कहा कि नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखा जाना चाहिए. नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखा जाना चाहिए।  कोर्ट ने कहा कि यदि कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता है, तो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट की कार्रवाई को सामाजिक राय और नैतिकता निर्देशित नहीं करेगी।  हाईकोर्ट ने कहा कि महिला ने एसएसपी शाहजहांपुर को पहले ही एक एप्लीकेशन दी है, जिसमें कहा गया है कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से उस आदमी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है. कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्य उनके रिश्ते के खिलाफ हैं. उन्होंने उसे जान से मारने की धमकी दी है और दोनों को ऑनर किलिंग का डर है।  कोर्ट ने कहा कि एसएसपी ने इस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की है. साथ रहने वाले दो वयस्कों की सुरक्षा करना पुलिस का कर्तव्य है. इस संबंध में पुलिस अधीक्षक पर विशेष दायित्व है. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ और अन्य, (2018) 7 SCC 192 मामले में कहा था।   इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस याचिका के साथ दोनों याचिकाकर्ताओं का संयुक्त हलफनामा भी लगा है. कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 8 अप्रैल के लिए नोटिस जारी किया. कोर्ट ने उस जोड़े को अपहरण के एक मामले में भी सुरक्षा प्रदान की, जो महिला के परिवार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर पंजीकृत किया गया था. फिलहाल, हाईकोर्ट के अगले आदेशों तक याचिकाकर्ताओं अनामिका और नेत्रपाल की गिरफ्तारी पर रोक लगाई है. याचियों के खिलाफ शाह जहांपुर के जैतीपुर थाने में केस क्राइम नंबर 4/2026 में एफआईआर दर्ज है. उनपर बीएनएस, 2023 की धारा 87 के तहत एफआईआर दर्ज है।  कोर्ट ने ने महिला के परिवार को इस जोड़े को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाने से रोक दिया. उन्हें उनके घर में प्रवेश करने या उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क करने से भी प्रतिबंधित किया गया है. कोर्ट ने यह भी कहा कि एसएसपी शाहजहांपुर के कपल की सेफ्टी और सिक्योरिटी के लिए पर्सनली ज़िम्मेदार होंगे।  बता दें कि याचियों की तरफ से एडवोकेट शहंशाह अख्तर खान ने केस लड़ा. एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट घन श्याम कुमार स्टेट की तरफ से पेश हुए. वहीं, एडवोकेट अजय कुमार मिश्रा एक प्राइवेट रेस्पोंडेंट की तरफ से पेश हुए, जबकि जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई।