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नई डिफेंस तकनीक: राफेल से बड़ा ब्रह्मास्त्र, दुश्मन को छुपा और पानी में तबाही

नई दिल्ली भारत और जर्मनी के बीच करीब 8 अरब डॉलर (लगभग 70,000 से 72,000 करोड़ रुपये) के प्रोजेक्ट-75(I) पनडुब्बी निर्माण समझौते पर मार्च के अंत तक हस्ताक्षर होने की संभावना है. यह सबमरीन डील अब तक का भारत का सबसे बड़ा रक्षा सौदा बन सकता है और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा. बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और सूत्रों के मुताबिक इसे हाल ही में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की जनवरी में भारत यात्रा के दौरान निर्णायक गति मिली. प्रोजेक्ट-75 इंडिया (P-75I) का उद्देश्य इंडियन नेवी के पुराने हो चुके पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े को आधुनिक बनाना और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा एवं डेटरेंस कैपेबिलिटी (प्रतिरोध की क्षमता) को मजबूत करना है. ऐसे समय में जब चीन और पाकिस्तान हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा रहे हैं, भारत के लिए अल्‍ट्रा मॉडर्न सबमरीन की तैनाती रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है. P-75I प्रोजेक्‍ट के तहत छह उन्नत पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन का निर्माण किया जाएगा. शॉर्टलिस्‍ट किए गए टाइप-214 नेक्स्ट जेनरेशन सबमरीन फ्यूल सेल आधारित एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस होंगी, जिससे वे कई हफ्तों तक बिना सतह पर आए समुद्र के भीतर रह सकती हैं. इससे उनकी पहचान और ट्रैकिंग का जोखिम काफी कम हो जाता है और नौसेना की सीक्रेट ऑपरेशन क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है. चीन और पाकिस्‍तान ने खासतौर पर अरब सागर के साथ ही हिन्‍द महासागर क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को काफी बढ़ावा दिया है. इससे भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पेश होने लगी हैं. यही वजह है कि भारत सबमरीन फ्लीट को अपग्रेड करने के साथ ही उसे बढ़ा भी रहा है. क्‍या है सबमरीन डील? oइस परियोजना में जर्मनी की थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के साथ साझेदारी में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) देश में ही इन पनडुब्बियों का निर्माण करेगी. ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, रणनीतिक साझेदारी मॉडल के तहत 45 से 60 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण का लक्ष्य रखा गया है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मजबूती मिलेगी. प्रस्तावित समझौते में पनडुब्बी निर्माण से जुड़ी अहम टेक्‍नोलॉजिकल ट्रांसफर का भी प्रावधान होने की संभावना है, जो भारत की लॉन्‍ग टर्म रक्षा आत्मनिर्भरता के लिए अहम माना जा रहा है. भारतीय नौसेना के पास फिलहाल करीब एक दर्जन रूसी मूल की पनडुब्बियां और छह फ्रांसीसी निर्मित स्कॉर्पीन श्रेणी की आधुनिक पनडुब्बियां हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बदलते सामरिक हालात और क्षेत्रीय चुनौतियों के मद्देनजर भारत को अपनी पनडुब्बी क्षमता में और विस्तार की जरूरत है. इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अक्टूबर 2014 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने प्रोजेक्ट-75(I) के तहत 6 नई पनडुब्बियों की खरीद को मंजूरी दी थी, जबकि जुलाई 2021 में औपचारिक अनुरोध प्रस्ताव (RFP) जारी किया गया. राफेल फाइटर जेट से भी बड़ी डील यह प्रोजेक्‍ट केवल नेवी की युद्ध क्षमता को ही नहीं बढ़ाएगी, बल्कि देश के जहाज निर्माण और रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को भी बड़ा प्रोत्साहन देगी. इससे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए नए अवसर पैदा होंगे और पनडुब्बी प्रणालियों, स्पेयर पार्ट्स तथा उपकरणों के निर्माण से जुड़ा एक व्यापक औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित होगा. जर्मनी के साथ सबमरीन करार भारत के लिए अभी तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील साबित होगी. यह साल 2016 में की गई राफेल फाइटर जेट खरीद समझौते से भी बड़ा है. भारत ने फ्रांस से 36 राफेल फाइटर जेट ₹58000 में खरीदा था, जबकि जर्मनी के साथ सबमरीन डील ₹72000 करोड़ की है. नेवी के लिए 51 वॉरशिप सरकार हाल के वर्षों में भारतीय नौसेना के स्वदेशीकरण रोडमैप 2015–2030 को तेजी से लागू कर रही है. इसके तहत देश में 51 बड़े युद्धपोतों का निर्माण जारी है, जिनकी कुल लागत करीब 90,000 करोड़ रुपये है. वर्ष 2014 से अब तक भारतीय शिपयार्ड्स नौसेना को 40 से अधिक स्वदेशी युद्धपोत और पनडुब्बियां सौंप चुके हैं, और बीते एक वर्ष में औसतन हर 40 दिन में एक नया पोत नौसेना में शामिल हुआ है. विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत-जर्मनी के बीच होने वाला यह पनडुब्बी सौदा न केवल रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देगा, बल्कि भारत को क्षेत्रीय समुद्री शक्ति संतुलन में और अधिक सशक्त भूमिका निभाने में मदद करेगा.

₹78,217 करोड़ की मिसाइल डिफेंस डील से भारत को मिलेगा नया सैन्य ताकतवर, Su-30MKI और MiG-29K जेट्स की ताकत बढ़ेगी

नई दिल्ली भारत का डिफेंस सेक्‍टर अभी भी मुख्‍य रूप से विदेशी खरीद पर निर्भर है. पिछले कुछ सालों में इसमें काफी बदलाव आया है. ‘आत्‍मनिर्भर भारत’ के सूत्र के साथ देश आगे बढ़ रहा है. यही वजह है कि अब भारत भी एक महत्‍वपूर्ण हथियार विक्रेता देश बनता जा रहा है. आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं. भारत के पश्चिमी बॉर्डर पर पाकिस्‍तान तो पूर्वी सीमा पर चीन स्थित है. इन दोनों देशों का रुख भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रहा है. अतीत में हुए युद्ध इसकी गवाही देते हैं. ऐसे में भारत के लिए एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध जैसी स्थिति से निपटने की तैयारी करना अनिवार्य है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोस्‍त और दुश्‍मन की पहचान और भी स्‍पष्‍ट हो चुकी है. बदले सामरिक माहौल को देखते हुए भारत अपने डिफेंस सिस्‍टम को मजबूत और अपडेट करना शुरू कर दिया है. आर्मी, एयरफोर्स और नेवी को महाबली बनाने की प्रक्रिया लगातार जारी है. नेवी में अब हर 6 सप्‍ताह के बाद एक युद्धपोत को शामिल करने की प्‍लानिंग है तो वहीं आर्मी ड्रोन फ्लीट बनाने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है. एयरफोर्स के लिए भी हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं. फाइटर जेट से लेकर एयर टू एयर और एयर टू सर्फेस मिसाइल को बेड़े में शामिल किया जा रहा है. प्रिसीजन गाइडेड बम की खरीद भी चल रही है. इसके अलावा एयर डिफेंस सिस्‍टम प्रोजेक्‍ट के तहत देश को किसी भी तरह के एरियल थ्रेट से सुरक्षित करने पर लगातार काम चल रहा है. इन सबके बीच एक और बड़ी खबर सामने आई है. भारत मित्र देश इजरायल से कटिंग एज वेपन, मिसाइल और बम खरीदने के लिए बड़ी डील करने की तैयारी में है. इनमें से कुछ मिसाइल की रेंज 300 से 400 किलोमीटर तक है. मतलब घर बैठे बटन दबाते ही लाहौर में तबाही लाई जा सकती है. लाहौर भारतीय सीमा के करीब स्थित बड़ा शहर है. जानकारी के अनुसार, भारत और इज़राइल के बीच रक्षा सहयोग एक नए और अहम दौर में प्रवेश कर रहा है. ‘इंडियन डिफेंस न्‍यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वायुसेना (IAF) को और अधिक ताकतवर बनाने के लिए भारत इजरायल से लगभग 8.7 अरब डॉलर (₹78217 करोड़) की डिफेंस डील करने की तैयारी में है. इस पैकेज में अत्याधुनिक SPICE-1000 प्रिसिजन गाइडेड बम, रैम्पेज मिसाइल, एयर लोरा (Air LORA) और आइस ब्रेकर (Ice Breaker) जैसी आधुनिक मिसाइलें शामिल हैं. इस प्रस्ताव को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विज़िशन काउंसिल (DAC) से मंजूरी मिल चुकी है. यह सौदा ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत को अपनी सीमाओं पर कई तरह की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. एक ओर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की उन्नत एयर डिफेंस तैनाती है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की ओर से GPS जैमिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल देखा गया है, खासकर मई 2025 में हुए ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के दौरान. ऐसे में भारत की यह खरीद उसकी रणनीतिक जरूरतों को दर्शाती है. आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच इजरायल के कुल रक्षा निर्यात का 34 प्रतिशत भारत को गया, जिससे भारत इजरायल का सबसे बड़ा रक्षा खरीदार बन गया है. इस नए पैकेज में सिर्फ मिसाइलें ही नहीं, बल्कि एयर-टू-एयर मिसाइलें, लोइटरिंग म्यूनिशन, आधुनिक रडार, सिमुलेटर और नेटवर्क आधारित कमांड सिस्टम भी शामिल हैं. रैम्पेज मिसाइल: भरोसेमंद वेपन रैम्पेज मिसाइल, जिसे इज़राइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) ने विकसित किया है, पहले से ही भारतीय वायुसेना और नौसेना के पास मौजूद है. यह मिसाइल Su-30MKI, MiG-29, Jaguar और MiG-29K जैसे विमानों से दागी जा सकती है. करीब 570 किलो वजनी यह मिसाइल GPS/INS गाइडेंस से लैस है और इसमें एंटी-जैमिंग क्षमता भी है. रैम्पेज का इस्तेमाल दुश्मन के एयरबेस, बंकर, कंट्रोल टावर और लॉजिस्टिक ठिकानों पर दूर से हमला करने के लिए किया जा सकता है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर इसकी प्रभावशीलता देखी गई थी. तीन मिसाइल…तीनों एक से बढ़कर एक रैम्पेज मिसाइल एयर लोरा मिसाइल आइस ब्रेकर मिसाइल रैम्पेज मिसाइल पहले से ही भारतीय वायुसेना और नौसेना के पास मौजूद है. यह मिसाइल Su-30MKI, MiG-29, Jaguar और MiG-29K जैसे विमानों से दागी जा सकती है. करीब 570 किलो वजनी यह मिसाइल GPS/INS गाइडेंस से लैस है और इसमें एंटी-जैमिंग क्षमता भी है. एयर लोरा एक एयर-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइल है, जो जमीन से दागी जाने वाली लोरा मिसाइल का उन्नत रूप है. यह मिसाइल पहले से भारत में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और IAI के सहयोग से बनाई जा रही है. यह मिसाइल 400 से 430 किलोमीटर की दूरी तक सटीक हमला कर सकती है. लगभग 1600 किलो वजनी यह मिसाइल मैक-5 की रफ्तार से उड़ती है और दुश्मन के मिसाइल ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य अड्डों को नष्ट करने में सक्षम है. राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स द्वारा विकसित आइस ब्रेकर मिसाइल को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध को ध्यान में रखकर बनाया गया है. यह मिसाइल 400 किलो से कम वजनी है और करीब 300 किलोमीटर तक कम ऊंचाई पर उड़कर हमला कर सकती है. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम, ऑटोमैटिक टारगेट रिकग्निशन और ऐसे सेंसर लगे हैं, जो GPS न होने पर भी लक्ष्य को पहचान सकते हैं. इसकी स्टील्थ डिजाइन और कम रडार पहचान क्षमता इसे दुश्मन की मजबूत एयर डिफेंस से बचाकर लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करती है. एयर LORA: दूर से सटीक वार एयर लोरा एक एयर-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइल है, जो जमीन से दागी जाने वाली LORA मिसाइल का उन्नत रूप है. यह मिसाइल पहले से भारत में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और IAI के सहयोग से बनाई जा रही है. यह मिसाइल 400 से 430 किलोमीटर की दूरी तक सटीक हमला कर सकती है और इसकी सटीकता इतनी ज्यादा है कि इसका CEP (त्रुटि सीमा) 10 मीटर से भी कम है. लगभग 1600 किलो वजनी यह मिसाइल मैक-5 की रफ्तार (6000 KMPH से ज्‍यादा की स्‍पीड) से उड़ती है और दुश्मन के मिसाइल ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य अड्डों को नष्ट करने में सक्षम है. आइस ब्रेकर: इलेक्ट्रॉनिक वॉर में भी असरदार राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स द्वारा विकसित आइस ब्रेकर मिसाइल को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध को ध्यान में रखकर … Read more