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इंजीनियरिंग छात्रों के लिए खुशखबरी: MP में घट सकती है कॉलेज फीस, निजी संस्थानों ने दिया प्रस्ताव

भोपाल  प्रदेश के निजी कॉलेजों से इंजीनियरिंग की पढ़ाई और सस्ती हो जाएगी। कई इंजीनियरिंग कॉलेजों ने शुल्क विनियामक समिति (एफआरसी) को अपने न्यूनतम शुल्क में कटौती का प्रस्ताव भेजा है। उनकी मांग है कि उनके यहां शिक्षण शुल्क 35 हजार रुपये सालाना कर दिया जाए। इसकी मंजूरी मिलती है तो यह निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों के पूरे तंत्र को प्रभावित करेगा। छात्रों की कमी से जूझ रहे संस्थान दरअसल निजी संस्थान विद्यार्थियों की कमी से जूझ रहे हैं। पिछले एक दशक में 58 कॉलेज बंद हो चुके हैं। इस बीच केवल एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज खुला है। पिछले वर्षों में इन कॉलेजों की औसतन 45 से 55 प्रतिशत सीटों पर ही प्रवेश हो पाए। वहीं सरकारी कॉलेजों में 80 से 90 प्रतिशत सीटें भर जाती हैं। इस वजह से घट रही संख्या विशेषज्ञों का कहना है कि उद्योगों की जरूरतों और इंजीनियरिंग कोर्स के बीच बढ़ती दूरी, रोजगार को लेकर विद्यार्थियों की बदलती प्राथमिकताएं और नई तकनीकों के अनुरूप पाठ्यक्रम का समय पर अपडेट नहीं होना है इसका प्रमुख कारण है। प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में अधिकतर प्रवेश दूसरे राज्यों के विद्यार्थी लेते हैं। सीटें रिक्त रहने से बढ़ रही लागत कटौती का प्रस्ताव देने वाले कॉलेजों का तर्क है कि सीटें खाली रहने के कारण प्रति विद्यार्थी लागत बढ़ रही है। इससे संस्थान आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। यदि शुल्क कम नहीं किया गया तो संचालन और मुश्किल हो जाएगा। कहा जा रहा है कि शुल्क कटौती से दूसरे प्रदेश के विद्यार्थियों के अलावा प्रदेश के कम आय वाले परिवारों के बच्चे भी आकर्षित होंगे। दूसरे राज्यों की तुलना में पहले से कम है फीस यहां पर यह भी बता दें कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात जैसे पड़ोसी राज्यों में इंजीनियरिंग का वार्षिक शुल्क औसतन एक से डेढ़ लाख रुपये तक है। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) ने भी न्यूनमत शुल्क करीब 80 हजार रुपये तय किया है। इसके उलट मध्यप्रदेश में यह शुल्क 40 से 60 हजार रुपये तक है। पांच वर्षों के दौरान यह स्थिति वर्ष — कॉलेज — सीटें — प्रवेशित 2021-22 — 126 — 47,520 — 28,534 2022-23 — 124 — 58,535 — 31,659 2023-24 — 123 — 60,754 — 33,334 2024-25 — 142 — 73,637 — 42,924 2025-26 — 128 — 64,473 — 38,171     उप्र, महाराष्ट्र, तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों की तुलना में यहां इंजीनियरिंग का शुल्क कम है। इस कारण यहां पर दूसरे राज्यों के विद्यार्थी भी प्रवेश लेते हैं। कुछ कॉलेज विवि में कन्वर्ट हो रहे हैं, इसलिए वे काउंसलिंग में शामिल नहीं हो रहे हैं।     – डा. अजीत सिंह पटेल, उपाध्यक्ष, एसोसिएशन ऑफ टेक्निकल प्रोफेशनल इंस्टि्टयूशंस मप्र     पांच-छह इंजीनियरिंग कॉलेजों से शुल्क तय करने के प्रस्ताव आए हैं। समिति कालेजों का लेखा-जोखा देखकर न्यूनतम शुल्क तय करती है। इस पर विचार किया जा रहा है।     – डॉ. अनिल शिवानी, सचिव, एफआरसी  

इंदौर के चौराहे पर 23 मीटर की ऊंचाई पर लटका 400 टन लोहा, इंजीनियरिंग की अनोखी मिसाल

इंदौर   इंदौर के लवकुश चौराहे पर बन रहे डबल डेकर फ्लाईओवर के निर्माण में एक अहम उपलब्धि हासिल की गई है। यहां शहर की सबसे लंबी 65 मीटर की स्टील गर्डर को सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया है। करीब 400 टन वजनी इस विशाल गर्डर को जमीन से 23 मीटर ऊंचाई पर लगाने की जटिल प्रक्रिया करीब 12 घंटे तक चली। इस गर्डर के जुड़ने से शहर में यातायात को आसान बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।  तीन विंच मशीनों की मदद से पूरा हुआ चुनौतीपूर्ण काम लवकुश चौराहे पर बो स्ट्रिंग स्पान के निर्माण के दौरान इस भारी गर्डर को हवा में ही जोड़ा गया। इसे सही जगह तक लाने के लिए तीन विंच मशीनों का इस्तेमाल किया गया। इनमें से दो मशीनों से गर्डर को आगे की ओर खींचा गया, जबकि एक मशीन को पीछे से संतुलन बनाए रखने और रोकने के लिए लगाया गया था। अब जैक पुश तकनीक के जरिए इसे दूसरी तरफ के बो स्ट्रिंग स्पान पर ले जाने की तैयारी की जा रही है। पहली गर्डर का काम पूरा होने के बाद अब दूसरी स्टील गर्डर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इंदौर विकास प्राधिकरण बना रहा भव्य फ्लाईओवर इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा लवकुश चौराहे पर कुल 1452 मीटर लंबा डबल डेकर फ्लाईओवर बनाया जा रहा है। इस परियोजना में 19 सेगमेंटल स्पान, 4 कंपोजिट गर्डर स्पान और एक खास बो स्ट्रिंग स्पान शामिल है। जिस बो स्ट्रिंग स्पान पर यह गर्डर रखी गई है, उसकी लंबाई 65 मीटर है और यहां ऐसी दो स्टील गर्डर लगाई जानी हैं। पहली गर्डर का निर्माण कार्य पूरा कर उसे तय स्थान पर स्थापित कर दिया गया है। रात भर चली गर्डर लगाने की प्रक्रिया गर्डर को स्थापित करने की प्रक्रिया गुरुवार रात 11 बजे शुरू हुई, जो शुक्रवार सुबह 11 बजे पूरी हुई। गर्डर को खींचकर सही जगह तक लाने में ही करीब 5 घंटे लगे। पुलिंग शुरू करने से पहले गर्डर को रीले पर चढ़ाया गया और उसके संतुलन की पूरी जांच की गई। सुरक्षा के लिहाज से इस दौरान नीचे से गुजरने वाले यातायात को पूरी तरह बंद कर दिया गया, ताकि कोई हादसा न हो। शहर का सबसे ऊंचा फ्लाईओवर पॉइंट बना आकर्षण यह 400 टन वजनी गर्डर जिस बो स्ट्रिंग पर रखी गई है, उसकी ऊंचाई 23 मीटर है, जो इंदौर के सभी फ्लाईओवर में सबसे ज्यादा है। इस फ्लाईओवर की खास बात यह है कि इसके नीचे से मेट्रो और एक अन्य फ्लाईओवर गुजर रहा है। इसी वजह से गर्डर को ऊंचाई पर ही जोड़ना पड़ा। इस जटिल काम के लिए 900 टन की कुल क्षमता वाली दो क्रेन का इस्तेमाल किया गया, जिसमें एक 600 टन और दूसरी 300 टन की क्रेन शामिल थी। इन्हीं क्रेन की मदद से भारी एंगल और निर्माण सामग्री को 23 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचाया गया।