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पानीपत के मरीज के लिए आर्टिफिशियल अंग: HC ने मेडिकल कॉर्पोरेशन को टेंडर जारी करने कहा

चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड पंचकूला को निर्देश दिए है कि वह रमन के लिए आर्टिफिशियल अंग खरीदने के लिए टेंडर आदि जारी करें। जानकारी के मुताबिक पानीपत के सनोली खुर्द गांव का रहने वाला रमन स्वामी 3 नवंबर 2011 को अपने घर की छत पर लटक रहे हाई-टेंशन बिजली के तार के संपर्क में आ गया था। जिसमें उसने अपने दोनों हाथ और बायां पैर गवां दिया। तब वह सिर्फ पांच साल का था। कोर्ट ने अगस्त 2025 में अंतरिम आदेश में हरियाणा के डायरेक्टर जनरल हेल्थ सर्विसेज को निर्देश दिया था कि लड़के के लिए ट्रांसप्लांट सर्जरी सहित सभी विकल्पों का पता लगाने के लिए ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों की एक टीम बनाई जाए। जस्टिस सुवीर सहगल ने आदेश में कहा कि अंतरिम आदेश के बाद याचिकाकर्ता की 6 अगस्त 2025 को जांच की गई और DGHS की ओर से 24 नवंबर, 2025 की तारीख का एक हलफनामा के साथ रिपोर्ट जमा की गई, जिसमें कहा गया है कि 17 साल के रमन की जांच मेडिकल बोर्ड के सदस्यों ने PGIMS रोहतक में क्लिनिकली और रेडियोलॉजिकली की। हाईकोर्ट ने कहा कि उपरोक्त पृष्ठभूमि और कोर्ट द्वारा पारित विभिन्न आदेशों को देखते हुए हरियाणा मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड पंचकूला को निर्देश दिया जाता है कि वह याचिकाकर्ता के लिए आर्टिफिशियल अंग खरीदने के लिए टेंडर आदि जारी करके कदम उठाए, जैसा कि 6 अगस्त, 2025 की रिपोर्ट में सलाह दी गई है, छह सप्ताह का समय दिया गया है।

प्रेमी जोड़ों की सुरक्षा पर हरियाणा हाईकोर्ट का सख्त निर्देश, आवेदन मिलने पर तुरंत कार्रवाई करें

चंडीगढ़   पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि विवाह करने वाले जोड़ों या किसी भी नागरिक द्वारा जीवन पर खतरे की आशंका जताए जाने पर सुरक्षा प्रदान करने में देरी करना उनके जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है यह असांविधानिक है। सुरक्षा तुरंत दी जानी चाहिए और बाद में जांच की जा सकती है। यदि सुरक्षा से इनकार किया जाता है, तो वह आदेश विस्तृत और कारणयुक्त होना चाहिए। कोर्ट ने जोड़े को सुरक्षा मुहैया करवाने का हरियाणा सरकार को आदेश दिया। हाई कोर्ट ने अधिकारियों को कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि यदि सुरक्षा देने में देरी के कारण किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है, तो संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। एक नवविवाहित दंपति ने लड़की के परिवार से जान का खतरा बताते हुए पुलिस से सुरक्षा मांगी थी। 19 अक्तूबर को आवेदन दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। राज्य के वकील ने अदालत में कहा कि आवेदन अभी हाल ही में मिला है और उचित निर्णय लिया जाएगा। अदालत ने इस ब्यान को गैर-जिम्मेदाराना व अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि सुरक्षा देना या न देना एसएचओ की मर्जी पर निर्भर नही हो सकता, यह कानूनन सही नहीं है। यह फैसला पंचकूला जिले के एक ऐसे जोड़े की याचिका पर आया, जो अपने परिवार वालों से अपनी जान और माल की सुरक्षा की गुहार लगा रहे थे। दोनों बालिग हैं और उन्होंने अपनी उम्र के सबूत के तौर पर आधार कार्ड पेश किए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि शादी के बिना साथ रहने के उनके फैसले के कारण उन्हें अपने रिश्तेदारों से धमकियां और उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है। सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार के वकील ने याचिका पर नोटिस स्वीकार कर लिया और अधिकारियों द्वारा इस मामले पर विचार करने में कोई आपत्ति नहीं जताई। जस्टिस अमन चौधरी ने इस याचिका का निपटारा करते हुए कई पुराने फैसलों का हवाला दिया। इनमें से एक फैसला 'प्रदीप सिंह बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा' का था, जिसमें यह माना गया था कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों को भी बाकी नागरिकों की तरह कानून का बराबर संरक्षण मिलना चाहिए। 'प्रदीप सिंह' के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार में व्यक्ति की पूरी क्षमता का विकास करने और अपनी पसंद का साथी चुनने का अधिकार भी शामिल है। कोर्ट ने आगे कहा, "व्यक्ति इस रिश्ते को शादी के जरिए औपचारिक बना सकता है या लिव-इन रिलेशनशिप जैसा अनौपचारिक रास्ता अपना सकता है। कानून की नजर में, ऐसा रिश्ता न तो मना है और न ही यह कोई अपराध है।" इस रुख को दोहराते हुए, जस्टिस चौधरी ने कहा कि जीवन और स्वतंत्रता का महत्व सबसे ज्यादा है और इसे सिर्फ इसलिए कम नहीं किया जा सकता क्योंकि रिश्ता औपचारिक शादी नहीं है। कोर्ट ने पुलिस को याचिकाकर्ताओं की 12 अक्टूबर, 2025 की अर्जी की जांच करने और अगर उन्हें किसी भी तरह के खतरे का अंदेशा है तो जरूरी सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर याचिकाकर्ता किसी संज्ञेय अपराध में शामिल पाए जाते हैं तो अधिकारी उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे। यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो समाज की पारंपरिक सोच से हटकर अपने रिश्ते को चुनते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून सभी के लिए बराबर है और किसी को भी सिर्फ इसलिए असुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए क्योंकि उनका रिश्ता समाज की परिभाषा में फिट नहीं बैठता। यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंद के अधिकार को मजबूत करता है।

हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा – प्रेक्टिकल सेशन है तकनीकी शिक्षा की रीढ़, AICTE से संशोधन की मांग

चंडीगढ़ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इंजीनियरिंग में डिग्री या डिप्लोमा प्रदान करने वाली तकनीकी शिक्षा में सिद्धांत और व्यावहारिक दोनों शामिल होने चाहिए। पीठ ने कहा कि व्यावहारिक सत्र तकनीकी शिक्षा की रीढ़ हैं।  सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का हवाला देते हुए, जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा, प्रैक्टिकल्स ऐसी शिक्षा की रीढ़ हैं, जो एक व्यावहारिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां सैद्धांतिक सिद्धांतों को प्रदर्शकों या व्याख्याताओं की देखरेख में लागू किया जाता है। सैद्धांतिक कक्षाओं में दिए गए ज्ञान को व्यावहारिक सत्रों के माध्यम से सुदृढ़ किया जाना चाहिए। इस प्रकार, व्यावहारिक कार्य तकनीकी शिक्षा प्रणाली का एक अभिन्न अंग हैं। संशोधन के लिए AICTI की स्वीकृति जरूरी इस मामले में अदालत की सहायता सीनियर एडवोकेट डीएस पटवालिया और राजीव आत्मा राम के साथ-साथ वकील गौरवजीत सिंह पटवालिया और बृजेश खोसला ने की। जस्टिस बराड़ ने स्पष्ट किया कि तकनीकी शिक्षा प्रणाली में प्रैक्टिकल अनिवार्य होने की स्थापित अवधारणा को अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTI) की स्पष्ट स्वीकृति के बिना संशोधित या रिप्लेस नहीं किया जा सकता। डायरेक्शन का अभाव यदि इस स्थापित अवधारणा, जो तकनीकी शिक्षा प्रदान करने के लिए एक गुणात्मक मानदंड के रूप में कार्य करती है, को किसी भी स्थिति में डिस्टेंस एजूकेशन द्वारा संशोधित या रिप्लेस किया जाना है, तो एआईसीटीई को ऐसे संशोधन को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना होगा। तकनीकी शिक्षा के रेगुलर पाठ्यक्रम को बदलने या संशोधित करने के लिए आवश्यक मानदंडों का निर्धारण पूरी तरह से एआईसीटीई के अधिकार क्षेत्र में है। जस्टिस बराड़ ने इस संबंध में कोई भी निर्णय स्पष्ट और सुस्पष्ट होना चाहिए और केवल दिशा निर्देशों के अभाव से इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। पीठ ने कहा- छात्रों की सरकारी नौकरी प्रभावित होगी पीठ ने आगे कहा कि एआईसीटीई ने अपनी स्पष्ट स्थिति व्यक्त की है कि डिस्टेंस एजूकेशन के माध्यम से प्राप्त इंजीनियरिंग डिप्लोमा न तो स्वीकृत हैं और न ही मान्यता प्राप्त हैं। इन टिप्पणियों के छात्रों और संस्थानों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकते हैं। निर्णय स्पष्ट करता है कि एआईसीटीई की स्वीकृति के बिना डिस्टेंस एजूकेशन के जरिए से इंजीनियरिंग में प्रदान किए गए डिप्लोमा मान्य नहीं माने जाएंगे, जिससे छात्रों की सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा के लिए पात्रता प्रभावित होगी। कोर्ट ने एआईसीटीई सौंपी जिम्मेदारी यह आदेश अनधिकृत दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रमों, तकनीकी शिक्षा में तेज़ी से हो रही वृद्धि और नियामक निगरानी की कमी को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच आया है। कोर्ट के निर्देश में एआईसीटीई को यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है कि केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने वाले वास्तविक संस्थानों को ही काम करने दिया जाए, जबकि छात्रों और आम जनता को गैर-अनुमोदित कार्यक्रमों से सावधान रहना होगा।