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चाय के बाद तुरंत पानी पीना सही या गलत? जानें सेहत पर असर

 अक्सर कई लोग खाने की तरह ही चाय पीने के तुरंत बाद पानी पी लेते हैं लेकिन विज्ञान और आयुर्वेद इस आदत को सेहत के लिहाज से बहुत अच्छा नहीं मानता है. ऐसे में चाय पीने से पहले या बाद में पानी पीना चाहिए या नहीं, या कितनी देर तक पीना चाहिए, यह जानना आपकी सेहत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि एक गलत आदत आपके पाचन तंत्र को बिगाड़ सकती है. चाय से पहले पानी पीना चाहिए या नहीं चाय पीने से पहले पानी पीना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है और इससे आपको बहुत बेनेफिट्स मिलते हैं. एसिडिटी से बचाव: चाय की तासीर एसिडिक (अम्लीय) होती है. खाली पेट चाय पीने से शरीर में एसिड का स्तर बढ़ जाता है. अगर आप चाय से 10-15 मिनट पहले एक गिलास पानी पीते हैं तो ये पेट में एक सुरक्षा परत बना देता है जिससे एसिडिटी और सीने में जलन की समस्या कम होती है. दांतों की सुरक्षा: चाय में टैनिन नामक तत्व होता है जो दांतों पर पीलेपन की परत जमा सकता है. पहले पानी पीने से दांतों पर एक हाइड्रेटेड लेयर बन जाती है जो दाग-धब्बों को रोकने में मदद करती है. हाइड्रेशन: चाय एक डाइयूरेटिक है जो शरीर से पानी को बाहर निकालती है. पहले पानी पी लेने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती. चाय के बाद पानी पीना सही है? चाय पीने के तुरंत बाद पानी पीना सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार इसके कई नुकसान होते हैं. दांतों की सेंसिटिविटी: चाय गर्म होती है और पानी आमतौर पर सामान्य या ठंडा. अचानक तापमान बदलने से दांतों की इनेमल  पर बुरा असर पड़ता है जिससे दांतों में झनझनाहट शुरू हो सकती है. पाचन में गड़बड़ी: आयुर्वेद के अनुसार, बहुत गर्म के बाद तुरंत बहुत ठंडा लेने से शरीर का तापमान असंतुलित हो जाता है. गर्म चाय के बाद तुरंत पानी पीने से पेट का तापमान अचानक गिर जाता है. इससे पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है और भारीपन या गैस की समस्या हो सकती है.

गर्मी में कितना पानी पीना चाहिए? उम्र के हिसाब से जानें सही मात्रा

गर्मी का मौसम आते ही शरीर में पानी की जरूरत कई गुना बढ़ जाती है। तेज धूप और बढ़ते तापमान के कारण शरीर से पसीने के रूप में पानी तेजी से निकलता है, जिससे डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में अगर समय पर और सही मात्रा में पानी नहीं पिया जाए, तो इसका असर सीधे सेहत पर पड़ता है। दरअसल, कई लोग अपनी उम्र और शरीर की जरूरत के अनुसार पानी नहीं पीते, जिससे थकान, चक्कर, सिरदर्द और कमजोरी जैसी समस्याएं होने लगती हैं। खासतौर पर बच्चों, बुजुर्गों और कामकाजी लोगों को इस मौसम में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है। इसलिए जरूरी है कि आप अपनी उम्र, वजन और दिनभर की गतिविधियों के अनुसार पानी का सेवन करें। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि किस उम्र के लोगों को कितना पानी पीना चाहिए और क्यों यह आपकी सेहत के लिए बेहद जरूरी है।  बच्चे (5–12 साल) इस उम्र में बच्चों का शरीर तेजी से एक्टिव रहता है और वे ज्यादा खेलकूद करते हैं, जिससे उनके शरीर से पसीने के रूप में पानी जल्दी निकलता है। इसलिए बच्चों को रोजाना 1 से 1.5 लीटर पानी देना जरूरी होता है। अगर बच्चा बाहर खेलता है या गर्मी ज्यादा है, तो पानी की मात्रा और बढ़ानी चाहिए। ध्यान रखें कि बच्चों को जूस या कोल्ड ड्रिंक के बजाय सादा पानी या प्राकृतिक पेय जैसे नारियल पानी देना ज्यादा फायदेमंद होता है। किशोर (13–18 साल) किशोरावस्था में शरीर का विकास तेजी से होता है, इसलिए पानी की जरूरत भी बढ़ जाती है। इस उम्र में 1.5 से 2.5 लीटर पानी पीना जरूरी है। स्कूल, स्पोर्ट्स और फिजिकल एक्टिविटी के कारण शरीर में पानी की कमी जल्दी हो सकती है। अगर पानी की कमी हो जाए तो थकान, ध्यान में कमी और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। वयस्क (18–50 साल) वयस्कों के लिए रोजाना 2.5 से 3.5 लीटर पानी पीना जरूरी माना जाता है। जो लोग धूप में काम करते हैं या ज्यादा फिजिकल एक्टिविटी करते हैं, उन्हें इससे भी ज्यादा पानी की जरूरत हो सकती है। पर्याप्त पानी पीने से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है, पाचन तंत्र सही काम करता है और शरीर से टॉक्सिन बाहर निकलते हैं। बुजुर्ग (50+ साल) बढ़ती उम्र में प्यास लगने की क्षमता कम हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शरीर को पानी की जरूरत कम हो जाती है। बुजुर्गों को रोजाना कम से कम 2 से 2.5 लीटर पानी पीना चाहिए। पानी की कमी से उन्हें चक्कर, कमजोरी, लो ब्लड प्रेशर और किडनी से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए उन्हें समय-समय पर पानी पीने की आदत डालनी चाहिए, भले ही प्यास न लगे।

कब्ज से राहत के आयुर्वेदिक उपाय: घी, किशमिश और अंजीर से मिलेगा फायदा

आयुर्वेद में हर एक चीज का इलाज है। कब्ज की समस्या का इलाज भी आपको आयुर्वेद में मिल जाएगा। लगातार कब्ज रहने से मल त्याग के समय बहुत ज्यादा जोर लगाना पड़ता है। जिसकी वजह से मल त्याग करने के आसपास की नसों में सूजन आ जाती है, जिससे बवासीर हो जाता है। जिसकी वजह से दर्द और खून आने की समस्या हो सकती है। इसके अलावा जब किसी व्यक्ति का पेट साफ नहीं होता है तो शरीर में टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं, जिसकी वजह से चेहरे पर मुहांसे, चिड़चिड़ापन, तनाव, काम में मन न लगना, लगातार गैस बनना, पेट फूलना और भूख न लगना जैसी समस्याएं शामिल हैं। इससे निपटने के लिए आप आयर्वेद में बताई खाने की चीजों को खाकर छुटकारा पा सकते हैं। 1) घी और गर्म पानी रात में सोने से पहले गुनगुने पानी में एक चम्मच घी डालकर पीएं। इस नुस्खे की मदद से आंतों को चिकनाई मिलती है, जिसकी वजह से मल त्याग करने में आसानी होती है। ब्यूटिरिक एसिड से भरपूर होने के कारण, यह आंतों के बैक्टीरिया को पोषण देता है और पाचन क्रिया को आसान बनाता है। 2) भीगे हुए किशमिश रातभर भीगी किशमिश को सुबह खाली पेट खाने से पाचन, आयरन की कमी, हड्डियों की मजबूती और एनर्जी बढ़ाने का काम करती हैं। सुबह के समय ये किशमिश खाने से ये प्राकृतिक लैक्सेटिव के रूप में काम करती है। फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होने के कारण, ये पाचन में सुधार करती हैं और पेट फूलने से राहत दिलाती हैं। 3) बेल पल्प गंभीर कब्ज से निपटने के लिए ये बेस्ट आयुर्वेदिक नुस्खा है। बेल के गूदे को गुनगुने पानी और गुड़ के साथ मिक्स करें। ये आंतों को साफ करने का काम करता है। 4) अलसी और चिया सीड्स फाइबर और ओमेगा-3 से भरपूर अलसी और चिया सीड्स पानी सोख लेते हैं और मल को अधिक मात्रा में बनाते हैं। इन्हें गर्म पानी में भिगोकर या स्मूदी में मिलाकर खाया जा सकता है। 5) उबला सेब या अंजीर उबला हुआ सेब एक पौष्टिक और आसानी से पचने वाली चीज है। आयुर्वेद के मुताबिक गुनगुना उबला सेब सुबह खाने से पाचन में मदद मिलती है। ये आंत के स्वास्थ्य को बढ़ाने और पेट की समस्याओं को कम करने में मदद करता है। इसके अलावा अंजीर फाइबर से भरपूर होते हैं। इनमें मौजूद नेचुरल एंजाइम्स नियमित मल त्यागने में मदद करते हैं। आप भीगी हुई अंजी रोजाना सुबह खा सकते हैं।

हाथों में बार-बार झुनझुनी और सुन्नपन को न करें नजरअंदाज, यह शरीर में छिपी इन बीमारियों का हो सकता है संकेत

क्या आपके हाथों में बार-बार झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होता है? कई लोग इसे मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह शरीर का एक संकेत भी हो सकता है, जिसे समझना जरूरी है.  अक्सर यह समस्या तब महसूस होती है जब हम गलत पोजीशन में सो जाते हैं या लंबे समय तक एक ही स्थिति में हाथ रखते हैं. ऐसे में नसों पर दबाव पड़ता है या खून का प्रवाह कुछ समय के लिए कम हो जाता है, जिससे झुनझुनी होने लगती है. कब होती है दिक्कत? लेकिन अगर यह परेशानी बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसके पीछे कोई खास कारण भी हो सकता है. theheartysoul की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे आम वजहों में से एक है कार्पल टनल सिंड्रोम, जिसमें कलाई की नस दब जाती है और अंगूठे, उंगलियों में झुनझुनी या दर्द होने लगता है. कभी-कभी समस्या कलाई में नहीं, बल्कि कोहनी या गर्दन से भी जुड़ी हो सकती है. नसों में कहीं भी दबाव आने से हाथ तक इसका असर पहुंच सकता है, जिससे झुनझुनी और कमजोरी महसूस होती है. ब्लड सर्कुलेशन और डायबिटीड भी कारण खराब ब्लड सर्कुलेशन भी इसका एक कारण हो सकता है.  ठंड में या अचानक तापमान बदलने पर उंगलियां सुन्न पड़ सकती हैं और रंग भी बदल सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसके अलावा, डायबिटीज जैसी बीमारियां भी नसों को प्रभावित कर सकती हैं. जब नसें कमजोर होने लगती हैं, तो हाथ-पैरों में झुनझुनी, जलन या सुन्नपन महसूस होने लगता है. विटामिन B12 की कमी विटामिन B12 की कमी भी एक अहम कारण है, जो धीरे-धीरे नसों को नुकसान पहुंचा सकती है. कई बार लोग थकान या कमजोरी को नजरअंदाज करते रहते हैं, लेकिन यह संकेत हो सकता है कि शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी है. कुछ मामलों में थायरॉयड की समस्या भी हाथों में झुनझुनी का कारण बन सकती है. शरीर का मेटाबॉलिज्म बिगड़ने से नसों पर असर पड़ता है और यह समस्या बढ़ सकती है. ये भी होता है कारण कंधे और गर्दन के बीच नसों या ब्लड वेसल्स पर दबाव पड़ने से भी हाथों में झुनझुनी हो सकती है. खासतौर पर जब हाथ लंबे समय तक ऊपर रखा जाए या भारी वजन उठाया जाए.  अगर झुनझुनी के साथ कमजोरी, चीजें गिरना, या दर्द बढ़ने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह संकेत हो सकता है कि नसों पर लगातार दबाव पड़ रहा है या कोई गंभीर समस्या विकसित हो रही है. अचानक एक तरफ हाथ सुन्न हो जाना, बोलने में दिक्कत या चक्कर आना जैसी स्थिति स्ट्रोक का संकेत भी हो सकती है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.