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भारतीय थाली में क्यों नहीं पूरा होता 60 ग्राम प्रोटीन का डेली टारगेट, जानिए कारण

हम भारतीय अपने खाने-पीने के शौकीन मिजाज और थाली के रंगों के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं. दाल, चावल, रोटी, सब्जी, अचार और रायता हमारी पारंपरिक थाली देखने में जितनी भरपूर लगती है, उतनी ही स्वादिष्ट भी होती है. लेकिन जब बात सेहत और खासकर प्रोटीन की आती है, तो हमारी यही ट्रेडिशनल थाली रोज की जरूरतों को पूरा करने में पीछे छूट जाती है. ICMR के अनुसार, एक एडल्ट को रोजाना लगभग 60 ग्राम प्रोटीन (Daily Protein Target) की जरूरत होती है. आइए जानते हैं कि आखिर हमारी रोज की थाली इस टारगेट को हासिल करने में क्यों चूक जाती है.  कार्बोहाइड्रेट की बहुत ज्यादा मात्रा हमारी थाली का सबसे बड़ा हिस्सा रोटी, चावल, पोहा या आलू जैसी चीजों से घिरा होता है. ये सभी चीजें कार्बोहाइड्रेट्स का मुख्य स्रोत हैं, जो हमें तुरंत एनर्जी तो देती हैं, लेकिन इनमें प्रोटीन की मात्रा बहुत कम होती है. अमूमन भारतीय घरों में थाली का 70 से 80% हिस्सा सिर्फ कार्ब्स से भरा होता है, जिससे प्रोटीन के लिए जगह ही नहीं बचती.   Daily Protein Target: दाल-रोटी और चावल को प्रोटीन का इकलौता जरिया मानना  हमारे यहां माना जाता है कि रोज दाल-चावल खा लिया, तो प्रोटीन की कमी नहीं होगी. लेकिन ऐसा नहीं है. दालों में लगभग 20% प्रोटीन होता है, और इसके साथ भारी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट भी होता है. अगर कोई सिर्फ दाल से अपने दिनभर का 60 ग्राम प्रोटीन का टारगेट पूरा करना चाहे, तो उसे दिन में 7 से 8 कटोरी दाल पीनी पड़ेगी, जो हजम करना नामुमकिन है. इसके अलावा, हमारे प्रोटीन का 60% हिस्सा गेहूं और चावल से आता है, जिसे हमारा शरीर पूरी तरह और आसानी से सोख नहीं पाता. वेजिटेरियन खाने में ‘कम्पलीट प्रोटीन’ की कमी भारत की एक बहुत बड़ी आबादी शुद्ध शाकाहारी है. चिकन, मटन, मछली और अंडों में ‘कम्पलीट प्रोटीन’ होता है, जो शरीर आसानी से सोख लेता है. इसके विपरीत, शाकाहारी स्रोतों जैसे अनाज और बीन्स को शरीर पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाता. जब तक आप अनाज और दालों को सही रैशीओ में मिलाकर (जैसे खिचड़ी या दाल-चावल) न खाएं, तब तक शरीर को सही प्रोटीन (Daily Protein Target) नहीं मिलता.  पकाने का ट्रेडिशनल तरीका भारतीय खाना बनाने का तरीका ऐसा है जिसमें मसालों को खूब भूनना और सब्जियों व दालों को देर तक उबालना शामिल है. बहुत ज्यादा तापमान पर बार-बार खाना पकाने और गर्म करने से भोजन में मौजूद प्रोटीन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों (Nutrients) की क्वालिटी कम हो जाती है.  स्नैक्स में अनहेल्दी चीजें चुनना हम सुबह और रात के खाने पर तो ध्यान दे देते हैं, लेकिन शाम की नाश्ते में हमारा झुकाव समोसा, कचौरी, बिस्कुट, नमकीन या चाय पर जाकर टिक जाता है. इन स्नैक्स में सिर्फ मैदा, तेल और चीनी होती है. अगर इसकी जगह मुट्ठी भर मूंगफली, मखाना, भुना चना या उबला अंडा शामिल किया जाए, तो प्रोटीन का टारगेट आसानी से पूरा हो सकता है.  अपनी थाली को प्रोटीन से भरपूर कैसे बनाएं? रोजाना 60 ग्राम प्रोटीन (Daily Protein Target) पूरा करना इतना भी मुश्किल नहीं है. बस अपनी थाली में छोटे-छोटे बदलाव करें:     पनीर और टोफू: अपने दोपहर या रात के खाने में 50-100 ग्राम पनीर या टोफू शामिल करें.      सोयाबीन: सोया चंक्स प्रोटीन का पावरहाउस हैं. इनकी सब्जी या पुलाव बनाकर खाएं.      सत्तू और छाछ: गर्मियों में सत्तू का शरबत और खाने के साथ गाढ़ी छाछ या दही का इस्तेमाल बढ़ाएं.      अंडे और लीन मीट: अगर आप नॉन-वेजिटेरियन हैं, तो उबले अंडे और ग्रिल्ड चिकन को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं.   

उबले अंडे दोबारा गर्म करना कितना सुरक्षित? जानिए सही तरीका और सावधानियां

अक्सर लोग सुबह हेल्दी नाश्ता करने के कारण या फिर सुबह की जल्दबाजी में अंडे खाना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें पकाना काफी आसान है. लेकिन कई लोग बार-बार पकाने या उबालकर रखने के चक्कर में एक साथ अंडे उबाल लेते हैं और उन्हें फ्रिज में रख देते हैं. बाद में जब उन्हें खाना होता है तो वे फ्रिज से निकालकर अंडों को दोबारा गर्म या उबालने लगते हैं. वैसे तो बचे हुए खाने को दोबारा गर्म करना एक नॉर्मल बात है लेकिन अंडों के मामले में थोड़ी सावधानी बरतना बहुत जरूरी है. ऐसा करना कितना सही है? इस बारे में सभी को जानना काफी जरूरी है क्योंकि गलत तरीका आपकी सेहत के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. क्या अंडे दोबारा गर्म करना सेफ है? Healthline के अनुसार, पहले से उबले या पके हुए अंडों को दोबारा गर्म करना पूरी तरह से सुरक्षित है बस उन्हें सही तरीके से स्टोर किया गया हो. उबले हुए अंडों को पकाने के बाद 2 घंटे के अंदर फ्रिज में रख देना चाहिए. दोबारा गर्म करते समय अंडे का तापमान कम से कम 74 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना चाहिए ताकि उसमें मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया जैसे साल्मोनेला पूरी तरह खत्म हो सकें. यदि अंडा लंबे समय तक कमरे के तापमान पर बाहर रखा रहा हो तो उसे दोबारा गर्म करके खाने की भूल बिल्कुल न करें. माइक्रोवेव में भूलकर भी न करें गर्म उबले हुए अंडे को दोबारा गर्म करने का सबसे आसान तरीका लोगों को माइक्रोवेव लगता है जो कि सबसे बड़ी गलती है. ब्रिटिश फूड सेफ्टी एक्सपर्ट वेबसाइट Commodious के मुताबिक, साबुत उबले अंडे को माइक्रोवेव में कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए. दरअसल, माइक्रोवेव की वेव्स अंडे के अंदर मौजूद पानी के मॉलिक्यूल्स को तेजी से भाप में बदल देती हैं. चूंकि अंडे का छिलका या उसका सफेद हिस्सा इस भाप को बाहर नहीं निकलने देता इसलिए अंडे के अंदर बहुत ज्यादा प्रेशर बन जाता है. जैसे ही आप इसे खाने के लिए काटते हैं या मुंह में लेते हैं, यह बम की तरह फट सकता है जिससे चेहरा जलने का गंभीर खतरा रहता है. अंडा दोबारा गर्म करने का सही तरीका क्या है? अगर आप उबले हुए अंडे को दोबारा गर्म और फ्रेश करना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे सुरक्षित तरीका है उबलते पानी का इस्तेमाल करना. इसके लिए सबसे पहले एक गहरे बर्तन में पानी उबाल लें और गैस बंद कर दें. अब उबले हुए अंडों (बिना छिलका उतारे) को उस गर्म पानी में डाल दें और बर्तन को 10 मिनट के लिए ढककर छोड़ दें. इस तरीके से अंडे के अंदर की नमी बरकरार रहती है, उसका टेक्सचर रबर जैसा नहीं होता और वह बिना किसी ब्लास्ट के रिस्क के अंदर तक अच्छी तरह गर्म हो जाता है.

कच्चा अंडा पीना कितना सुरक्षित है? जानें साइंस और हेल्थ एक्सपर्ट्स की राय

बॉडी बिल्डिंग या फिटनेस फ्रीक लोग सुबह-सुबह दूध में कच्चा अंडा मिलाकर पी जाते हैं या फिर इसे सीधे ही खा लेते हैं. जिम जाने वाले युवाओं के बीच यह काफी पॉपुलर है क्योंकि उनका मानना होता है कि पकाने से अंडे के न्यूट्रिएंट्स कम हो जाते हैं. ऐसे कई लोग हैं जो इसे खाना सही मानते हैं और कई लोग नहीं. ऐसे में साइंस इस बारे में क्या कहता है कि कच्चा अंडा खाना फायदेमंद है भी या नहीं इस बारे में जान लीजिए. क्या कच्चा अंडा पचाना आसान है? Healthline का कहना है, कई लोग मानते हैं कि कच्चे अंडे से प्रोटीन अधिक मिलता है लेकिन साइंस इसके विपरीत है. दरअसल, इंसानी शरीर पके हुए अंडे के प्रोटीन को 90 प्रतिशत तक आसानी से एब्जॉर्ब कर लेता है जबकि कच्चे अंडे का केवल 50 प्रतिशत प्रोटीन ही शरीर पचा पाता है. वहीं कच्चे अंडे के सफेद हिस्से में एविडिन (Avidin) नाम का प्रोटीन होता है जो शरीर में बायोटिन (विटामिन B7) के एब्जॉर्प्शन को रोक देता है जिससे इसकी कमी हो सकती है. साल्मोनेला इंफेक्शन का सबसे बड़ा खतरा कच्चा अंडा खाने का सबसे खतरनाक पहलू है उसमें मौजूद बैक्टीरिया. अमेरिकन हेल्थ आर्गेनाइजेशन CDC का कहना है, कच्चे या कम पके हुए अंडों में साल्मोनेला नाम का बैक्टीरिया होने का बहुत ज्यादा चांस रहता है. यह बैक्टीरिया मुर्गी के अंडे देने के दौरान या उसके अंदरूनी हिस्से में पहले से मौजूद हो सकता है. अगर यह शरीर में चला जाए तो फूड पॉइजनिंग हो सकती है जिससे पेट में तेज दर्द, डायरिया, उल्टी, बुखार और डिहाइड्रेशन जैसी गंभीर समस्याएं शुरू हो जाती हैं. ये लोग भूलकर भी नहीं खाएं कच्चा अंडा कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए कच्चा अंडा एक मेडिकल इमरजेंसी खड़ी कर सकता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, प्रेग्नेंट महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को कच्चा अंडा या इससे बनी चीजें (जैसे होममेड मेयोनीज) खाने से पूरी तरह बचना चाहिए. साल्मोनेला बैक्टीरिया का असर इन पर बहुत तेजी से होता है, जो कभी-कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है. सेफ रहने के लिए क्या करें? अगर आप अंडे के सारे न्यूट्रिएंट्स सुरक्षित तरीके से पाना चाहते हैं, तो उसे उबालकर या ऑमलेट बनाकर ही खाएं. अंडे को तब तक पकाएं जब तक कि उसका पीला और सफेद हिस्सा पूरी तरह सॉलिड न हो जाए. हीट के संपर्क में आते ही साल्मोनेला बैक्टीरिया मर जाता है और अंडे का प्रोटीन भी आपकी बॉडी के लिए आसानी से एब्जॉर्ब करने लायक बन जाता है.

अंडे में खून की बूंद क्यों दिखती है? जानिए इसका वैज्ञानिक कारण

अंडे को प्रोटीन और न्यूट्रिएंट्स का सबसे अच्छा सोर्स माना जाता है इसलिए कई लोग रोजाना अंडे का सेवन करते हैं. लेकिन कई बार जब अंडे को पैन में तोड़ने के लिए फोड़ते हैं तो योक (पीला भाग) या एल्ब्यूमेन (सफेद भाग) पर लाल रंग की खून की बूंद या धब्बा दिखाई देता है. इसे देखकर अक्सर लोग डर जाते हैं और पूरा अंडा फेंक देते हैं. लोग सोचने लगते हैं कि क्या यह अंडा खराब है या फिर फर्टिलाइज्ड (जिससे चूजा बनता है) हो चुका है? अब ऐसे में हर किसी के मन में सवाल उठता है कि ये ब्लड स्पॉट कैसे आता है और क्या उससे कुछ नुकसान हो सकता है? तो आइए इस बारे में जानते हैं. क्यों आ जाती है अंडे के अंदर खून की बूंद? हेल्थलाइन का कहना है, अंडे में दिखने वाले ये ब्लड स्पॉट्स पूरी तरह से नेचुरल होते हैं और इन्हें देखकर घबराने की जरूरत नहीं है. दरअसल, अंडे में खून का धब्बा दिखाई देने के पीछे एक सिंपल बायोलॉजिकल प्रोसेस है. जब मुर्गी के शरीर के अंदर अंडा बन रहा होता है तो योक उसके ओवरी (अंडाशय) से रिलीज होता है. ओवरी में कई छोटी-छोटी ब्लड वेसल्स होती हैं और अंडा रिलीज होने के दौरान अगर इनमें से कोई भी बारीक ब्लड वेसल फट जाती है तो खून की एक छोटी सी बूंद योक पर लग जाती है. यूएसयू डिजिटल कॉमन्स पर पब्लिश्ड यूटा स्टेट यूनिवर्सिटी एक्सटेंशन गाइड के अनुसार, यदि ब्लड वेसल ओवरी में फटती है तो धब्बा योक पर दिखता है और यदि अंडा आगे बढ़ने के बाद ओविडक्ट (अंडवाहिनी) में ब्लीडिंग होती है तो यह धब्बा अंडे के सफेद भाग में आ जाता है. यह मुर्गी की उम्र, जेनेटिक्स, विटामिन A की कमी या अचानक बढ़े स्ट्रेस के कारण हो सकता है. क्या ब्लड स्पॉट वाले अंडे को खाना सुरक्षित है? आम जनता के बीच यह सबसे बड़ा कन्फ्यूजन है कि क्या इस अंडे को खाने से कोई बीमारी हो सकती है. यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (USDA) का कहना है, ब्लड स्पॉट वाले अंडे खाने के लिए पूरी तरह से सेफ हैं. USDA अंडा ग्रेडिंग मैनुअल के नियमों के अनुसार, ऐसे अंडों को ग्रेड-बी कैटेगरी में रखा जाता है लेकिन ये अनसेफ नहीं होते. यदि आपको यह धब्बा देखने में अच्छा नहीं लग रहा है तो आप चाकू की नोक या चम्मच से उस लाल हिस्से को निकालकर अलग कर सकते हैं और बाकी बचे अंडे को आराम से पकाकर खा सकते हैं. बस ध्यान रखें कि अंडे को अच्छी तरह से कुक किया गया हो.

सुबह की ये 5 गलत आदतें चुपचाप कमजोर कर रही हैं आपका दिल

आज की भागदौड़ भरी इस जिंदगी में अगर हम किसी चीज़ को सबसे ज़्यादा नजरअंदाज कर रहे हैं, तो वह है हमारी सेहत. खासकर जब बात हार्ट हेल्थ का ख्याल रखने की आती है, तो हम सबसे ज़्यादा इसे ही अनदेखा करने लगे हैं. आज का यह आर्टिकल उन सभी लोगों के लिए है, जो अपनी हार्ट हेल्थ का बेहतर तरीके से ख्याल रखना चाहते हैं. आज हम आपको सुबह की कुछ ऐसी आदतों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें अगर आप समय रहते सुधार नहीं लेते हैं, तो इसका आपकी हार्ट हेल्थ पर काफी बुरा असर पड़ सकता है. तो चलिए जानते हैं सुबह की ऐसी 5 गलत आदतों के बारे में, जो धीरे-धीरे आपके दिल को कमजोर करने का काम कर रही हैं और आपको इस बात का अंदाजा भी नहीं लग रहा है. सोकर उठते ही अचानक से बिस्तर से उठ जाना सुबह जैसे ही हमारी आंख खुलती है, हमारा शरीर एकदम रेस्ट मोड से जागने की स्थिति में आ रहा होता है. ऐसे में कई लोग क्या करते हैं कि अलार्म बजते ही झटके से बिस्तर से उठकर खड़े हो जाते हैं. सच मानिए, यह आदत आपके दिल के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकती है. अचानक ऐसे उठने से ब्लड प्रेशर एकदम से बढ़ जाता है, जिससे दिल पर अचानक बहुत ज्यादा प्रेशर पड़ता है. सबसे सही तरीका यह है कि जब भी सुबह आपकी आंख खुले, तो तुरंत हड़बड़ाकर न उठें. कम से कम दो मिनट आराम से बिस्तर पर ही बैठे रहें, शरीर को थोड़ा स्ट्रेच करें और उसके बाद धीरे से उठें. इससे आपके शरीर का ब्लड सर्कुलेशन एकदम नॉर्मल रहता है और दिल पर कोई फालतू का लोड नहीं पड़ता. खाली पेट चाय या कॉफी पीना भारत में ज्यादातर लोगों के दिन की शुरुआत बेड-टी यानी बिस्तर पर चाय या कॉफी पीने से होती है. लेकिन खाली पेट कैफीन का सेवन करना आपकी हार्ट हेल्थ के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है. खाली पेट चाय या कॉफी पीने से शरीर में एसिडिटी बढ़ती है और हार्ट रेट तेज हो सकती है. इसके अलावा, आपकी यह आदत आपके ब्लड प्रेशर को भी अचानक से बढ़ा सकता है. सुबह उठकर सबसे पहले एक या दो ग्लास गुनगुना पानी पीना चाहिए ताकि शरीर हाइड्रेट हो सके, उसके बाद ही कुछ खाना या पीना चाहिए. हैवी और अनहेल्दी ब्रेकफास्ट करना या उसे स्किप कर देना ब्रेकफास्ट हमारे पूरे दिन का सबसे जरूरी डाइट होता है. कुछ लोग समय की कमी के कारण ब्रेकफास्ट स्किप कर देते हैं, तो कुछ लोग सुबह-सुबह ही बहुत ज्यादा तला-भुना, कचौड़ी, समोसा या पैक्ड चीजें खा लेते हैं. ये दोनों ही आदतें आपकी हार्ट हेल्थ के लिए काफी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं. ब्रेकफास्ट स्किप करने से शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा होता है जिससे मोटापा बढ़ने लगता है. इसकी वजह से दिल की बीमारी का खतरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है. वहीं, दूसरी ओर, सुबह-सुबह ज्यादा तेल और फैट वाली चीजें खाने से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, जिससे दिल की नसें ब्लॉक हो सकती हैं. हद से ज्यादा स्ट्रेस लेना या गुस्सा करना सुबह उठते ही ऑफिस की टेंशन, काम का प्रेशर या किसी बात पर गुस्सा करना आपकी हार्ट हेल्थ को बुरी तरह से बिगाड़ सकता है. जब आप सुबह-सुबह स्ट्रेस लेते हैं, तो शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हॉर्मोन्स रिलीज होते हैं. ये हॉर्मोन्स दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर को बढ़ा देते हैं. अगर यह रोज की आदत बन जाए, तो समय के साथ आपका दिल कमजोर होने लगता है. अगर आप नहीं चाहते हैं कि ऐसा हो, तो सुबह के समय खुद को शांत रखने की कोशिश करें. इसके लिए आप थोड़ी देर मेडिटेशन या डीप ब्रीदिंग की प्रैक्टिस कर सकते हैं. फिजिकल एक्टिविटी बिल्कुल भी न करना आपको शायद यह जानकर हैरानी हो लेकिन, रात भर सोने के बाद सुबह हमारे शरीर की नसें और मसल्स थोड़ी टाइट हो जाती हैं. अगर आप सुबह उठकर सीधे कुर्सी या सोफे पर बैठ जाते हैं और कोई फिजिकल मूवमेंट नहीं करते, तो यह आपके दिल के लिए बिलकुल भी अच्छा नहीं है. सुबह के समय कम से कम 20 से 30 मिनट की लाइट वॉकिंग, योगा या स्ट्रेचिंग करना बहुत जरूरी है. फिजिकल एक्टिविटी न करने से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन स्लो हो जाता है, जिसकी वजह से दिल को काम करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

16 डिग्री पर AC चलाना पड़ सकता है भारी, सेहत के लिए खतरे की घंटी

उत्तर भारत में इस समय भीषण गर्मी का कहर जारी है. ऐसे में थका देने वाली धूप से घर लौटते ही हर कोई एसी (Air Conditioner) को सबसे कम तापमान यानी 16 या 17 डिग्री पर सेट कर देता है ताकि कमरा तुरंत ठंडा हो जाए. हम सोचते हैं कि इससे हमें जल्दी राहत मिलेगी, लेकिन हकीकत में यह तरीका सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. दरअसल, इतने कम तापमान पर लगातार एसी चलाना न केवल आपके घर का बिजली बिल रॉकेट की तरह बढ़ाता है, बल्कि आपको बीमार कर अस्पताल के लंबे-चौड़े बिल का भुगतान करने पर भी मजबूर कर देता है. आइए जानते हैं कि यह आदत हमारे शरीर को किस तरह नुकसान पहुंचाती है. थर्मल शॉक और इम्युनिटी पर हमला जब आप बाहर के 40 से 45 डिग्री के झुलसा देने वाले तापमान से सीधे आकर 16 डिग्री वाले एकदम ठंडे कमरे में बैठते हैं तो आपकी बॉडी को एक गंभीर 'थर्मल शॉक' लगता है. अचानक होने वाले इस बड़े टेम्परेचर चेंज को हमारा शरीर आसानी से झेल नहीं पाता. इसके कारण ब्लड वेसल्स अचानक सिकुड़ जाती हैं, जिससे ब्लड सर्कुलेशन पर बुरा असर पड़ता है. शरीर की इम्युनिटी होने लगती है. यही वजह है कि ऐसे माहौल में रहने वाले लोगों को बार-बार सर्दी, जुकाम, खांसी और गले में इन्फेक्शन की शिकायत होने लगती है. जोड़ों का दर्द, मसल्स में अकड़न लगातार बेहद कम तापमान में बैठने या सोने से शरीर के मसल्स और नसें बुरी तरह प्रभावित होती हैं. 16-17 डिग्री की ठंडी हवा सीधे शरीर पर लगने से जोड़ों में दर्द और मांसपेशियों में अकड़न की समस्या बढ़ जाती है. खासकर जिन लोगों को पहले से ही आर्थराइटिस या साइनस की शिकायत है, उनके लिए यह स्थिति बेहद दर्दनाक हो सकती है. इसके अलावा ठंडी हवा के कारण सिरदर्द की समस्या भी आम हो जाती है जो धीरे-धीरे माइग्रेन का रूप ले सकती है. स्किन और आंखों में सूखापन कम टेम्परेचर पर चलने वाला एसी कमरे की हवा से पूरी नमी यानी मॉइश्चर को सोख लेता है. हवा ड्राई होने के कारण आपकी स्किन और आंखों पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है. लगातार ठंडी और सूखी हवा में रहने से त्वचा में ड्राईनेस और खुजली होने लगती है. साथ ही आंखों का मॉइश्चर खत्म होने से ड्राई आइज की प्रॉब्लम हो जाती है जिससे आंखों में जलन और रेडनेस की शिकायत शुरू हो जाती है. क्या है एसी चलाने का सही तरीका? डॉक्टरों और ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) के अनुसार, इंसानी शरीर के लिए 24 से 26 डिग्री का तापमान सबसे बेस्ट और हेल्दी माना जाता है. इस टेम्परेचर पर एसी चलाने से बॉडी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता और कमरे में बेहतर कूलिंग भी बनी रहती है. सबसे बड़ी बात यह है कि 24 डिग्री पर एसी चलाने से बिजली की खपत भी काफी कम होती है, जिससे आपका बिजली बिल कंट्रोल में रहता है.

कॉपर बॉटल में लेमन और गर्म पानी क्यों हो सकता है खतरनाक?

कॉपर बॉटल में पानी पीने का ट्रेंड पिछले कुछ सालों में बड़े स्तर पर फॉलो हो रहा है. आयुर्वेद में 'ताम्र जल' को सेहतमंद बताया गया है, लेकिन आज लोग इसे गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं. कॉपर बॉटल में लेमन वॉटर, जीरा वॉटर या गर्म पानी पी रहे हैं. कई लोग तो इसमें ये चीजें घंटों तक भरे रखते हैं तो कुछ लोग रात भर के लिए. लेकिन ऐसा करना सेहत के लिए काफी खतरनाक हो सकता है. यदि आप भी उन लोगों में से हैं तो ये आर्टिकल जरूर पढ़ें. लेमन वॉटर और जीरा वॉटर क्यों खतरनाक? लेमन जूस और जीरा में एसिडिकेटी होती है जो कॉपर के साथ क्रिया करके टॉक्सिक कॉपर सॉल्स बनाती है. ये सॉल्स पानी में घुलकर सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं. डॉक्टरों और न्यूट्रिशनिस्ट्स का कहना है कि कॉपर बॉटल में सिर्फ सादा पानी स्टोर करना चाहिए लेकिन कोई भी एसिडिक लिक्विड नहीं डालना चाहिए. एसिडिक लिक्विड कॉपर लेचिंग बढ़ाते हैं यानी कॉपर ज्यादा मात्रा में पानी में घुल जाता है. गर्म पानी भी कॉपर बॉटल में नहीं डालें गर्म या बूइंग पानी कॉपर बॉटल में डालने पर कॉपर लेचिंग बढ़ जाती है. इससे कॉपर टॉक्सिसिटी का रिस्क बढ़ता है. डॉक्टर्स का कहना है कि गर्म पानी कॉपर बॉटल में डालना सेहत के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है. गर्म पानी में कॉपर तेजी से घुलता है और पानी में टॉक्सिक लेवल बढ़ जाता है. हरे निशानों का मतलब क्या है? कॉपर बॉटल में दिख रहे हरे निशान कॉपर के ऑक्सीडेशन का संकेत हैं. ये कॉपर कार्बोनेट होते हैं, जो बाहरी पतनी नहीं टॉक्सिक नहीं हैं, लेकिन अगर ये बॉटल के इनसाइड हैं तो उन्हें अच्छी तरह क्लीन करना जरूरी है. डॉक्टर्स का कहना है कि ग्रीन लेयर ऑक्सीडेशन का रिजल्ट है और बॉटल को अच्छी तरह क्लीन करना जरूरी है. कॉपर टॉक्सिसिटी के सिम्प्टम कॉपर टॉक्सिसिटी के सिम्प्टम नौजिया, वॉमिटिंग, स्टमक क्रम्प्स, डायरिया और दस्त हैं. बच्चों में यह रिस्क ज्यादा है क्योंकि उनके शरीर का साइज छोटा होता है. कैसे करें सही तरीके से कॉपर बॉटल इस्तेमाल     बॉटल में सिर्फ सादा पानी स्टोर करें     पानी को 6-12 घंटे कॉपर बॉटल में रखें     लेमन, जीरा, विनेगर नहीं डालें     गर्म पानी नहीं डालें     बॉटल को अच्छी तरह क्लीन करें  

फैटी लिवर से बचने के लिए इन 6 चीजों से तुरंत बनाएं दूरी

 आज के समय में फैटी लिवर की समस्या काफी आम हो गयी है. एक बड़ी आबादी ऐसी है जो एक लंबे समय से इस प्रॉब्लम से जूझ रही है. यह एक ऐसी हेल्थ कंडीशन है जिसमें आपके लिवर के अंदर नॉर्मल से ज्यादा चर्बी इकठ्ठा हो जाती है. लिवर की जब बात आती है तो यही वह ऑर्गन है, जो खाने को डाइजेस्ट करने में, शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में और एनर्जी को मैनेज करने का काम करता है. लेकिन, जब इसमें फैट बढ़ने लग जाता है तो इसकी काम करने की कैपिसिटी धीरे-धीरे कमजोर होने लग जाती है. अगर आप चाहते हैं कि आपको इस प्रॉब्लम से जूझना न पड़े तो सबसे पहले आपको अपनी कुछ आदतों को सुधारना होगा. इन आदतों में गलत डाइट लेना, कम फिजिकल एक्टिविटीज करना, बहुत ही ज्यादा फ्राइड और मीठी चीजें खाना शामिल है. आज इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसी चीजों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका सेवन आपको करने से बचना चाहिए अगर आप फैटी लिवर की प्रॉब्लम से खुद को बचाकर रखना चाहते हैं तो. चलिए इन चीजों के बारे में विस्तार से जानते हैं. स्वीटेंड ड्रिंक्स का सेवन करने से बचें अगर आपको फैटी लिवर है तो आपको जितनी जल्दी हो सके स्वीटेंड ड्रिंक्स जैसे कि कोल्ड ड्रिंक, सोडा, पैकेज्ड जूस और एनर्जी ड्रिंक्स से दूरी बना लेनी चाहिए. इनमें काफी ज्यादा मात्रा में रिफाइंड शुगर और हाई फ्रक्टोज कॉर्न सिरप पाया जाता है. जब ये चीजें आपके शरीर में जाती हैं तो तुरंत ही फैट में कन्वर्ट हो जाती हैं. यह फैट डायरेक्टली आपके लिवर में इकठ्ठा होने लगता है जिससे धीरे-धीरे आपके लिवर पर प्रेशर बढ़ने लग जाता है. अगर आप रेगुलर बेसिस पर इस तरह के ड्रिंक्स पीते हैं तो आपके लिवर में इन्फ्लेमेशन की प्रॉब्लम बढ़ सकती है. फ्राइड चीजों से भी बनाएं दूरी भले ही आपको फैटी लिवर हो या फिर आप खुद को इससे बचाकर रखना चाहते हों, आपके लिए यह काफी जरूरी हो जाता है कि आप अपनी डाइट से फ्राइड चीजों को हटाना शुरू कर दें. फ्राइड चीजें जैसे कि समोसा, कचौड़ी, पकौड़े, पूरियां और फ्रेंच फ्राइज में ट्रांस फैट और कैलोरी की मात्रा बहुत ही ज्यादा होती है. जब ये आपके शरीर में जाते हैं तो कभी भी आसानी से बर्न नहीं होते है और धीरे-धीरे करके आपके लिवर में ही इकठ्ठा होने लग जाते हैं. रेगुलर बेसिस पर इस तरह की चीजों को खाने से आपके लिवर को फैट प्रोसेस करने में दिक्कत होती है, जिससे फैटी लिवर की प्रॉब्लम और भी ज्यादा बढ़ सकती है. जंक फूड्स की वजह से भी बढ़ सकता है फैटी लिवर जंक फूड्स जैसे कि बर्गर, पिज्जा, मोमोज, नूडल्स और पैकेज्ड स्नैक्स स्वाद के मामले में तो बहुत ही जबरदस्त और एडिक्टिव लगते हैं, लेकिन इनमें न्यूट्रिशन बहुत ही कम और अनहेल्दी फैट बहुत ज्यादा मौजूद होता है. इनमें मौजूद प्रिजर्वेटिव्स और एक्स्ट्रा सॉल्ट लिवर पर एक्स्ट्रा लोड डालने का काम करते हैं. इसके अलावा अगर आप इस तरह की चीजें खा रहे हैं तो आपके शरीर में ब्लड शुगर और इंसुलिन का लेवल भी बिगड़ सकता है. ऐसा होने की वजह से लिवर में फैट इकठ्ठा होने की जो प्रक्रिया है वह और भी ज्यादा तेज हो जाती है. हाई शुगर फूड्स भी हैं हानिकारक हाई शुगर फूड्स जैसे कि केक, पेस्ट्री, मिठाइयां, चॉकलेट और डेजर्ट्स में रिफाइंड शुगर की मात्रा बहुत ही ज्यादा होती है. जब आप अपने शरीर को जरूरत से ज्यादा चीनी देने लगते हैं, तो वह उसे एनर्जी में कन्वर्ट करने की जगह पर फैट के रूप में स्टोर करके रखने लगता है. यही फैट धीरे-धीरे आपके लिवर में भी जमा होने लग जाता है. जब आप रेगुलर बेसिस पर मीठी चीजें खाते रहते हैं तो इससे इंसुलिन रेसिस्टेंस की प्रॉब्लम बढ़ भी सकती है, जो आगे चलकर आपके लिवर को डैमेज करने का ही काम करता है. बंद कर दें शराब पीना शराब को फैटी लिवर का सबसे बड़ा और सीरियस कारण भी माना जाता है. जब आप शराब पीते हैं तो इसकी वजह से आपके लिवर के सेल्स डैमेज होने शुरू हो जाते हैं और साथ ही आपका लिवर अपनी पूरी कैपेसिटी के साथ काम भी नहीं कर पाता है. जब आप रेगुलरली शराब पीते हैं तो आपके लिवर में इन्फ्लेमेशन, फैट का इकठ्ठा होना और कुछ ही समय बाद लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है. अगर आपको फैटी लिवर है तो आपको शराब का सेवन करना पूरी तरह से ही बंद कर देना चाहिए. थोड़ी मात्रा में भी शराब पीने से आपको काफी ज्याद नुकसान हो सकता है. प्रोसेस्ड फूड भी लिवर को करते हैं डैमेज प्रोसेस्ड फूड्स जैसे कि पैकेज्ड सूप, रेडी-टू-ईट मील्स, सॉसेज, बेकन और बाकी पैक्ड फूड आइटम्स में कई तरह के केमिकल्स, प्रिजर्वेटिव्स और जरूरत से ज्यादा नमक पाया जाता है. ये चीजें आपके शरीर में जाती हैं, तो आपके लिवर को इन्हें प्रोसेस करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. बहुत ही लंबे समय तक इन फूड आइटम्स के सेवन से लिवर में टॉक्सिन्स और फैट दोनों के इकठ्ठा होने का खतरा बढ़ जाता है.

प्याज की बदबू से पाएं छुटकारा, सेब से लेकर नींबू तक ये तरीके आएंगे काम

 खाने में प्याज का इस्तेमाल स्वाद को दोगुना कर देता है. दूसरे मौसमों की अपेक्षा गर्मी के मौसम में प्याज की खपत अधिक होती है क्योंकि ये नेचुरल तरीके से शरीर को अंदर से ठंडा करने में मदद करती है. लेकिन प्याज खाने या काटने की सबसे बड़ी समस्या ये है कि उसमें काफी तेज बदबू आती है. दरअसल, प्याज काटने और खाने के बाद उसमें मौजूद सल्फर कंपाउंड्स मुंह के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं, जिससे सांसों से लंबे समय तक स्मेल आती रहती है. हाथों से प्याज काटते वक्त यह स्मेल स्किन में समा जाती है जो साधारण साबुन से नहीं जाती. इसे दूर करने के लिए कुछ साइंटिफिक और घरेलू तरीके बेहद कारगर हैं.   सेब का कमाल हेल्थलाइन के मुताबिक, प्याज खाने के बाद अगर आप एक सेब खाते हैं तो यह काफी मददगार होता है. सेब में मौजूद नेचुरल एंजाइम्स प्याज के सल्फर कंपाउंड्स को ब्रेक करने का काम करते हैं. यदि आप प्याज खाने की थोड़ी देर बाद सेब जैसे फल का सेवन करते हैं तो सांसों की दुर्गंध को कम करने में मदद मिल सकती है. नींबू और साइट्रस फ्रूट्स केयर फ्री डेंटल के मुताबिक, हाथों की बदबू दूर करने के लिए नींबू का रस एक बेहतरीन ऑपशन है. नींबू में मौजूद सिट्रिक एसिड न केवल बैक्टीरिया को मारता है बल्कि प्याज की स्मेल को भी खत्म करता है. नींबू पानी से कुल्ला करना या हाथों पर इसे रगड़ना बदबू को तुरंत कम कर सकता है. ग्रीन टी का सेवन Vinmec Health की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन टी में पॉलीफेनोल्स नाम के पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं. ये कंपाउंड प्याज में मिलने वाले गंध पैदा करने वाले कंपाउंड्स को खत्म करने में मदद करते हैं. इसलिए खाने के बाद 1 कप गर्म ग्रीन टी पीने से मुंह की ताजगी बनी रहती है और बैक्टीरिया का असर कम होता है. स्टेनलेस स्टील और नमक क्या आप जानते हैं कि हाथों को स्टेनलेस स्टील पर रगड़ने से प्याज की गंध गायब हो जाती है. इसका कारण है कि स्टील के मॉलिक्यूल्स प्याज के सल्फर के साथ बाइंड होकर उसे स्किन से हटा देते हैं. साथ ही हाथों पर थोड़ा नमक रगड़कर धोने से भी स्मेल काफी हद तक कम हो जाती है. बेकिंग सोडा और विनेगर मुंह की स्मेल के लिए एप्पल साइडर विनेगर या बेकिंग सोडा का पानी से कुल्ला करना एक अच्छा उपाय है. यह मुंह के pH लेवल को बैलेंस करता है जिससे बैक्टीरिया नहीं पनपते. WebMD के मुताबिक, बेकिंग सोडा ओरल हाइजीन बनाए रखने और बदबू को कंट्रोल करने में काफी प्रभावी हो सकते हैं.

नई स्टडी में खुलास,6–7 घंटे से कम या ज्यादा नींद लेने से बढ़ती है शरीर की उम्र तेजी से

 रात में बहुत कम या जरूरत से ज्यादा सोना सिर्फ थकान ही नहीं बढ़ाता, बल्कि ये बॉडी के कई जरूरी अंगों की उम्र भी तेजी से बढ़ा सकता है. नेचर जर्नल में 13 मई को पब्लिश हुई एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि कम और ज्यादा दोनों तरह की नींद ब्रेन, हार्ट, फेफड़ों और इम्यून सिस्टम पर बुरा असर डाल सकती है. रिसर्च के मुताबिक सबसे कम खतरा उन लोगों में देखा गया जो रोज करीब 6.4 से 7.8 घंटे की नींद लेते हैं. नींद क्यों है हमारे लिए जरूरी? इस स्टडी को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर ऑफ रेडियोलॉजी जुनहाओ वेन ने लीड किया. उन्होंने कहा कि हमारी रिसर्च दिखाती है कि बहुत कम और बहुत ज्यादा दोनों तरह की नींद शरीर के लगभग हर अंग की उम्र बढ़ने की रफ्तार तेज कर सकती है. इससे ये साफ होता है कि अच्छी नींद ब्रेन और पूरी बॉडी को हेल्दी रखने में बेहद जरूरी है. रिसर्च में क्या पता लगाया गया? रिसर्चर्स ने एजिंग को मापने के लिए मशीन लर्निंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया. टीम ने 17 अलग-अलग ऑर्गन सिस्टम्स के लिए 23 बायोलॉजिकल क्लॉक्स तैयार किए. इन क्लॉक्स में मेडिकल स्कैन, ब्लड टेस्ट और बॉडी प्रोटीन से जुड़ी जानकारी शामिल की गई, जिससे पता लगाया गया कि किसी इंसान के अंग उसकी असली उम्र के मुकाबले कितनी तेजी से बूढ़े हो रहे हैं. किन लोगों की उम्र तेजी से बढ़ती है? इस स्टडी में यूके बायोबैंक के करीब पांच लाख लोगों के हेल्थ डेटा का एनालिसिस किया गया. रिसर्च में एक यू-शेप पैटर्न सामने आया. यानी जो लोग रोज 6 घंटे से कम सोते थे और जो 8 घंटे से ज्यादा सोते थे, दोनों में एजिंग की स्पीड ज्यादा पाई गई. सबसे हेल्दी स्लीप रेंज करीब 7 घंटे मानी गई. कम नींद लेने वाले लोगों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का खतरा ज्यादा देखा गया. वहीं कम और ज्यादा दोनों तरह की नींद फेफड़ों की बीमारियों जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और अस्थमा से भी जुड़ी मिली. इसके अलावा एसिड रिफ्लक्स जैसी पेट की समस्याओं का रिस्क भी बढ़ता पाया गया. कम नींद लेने के क्या होते हैं नुकसान? जुनहाओ वेन के मुताबिक नींद सिर्फ दिमाग से जुड़ी चीज नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी बॉडी पर पड़ता है. उन्होंने कहा कि स्लीप ड्यूरेशन हमारी पूरी फिजियोलॉजी से जुड़ी होती है और इसका असर शरीर के लगभग हर हिस्से पर दिखाई देता है. रिसर्च टीम ने बुजुर्ग लोगों में डिप्रेशन पर भी असर देखा. एनालिसिस में सामने आया कि कम नींद सीधे तौर पर डिप्रेशन को बढ़ा सकती है, जबकि ज्यादा नींद ब्रेन और बॉडी फैट में होने वाले बदलावों के जरिए इसका असर डाल सकती है. रिसर्चर्स का मानना है कि कम और ज्यादा सोने वाले लोगों के लिए अलग-अलग तरह की हेल्थ केयर की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि स्टडी ये साबित नहीं करती कि सिर्फ नींद ही तेजी से बूढ़ा होने की वजह है, लेकिन रिसर्चर्स का कहना है कि सही स्लीप हैबिट्स बढ़ती उम्र में हेल्थ को बेहतर बनाए रखने का अहम हिस्सा हो सकती हैं.