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रेगिस्तान में नजर आया कैराकल, जैसलमेर बना वन्यजीव संरक्षण का नया केंद्र

जैसलमेर राजस्थान के पश्चिमी छोर पर स्थित भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे शुष्क मरुस्थलीय इलाकों में एक बेहद अहम वन्यजीव खोज सामने आई है। विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके दुर्लभ वन्य जीव कैराकल की मौजूदगी ने वन विभाग और वैज्ञानिकों में नई उम्मीद जगा दी है। जैसलमेर के सीमावर्ती क्षेत्र में इस प्रजाति की लगातार गतिविधियों के प्रमाण मिलने से यह इलाका अब संरक्षण के लिहाज से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, जैसलमेर का यह पूरा क्षेत्र शुष्क मरुस्थलीय घासभूमि (डेजर्ट ग्रासलैंड) का हिस्सा है, जो कैराकल के प्राकृतिक आवास के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है। यहां खुले मैदान, कम वनस्पति और छोटे शिकार जीवों की उपलब्धता इस प्रजाति के लिए आदर्श परिस्थितियां बनाती हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से यह प्रजाति मानव गतिविधियों और आवास खत्म होने के कारण नजर नहीं आ रही थी, लेकिन अब इसके फिर से दिखने से संकेत मिलते हैं कि यह क्षेत्र उनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन सकता है। निगरानी के लिए हाईटेक इंतजाम इस दुर्लभ जीव की मौजूदगी की पुष्टि के बाद वन विभाग और Wildlife Institute of India ने मिलकर संरक्षण प्रयासों को तेज कर दिया है। क्षेत्र में कुल 9 मोशन सेंसिंग कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं, जो दिन-रात गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं। इन कैमरों से मिले फुटेज ने कई अहम जानकारियां सामने रखी हैं, जिनमें कैराकल की आवाजाही, उसके शिकार के तरीके और रहने के पैटर्न को समझने में मदद मिल रही है। रेडियो कॉलर से हो रही ट्रैकिंग वन विभाग ने दो महीने पहले एक नर कैराकल को पकड़कर उसे रेडियो कॉलर लगाया और फिर सुरक्षित तरीके से जंगल में छोड़ दिया। इसके बाद उसकी हर मूवमेंट को ट्रैक किया जा रहा है। रेडियो कॉलर से प्राप्त डेटा के अनुसार, यह कैराकल भारत-पाकिस्तान सीमा से लगे विस्तृत क्षेत्र में विचरण कर रहा है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि इस प्रजाति का आवास सीमाओं से परे फैला हुआ है, जो संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत को भी दर्शाता है। तीन कैराकल की पुष्टि, बढ़ी उम्मीद अब तक मिले कैमरा ट्रैप फुटेज में रेडियो कॉलर लगे कैराकल के अलावा एक अन्य नर और एक मादा कैराकल की मौजूदगी दर्ज की गई है। इस तरह क्षेत्र में कुल तीन कैराकल के होने की पुष्टि हो चुकी है। इसके अलावा एक गुफा में दो नर कैराकल के एक साथ रहने के संकेत भी मिले हैं, जो इस प्रजाति के व्यवहार को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आमतौर पर कैराकल एकाकी जीवन जीते हैं, ऐसे में यह व्यवहार शोध का विषय बन गया है। फूड चेन की भी हो रही पहचान निगरानी के दौरान वैज्ञानिकों ने कैराकल की फूड चेन को भी आंशिक रूप से पहचान लिया है। यह जीव मुख्यतः छोटे स्तनधारियों, पक्षियों और सरीसृपों का शिकार करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में शिकार की पर्याप्त उपलब्धता इस प्रजाति के टिके रहने का एक बड़ा कारण हो सकती है। संरक्षण के लिए बढ़ी सक्रियता वन विभाग की टीमें लगातार क्षेत्र में गश्त कर रही हैं और कैराकल की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। साथ ही स्थानीय लोगों को भी इस दुर्लभ जीव के महत्व के बारे में जागरूक किया जा रहा है, ताकि किसी प्रकार का खतरा न उत्पन्न हो।

भारत-पाक बॉर्डर पर ड्यूटी के दौरान दो जवानों की मौत, पुलिस महकमे में हड़कंप

गुरदासपुर (पंजाब) पंजाब के गुरदासपुर में भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर पंजाब पुलिस के दो जवानों की मौत हुई है। इनमें अस्सिटेंट सब इंस्पेक्टर और एक होम गार्ड जवान शामिल है। गुरदासपुर के दोरांगला पुलिस स्टेशन के तहत बॉर्डर से सटी आदियां चेक पोस्ट के अंदर दोनों जवानों की लाश मिलने से सनसनी फैल गई। भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के पास हुए इस हादसे की जांच चल रही है।   घटना की सूचना मिलते ही पुलिस उच्च अधिकारी मौके पहुंचे हैं। हालांकि अभी तक पुलिस अधिकारियों की तरफ से कोई भी आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। मृतक पुलिस कर्मियों की पहचान एएसआई अशोक कुमार और होम गार्ड जवान गुरनाम सिंह के रूप में हुई है। अभी तक इस बात का खुलासा नहीं हो पाया है कि सेकंड लाइन ऑफ डिफेंस की पहली चेक पोस्ट पर ऐसा हादसा कैसे हो गया। जिसके लिए अधिकारियों के बयानों का इंतजार है।

Border पर भारी हलचल: भारत ने शुरू किया विशाल युद्धाभ्यास, थल, जल और वायु सेना साथ में एक्शन में

नई दिल्ली  देश की पश्चिमी सीमाओं के पास तीनों सेनाओं का एक बड़ा संयुक्त अभ्यास शुरू हो चुका है — नाम है ऑपरेशन त्रिशूल। यह अभ्यास 10 नवंबर तक चलेगा और इसमें सेना, नौसेना व वायुसेना की सामूहिक युद्धक क्षमताओं का परखा जाएगा। पिछले कुछ समय में संपन्न ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला मौका है जब भारत ने किसी सामरिक चुनौती के परिदृश्य में हर संभव युद्धक्षेत्र पर अपनी ताकत आजमाने के लिए इतनी व्यापक स्तर पर अभ्यास किया है। राजस्थान व गुजरात के सीमाई इलाकों में चल रहे इस अभ्यास को न केवल प्रशिक्षण का कार्यक्रम माना जा रहा है, बल्कि सीमा सुरक्षा के प्रति निर्णायक संदेश भी बताया जा रहा है – कि यदि कोई विरोधी फिर किसी प्रकार की हिमाकत करता है तो उसका जवाब सीमा पर ही नहीं, बल्कि आवश्यकतानुसार सीमा पार तक भी दिया जा सकता है। किस-किस ने हिस्सेदारी ली है त्रिशूल अभ्यास में तीनों सेनाओं के कुल मिलाकर 25,000 से अधिक जवान तैनात हैं। वायुसेना के राफेल व सुखोई जैसे अग्रिम लड़ाकू विमानों के अलावा ब्रह्मोस व आकाश मिसाइल प्रणालियां – जो पहले ऑपरेशन सिंदूर में अपना प्रदर्शन दे चुकी हैं – भी शामिल हैं। इसके साथ ही युद्धक टैंकों, इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स, लड़ाकू हेलिकॉप्टरों, लंबी दूरी मार करने वाली आर्टिलरी प्रणालियों, ड्रोन और नौसेना के युद्धपोत भी अभ्यास का हिस्सा हैं। मल्टी-डोमेन वॉरफेयर – आधुनिक युद्ध की तैयारी त्रिशूल का एक मुख्य उद्देश्य है मल्टी-डोमेन ऑपरेशन का अभ्यास – यानी जमीन, समुद्र और हवा के अलावा साइबर, इलेक्ट्रॉनिक स्पेस और अन्य नए क्षेत्र शामिल कर के इन सभी मोर्चों पर समन्वित कार्रवाई का परिक्षण। आधुनिक युद्ध अब केवल पारंपरिक युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहा; अंतरिक्ष व साइबर स्पेस जैसी चुनौतियों को भी एक साथ संभालने की क्षमता विकसित करना इस अभ्यास का अहम हिस्सा है।   कच्छ क्षेत्र पर विशेष नजर अभ्यास का एक विशेष फोकस गुजरात के कच्छ क्षेत्र पर रखा गया है। यह इलाका रणनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है और हाल ही में रक्षा मंत्रियों की चेतावनियों के बीच इसका महत्व और बढ़ गया है। रक्षा मंत्री ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि पाकिस्तान ने सर क्रीक इलाके में कोई दुस्साहस किया तो उसके जवाब में निर्णायक कार्रवाई की जाएगी – इस संदर्भ में कच्छ का क्षेत्र खास रणनीतिक महत्व रखता है, क्योंकि कराची तक पहुँचने वाले मार्ग से भी यह जुड़ा हुआ है।