samacharsecretary.com

उज्जैन के कालभैरव मंदिर में नई व्यवस्था की तैयारी, श्रावण से अलग-अलग कतारों में होंगे दर्शन

 उज्जैन श्रावण महीने की शुरुआत से कालभैरव मंदिर में दर्शन व्यवस्था बदल सकती है। मंदिर प्रबंध समिति अभी से तैयारी कर रही है।कुछ दिनों पहले ही मंदिर में 500 रुपए सशुल्क वीआईपी दर्शन की व्यवस्था भी शुरू की गई है। ऐसे में अभी मंदिर में निःशुल्क सामान्य व सशुल्क दर्शनार्थियों के लिए अलग-अलग दो कतार लगाई जा रही है। इनमें से सशुल्क दर्शन वाली कतार में ही प्रोटोकॉल व वीआईपी वाले श्रद्धालुओं को भी दर्शन करवाए जा रहे हैं। इससे सुविधा बनाने में मुश्किलें हो रही हैं, क्योंकि इस कतार वाले सभी श्रद्धालुओं को गर्भगृह से दर्शन करवाने होते हैं। अगले महीने 30 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत होने जा रही है। ऐसे में समिति यहां की दर्शन व्यवस्था को और भी सरल बनाने की तैयारी कर रही है। यह है समिति की प्लानिंग दर्शन की नई प्लानिंग यह की जा रही है कि दो की बजाय दर्शन के लिए तीन कतार का प्रबंध किया जाएगा। इनमें से पहली कतार निःशुल्क सामान्य दर्शनार्थियों के लिए रहेगी। दूसरी कतार 500 रुपए सशुल्क वाले दर्शनार्थियों के लिए और तीसरी कतार प्रोटोकॉल- वीआईपी वाले श्रद्धालुओं के लिए। मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष एलएन गर्ग पहले ही स्पष्ट कर चुके थे कि व्यवस्थाओं में परिवर्तन करेंगे और ऑनलाइन पर भी जोर देंगे। श्रावण में बढ़ेगी भीड़ श्री महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन करने के बाद अधिकांश श्रद्धालु कालभैरव मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं। ऐसे में इस मंदिर में भी भीड़ का दबाव रहता है। महाकाल दर्शन रूट पर भी बदलाव की तैयारी श्रावण माह की शुरुआत और महाकाल लोक में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए शहर की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। मंगलवार को ट्रैफिक डीएसपी दिलीपसिंह परिहार और थाना प्रभारी इंद्रपाल सिंह की उपस्थिति में ऑटो व ई-रिक्शा संघ के पदाधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक में सर्वसम्मति बनी है कि बेगमबाग-हरिफाटक से नीलकंठ मार्ग पर लगने वाले जाम से मुक्ति के लिए अब इस रूट पर ऑटो और ई-रिक्शा का प्रवेश बंद करना जरूरी है। डीएसपी परिहार ने बताया कि इस प्रस्ताव को सड़क सुरक्षा समिति की बैठक में कलेक्टर के समक्ष अंतिम नोटिफिकेशन के लिए रखा जाएगा। मंदिर जाने के लिए दो वैकल्पिक मार्ग तय (साइड बॉक्स)     रूट नंबर 1: हरिफाटक- बेगमबाग के बजाय ऑटो व ई-रिक्शा गऊघाट और यंत्र महल के रास्ते होते हुए श्रद्धालुओं को नृसिंह घाट छोड़ेंगे।     रूट नंबर 2: हरिफाटक ब्रिज टी-पॉइंट से इंटरप्रिटेशन सेंटर होते हुए ई-रिक्शा सीधे चारधाम तक जा सकेंगे। (नोट- यदि किसी श्रद्धालु या स्थानीय नागरिक को ई-रिक्शा व ऑटो से गोपाल मंदिर की तरफ जाना है, तो ऑटो व ई-रिक्शा चालक दौलतगंज के रास्ते का उपयोग कर तोपखाना होते हुए जा सकेंगे।)

कालाष्टमी 2026: 10 अप्रैल को है ‘काशी के कोतवाल’ का व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और प्रिय भोग

:कालाष्टमी का दिन भगवान काल भैरव को समर्पित है, जिन्हें भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है. साल 2026 में यह पर्व 10 अप्रैल को मनाया जाएगा. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने से भय दूर होता है और जीवन की परेशानियां समाप्त हो जाती हैं. काल भैरव को “काशी का कोतवाल” भी कहा जाता है, जो अपने भक्तों की हर संकट से रक्षा करते हैं. कालाष्टमी 2026: शुभ मुहूर्त और समय हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत और समाप्ति का समय इस प्रकार है:     अष्टमी तिथि प्रारंभ: 9 अप्रैल 2026, रात्रि 09:19 बजे से     अष्टमी तिथि समाप्त: 10 अप्रैल 2026, रात्रि 11:15 बजे तक     मुख्य व्रत तिथि: उदय तिथि के अनुसार, मुख्य व्रत 10 अप्रैल 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा. प्रिय भोग मान्यता है कि भगवान काल भैरव को इमरती, जलेबी, बाटी-चूरमा, तली हुई पापड़, बेसन के लड्डू और काले उड़द से बनी चीजें अत्यंत प्रिय हैं. इसलिए पूजा के लिए भोग में इन चीजों को अवश्य शामिल करें. इसके अलावा, इस दिन कच्चा दूध और मीठी रोटी का भोग लगाना भी शुभ माना जाता है. शुभ रंग भगवान काल भैरव का संबंध शनि और राहु से भी माना जाता है. इसलिए उन्हें काला और नीला रंग पहनाना शुभ माना जाता है. प्रिय फूल काल भैरव को कनेर और आक के फूल चढ़ाना श्रेष्ठ माना गया है. इसके अलावा उन्हें नीले रंग के फूल जैसे अपराजिता भी अर्पित किए जा सकते हैं. पूजन विधि: ऐसे करें आराधना     स्नान और संकल्प: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और भगवान काल भैरव के व्रत का संकल्प लें.     स्थापना: चौकी पर काल भैरव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें.     अभिषेक: काल भैरव का पंचामृत या कच्चे दूध से अभिषेक करें.     दीपक: चौमुखी दीपक जलाएं, जिसमें सरसों का तेल प्रयोग करें.     पाठ और मंत्र: भगवान काल भैरव के मंत्र “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं” या “ॐ कालभैरवाय नमः” का जप करें. इस दिन काल भैरव अष्टक का पाठ करना विशेष फलदायी होता है.     कथा और चालीसा: भगवान काल भैरव की व्रत कथा और चालीसा का पाठ करें.     आरती: अंत में आरती कर पूजा पूर्ण करें. कालाष्टमी की पौराणिक कथा शिव पुराण के अनुसार, एक बार सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मा जी और पालनकर्ता भगवान विष्णु के बीच यह बहस छिड़ गई कि उनमें सबसे महान कौन है. इस विवाद को सुलझाने के लिए महादेव एक अंतहीन ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. दोनों के बीच यह शर्त रखी गई कि जो भी इस प्रकाश स्तंभ का आदि या अंत खोज लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा. भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण कर पाताल की ओर जाकर सत्य स्वीकार किया कि इसका कोई अंत नहीं है. दूसरी ओर, ब्रह्मा जी हंस बनकर आकाश की ओर गए. अंत न मिलने पर भी उन्होंने छल करके दावा किया कि उन्होंने अंत देख लिया है और केतकी के पुष्प को भी झूठ बोलने के लिए राज़ी कर लिया. ब्रह्मा जी के इस अहंकार और असत्य को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए, और उनके क्रोध से भयंकर रूप वाले काल भैरव प्रकट हुए. काल भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का पांचवां मुख काट दिया, जिससे उन्होंने झूठ बोला था और शिव की निंदा की थी. चूंकि काल भैरव ने एक ब्राह्मण (ब्रह्मा जी) का सिर काटा था, इसलिए उन पर ‘ब्रह्महत्या’ का पाप लगा और वह कटा हुआ सिर उनके हाथ से चिपक गया. इस पाप से मुक्ति पाने के लिए वे तीनों लोकों में भटके, लेकिन अंततः जब वे काशी (वाराणसी) पहुंचे, तो वह सिर उनके हाथ से छूट गया और वे मुक्त हो गए. तभी से काल भैरव को ‘काशी का कोतवाल’ कहा जाता है, जिनके दर्शन के बिना काशी की यात्रा अधूरी मानी जाती है.