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साफ मौसम से त्रिवेणी में दो दिनों में स्नान करने वालों की संख्या 2 करोड़ के पास पहुंची

माघ मेले में मकर संक्रांति स्नान पर्व पर उठी आस्था की लहर, 1 करोड़ से अधिक लोगों ने लगाई पुण्य की डुबकी साफ मौसम से त्रिवेणी में दो दिनों में स्नान करने वालों की संख्या 2 करोड़ के पास पहुंची साधु-संतों और कल्पवासियों के साथ किन्नर अखाड़े ने भी किया भव्य स्नान, हर-हर महादेव की हर तरफ गूंज मेला क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर रही चौकसी, सक्रिय और सतर्क प्रशासनिक मशीनरी से स्नान पर्व सकुशल संपन्न प्रयागराज में मकर संक्रांति स्नान पर्व में माघ मेला में 1.03 करोड़ श्रद्धालुओं ने किया पुण्य स्नान – ऋषिराज, मेला अधिकारी प्रयागराज प्रयागराज में मकर संक्रांति पर्व पर आस्था का सैलाब उमड़ा। त्रिवेणी तट पर आयोजित माघ मेले के दूसरे स्नान पर्व पर देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं ने संगम में पुण्य की डुबकी लगाई। प्रशासन की तरफ से की गई चाक चौबंद व्यवस्था के चलते माघ मेले का दूसरा स्नान पर्व सकुशल संपन्न हो गया। माघ मेला क्षेत्र के विभिन्न घाटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं के पुण्य स्नान करने का सिलसिला शुरू हो गया। कल्पवासियों ने त्रिवेणी तट पहुंच कर संगम में आस्था की डुबकी लगाई और खिचड़ी, गुड़ का दान कर संक्रांति की परम्परा को पूरा किया। दंडी साधुओं और आचार्य सम्प्रदाय के संतों ने नजदीकी गंगा घाटों पर डुबकी लगाई और उत्तरायण भगवान भास्कर की पूजा अर्चना की। माघ मेले में अखाड़ों के स्नान की परम्परा नहीं है, लेकिन अखाड़ों से जुड़े कई नागा संन्यासी भी संक्रांति स्नान के लिए संगम पहुंचे और व्यक्तिगत रूप से मोक्ष की डुबकी लगाई। इसी दौरान ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गंगा पूजन कर अपनी 'गो प्रतिष्ठा प्रेरणा यात्रा' का विधिवत शुभारंभ किया। मौसम खुला होने की वजह से त्रिवेणी में संक्रांति स्नान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई। मेला अधिकारी ऋषिराज ने बताया कि मकर संक्रांति पर बृहस्पतिवार शाम 4 बजे तक 91 लाख से अधिक लोग पुण्य की डुबकी लगा चुके थे और सूर्यास्त तक त्रिवेणी में डुबकी लगाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 1.03 करोड़ पहुंच गई। सनातनी किन्नर अखाड़े ने किया गंगा स्नान, बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न पर संकल्प का आवाहन मकर संक्रांति स्नान पर्व पर सभी समान भाव से पुण्य की डुबकी लगाते दिखाई दिए। माघ मेला क्षेत्र में प्रयागवाल नगर में कल्पवास कर रहा सनातनी किन्नर अखाड़ा पूरे उत्साह के साथ सुबह गंगा तट के लिए निकला । इस दौरान रास्ते में किन्नर अखाड़े के शिष्यों द्वारा तांडव नृत्य की प्रस्तुति की गई, जिसने पूरे वातावरण को भक्तिमय व अलौकिक बना दिया। अखाड़े के सदस्यों ने गंगा तट पहुंचकर सबसे पहले अपनी कुलदेवी बउचरा माता को गंगा स्नान कराया और फिर सामूहिक स्नान किया।  इस दौरान अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर कौशल्या नंद गिरी ने सभी श्रद्धालुओं से अपील की कि बांग्लादेश में जिस तरह से हिंदुओं का उत्पीड़न हो रहा है, उसे देखते यूपी के सीएम योगी जी के सभी सनातनियों के एकजुट होने के आह्वान को संकल्प में बदलने का समय आ गया है। सभी सनातनी एकजुट होंगे तभी सुरक्षित रहेंगे।

ओरछा में मकर संक्रांति के अवसर पर श्रद्धालुओं ने बेतवा नदी में डुबकी लगाई, रामराजा के दर्शन

निवाड़ी  देशभर में आज यानि 15 जनवरी को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जा रहा है. मध्य प्रदेश में लोग नर्मदा, शिप्रा, बेतवा नदी में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं. इसी क्रम में रामराजा नगरी ओरछा में भी आस्था का सैलाब उमड़ा. बड़ी संख्या में श्रद्धालु बेतवा नदी में डुबकी लगाने पहुंचे. साथ ही बेतवा नदी के किनारे लगे मेले का लोग आनंद ले रहे हैं. पुलिस प्रशासन ने भी सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए. ओरछा में उमड़ा आस्था का जनसैलाब मकर संक्रांति के अवसर पर मध्य प्रदेश के धार्मिक व पर्यटन नगरी ओरछा में आस्था का अद्भुत सैलाब उमड़ पड़ा. पर्व के शुभ मुहूर्त के साथ ही भक्तों ने बेतवा नदी में आस्था की पवित्र डुबकी लगाई. मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से पापों का क्षय होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है. स्नान के बाद श्रद्धालु सीधे ओरछा के प्रसिद्ध रामराजा सरकार मंदिर पहुंचे. जहां दर्शन करने वालों की भीड़ देखने लायक थी. श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की. बड़ी संख्या में लोग मंदिर परिसर में दान, तिल-गुड़ वितरण और ब्राह्मण सेवा जैसे पुण्य कार्य करते नजर आए. सुरक्षा के लिए एसडीआरएफ टीम रही मौजूद कई परिवारों ने इस अवसर पर गरीबों को वस्त्र और अन्नदान कर मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व और बढ़ा दिया. दूसरी तरफ प्रशासन और पुलिस भी पूरी तरह सक्रिय दिखे. भीड़ नियंत्रण से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक हर कदम पर सतर्कता देखने को मिली. घाटों पर सुरक्षा ड्यूटी में तैनात पुलिस बल हर एक आवाजाही पर नजर रखे हुए हैं. संवेदनशील घाटों पर एसडीआरएफ की टीमें लगातार मौजूद रहीं और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए साजो-सामान के साथ तैयार रही. स्थानीय प्रशासन ने भी चिकित्सा सहायता, लाइटिंग, बैरिकेडिंग और ट्रैफिक नियंत्रण जैसी व्यवस्थाओं को संभाल रखा था. जिससे भक्तों को किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े. देवभूमि ओरछा में मकर संक्रांति का यह दृश्य भक्ति, अनुशासन और सांस्कृतिक गरिमा का सुंदर संगम बन गया.

सूर्यास्त के बाद मकर संक्रांति का महत्व: ये काम करें शुभ, इन गलतियों से बचें

मकर संक्रांति का पर्व हर साल माघ माह में सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है. आज मकर संंक्रांति का पावन पर्व मनाया जा रहा है. मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं. उत्तरायण का काल देवताओं का माना जाता है, इसलिए मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान-दान का बहुत विशेष महत्व माना गया है. इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन स्नान-दान, पूजा-पाठ और जप-तप करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होते हैं. मकर संक्रांति के दिन उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में खिचड़ी खाई जाती है, इसलिए इसे खिचड़ी भी कहा जाता है. मकर संक्रांति के दिन सूर्यास्त के बाद का समय भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. धर्म शास्त्रों में बताया गया है मकर संक्रांति के दिन सूर्यास्त के समय कुछ काम करने बहुत शुभ होते हैं. साथ ही कुछ गलतियों से बचने के लिए भी कहा गया है. आइए इसके बारे में जानते हैं. मकर संक्रांति पर सूर्यास्त के बाद क्या करना होता है शुभ? मकर संक्रांति के दिन सूर्यास्त के बाद शाम के समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए. इस दिन शाम के समय मंदिर या पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना चाहिए. इस दिन सूर्यास्त के बाद शाम को लड्डू गोपाल के सामने घी का एक अखंड दापक जलाना चाहिए. ऐसा करने से परिवार में सुख-शांति आती है. इस दिन घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाना बहुत शुभ माना जाता है. इस दिन शाम को तुलसी के पास भी दीपक अवश्य जलाएं. इससे जीवन में सुख-समृद्धि आती है. मकर संक्रांति पर न करें ये गलतियां मकर संक्रांति के दिन दक्षिण दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए. इस दिन भूलकर भी बड़ों का अपमान नहीं करना चाहिए. इस दिन मांस-मछली, शराब और लहसुन-प्याज जैसे तामसिक भोजन के सेवन नहीं करना चाहिए. इस दिन झूठ, क्रोध और कटु वाणी बोलने से बचना चाहिए. व्यवहार में सयंम रखना चाहिए.

कल मकर संक्रांति, आज से ही गोरखनाथ मंदिर में उमड़ी आस्था; खिचड़ी चढ़ाने पहुंचे हजारों भक्त

गोरखपुर मकर संक्रांति 2026 को लेकर लोगों में भ्रम था कि इसे 14 जनवरी को मनाया जाए या फिर 15 जनवरी को। ज्योतिषाचार्यों ने भ्रम की इस स्थिति को खत्म करते हुए बता दिया है कि सूर्य 14 जनवरी यानी आज रात 9 बजकर 35 मिनट पर धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। ऐसे में शास्त्रों के अनुसार संक्रांति का पर्व उदया तिथि के आधार पर यानी अगले दिन 15 जनवरी को मान्य होगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने मकर संक्रांति के उपलक्ष्य में होने वाला सार्वजनिक अवकाश भी 14 जनवरी के स्थान पर 15 जनवरी कर दिया है। लेकिन इस बीच 14 जनवरी को तड़के चार बजे गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर पर सदियों पुरानी परंपरा जीवंत हो गई। ब्रह्ममुहूर्त में जैसे ही मंदिर के कपाट खुले, श्रद्धालुओं ने बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित करनी शुरू कर दी। एक दिन पहले मंगलवार से ही बिहार, दिल्ली सहित अन्य राज्यों और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और शहर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर पहुंच गए थे।   सुबह चार बजे से आठ बजे तक खिचड़ी चढ़ाने वालों की भारी भीड़ रही। इस दौरान मुख्य रूप से वे श्रद्धालु दर्शन को पहुंचे, जो पहले से गोरखनाथ मंदिर परिसर में मौजूद थे। सुबह आठ बजे के बाद कुछ समय के लिए भीड़ में कमी आई, लेकिन दस बजे के बाद श्रद्धालुओं की संख्या एक बार फिर तेजी से बढ़ गई। दरअसल, इस समय ट्रेन और अन्य साधनों से दूर-दराज क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मंदिर प्रशासन लगातार अनाउंसमेंट करता रहा। श्रद्धालु सिंह द्वार पर खिचड़ी स्वरूप चावल अर्पित कर दर्शन के लिए आगे बढ़ते दिखे। भीड़ अधिक होने के कारण एक बार में 70 से 80 श्रद्धालुओं को ही मंदिर में प्रवेश दिया जा रहा है। फिलहाल पुरुष श्रद्धालुओं की तुलना में महिलाओं की संख्या अधिक देखी जा रही है। गोरक्षपीठाधीश्वर कल तड़के चढ़ाएंगे खिचड़ी इस वर्ष मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ रही है। ऐसे में गुरुवार को विशेष उत्साह देखने को मिलेगा, जब तड़के सुबह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सबसे पहले गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित करेंगे। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग बैरिकेडिंग की गई है। मंदिर समिति श्रद्धालुओं से अपील कर रही है कि खिचड़ी इधर-उधर न फेंकें। खिचड़ी अर्पित करने के बाद श्रद्धालु उत्तरी द्वार से बाहर निकलकर हनुमान मंदिर के पास से होते हुए पूरे परिसर का भ्रमण कर रहे हैं।  

मकर संक्रांति दो दिन क्यों? जानें सही वजह

मकर संक्रांति को लेकर इस साल लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह पर्व आज यानी 14 जनवरी 2026 को मनाया जाए या फिर 15 जनवरी 2026 को. यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में मकर संक्रांति आज और कल दोनों दिन मनाई जा रही है. इसके पीछे ज्योतिष, पंचांग, परंपरा और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े कई कारण हैं. आइए आसान भाषा में पूरे मामले को समझते हैं. क्यों है तारीखों को लेकर कंफ्यूजन? मकर संक्रांति तब मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. ज्योतिषियों के बीच मतभेद सूर्य के प्रवेश के समय को लेकर है. अधिकांश पंचांगों के अनुसार, सूर्य आज यानी 14 जनवरी को दोपहर 3:13 बजे मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं. वहीं, बनारस के कुछ पंचांगों का मानना है कि यह प्रवेश रात 9:19 बजे होगा. इसी समय के अंतर के कारण त्योहार दो दिन मनाया जा रहा है. आज 14 जनवरी कहां-कहां है धूम? चूंकि अधिकांश पंचांगों के अनुसार, सूर्य का गोचर आज दोपहर में हो रहा है, इसलिए देश के कुछ हिस्सों में ये उत्सव आज भी मनाया जा रहा है. गुजरात और राजस्थान: यहां उत्तरायण और पतंगबाजी का मुख्य जश्न आज ही मनाया जा रहा है. तमिलनाडु: दक्षिण भारत में थाई पोंगल का मुख्य दिन आज 14 जनवरी ही है. शुभ मुहूर्त: द्रिक पंचांग के अनुसार, संक्रांति का पुण्य काल आज दोपहर 3:13 बजे से शाम 5:45 बजे तक रहेगा. कल (15 जनवरी) क्यों मनाई जाएगी संक्रांति? उत्तर प्रदेश, बिहार और वाराणसी के विद्वान 15 जनवरी को त्योहार मनाना अधिक उचित मान रहे हैं. इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं. उदया तिथि और स्थानीय परंपरा शास्त्रों में माना जाता है कि जो तिथि सूर्योदय के समय होती है, उसी का महत्व पूरे दिन रहता है. चूंकि आज सूर्य का प्रवेश दोपहर या रात में हो रहा है, इसलिए उदया तिथि के अनुसार कल 15 जनवरी को मुख्य स्नान और दान होगा. षटतिला एकादशी और चावल का धर्मसंकट इस बार 14 जनवरी को षटतिला एकादशी भी है. हिंदू धर्म में एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित है. मकर संक्रांति का मुख्य प्रसाद ‘खिचड़ी’ है, जो बिना चावल के नहीं बन सकती. ऐसे में व्रत रखने वाले लोग 14 जनवरी को खिचड़ी नहीं खा सकते, इसलिए वे 15 जनवरी को यह पर्व मनाएंगे. दोपहर के स्नान को लेकर शास्त्र क्या कहते हैं? प्रयागराज के ज्योतिषाचार्य पंडित दिवाकर त्रिपाठी के अनुसार, शास्त्रों में दोपहर के स्नान को अच्छा नहीं माना गया है. धर्म सिंधु और नारद पुराण के अनुसार, संक्रांति का पुण्यकाल अगले दिन के मध्याह्न तक रहता है. इसलिए 15 जनवरी की सुबह स्नान और दान करना सबसे उत्तम है. आपके लिए क्या है सही? अगर आप परंपरा और पंचांग को मानते हैं, तो दान-पुण्य और पवित्र नदियों में स्नान के लिए 15 जनवरी की सुबह का समय सबसे श्रेष्ठ है. वहीं, अगर आप केवल उत्सव और पतंगबाजी का आनंद लेना चाहते हैं, तो 14 जनवरी को इसकी शुरुआत हो चुकी है.

मकर संक्रांति: स्नान न करने पर मिलने वाले दंड क्या हैं?

मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में शुभ प्रवेश का प्रतीक है, जो उसकी उत्तर दिशा की यात्रा का संकेत देता है. हिंदू परंपरा में सूर्य की इस गति को बढ़ती रोशनी, गर्मी और नई ऊर्जा से जोड़ा जाता है इसलिए इस त्योहार को शारीरिक शुद्धि, मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक उत्थान के लिए एक शक्तिशाली समय माना जाता है. मकर संक्रांति का त्योहार को लेकर इस बार कंफ्यूजन की स्थिति हुई. कई जगह आज मनाया जा रहा और कई जगह कल मनाया जाएगा. ऐसे में जानते हैं कि इस त्योहार पर स्नान न करने पर श्रद्धालु के जीवन में किस तरह का प्रभाव पड़ता है? सबसे पहले बात करते हैं कि मकर संक्रांति को लेकर कंफ्यूजन की स्थिति क्यों हुई? दरअसल, कई पंचांगों में कहा गया है कि ये त्योहार 14 जनवरी को ही मनाया जाएगा, लेकिन काशी के पंचांग में दावा किया गया है कि सूर्यदेव मकर राशि में 14 जनवरी रात 9 बजकर 19 मिनट पर प्रवेश करेंगे. यही कारण है कि अगले दिन उदया तिथि में त्योहार मनाया जाएगा. इसके अलावा एक तर्क ये भी दिया जा रहा था कि 14 जनवरी को षटतिला एकादशी है, जिसके चलते चालव या अन्न दान नहीं किया जा सकता है. इसे अगले दिन ही मनाना शुभ रहेगा. आखिरकार 15 जनवरी को त्योहार को मनाना शुभ माना गया है. मकर संक्रांति पर स्नान, ध्यान, दान का विशेष आध्यात्मिक महत्व है. इस दिन स्नान करने से पापों का नाश होता है. अगर कोई श्रद्धालु मकर संक्रांति पर स्नान नहीं करता है तो उसे सजा के तौर पर उसके जीवन में कई चीजें घटित हो सकती हैं. मान्यता है कि इस त्योहार पर पवित्र नदियों में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान किया जाता है. खासकर गंगा में स्नान करने का अपना एक महत्व है. इससे पिछले पापों का विनाश होता है, जो भी व्यक्ति घर पर और पवित्र नदी में स्नान नहीं करता है वो विशेष पुण्य लाभ से वंचित रह सकता है. मकर संक्रांति पर स्नान न करने से मनुष्य बनता है दरिद्र? मान्यता ये भी है कि सूर्यदेव के उत्तरायण होने की वजह से प्रकृति में पॉजिटिव एनर्जी का प्रवाह बढ़ता है. कहा गया है कि स्नान न करने से शरीर में तामसिक ऊर्जा और आलस्य बना रहता है. इसकी वजह से सुबह का स्नान करने से शरीर शुद्ध होता है, जोकि नई ऊर्जा के संचार के लिए बहुत जरूरी होता है. कुछ पौराणिक कथाओं में जिक्र किया गया है कि जो व्यक्ति मकर संक्रांति जैसे पर्व पर स्नान और दान नहीं करता, वह अगले जन्म में दरिद्र या रोगों से ग्रसित हो सकता है. शनिदेव हो जाते हैं नाराज! मान्यता के मुताबिक, मकर संक्रांति पर स्नान और दान करने से सूर्य और शनि देव की कृपा बरसती है क्योंकि सूर्य देव के बेटे शनि अपने पिता का स्वागत इस दिन करते हैं. स्नान की अनदेखी करने से इन ग्रहों के शुभ प्रभाव में कमी आ सकती है. अगर कोई श्रद्धालु स्वास्थ्य कारणों या अन्य मजबूरी से नदी में पवित्र स्नान नहीं कर पार रहा है तो उसके लिए एक अलग तरह का विधान है. वह श्रद्धालु घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल डाले और काले तिल मिलाकर स्नान करे. इससे संक्रांति का पूरा पुण्य मिलेगा.

मकर संक्रांति पर शिप्रा-नर्मदा में श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी, रामघाट पर हुआ दान

नर्मदापुरम / उज्जैन/जबलपुर/खंडवा/खरगोन उज्जैन में मकर संक्रांति पर्व पर सुबह से श्रद्धालु स्नान के लिए शिप्रा नदी के रामघाट सहित दत्त अखाड़ा घाट और अन्य घाटों पर स्नान कर रहे हैं। रामघाट पर सुबह से ही ठंड के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते नजर आए।  मकर संक्रांति के अवसर पर बुधवार  को उज्जैन के महाकाल मंदिर में भगवान महाकाल को तिल के तेल से स्नान कराया गया. वही पुण्य सलिला शिप्रा नदी के घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी. पौष मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन सूर्योदय के साथ ही श्रद्धालुओं ने घाटों का रुख करना शुरू कर दिया. कड़ी ठंड के बावजूद रामघाट और शिप्रा के अन्य घाटों पर भक्तों ने आस्था की डुबकी लगाई. स्नान के बाद भक्तों ने दान-पुण्य किया और महाकालेश्वर मंदिर में भगवान महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त किया.  घाटों पर होने वाली भीड़ की सुरक्षा को देखते हुए होमगार्ड और एसडीआरएफ की टीमें लगातार घाटों पर सतत निगरानी कर रही हैं। आला अधिकारियों के मुताबिक होमगार्ड और एसडीआरएफ की टीमें घाटों पर मौजूद हैं, जो श्रद्धालुओं को गहरे पानी में न जाने की चेतावनी देती रहीं। इस बार 14-15 जनवरी को दो दिन संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है। आज घरों में तिल और गुड़ की मिठास रहेगी, वहीं सार्वजनिक स्थलों पर कई जगह पतंग महोत्सव का भी आयोजन किया जाएगा। दोपहर 3:05 बजे मकर संक्रांति पर्व की शुरुआत पंडित जी के  अनुसार, 14 जनवरी को दोपहर 3:05 बजे सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेगा। यानी दोपहर 3:05 बजे से सूर्य की मकर संक्रांति पर्व की शुरुआत होगी। दान-पुण्य के लिहाज इसका प्रभाव 15 जनवरी को माना जाएगा। क्योंकि धर्मशास्त्रों के अनुसार यदि सूर्य की संक्रांति दोपहर में या उसके बाद होती है, तो उसका पर्व काल अगले दिन मनाया जाता है।

मकर संक्रांति की तारीख तय क्यों हो गई? अगले 54 वर्षों तक 15 जनवरी का ही संयोग

नई दिल्ली ग्रहों के राजा सूर्य 14 जनवरी की रात्रि 9:39 बजे धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के इस राशि परिवर्तन को ही मकर संक्रांति कहा जाता है। इस वर्ष संक्रांति का पुण्यकाल लगभग 16 घंटे तक रहेगा, जो अगले दिन सूर्योदय के बाद 15 जनवरी की दोपहर तक माना जाएगा। क्यों बदलती है मकर संक्रांति की तिथि? ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य के राशि परिवर्तन में हर वर्ष लगभग 20 मिनट की देरी होती है। इस प्रकार 3 वर्षों में लगभग 1 घंटे का अंतर, 72 वर्षों में 24 घंटे यानी 1 दिन का अंतर हो जाता है। चूंकि सूर्य और चंद्रमा अपने मार्ग में पीछे नहीं चलते, इसलिए हर 72 वर्षों में संक्रांति की तिथि एक दिन आगे बढ़ जाती है।   2080 तक 15 जनवरी को ही संक्रांति ज्योतिषविद् आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री के अनुसार, इस गणना के आधार पर वर्ष 2080 तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी। इसके बाद संक्रांति की तिथि बढ़कर 16 जनवरी हो जाएगी। हालांकि 72 वर्षों का यह चक्र वर्ष 2008 में ही पूरा हो गया था, लेकिन कुछ वर्षों तक सूर्य का राशि परिवर्तन प्रातः काल में होने के कारण पूर्वकाल मानकर मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाती रही। पहले कब-कब मनाई जाती थी मकर संक्रांति?     1936 से पहले: 14 जनवरी     1864 से 1936: 13 जनवरी     1792 से 1863: 12 जनवरी विशेष बात यह है कि 12 जनवरी 1863, जब स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था, उस दिन मकर संक्रांति का पर्व था। इस वर्ष का योग और धार्मिक महत्व इस वर्ष मकर संक्रांति का पर्व वृद्धि योग, शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि, ज्येष्ठा नक्षत्र और गुरुवार के दिन मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन साधारण नदी में स्नान भी गंगा स्नान के समान पुण्यकारी माना गया है। राशि के अनुसार करें दान मकर संक्रांति के दिन स्नान-दान का विशेष महत्व है। जातक अपनी राशि के अनुसार दान कर पुण्य अर्जित कर सकते हैं। इस दिन किसी का अपमान न करें, पेड़ न काटें और तुलसी की पत्तियां न तोड़ें।     मेषः लाल मिर्च, लाल वस्त्र, मसूर दाल     वृषभः सफेद तिल के लड्डू, चावल, चीनी     मिथुनः हरी सब्जियां, मौसमी फल, साबुत मूंग     कर्कः जरूरतमंदों को सफेद वस्त्र, घी     सिंहः गुड़, चिक्की, शहद, मूंगफली का दान     कन्याः मूंग दाल की खिचड़ी बनाकर जरूरतमंदों को खिलाएं     तुलाः सफेद वस्त्र, मखाना, चावल, चीनी     वृश्चिकः मूंगफली, गुड़, लाल रंग के गर्म कपड़े     धनुः पीले वस्त्र, केले, बेसन, चने की दाल     मकरः काले तिल के लड्डू, कंबल     कुंभः ऊनी कपड़े, सरसों तेल, जूता-चप्पल     मीनः पीली सरसों, चने की दाल, मौसमी फल

मकर संक्रांति की तारीख में उलझन: 15 जनवरी, एकादशी और दो बड़े झोल

भारत में त्योहारों की तिथि को लेकर अक्सर असमंजस की स्थिति रहती है, और इस बार मकर संक्रांति 2026 को लेकर भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. ज्योतिषविदों के अनुसार, इस साल मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को मनाया जाना अधिक श्रेष्ठ बताया जा रहा है. लेकिन आखिर ऐसा क्यों है? इसके पीछे दो सबसे बड़े ज्योतिषीय कारण हैं और साथ ही एक ऐसा दुर्लभ संयोग बन रहा है जो पूरे 23 साल बाद आया है. आइए जानते हैं. सूर्य का गोचर और पुण्य काल का समय ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तभी मकर संक्रांति मनाई जाती है. साल 2026 में सूर्य देव 14 जनवरी की दोपहर 3:13 बजे मकर राशि में प्रवेश करेंगे. शास्त्रों का नियम है कि यदि संक्रांति दोपहर के बाद (सूर्यास्त के करीब) लगती है, तो उसका पूर्ण पुण्य काल और दान-स्नान अगले दिन के सूर्योदय पर करना सबसे उत्तम होता है. यही कारण है कि 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाना शास्त्र सम्मत माना जा रहा है. उदया तिथि की मान्यता हिंदू धर्म में उदया तिथि वह तिथि जो सूर्योदय के समय मौजूद हो का विशेष महत्व है. चूंकि 14 जनवरी को सूर्य का राशि परिवर्तन दोपहर में हो रहा है, इसलिए 15 जनवरी की सुबह जब सूर्योदय होगा, तब संक्रांति की तिथि प्रभावी रहेगी. इसी उदया तिथि के कारण देश के अधिकांश हिस्सों में 15 जनवरी को ही पवित्र स्नान, सूर्य अर्घ्य और दान के कार्य किए जाएंगे. 23 साल बाद बना दुर्लभ संयोग: षटतिला एकादशी की बाधा इस बार मकर संक्रांति की तिथि के साथ एक बड़ी दिलचस्प बात जुड़ी है. 14 जनवरी को षटतिला एकादशी भी पड़ रही है. ज्योतिषीय गणना बताती है कि ऐसा संयोग लगभग 23 साल पहले साल 2003 में बना था. खिचड़ी खाने को लेकर क्यों है उलझन? मकर संक्रांति पर मुख्य रूप से चावल और दाल की खिचड़ी खाई जाती है. लेकिन एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है. ऐसे में जो लोग एकादशी का उपवास रखते हैं, उनके लिए 14 जनवरी को संक्रांति मनाना कठिन होगा. इसी वजह से विद्वानों का मत है कि 14 जनवरी को आप तिल, गुड़ और फलाहार का सेवन करें. फिर अगले दिन यानी 15 जनवरी को संक्रांति का पारंपरिक भोजन यानी खिचड़ी खाएं और दान करें. आध्यात्मिक महत्व धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो सूर्य का मकर राशि में आना और भगवान विष्णु की प्रिय एकादशी तिथि का एक ही समय पर होना बेहद शुभ है. इसे विष्णु-भक्ति और सूर्य-तत्व का अद्भुत मिलन कहा जा रहा है. इसलिए इस दिन किया गया दान और पूजा सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होगी.

सूर्य का मकर राशि में गोचर आज रात 9:19 बजे, जानें संक्रांति की सही तिथि

इस साल मकर संक्रांति 2026 को लेकर कंफ्यूजन है क्योंकि कहा जा रहा है कि 14 की जगह 15 जनवरी को ये त्योहार मनाना ज्यादा शुभ रहेगा. इसको लेकर सबसे बड़े दो तर्क दिए जा रहे हैं कि 14 जनवरी को षटतिला एकादशी है, जिसके चलते अन्न दान नहीं किया जा सकता है और दूसरा सूर्य देव मकर राशि में रात 9 बजकर 13 मिनट पर प्रवेश कर रहे हैं, ऐसे में उदया तिथि यानी 15 जनवरी को ही स्नान, ध्यान, दान करना उचित माना जा रहा है. इन सब के पीछे ज्योतिषाचार्यों ने तर्क दिए हैं. हालांकि द्रिक पंचांग के मुताबिक, मकर संक्रांति का पुण्य काल 14 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से शुरू हो रहा है, जोकि शाम 5 बजकर 45 मिनट तक रहेगा. ये अवधि 2 घंटे 32 मिनट तक की है. इसके अलावा महापुण्य काल दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से शुरू हो रहा है, जोकि शाम 4 बजकर 58 मिनट तक रहेगा. इसकी अवधि 1 घंटा 45 मिनट है. पंचांग के अनुसार, ‘मकर संक्राति के शुरू होने के बाद 40 घटी तक का समय मकर संक्रांति से संबंधित शुभ कार्य करने के लिए उत्तम माना गया है. 1 घटी की अवधि 24 मिनट होती है, ऐसे में 40 घटी का समय 16 घंटे होते हैं. 40 घटी का समयपुण्य काल के नाम से भी जाना जाता है. इस दौरान श्रद्धालु व्रत रख पवित्र स्नान कर भगवान सूर्य को नैवेद्य अर्पण करते हैं. साथ ही साथ दान-दक्षिणा, श्राद्ध कर्म और व्रत का पारण करते हैं. ये सभी गतिविधियां पुण्यकाल के समय ही की जानी जरूरी होती हैं.’ कब मनाएं मकर संक्रांति? द्रिक पंचांग के मुताबिक, ‘यदि मकर संक्रांति सूर्यास्त के बात होती है, तो ऐसी स्थिति में पुण्यकाल की सभी गतिविधियां अगले दिन सूर्योदय काल तक स्थगित कर दी जाती हैं, ऐसे में पुण्य काल की सभी गतिविधियां दिन के समय ही संपन्न करनी चाहिए.’ अगर, द्रिक पंचांग की मानें तो मकर संक्रांति मनाने का सही दिन 14 जनवरी है. 15 जनवरी को मनाई जाएगी मकर संक्रांति मकर संक्रांति को लेकर प्रयागराज के ज्योतिषाचार्य पंडित दिवाकर त्रिपाठी ने TV9 डिजिटल से बात करते हुए कहा कि कोई भी ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में कूदकर नहीं जाता है. वह संचरण करते हुए जाता है. सूर्य एक दिन में एक डिग्री प्रवेश करता है और उसे दूसरे ग्रह में जाने के लिए 30 दिन लग जाते हैं इसलिए संक्रांति की काल 12 से 16 घंटे माना गया है. हमें मकर की संक्रांति चाहिए न कि धनु की. संक्रांति धनु में भी रहेगी तो भी पुण्यकाल रहेगा क्योंकि इसे 12 घंटे पहले और 16 घंटे बाद तक माना जाता है. उन्होंने कहा कि हमें सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर जाएंगे उस समय मकर की संक्रांति चाहिए. काशी के पंचांगों के मुताबिक, रात में सूर्य 9 बजकर 19 पर मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं. नारद पुराण के 123वें पेज में कहा गया है कि मकर की संक्रांति होने पर 30 घटी पहले और 40 घटी बाद तक पुण्यकाल होता है. इसी तरह धर्म सिंधु में जिक्र किया गया है. ये पुण्यकाल 15 जनवरी के मध्यान तक पड़ेगा इसलिए मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी. मकर संक्रांति पर क्या करें दान? मकर संक्रांति पर दान देना सबसे बड़ा पुण्य माना गया है. इस दिन कन्याओं और गरीबों को दान दिया जाता है. श्रद्धालु तिल-गुड़, खिचड़ी, गर्म कपड़े, कंबल, अनाज घी और शहद दान देते हैं. दरअसल, तिल का दान करने से पाप का विनाश होता है और गुड़ दान करने से सूर्य भगवान खुश होते हैं. खिचड़ी दान करने से शनि और चंद्रमा के पड़ने वाले अशुभ प्रभाव कम हो जाते हैं. वहीं, गर्म कपड़े दान करने से गरीबों का आशीर्वाद मिलता हैं और काले व नीले कंबल दान करने से शनि देव की कृपा बरसती है. इसके अलावा अनाज और घी-शहद भी जीवन में मधुरता लाते हैं.