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नई सरकार से पहले बड़ा संकेत! क्या यूनुस बनेंगे बांग्लादेश के नए राष्ट्रपति?

ढाका बांग्लादेश में नई सरकार की गठन की तैयारियां चल रही हैं। इसी बीच कयास लागे जा रहे हैं कि अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार रहे नोबेल विजेता मोहम्द यूनुस को भी कोई संवैधानिक पद दिया जा सकता है। हालांकि इसपर मुहर नहीं लगी है।  अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद सेना के समर्थन से नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को बांग्लादेश का शासन सौंप दिया गया था। वह अंतरिम सरकार के सलाहकार के तौर पर इतने दिनों तक कामकाज देखते रहे। वहीं अब आम चुनाव के बाद बीएनपी चीफ तारिक अहमद 17 फरवरी को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। इस बीच मोहम्मद यूनुस को लेकर भी कई चर्चाएं गर्म हैं। जानकारों का कहना है कि आगे भी उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। क्या राष्ट्रपति बनेंगे मोहम्मद यूनुस सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि मोहम्मद यूनुस को कोई बड़ा संवैधानिक पद दिया जा सकता है। रहमान के करीबी हुमायूं कबीर ने कहा, अब तक किसी की भूमिका तय नहीं की गई है। मोहम्मद यूनुस को लेकर भी आगे का कोई फैसला नहीं हुआ है। इतना जरूर हैकि उन्होंने देश को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा साथ खड़े रहने का आश्वासन दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक हुमायूंकबीर ने कहा, अभी किसी के डिपार्टमेंट को लेकर भी चर्चा नहीं हुई है। तारिक रहमान की प्राथमिकता एक समावेशी सरकार बनाना है। इस चुनी हुई सरकार में लोगों की प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल किया जाएगा.। सांसदों के अनुभव, उनकी विशेषज्ञता के आधार पर उन्हें जिम्मेदारी दी जाएगी। बता दें कि फिलहाल मोहम्मद शहाबुद्दीन बांग्लादेश के राष्ट्रपति हैं। लेखक डेविड बर्जमैन का मानना है कि मोहम्मद यूनुस को राष्ट्रपति बनाने से उनके अनुभवा का लाभ बांग्लादेश को मिल सकता है। उन्होंने कहा, मोहम्मद यूनुस की कई मामलों में आलोचना होती है, इसके बावजूद अंतरारष्ट्रीय स्तर पर उनकी मान्यता है। अगर प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सोच रखने वाले व्यक्ति का साथ मिलता है तो यह सोने पर सुहागा होगा। उन्हें विदेश नीति को लेकर मोहम्मद यूनुस से काफी मदद मिल सकती है। बर्जमैन ने दावा किया कि इस मामले को लेकर तारिक रहमान और मोहम्मद यूनुस के बीच वार्ता हो चुकी है। हालांकि दोनों की टीमों की ओर से ऐसे कयासों को खारिज किया गया है। जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय नीतियों को लेकर मोहम्मद यूनुस तारिक रहमान के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। वहीं यूनुस के प्रेस सेक्रेटरी ने कहा कि उनकी राजनीति में ज्यादा कोई रुचि नही है और ना ही वह कोई संवैधानिक पद चाहते हैं। वह फिर से वापस जाना चाहते हैं और अपना महत्वपूर्ण समय खुद को देना चाहते हैं। उन्होंने बहुत सारे लक्ष्य हासिल किए हैं और अब सत्ता का हस्तांतरण कर रहे हैं। अपने बारे में मोहम्मद यूनुस ने कुछ नहीं बताया है।  

बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए कठिनाई, मोहम्मद यूनुस की एक गलती का पड़ा असर

ढाका  बांग्लादेश आज हिंसा और कट्टरपंथ की आग में झुलस रहा है. मुहम्मद यूनुस की एक गलती की सजा अब बांग्लादेश भुगत रहा है. चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, हर कोई हिंसा की आग में जल रहा है. आज बांग्लादेश की जो हालत है, उसकी जड़ें मुहम्मद यूनुस के एक फैसले से जुड़ी हैं. जी हां, जिस फैसले को यूनुस ने लोकतांत्रिक बताकर पेश किया था, आज वही फैसला बांग्लादेश के लिए अभिशाप बन गया है. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मु्हम्मद यूनुस के उस फैसले के कारण ही बांग्लादेश में हिंदू और मुसलमान के बीच खाई बढ़ गई है. अब नौबत यह है कि कभी हिंदू युवक दीपू दास और सम्राट की लिंचिंग हो जाती है तो कभी मुसलमान उस्मान हादी की हत्या. अब सवाल है कि आखिर यूनुस की वह गलती क्या है, जिसका अंजाम बांग्लादेश की आवाम भुगत रही है. कैसे वह एक फैसला हिंदुओं के लिए काल बन चुका है. दरअसल, शेख हसीना के पद छोड़ते ही मुहम्मद यूनुस ने बांग्लादेश में एक ऐसा फैसला लिया, जिसने पूरे देश को अस्थिरता और कट्टरपंथ की आग में झोंक दिया. वह फैसला था जमात-ए-इस्लामी से बैन हटाना. जी हां, नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने शेख हसीना के देश छोड़ते ही जमात-ए-इस्लामी पर लगा प्रतिबंध हटा लिया था. इसे ही अब बांग्लादेश की मौजूदा दुर्दशा और हिंदू समुदाय पर बढ़ते अत्याचारों का मुख्य कारण माना जा रहा है. जमात-ए-इस्लामी एक कट्टरपंथी संगठन है. यह खिलाफत राष्ट्र की वकालत करता है. इसका पाकिस्तान प्रेम समय-समय पर झलका है. यूनुस के इसी फैसले ने एक कट्टरपंथी संगठन को खुली छूट दे दी, जिसका नतीजा आज बांग्लादेश में फैलते अतिवादऔर अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमलों के रूप में दिखाई दे रहा है. यूनुस की वो साजिशन गलती क्या 8 अगस्त ही वह तारीख थी, जब बांग्लादेश के बुरे दिन शुरू हो गए थे. पिछले साल 8 अगस्त को ही एक बड़ा फैसला हुआ था. वही फैसला अब पूरे बांग्लादेश को परेशान कर रहा है. उसके चलते ही बांग्लादेश की शांति खत्म हो गई है. जगह-जगह हिंसा हो रही है. बांग्लादेश का लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ चुका है. उसके आगे अब यूनुस की भी नहीं चल रही है. जी हां, 8 अगस्त को ही मोहम्मद यूनुस ने जमात-ए-इस्लामी नाम के संगठन पर लगा बैन हटा दिया था. यह संगठन कट्टरपंथी है और हिंदुओं से नफरत करता है. इस फैसले से बांग्लादेश में कट्टरवाद बढ़ गया और हिंदुओं पर हमले ज्यादा हो गए. क्यों शेख हसीना ने लगाया था बैन पहले शेख हसीना की सरकार ने 1 अगस्त 2024 को जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र ग्रुप इस्लामी छत्र शिबिर पर रोक लगाई थी. वजह थी छात्र कोटा के खिलाफ प्रदर्शनों में हुई हिंसा, जहां 150 से ज्यादा लोग मारे गए. शेख हसीना ने इसे आतंकवाद रोकने वाले कानून के तहत बैन किया, क्योंकि यह संगठन हिंसा फैलाने में डायरेक्ट शामिल था. जमात-ए-इस्लामी की शुरुआत 1941 में हुई थी. यह संगठन पूरी तरह से पाकिस्तान परस्त है. वह आईएसआई के इशारों पर काम करता है. इसकी झलक पूरी दुनिया 1971 के जंग में देख चुकी है. जी हां, 1971 के बांग्लादेश आजादी के युद्ध में जमात-ए-इस्लीमी ने पाकिस्तान की सेना का साथ दिया था और लाखों लोगों की हत्या में उसकाा हाथ था. साल 2013 में बांग्लादेश की कोर्ट ने इसे चुनाव लड़ने से रोक दिया था, क्योंकि इसका नियम संविधान के खिलाफ था. जमात-ए-इस्लामी क्या चाहता है? लेकिन 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना ने इस्तीफा दिया और भारत चली आईं. इसके बाद इस कट्टरपंथी संगठन के अच्छे दिन शुरू हो गए. 8 अगस्त को यूनुस की सरकार ने बैन हटा लिया. यूनुस सरकार ने कहा कि जमात की कोई आतंकी गतिविधि नहीं है और शेख हसीना सरकार का आरोप गलत था. पर सच तो यह है कि जमात कट्टर इस्लामी संगठन है, जो बांग्लादेश को शरिया कानून वाला देश बनाना चाहता है. इसका छात्र ग्रुप शिबिर बहुत हिंसक है, जो दुश्मनों की हत्या करता है, धार्मिक झगड़े भड़काता है और झूठी खबरें फैलाता है. यह संगठन हिंदुओं से नफरत करता है और दूसरे कट्टर ग्रुपों से जुड़ा है. साल 2013 में युद्ध अपराध के फैसले के बाद इसके लोगों ने 50 से ज्यादा हिंदू मंदिर तोड़े और 1,500 से ज्यादा हिंदू घरों-दुकानों को आग लगाई. बांग्लादेश में हिंदुओं के प्रति नफरत बढ़ गया है. जमात अब दे रहा हिंदुओं को जख्म मोहम्मद यूनुस के इसी फैसले से जमात को फिर से ताकत मिली. बैन हटने के बाद उन्होंने ढाका में बड़ी-बड़ी रैलियां कीं और कट्टरवाद फैलाया. यूनुस की सरकार आने के बाद देश में कट्टर ग्रुप मजबूत हुए, जिससे अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और लोगों के बीच एकता खराब हुई. सबसे ज्यादा नुकसान हिंदुओं को हुआ. 2024 की हिंसा में 4 से 20 अगस्त तक 2,010 हमले हुए, 1,705 परिवार प्रभावित हुए, 157 घर-दुकानें लूटी या जलाई गईं, और 152 मंदिरों को नुकसान पहुंचा. हिंदुओं की हत्याओं में जमात का कट्टरवाद साफ दिखता है, जहां राजनीति के नाम पर सांप्रदायिक हमले होते हैं. इस जमात के कारण ही बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार बढ़े. अभी बीते कुछ समय से जो हालात बने हुए हैं, उसके पीछे भी जमात है. दीपू दास की हत्या भी जमात की भीड़ ने की. शेख हसीना ने क्यों लगाया था जमात-ए-इस्लामी पर बैन?     शेख हसीना सरकार ने जमात-ए-इस्लामी पर इसलिए प्रतिबंध लगाया था क्योंकि यह संगठन खुले तौर पर कट्टर इस्लामी विचारधारा को बढ़ावा देता रहा है.     जमात पर 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान युद्ध अपराधों, नरसंहार और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के गंभीर आरोप रहे हैं.     शेख हसीना सरकार का मानना था कि यह संगठन लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए खतरा है.     इसी वजह से जमात-ए-इस्लामी को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखा गया था. मुहम्मद यूनुस ने बैन हटाकर दी खुली छूट     शेख हसीना के सत्ता से हटते ही अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने जमात-ए-इस्लामी से प्रतिबंध हटा दिया.     यूनुस सरकार की तरफ से तर्क दिया गया कि जमात-ए-इस्लामी आतंकी गतिविधियों में शामिल नहीं है और उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अधिकार … Read more