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MP हाई कोर्ट का फैसला- ‘पत्नी की व्यक्तिगत इनकम को पति से नहीं जुड़ेगी’

जबलपुर. हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह व न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की युगलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में जांच एजेंसी पत्नी की व्यक्तिगत आय को सरकारी विभाग में पदस्थ पति की आय में जोड़कर असेसमेंट नहीं कर सकती है। कोर्ट से इस आदेश के साथ अभियोजन स्वीकृति के आदेश व आगे की कार्रवाई को निरस्त कर दिया है। याचिकाकर्ता रीवा निवासी अधिवक्ता मीनाक्षी खरे व उनके पति आलोक खरे की ओर से दायर याचिका में आय से अधिक संपत्ति का गलत असेसमेंट करने व उनके विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता आलोक खरे वर्तमान में आबकारी विभाग में डिप्टी कमिश्नर में पद पर रीवा में पदस्थ है। याचिकाकर्ता मीनाक्षी पेशे से अधिवक्ता हैं और शादी के पहले से आयकर रिटर्न फाइल कर रही हैं। वर्ष 2018 में लोकायुक्त ने आलोक खरे के घर और कार्यालय में दबिश दी थी। लोकायुक्त ने जांच में चार सितम्बर, 1998 से 15 अक्टूबर, 2019 तक याचिकाकर्ता की संपत्ति और खर्च से जुड़ा डेटा एकत्र किया था। लोकायुक्त के अनुसार याचिकाकर्ताओं के पास वैध आय स्त्रोत से लगभग 88.20 प्रतिशत अधिक संपत्ति मिली थी। लोकायुक्त ने उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर लिया था और सरकार की ओर से अभियोजन की स्वीकृति प्रदान कर दी गई। याचिका में कही गई यह बात याचिका में कहा गया था कि लोकायुक्त के अनुसार याचिकाकर्ताओं के पास से 10 करोड़ 71 लाख रुपये की संपत्ति मिली थी। जबकि उनकी वैध आय 5 करोड़ 69 लाख रुपये थी। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि अधिवक्ता होने के कारण मीनाक्षी की अच्छी-खासी आय थी और वह अपने परिवार की आर्थिक मदद करती थी। उन्होने अपनी आय से खेती की जमीन खरीदी और उससे इस अवधि के दौरान 4 करोड़ 81 लाख रुपये की आय हुई थी। दोनों याचिकाकर्ताओं की वैध आय को जोड़कर देखा जाए तो 10 करोड़ 50 लाख रुपये हैं। जो लोकायुक्त द्वारा किए गए असेसमेंट से 21 लाख रुपये अधिक है। जो लगभग आय के वैध स्त्रोत से दो प्रतिशत अधिक है। आय के वैध स्त्रोत से 10 प्रतिशत से अधिक संपत्ति पाए जाने पर अभियोजन की अनुमत्ति प्रदान नहीं की जा सकती है। हाई कोर्ट ने दिया यह फैसला हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता महिला अधिवक्ता ने इनकम टैक्स रिटर्न के साथ-साथ खेती से हुई इनकम को ध्यान में रखा जाए, तो मंज़ूरी देने वाली ऑथरिटी को मंज़ूरी नहीं देनी चाहिए थी। प्रकरण को प्रारंभ में ही खत्म कर देना चाहिए था। इनकम के जाने-पहचाने सोर्स का आशय ऐसी इनकम से है जो मध्य प्रदेश सिविल सर्विस रूल्स, 1965 के रूल 19 के अनुसार सही तरीके से बनाई गई हो। कानूनी टैक्स फाइलिंग से साबित हुई इनकम कानून की नजर में जानी-पहचानी और वैध इनकम है। युगलपीठ ने अभियोजन स्वीकृति के विवादित मंज़ूरी आर्डर व आगे की कार्रवाई को निरस्त कर दिया।

एमपी हाईकोर्ट अपडेट: जजों के खाली पदों की वजह से लंबित 4.8 लाख से ज्यादा केस, निपटान में लगेगा चार दशक

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर और खंडपीठ इंदौर व ग्वालियर में यदि न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या 42 से बढ़कर 75 या 85 नहीं होती है, तो साढ़े चार लाख 80 हजार से अधिक लंबित प्रकरणों का बैकलाग खत्म करने में पांच या दस साल नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय लग सकता है। एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण इस संबंध में एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी लंबित मामलों के बढ़ने का प्रमुख कारण है। ऐसे में हाई कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति और उनके समाधान पर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक हो गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39-ए के तहत राज्य का यह दायित्व है कि प्रत्येक नागरिक को न्याय तक समान और प्रभावी पहुंच सुनिश्चित की जाए। लेकिन यदि न्याय मिलने में दशकों का समय लगे, तो यह संवैधानिक प्रावधान केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। वर्तमान स्थिति इसी ओर संकेत करती है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में 11 जजों की कमी, बढ़ते मामलों से बढ़ेगी मुश्किल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की बात करें तो यहां 53 स्वीकृत पदों के मुकाबले फिलहाल केवल 42 न्यायाधीश कार्यरत हैं। यानी 11 पद रिक्त, जो कुल स्वीकृत संख्या का करीब 20.75 प्रतिशत है। यह आंकड़ा इसलिए और चिंताजनक हो जाता है, क्योंकि मध्य प्रदेश पहले से ही लंबित मामलों के मामले में देश के बड़े राज्यों में शामिल है। हाईकोर्ट में जजों की यह कमी न केवल मामलों की सुनवाई को धीमा करती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में आम लोगों के भरोसे को भी कमजोर करती है। वकीलों और सामाजिक संगठनों का लंबे समय से कहना रहा है कि जजों की कमी के कारण नियमित सुनवाई संभव नहीं हो पाती और तारीख पर तारीख न्याय व्यवस्था की पहचान बनती जा रही है। केंद्र सरकार ने संसद को यह भी बताया कि जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका में नियुक्ति और पदों का निर्धारण संबंधित राज्य सरकार और हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में कुल 1639 न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं। इनमें से 803 जज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं, जो कुल कार्यरत संख्या का 48.99 प्रतिशत है। वहीं, करीब 51 प्रतिशत न्यायिक अधिकारी अन्य वर्गों से हैं। हालांकि, सरकार ने संसद में जिला-वार रिक्त पदों का कोई अलग-अलग ब्योरा पेश नहीं किया। इससे यह साफ हो जाता है कि मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में निचली अदालतों पर बढ़ते बोझ के बावजूद, जजों की वास्तविक कमी का जिला स्तर पर कोई सार्वजनिक और पारदर्शी आकलन सामने नहीं आया है। जानकारों का मानना है कि अगर जिला-वार आंकड़े सामने आएं, तो स्थिति और भी गंभीर नजर आ सकती है। देशभर की स्थिति: कई हाईकोर्ट में हालात बेहद गंभीर अगर देशभर की तस्वीर पर नजर डालें, तो हालात केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में 94 स्वीकृत पदों में से 14 पद खाली हैं, यानी करीब 14.9 प्रतिशत। दिल्ली हाईकोर्ट में 60 में से 16 पद (26.6 प्रतिशत) और मद्रास हाईकोर्ट में 75 में से 22 पद (29.3 प्रतिशत) रिक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी 34 स्वीकृत पदों में से एक पद खाली है, जो भले ही प्रतिशत में कम लगे, लेकिन शीर्ष अदालत में हर एक जज की भूमिका बेहद अहम होती है। इलाहाबाद, कलकत्ता और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में सबसे ज्यादा संकट आंकड़ों के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की कमी सबसे ज्यादा है। यहां 160 स्वीकृत पदों के मुकाबले 50 पद खाली हैं, यानी 31.25 प्रतिशत। कलकत्ता हाईकोर्ट की स्थिति और भी गंभीर है, जहां 72 में से 29 पद रिक्त हैं, जो 40.3 प्रतिशत बैठता है। वहीं जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख और झारखंड हाईकोर्ट में हालात बेहद चिंताजनक बताए गए हैं, जहां 44 प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि देश के कई हिस्सों में न्यायपालिका संसाधनों की भारी कमी से जूझ रही है। मध्य प्रदेश की निचली अदालतों में वर्गवार प्रतिनिधित्व मध्य प्रदेश में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों का वर्गवार विवरण भी संसद में पेश किया गया। इसके अनुसार:     अनुसूचित जाति (SC): 263 जज – लगभग 16.05%     अनुसूचित जनजाति (ST): 232 जज – लगभग 14.15%     अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 308 जज – लगभग 18.79%     अन्य वर्ग: 836 जज – लगभग 51.01% कुल मिलाकर 1639 कार्यरत न्यायिक अधिकारियों में से लगभग आधे SC, ST और OBC वर्ग से हैं। हालांकि, सवाल यह भी उठ रहा है कि जब पद ही पर्याप्त नहीं हैं, तो प्रतिनिधित्व के ये आंकड़े न्यायिक बोझ को कितना कम कर पा रहे हैं। भोपाल के एडवोकेट सुनील आदिवासी ने द मूकनायक से बातचीत में न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि अदालतों में जजों की कमी तो पहले से ही एक बड़ी समस्या है, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि दलित और आदिवासी वर्ग से आने वाले जज केवल नाम मात्र के बराबर रह गए हैं। उनका कहना है कि सामाजिक न्याय की जिस अवधारणा की बात संविधान करता है, वह तब तक अधूरी रहेगी, जब तक न्याय देने वाली व्यवस्था में ही वंचित तबकों की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाती। एडवोकेट सुनील आदिवासी ने आगे कहा कि जब न्यायपालिका में दलित-आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व बेहद सीमित होता है, तो इसका असर फैसलों की संवेदनशीलता और समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय की पहुंच पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते जजों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता और प्रतिनिधित्व पर ध्यान नहीं दिया गया, तो न्यायपालिका से आम जनता का भरोसा कमजोर होना तय है। न्याय में देरी और न्याय से वंचित? विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की कमी सीधे-सीधे न्याय में देरी से जुड़ी हुई है। जब एक-एक जज पर हजारों मामलों का बोझ हो, तो त्वरित और प्रभावी न्याय की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला अदालतों तक रिक्त पदों को भरने में हो रही देरी पर … Read more

जबलपुर हाईकोर्ट ने दी बड़ी राहत, प्रोबेशन पीरियड के कर्मचारियों को मिलेगा पूरा वेतन

  जबलपुर जबलपुर हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश के हजारों सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट के द्वारा प्रोबेशन पीरियड में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन में कटौती को अवैध बताते हुए आदेश जारी किया है कि जिन कर्मचारियों का वेतन काटा गया है। उस राशि को एरियर सहित वापस किया जाए। GAD के सर्कुलर को रद्द किया हाईकोर्ट ने सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के द्वारा 12 दिसंबर 2019 को जारी सर्कुलर को रद्द कर दिया है। GAD के द्वारा पहले नई भर्तियों में 70%, दूसरे वर्ष 80 प्रतिशत और तीसरे साल 90 प्रतिशत वेतन देने का प्रावधान किया गया था। दरअसल, गुरुवार को जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोट की डिवीजन बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार के द्वारा जब कर्मचारियों से 100 प्रतिशत काम लिया जा रहा है, तो प्रोबेशन के नाम पर सैलरी में कटौती ठीक नहीं है। कोर्ट के द्वारा स्पष्ट किया गया कि प्रोबेशन पीरियड में समान रूप से काम के लिए समान वेतन का सिद्दांत है। जो कि पूरी तरह लागू होगा और काम पूरा करने पर पूरा वेतन देना अनिवार्य है। पैसा लौटाने के आदेश जारी कोर्ट की ओर से स्पष्ट किया गया कि प्रोबेशन पीरियड में वेतन की गई रिकवरी पूरी तरह अवैध है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि कर्मचारियों को इस अवधि में पूरा वेतन नहीं दिया गया। कर्मचारियों को शत-प्रतिशत वेतन का लाभ दिया जाएगा और कटी हुई राशि को एरियर के रूप में लौटाया जाएगा। 

महिला को आज़ादी, शादीशुदा होने के बावजूद अपनी पसंद से रहने का अधिकार — MP हाईकोर्ट

इंदौर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने कहा कि महिला वयस्क है, भले ही वह शादीशुदा है तो वह अपनी मर्जी के हिसाब से किसी के साथ रह सकती है। दरअसल, एक याचिका की सुनवाई के दौरान महिला को शुक्रवार को हाई कोर्ट में पुलिस सुरक्षा के बीच लाया गया। महिला ने कोर्ट में कहा कि वह याचिकाकर्ता के साथ रहना चाहती है, लेकिन उसके माता-पिता ने उसे जबरन अपने पास रखा है। इधर महिला के माता-पिता ने कहा कि उसकी पहले ही शादी हो चुकी है। शादी के बाद उसे अपने पति के साथ रहना चाहिए। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद उक्त टिप्पणी की।  “मैं पूरी तरह बालिग हूँ और कानून मुझे यह अधिकार देता है कि मैं अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले खुद लूं। मैं अपनी मर्जी से जिसके साथ चाहूँ, उसके साथ रह सकती हूँ। मेरे माता-पिता मेरी इच्छा के खिलाफ मुझे जबरन अपने पास रखे हुए हैं। मैं किसी दबाव में नहीं हूँ और स्पष्ट रूप से कहना चाहती हूँ कि मैं धीरज के साथ रहना चाहती हूँ। मुझे अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने दिया जाए।” पुलिस सुरक्षा के बीच  इंदौर हाई कोर्ट पहुंची महिला ने न्यायालय के सामने यह स्पष्ट बयान दिया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि महिला वयस्क है तो वह अपनी इच्छा के अनुसार किसी के साथ भी रह सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला का शादीशुदा होना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंद पर रोक नहीं लगा सकता। यह फैसला उस याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें एक युवक ने आरोप लगाया था कि उसकी साथी को उसके माता-पिता ने जबरन अपने पास रखा हुआ है। यह मामला राजस्थान के सवाई माधोपुर निवासी धीरज नायक से जुड़ा है, जिन्होंने अपने अधिवक्ता जितेंद्र वर्मा के माध्यम से हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि धीरज ने संध्या नामक महिला से विवाह किया है और संध्या उसके साथ रहना चाहती है, लेकिन उसके माता-पिता उसे जबरदस्ती अपने घर में रखे हुए हैं और बाहर जाने की अनुमति नहीं दे रहे। पुलिस सुरक्षा में कोर्ट लाई गई महिला इस मामले की पिछली सुनवाई 2 दिसंबर को हुई थी, जिसमें हाई कोर्ट ने महिला को स्वयं कोर्ट के सामने पेश कर बयान दर्ज कराने के निर्देश दिए थे। कोर्ट के आदेश पर शुक्रवार को पुलिस सुरक्षा के बीच महिला को इंदौर हाई कोर्ट लाया गया। सुनवाई के दौरान महिला ने साफ तौर पर कहा कि वह अपनी मर्जी से याचिकाकर्ता धीरज नायक के साथ रहना चाहती है और उसके माता-पिता उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखे हुए हैं। महिला ने यह भी बताया कि इससे पहले कोर्ट के निर्देश पर एक न्यायिक दंडाधिकारी (JMFC) के समक्ष भी उसके बयान दर्ज कराए जा चुके हैं। उन बयानों में भी उसने यही कहा था कि उसे जबरन अपने माता-पिता के नियंत्रण में रखा गया है और वह स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी का फैसला नहीं कर पा रही है। माता-पिता ने कहा, पहले से शादीशुदा है बेटी वहीं, महिला के माता-पिता की ओर से यह दलील दी गई कि उनकी बेटी की पहले ही शादी हो चुकी है। उनका कहना था कि शादी के बाद महिला को अपने पति के साथ ही रहना चाहिए और किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने का उसे अधिकार नहीं है। माता-पिता ने इसे सामाजिक और पारिवारिक मर्यादाओं से जोड़ते हुए कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की। हालांकि, हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद महिला की उम्र और उसकी स्वतंत्र इच्छा को सबसे महत्वपूर्ण आधार माना। अदालत ने कहा कि कानून की नजर में यदि महिला बालिग है, तो उसे यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वह किसके साथ और कहां रहना चाहती है। हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी भी वयस्क महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध कहीं रोके रखना कानूनन गलत है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शादीशुदा होना किसी महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खत्म नहीं करता। संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के तहत महिला अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने के लिए स्वतंत्र है। कोर्ट ने यह भी माना कि माता-पिता या परिवार की असहमति के बावजूद, यदि महिला ने स्पष्ट रूप से अपनी इच्छा जाहिर कर दी है, तो उसे उसी के अनुसार निर्णय लेने दिया जाना चाहिए। धीरज नायक को सौंपी गई महिला की सुपुर्दगी  हुई सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि महिला को धीरज नायक के साथ ही रहने दिया जाए। कोर्ट ने महिला की सुपुर्दगी धीरज को सौंपते हुए पुलिस को निर्देश दिए कि वह दोनों को सुरक्षा प्रदान करे और सुरक्षित रूप से सवाई माधोपुर तक छोड़कर आए। अदालत ने यह आदेश भी दिया कि इस दौरान किसी प्रकार का दबाव, धमकी या हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, ताकि महिला बिना किसी भय के अपने फैसले पर अमल कर सके। व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर फिर मुहर यह फैसला एक बार फिर यह स्थापित करता है कि भारतीय न्यायपालिका वयस्क महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंद के अधिकार को सर्वोपरि मानती है। इससे पहले भी कई मामलों में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट यह कह चुके हैं कि बालिग महिला को यह अधिकार है कि वह अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुने और उसके साथ रहे, चाहे परिवार या समाज को यह पसंद हो या नहीं।  विधि विशेषज्ञ मयंक सिंह ने कहा, कि यह आदेश उन मामलों में नजीर बनेगा, जहां पारिवारिक दबाव के चलते महिलाओं की स्वतंत्रता छीनी जाती है। अदालत का यह रुख साफ संकेत देता है कि कानून की नजर में सबसे अहम महिला की सहमति और उसकी इच्छा है, न कि सामाजिक दबाव या पारिवारिक परंपराएं।

MP हाईकोर्ट का अहम फैसला: पत्नी की बेवफाई का सबूत बनी तस्वीरें, इंडियन एविडेंस एक्ट पर महत्वपूर्ण टिप्पणी

जबलपुर  जबलपुर हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि विवाहेतर यौन संबंध के आधार पर तलाक की डिक्री जारी करने में 65-बी सर्टिफिकेट के बिना तस्वीरों का इस्तेमाल किया जा सकता है। जस्टिस विशाल धगट और जस्टिस बी पी शर्मा की युगलपीठ ने यह स्पष्ट किया कि शादी के मामलों में इंडियन एविडेंस एक्ट पूरी तरह से लागू नहीं होता है। कोर्ट ने इस आधार पर दायर एक अपील को खारिज कर दिया। महिला ने दी थी तलाक को चुनौती यह मामला बालाघाट की एक महिला से जुड़ा है, जिसने कुटुंब न्यायालय द्वारा तलाक की डिक्री जारी करने के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। महिला का कहना था कि उसके पति ने एक अन्य व्यक्ति के साथ उसकी आपत्तिजनक तस्वीरों का इस्तेमाल करके तलाक के लिए आवेदन किया था। महिला की ओर से यह भी दलील दी गई थी कि इन तस्वीरों के साथ इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत 65-बी सर्टिफिकेट पेश नहीं किया गया था, जो कि जरूरी है। महिला ने सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा था कि 65-बी सर्टिफिकेट के बिना तलाक का आदेश रद्द किया जाना चाहिए। उसने यह भी बताया कि तस्वीरें गलती से उसके मोबाइल से पति के मोबाइल में ट्रांसफर हो गई थीं और बाद में पति ने उसका फोन तोड़ दिया था। शादी के मामलों में पूरी तरह लागू नहीं होता एक्ट लेकिन, युगलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट शादी के मामलों में पूरी तरह से लागू नहीं होता है। फैमिली कोर्ट्स एक्ट के सेक्शन 14 के अनुसार, कुटुंब न्यायालय को सच्चाई का पता लगाने के लिए किसी भी तरह की रिपोर्ट, बयान या डॉक्यूमेंट्स को सबूत के तौर पर स्वीकार करने का अधिकार है। कोर्ट ने माना कि कुटुंब न्यायालय ने इन तस्वीरों पर भरोसा करके कोई गलती नहीं की। महिला की अपील को किया खारिज कोर्ट ने यह भी पाया कि महिला ने इस बात से इनकार नहीं किया कि वह तस्वीरों में है। उसने केवल यह कहा कि तस्वीरें किसी ट्रिक से बनाई गई हैं, लेकिन यह नहीं बताया कि किसने और कैसे बनाईं। महिला ने अपने बयान में स्वीकार किया था कि तस्वीरें उसके मोबाइल से पति के मोबाइल में ट्रांसफर हुई थीं और फिर पति ने उसका फोन तोड़ दिया। कोर्ट ने कहा कि पति के पास पत्नी के विवाहेतर संबंध के सबूत थे, और गुस्से में फोन तोड़ना स्वाभाविक था ताकि पत्नी का अपने पार्टनर से संपर्क टूट जाए। कोर्ट ने उस फोटोग्राफर से भी पूछताछ की जिसने तस्वीरें खींची थीं। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए, युगलपीठ ने अपील को खारिज कर दिया।  

MP हाईकोर्ट ने कटनी में हत्या आरोपी के घर पर 15 दिन के लिए बुलडोजर रोक, न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने दिया आदेश

जबलपुर  हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने कटनी में भाजपा नेता नीलू रजक की गोली मारकर हत्या के आरोपित अकरम खान का मकान गिराने पर 15 दिन की रोक लगा दी है। कोर्ट ने 15 दिन के भीतर अगर चाहे युगलपीठ में अपील के लिए भी स्वतंत्र किया है। मामले की सुनवाई में कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पास मकान के वैध दस्तावेज नहीं है। हत्या के आरोपित अकरम खान के भाई इमरान खान ने मकान तोड़ने को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता मोहम्मद इमरान खान की ओर से कोर्ट को बताया गया कि उसके भाई अकरम खान और नेल्सन जोसेफ को नीलू रजक की 28 अक्टूबर को गोली मारकर हत्या के आरोप में कटनी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। कैमोर नगर परिषद ने मकान को गिराने के लिए नोटिस जारी किया है जिसे की कोर्ट में चुनौती दी गई। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह और पैनल अधिवक्ता आकाश मालपाणी ने पक्ष रखते हुए बताया कि यह याचिकाकर्ता के पास मालिकाना हक और निर्माण की अनुमति से संबंधित दस्तावेज नहीं है। मकान मोहम्मद इमरान खान की मां के नाम पर जरूर है, लेकिन उनके पास सिर्फ एग्रीमेंट के दस्तावेज है। ऐसे में, उनके विरुद्ध की जा रही कार्रवाई सही है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास कोई दस्तावेज न होने पर उसे राहत नहीं दी जा सकती। हालांकि बुलडोजर एक्शन से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों के मद्देनजर याचिकाकर्ता के विरुद्ध कार्यवाही पर 15 दिन के लिए रोक लगा दी गई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि 15 दिन में यदि कोई कानूनी बाधा न हो तो प्रशासन नोटिस के मुताबिक कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र होगा। याचिकाकर्ता की और से कोर्ट में पैरवी कर रहे उत्कर्ष अग्रवाल ने एकलपीठ के आदेश को युगलपीठ में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है।  

रोड एक्सीडेंट पर MP हाई कोर्ट की नाराज़गी, पुलिस को फटकार—ट्रैफिक कौन संभालेगा?

इंदौर   इंदौर में बढ़ते सड़क हादसों को लेकर हाई कोर्ट ने ट्रैफिक पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े किए. शहर के एयरपोर्ट रोड पर करीब 2 माह पहले बेलगाम ट्रक ने कई लोगों को कुचल दिया था. इस मामले में दायर याचिका पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई चल रही है. हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इंदौर पुलिस कमिश्नर पेश हुए. इस दौरान हाई कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर पर चालानी कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाए. मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी. पहले ट्रैफिक रूल्स तुड़वाते हैं, फिर चालानी कार्रवाई हाई कोर्ट में चीफ जस्टिस संजीव सचदेव और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ द्वारा इस मामले की सुनवाई की जा रही है. सुनवाई के दौरान पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह ने बताया "ट्रैफिक रूल्स तोड़ने वाले वाहन चालकों पर कार्रवाई की जा रही है." उन्होंने इसका ब्यौरा भी पेश किया. इस पर युगलपीठ ने कहा "आपकी पुलिस द्वारा पहले वाहन चालकों से नियम तुड़वाए गए और उसके बाद उनके खिलाफ चालानी कार्रवाई की गई." चालान काटने में लगी रहती है ट्रैफिक पुलिस हाई कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर से कहा "मुंबई में जाकर देखें, वहां पर बीच चौराहे पर पुलिसकर्मी नजर आता है लेकिन आपके इंदौर में पेड़ के पीछे जवान खड़े रहते हैं और वह ड्यूटी करने के दौरान सिग्नल तोड़ने वालों के चालान बनाने में लगे रहते हैं. आपको 31 दिसंबर तक चालानी कार्रवाई का टारगेट मिलता है. यदि 31 दिसंबर तक निश्चित संख्या में चालानी कार्रवाई नहीं हुई तो चालानी कार्रवाई बड़े स्तर पर की जाती है." इससे पहले भी कलेक्टर, कमिश्नर ,आरटीओ द्वारा कई प्लान बताए गए, उन प्लान में कई तरह की खामियां थी. इस पर कोर्ट ने आपत्ति ली है. भारी वाहनों की मनमानी पर पुलिस ने क्या किया कोर्ट ने इंदौर पुलिस कमिश्नर से पूछा "हादसा होने के बाद भी शहरी क्षेत्र में भारी वाहन घुस रहे हैं. ड्रिंक एंड ड्राइव के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, इस पर पुलिस क्या कार्रवाई कर रही है." इस पर पुलिस कमिश्नर ने बताया "भारी वाहनों के प्रवेश पर सख्ती जारी है. जरूरी सामान लाने ले जाने वाले वाहनों को अनुमति दी गई है." इंदौर शहर के ट्रैफिक को सुधारने के लिए लगातार वालेंटियर का भी सहयोग लिया जा रहा है. अब 27 नवंबर को एक बार फिर हाई कोर्ट के समक्ष सभी विभागों के अधिकारी उपस्थित होंगे और अभी तक ट्रैफिक सुधारने को लेकर क्या कदम उठाए हैं, इस बारे में जानकारी देंगे. ट्रक ने बरपाया कहर, 2 की मौत, 13 घायल हुए थे इंदौर के एयरपोर्ट रोड पर दो महीने पहले एक ट्रक अनियंत्रित हो गया था और उसने आधा दर्जन से अधिक वाहन चालकों को टक्कर मारी. इसमें दो लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 13 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. इस घटना के बाद याचिका इंदौर हाई कोर्ट में हाई कोर्ट बार एसोसिशन के अध्यक्ष रितेश ईरानी द्वारा लगाई गई थी. वकील रितेश ईरानी के अनुसार याचिका पर लगातार सुनवाई चल रही है. 

MP High Court ने जोड़ा फासला खत्म किया: अलग होना चाहते थे ये दंपति, फिर हुआ ऐसा

ग्वालियर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में युगल पीठ ने चार साल से विवादों में उलझे एक दंपती को फिर से मिला दिया है। न्यायालय के निर्देश पर 30 दिन साथ रहने के बाद दोनों ने आपसी मतभेद सुलझा लिए और अब उन्होंने तलाक नहीं लेने का फैसला किया है। दंपती ने एक-दूसरे के खिलाफ दर्ज सभी मुकदमे वापस लेने और पत्नी द्वारा पति को दी गई भरण-पोषण राशि लौटाने पर भी सहमति जताई है। पीठ ने कहा कि जब पति-पत्नी आपसी सहमति से साथ रहना चाहते हैं, तो न्यायालय का उद्देश्य भी पारिवारिक जीवन में शांति, स्थायित्व और समरसता स्थापित करना है।   2022 से थे अलग, अब फिर बने एक-दूसरे का सहारा भिंड निवासी राहुल और श्वेता (परिवर्तित नाम) के बीच जरा-जरा सी बातों पर विवाद शुरू हुआ था, जिसके चलते दोनों 2022 से अलग रह रहे थे। वर्ष 2023 में भिंड कुटुंब न्यायालय में तलाक का आवेदन खारिज कर दिया था, लेकिन इसके बाद राहुल ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत हाईकोर्ट में दोबारा तलाक की याचिका दायर की। इन बातों पर हुआ समझौता     पति के खिलाफ दायर सभी आपराधिक और दीवानी प्रकरण पत्नी 15 दिनों में वापस लेंगी।     पति द्वारा दी गई स्थायी भरण-पोषण राशि पत्नी लौटाएंगी।     दोनों एक-दूसरे के प्रति सम्मान और शांति के साथ साथ रहेंगे।     किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या उत्पीड़न नहीं करेंगे। साथ रहने के दिए निर्देश सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने दंपती को 30 दिन साथ रहने का निर्देश दिया, ताकि वे आपसी मतभेद सुलझा सकें। एक माह बाद दोनों दोबारा कोर्ट में उपस्थित हुए और बताया कि वे अब साथ रहना चाहते हैं। पत्नी ने कुछ मामूली शिकायतें रखीं, जिन पर न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक जीवन में ऐसे मुद्दे समझदारी और सहनशीलता से सुलझाए जा सकते हैं।अदालत ने शासकीय अधिवक्ता अंजलि ग्यानानी को मामले में ‘शौर्या दीदी’ नियुक्त किया है। वे अगले 6 माह तक पत्नी का मार्गदर्शन और सहयोग करती रहेंगी, ताकि दाम्पत्य जीवन में स्थायी शांति और विश्वास बना रहे।

सतत न्याय की पहल: इस शनिवार भी एमपी हाई कोर्ट में ताबड़तोड़ सुनवाई

जबलपुर हाई कोर्ट को चार लाख 82 हजार 627 कुल लंबित मुकदमों के बोझ से निजात दिलाने युद्ध स्तर पर प्रयास जारी है। इस अभियान के अंतर्गत निरंतर दूसरे शनिवार को 8 विशेष पीठों ने 296 प्रकरणों का निराकरण करने का आदर्श प्रस्तुत किया। 8 विशेष पीठों ने जमानत अर्जियों को सुना। शेष दो नियमित पीठों के समक्ष सर्विस व अवमानना के प्रकरण सुने गए। दरअसल, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा के निर्देश पर इन विशेष पीठों का गठन किया गया है। शनिवार को आठ विशेष पीठों ने 866 जमानत के मामलों पर सुनवाई की। इनमें से से 296 मामले निराकृत कर दिए गए। वहीं, सेवा संबंधी मामलों की सुनवाई कर रही दोनों बेंचों ने 41 मामलों का निराकरण किया। इस तरह एक दिन में ही 337 लंबित मामलों का पटाक्षेप कर दिया गया। जबकि पहले शनिवार को आठ विशेष बेंच में 864 मामले सुनवाई के लिए रखे गए थे, जिनमें से 350 प्रकरणों का निराकरण किया गया था। इन जजों ने सुनी जमानत अर्जियां जज – कुल आवेदन सुने – निराकृत न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा – 115 – 55 न्यायमूर्ति एमएस भट्टी – 149- 51 न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल- 138 – 33 न्यायमूर्ति दीपक खोत – 126 – 33 न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी – 103 – 33 न्यायमूर्ति रामकुमार चौबे – 84- 32 न्यायमूर्ति रत्नेशचंद्र सिंह बिसेन- 48- 14 न्यायमूर्ति बीपी शर्मा – 102 – 45 सर्विस मैटर्स के लिए बैठी ये बेंच जस्टिस डीडी बंसल- 92 – 04 जस्टिस विवेक जैन- 109- 37 कुल मामलों पर सुनवाई – 866 निराकृत मामले – 337 द्रुतगति से बढ़ रहे लंबित मामलों को गंभीरता से लिया गया हाई कोर्ट बार एसोसिएशन, जबलपुर के अध्यक्ष धन्य कुमार जैन व सचिव परितोष त्रिवेदी के अनुसार उन्होंने मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा को बताया था कि मुख्यपीठ में इस वर्ष दायर की गई व लंबित जमानत अर्जियों का आंकड़ा तीन हजार के पास पहुंच गया है। सर्विस मैटर्स का आंकड़ा भी तेजी से बढ़ रहा है। इसको लेकर वकीलों में पिछले कुछ समय से असंतोष व्याप्त है। इस संबंध में ठोस कदम उठाने का आग्रह किया था। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश सचदेवा ने द्रुतगति से बढ़ रहे लंबित मामलों को गंभीरता से लेते हुए नवीन व्यवस्था दे दी। विगत 20 सितंबर को जमानत के मामलों के लिए आठ विशेष बेंच गठित की थीं। इस बार दो बेंच सर्विस मैटर्स के लिए भी बैठीं। जैन ने कहा कि हाई कोर्ट की यह पहल सराहनीय है। इससे बड़ी संख्या में पक्षकारों को राहत मिली। सामान्य कार्य दिवसों की तरह इनमें पक्षकार, वकील, कर्मचारी व अधिकारी शामिल रहे। एक वर्ष में 50 हजार केस निपटाने का लक्ष्य उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चार लाख 82 हजार 627 केस लंबित हैं। इसमें 2,86,172 मामले सिविल और 1,96,455 क्रिमिनल के हैं। कुल क्रिमिनल मामलों में शून्य से 10 साल पुराने 1,34,524 केस, 11 से 25 साल पुराने 59,424 केस और 25 साल से भी ज्यादा पुराने केसों की संख्या 2,507 है। हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर में तीन हजार मामले अकेले जमानत अर्जियों से जुड़े हैं, जो महीनों से लंबित हैं। भोपाल, इंदौर और ग्वालियर की तीनों पीठों में कुल 53 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या है, कार्यरत 43 हैं। अनुमान है कि 10 जजों की स्पेशल बेंच एक साल में 30 से 50 हजार से अधिक मामलों का निपटारा कर सकती है। सभी बेंचें एमसीआरसी यानी क्रिमिनल मामलों, आदेश, एडमिशन और अंतिम सुनवाई पर विचारण करेंगी।

हाईकोर्ट का फैसला: रिश्तों में पूरी तरह टूट चुका विश्वास, विवाह विच्छेद के आदेश जारी

जबलपुर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि पक्षों(पति और पत्नी) के बीच वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करना असंभव हो जाता है, तो न्यायालय इस तथ्य से अपनी आँखें बंद नहीं कर सकता है. हम तलाक नहीं देकर दोनों पक्षों की पीड़ा को बढ़ा नहीं सकते है. हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट तथा जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने इस आदेश के साथ 9 साल से अलग रहने वाले पति-पत्नी के विवाह विच्छेद पर मोहर लगा दी. ग्वालियर निवासी विकास आर्य की तरफ से दायर की गई थी याचिका, कुटुम्ब न्यायालय के आदेश को दी गई थी चुनौती ग्वालियर निवासी विकास आर्य की तरफ से दायर की गई याचिका में कुटुम्ब न्यायालय द्वारा तलाक के आवेदन को खारिज किये जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गयी थी. अपील पर मार्च 2025 में हुई सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने तलाक के लिए सहमति व्यक्त की थी. इसके बाद कूलिंग पीरियड माफ करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था. इसके बाद परिवादी पत्नी की तरफ से स्थगन की मांग करने पर प्रकरण को मध्यस्थता के लिए भेजा गया था. हाई कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता और प्रतिवादी पिछले 9 साल से अलग-अलग रह रहे हैं और तलाक चाहते हैं हाईकोर्ट में रिपोर्ट पेश कर बताया गया था कि प्रतिवादी पत्नी मध्यस्थता के लिए उपस्थित नहीं हुई, इसलिए मामले को न्यायालय में वापस भेज दिया गया है. युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अपीलकर्ता और प्रतिवादी पिछले 9 साल से अलग-अलग रह रहे हैं और तलाक चाहते हैं. जैसा की पूर्व में पारित आदेश पत्र से स्पष्ट है. ऐसी स्थिति में तलाक का आदेश नहीं देने का अर्थ होगा कि विवाह पूरी तरह से टूटने के बावजूद विशेष चरण में रोक दिया गया है. पक्षों के बीच वैवाहिक संबंधों के समाधान की कोई संभावना नहीं है. युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ विवाह विच्छेद के आदेश जारी किए.