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UAE का OPEC से अलगााव, पश्चिमी एशिया की जियोपॉलिटिक्स में आया बड़ा बदलाव

नई दिल्ली फारस की खाड़ी की चमकती सतह पर सब कुछ हमेशा शांत दिखता है- ऊपर से. लेकिन उसी पानी के नीचे कई परतों में तनाव, शक और रणनीतिक करंट बहते रहते हैं. संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. बाहर से यह दुनिया का सबसे चमकदार बिजनेस हब लगता है, लेकिन इसके भीतर एक बड़ा फैसला पक रहा था- OPEC (तेल निर्यातक देशों का संगठन) से बाहर निकलने का।  पहली नजर में यह फैसला एक छोटे से विवाद जैसा लगता है कि, UAE पांच मिलियन बैरल रोज़ तेल बेचना चाहता था, जबकि उसे करीब साढ़े तीन मिलियन बैरल का कोटा दिया गया था. लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है, खत्म नहीं. यह डेढ़ मिलियन बैरल का झगड़ा नहीं, बल्कि दशकों पुरानी रीजनल लीडरशिप को चुनौती देने का एलान है. जिसमें बताया गया है कि यूएई महज कोई छोटा-सा खाड़ी देश नहीं, बल्कि ग्लोबल पावर सेंटर है।  UAE का फैसला, अमेरिकी चाहत भी! अबू धाबी में जब OPEC से बाहर होने का फैसला लिया जा रहा था, तब इसकी गूंज सिर्फ खाड़ी तक सीमित नहीं थी. वॉशिंगटन भी इसे ध्यान से देख रहा था. अमेरिका लंबे समय से OPEC को एक “कार्टेल” मानता रहा है. एक ऐसा समूह जो तेल की कीमतों को अपने हिसाब से नियंत्रित करता है और कई बार रूस जैसे देशों के साथ मिलकर ग्लोबल ऑयल मार्केट को प्रभावित करता है।  ऐसे में UAE का OPEC से बाहर निकलना अमेरिका के लिए एक रणनीतिक मौका है. इससे OPEC की सामूहिक ताकत कमजोर होगी, अरब-रूस की तेल साझेदारी में दरार आएगी और तेल को “पॉलिटिकल वेपन” की तरह इस्तेमाल करने की क्षमता घटेगी. इसलिए भले ही यह फैसला UAE का हो, लेकिन इसकी गूंज अमेरिकी विदेश नीति की जीत के तौर पर भी सुनाई देती है।  विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई के इस बड़े कदम के पीछे अमेरिका के साथ हुआ एक खास समझौता भी है, जिसे 'डॉलर-दिरहम स्वैप एग्रीमेंट' कहा जा रहा है. आसान शब्दों में कहें तो इस समझौते के तहत अमेरिका ने यूएई को जरूरत पड़ने पर सीधे और तुरंत अमेरिकी डॉलर मुहैया कराने की गारंटी दी है. जब ईरान के साथ युद्ध जैसे हालात बने, तो यूएई की मुद्रा 'दिरहम' पर खतरा मंडराने लगा था. ऐसे में अमेरिका के साथ हुए इस स्वैप डील ने यूएई की तिजोरी को एक सुरक्षा कवच दे दिया. अभी तक यूएई ओपेक के कड़े नियमों से बंधा था, जिसकी वजह से वह अपनी मर्जी से तेल उत्पादन नहीं बढ़ा पा रहा था. अमेरिका से मिली 'डॉलर की गारंटी' ने यूएई को यह भरोसा दिलाया कि अगर वह ओपेक से अलग होता है और तेल बाजार में कोई उतार-चढ़ाव आता है, तो भी उसकी अर्थव्यवस्था नहीं डगमगाएगी. यदि यूएई की करेंसी डॉलर के समकक्ष रहती है, तो इससे वहां बिजनेस करने वालों को भी भरोसा रहेगा. इसी भरोसे के दम पर यूएई ने ओपेक की बंदिशों को अलविदा कह दिया और अपनी स्वतंत्र आर्थिक राह चुन ली।  ’UAE एप’ का हैंग होना UAE को अगर आप सिर्फ एक देश समझते हैं, तो आप उसकी असली ताकत को मिस कर रहे हैं. यह एक “एप” है- एक ऐसा प्लेटफॉर्म, जहां दुनिया के कारोबार बिना ज्यादा सवालों के चलते हैं।  ईरान पर प्रतिबंध लगे, तो उसका व्यापार यहीं से घूमकर दुनिया तक पहुंचा. भारत और पाकिस्तान के बीच कई बिजनेस डील्स UAE के रास्ते पूरी होती रहीं. यहां तक कि प्रतिबंधित रूसी तेल भी “शैडो टैंकर” के जरिए यहीं से बाजार तक पहुंचा।  दुबई और अबू धाबी ने खुद को न्यूट्रल, स्थिर और सुरक्षित हब के रूप में स्थापित किया था. यही वजह थी कि यूरोप और अमेरिका की बड़ी कंपनियां यहां से ऑपरेट करती थीं. रियल एस्टेट बूम पर था, टूरिज्म चरम पर था और UAE एक “परफेक्ट बिजनेस मशीन” बन चुका था।  लेकिन फिर ईरान के साथ संघर्ष ने इस मशीन में झटका दे दिया. हमलों ने सिर्फ तेल ठिकानों को नहीं, बल्कि उस भरोसे को भी चोट पहुंचाई जिस पर UAE की पूरी ब्रांडिंग टिकी थी. अचानक कॉर्पोरेट्स ने अपने विकल्प तलाशने शुरू कर दिए-सिंगापुर, हांगकांग और कुछ मामलों में यूरोप वापसी।  जो UAE खुद को न्यूट्रल बताता था, वह अब अमेरिकी-इजरायली खेमे में दिखने लगा. और यहीं से उसकी सबसे बड़ी चुनौती शुरू हुई-“क्या वह अब भी उतना ही सुरक्षित और स्थिर है?” सऊदी विजन 2030 का पिछड़ना इस कहानी में एक और किरदार है- सऊदी अरब. कभी UAE का सबसे करीबी सहयोगी, अब उसका सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी।  सऊदी अरब का पूरा दांव उसके महत्वाकांक्षी ‘विजन 2030’ पर लगा है. इस प्रोजेक्ट को फंड करने के लिए उसे तेल की ऊंची कीमतें चाहिए. इसलिए वह उत्पादन कम रखकर कीमतें ऊपर बनाए रखने की रणनीति पर चलता है।  दूसरी ओर UAE का मॉडल अलग है. उसने अपनी इकोनॉमी को डायवर्सिफाई किया हुआ है. प्रोडक्शन कॉस्ट यहां बेहद कम है, और उसने 2030 तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन क्षमता हासिल करने के लिए 122 बिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश किया है. लेकिन OPEC के कोटे उसे 2.6 से 3.1 मिलियन बैरल के बीच सीमित रखते रहे।  अबू धाबी के लिए यह “अंडरग्राउंड पड़ा तेल” एक जोखिम है-क्योंकि 2040 तक फॉसिल फ्यूल की डिमांड घटने की आशंका है. यानी अगर अभी नहीं बेचा, तो बाद में शायद बेचना ही संभव न हो. यही सोच सऊदी और UAE के बीच की दूरी को टकराव में बदल देती है।  यमन, सोमालीलैंड में बिल्डअप तेल का विवाद तो सिर्फ एक हिस्सा है. असली दरार कई मोर्चों पर एक साथ बनी. यमन में UAE ने सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल का समर्थन किया-एक अलगाववादी गुट, जो सऊदी के सहयोगियों के खिलाफ खड़ा था. हालात इतने बिगड़े कि सऊदी अरब ने UAE समर्थित ठिकानों और सैन्य संसाधनों पर एयरस्ट्राइक तक कर दी, खासकर मुकल्ला पोर्ट के आसपास।  उधर सोमालीलैंड को लेकर भी तनाव बढ़ा. जब इजरायल ने उसे मान्यता दी, तो सऊदी को यह कदम अस्थिरता फैलाने वाला लगा-और उसे UAE की भूमिका पर भी शक हुआ।  इसके बाद दोनों देशों के बीच दो महीने तक सोशल मीडिया, कूटनीतिक चैनलों और वॉशिंगटन में लॉबिंग के जरिए आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला।  ईरान वॉर में सऊदी ‘मांडवाली’ फिर … Read more