samacharsecretary.com

सियासी समीकरणों में बदलाव, बीजेपी के सवर्ण वोट बैंक में असंतोष

पटना  कहते हैं कि राजनीति में नेता भले ही अपने वोट बैंक के भरोसे रहें, लेकिन उनकी एक गलती बना-बनाया वोट बैंक न सिर्फ बिगाड़ सकती है बल्कि भड़का भी सकती है। सोशल मीडिया पर इन दिनों जिस तरह की चर्चा चल रही है, उसको देख कर बीजेपी के मामले में भी ऐसा ही लग रहा है। एक तरफ विजय कुमार सिन्हा का त्याग-तपस्या-बलिदान वाला बयान और दूसरी तरफ श्रेयसी सिंह की चुप्पी। उधर नीतीश ने इसी बहाने अपनी तरफ से मरहम लगा दिया। समझिए कैसे। बिहार में बीजेपी से कोर वोटर हुए नाराज बिहार में बीजेपी को सत्ता में लाने में भूमिहार ब्राह्मणों का बड़ा हाथ माना जाता रहा है। 2005 में जब ये वोटर लालू प्रसाद यादव के चलते कांग्रेस से बिदके थे, तो उन्होंने अपना सारा समर्थन बीजेपी की झोली में डाल दिया। पटना का बिक्रम विधानसभा क्षेत्र हो या फिर बेगूसराय में 2015 को छोड़ बाकी विधानसभा चुनाव। भूमिहार ब्राह्मण और ब्राह्मण बिरादरी बहुल क्षेत्रों में लोगों ने बीजेपी को हाथों-हाथ लिया। हालांकि कुछ क्षेत्रों में कांग्रेस को फिर से इसी समाज का समर्थन मिला और उसने वापसी भी की। लेकिन अब यही समाज बीजेपी से फिर से नाराज है। और तो और बीजेपी के कुछ चुनिंदा 'राय' यानी यादव वोटर भी नाराज दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर दिख रही नाराजगी सोशल मीडिया साइट्स पर आप जाएंगे तो आपको कई ऐसे पोस्ट मिलेंगे, जिसमें खुल कर बिहार बीजेपी को कोसा जा रहा है। यहां तक कहा जा रहा है कि बीजेपी को जब सरकार बनाने का मौका मिला तो अपने उन कोर वोटरों को ही भूल गई, जिसने उन्हें सत्ता के इस मुकाम तक पहुंचाया। अपनी पार्टी के किसी नेता को छोड़ बाहर से आए चेहरे पर भरोसा किया गया। ऐसे में कोर वोटरों को सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनाए जाने से ज्यादा ऐतराज अपनी अनदेखी का है। वहीं जिस तरह से सियासी हवा में श्रेयसी सिंह का नाम तैरा, उसके बाद राजपूत वोटरों के एक तबके में भी नाराजगी दिख रही है। इन सबका असर भी देखने को मिला। बिहार में पहली बार बीजेपी सत्ता की ड्राइविंग सीट पर है, लेकिन इसकी खुशी बीजेपी के ज्यादातर कार्यकर्ताओं में ही नहीं दिख रही है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि एक बार पटना बीजेपी ऑफिस घूम आइए, आपको सहज अंदाजा मिल जाएगा।     2005 में बीजेपी को नीतीश के जरिए सत्ता में लाने में सवर्ण वोटरों की बड़ी भूमिका     सवर्ण वोटरों ने बीजेपी को एकजुट होकर एकमुश्त वोट दिया था और देते रहे     लेकिन अब नए समीकरण गढ़ने पर बीजेपी को यही वोटर सुना रहे     नाराजगी सम्राट चौधरी को सीएम बनाने से नहीं बल्कि अपनी अनदेखी होने से नीतीश ने इसी मौके का उठाया फायदा पूर्व सीएम नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री की गद्दी तो छोड़ दी लेकिन जाते-जाते उन्होंने जातीय समीकरणों की ऐसी गोटी फिट की, जो भले ही सरकार को बनाए रखने में नींव का काम करे। लेकिन बीजेपी के लिए मुसीबत ही बनेगी। नीतीश कुमार ने अपने भरोसेमंद मंत्री विजय कुमार चौधरी (भूमिहार) और बिजेंद्र प्रसाद यादव (यादव) को उपमुख्यमंत्री बनवाकर बीजेपी के कोर वोटरों के दिल पर मरहम लगा दिया। बात ये रही कि कुर्मी जाति से किसी को बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली, तो जदयू में निशांत के नाम और राजनीति में आने के बाद संतुष्टि है, नाराजगी नहीं। अब क्या करेगी बीजेपी? ये फैसला कोई नहीं कर सकता कि बीजेपी क्या करेगी? ये पूरी तरह से उसका अंदरुनी मसला है, लेकिन विधायक दल की बैठक के बाद जिस तरह से विजय कुमार सिन्हा ने त्याग-तपस्या-बलिदान और कमांडर वाली बात की, उससे उन्होंने काफी हद तक बीजेपी में भूमिहार वोटरों की सहानुभूति अपनी ओर खींच ली। ऐसे में अब बिहार बीजेपी के सामने सबसे बड़ी समस्या यही है कि वो अपने कोर वोटरों को मनाए कैसे, क्योंकि ये वोटर ऐसी जमात है जो नाराज होने पर शिफ्ट होने में देर नहीं करते। अब बीजेपी इन्हें फिर से कैसे पाले में लाती है, जाहिर है इसके लिए उसके थिंक टैंक में मंथन जरूर हो रहा होगा।

पटना में जदयू की अचानक बैठक, मंत्रिमंडल विस्तार पर कयास

पटना  बिहार में एक बार फिर से सियासी हलचल तेज होती हुई दिख रही है।  15 अप्रैल को सम्राट सरकार के गठन के दिन जदयू ने अपने विधायक दल की बैठक टाल दी थी। लेकिन अब अचानक से नीतीश कुमार के आवास 7 सर्कुलर रोड पर फिर से जदयू की बैठक बुला ली गई है। जदयू के विधायकों को 20 अप्रैल को पटना में हाजिर रहने को कहा गया है। जदयू विधायक दल की अचानक बुलाई गई बैठक बिहार में नीतीश कुमार के सीएम पद छोड़ने के बाद इस घटनाक्रम को अहम माना जा रहा है। हालांकि ये बताया जा रहा है कि 15 अप्रैल को जदयू विधायक दल की बैठक टाल कर उसे NDA विधायक दल की बैठक बनाया गया था। अब नई सरकार के मद्देनजर 20 अप्रैल को जदयू विधायक दल की बैठक बुलाई गई है। हालांकि इसको लेकर कई तरह के कयास भी लगाए जा रहे हैं। पहला कयास- मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर विधायक दल की मीटिंग पहला कयास ये लगाया जा रहा है कि बिहार में अभी सिर्फ सम्राट चौधरी (सीएम), विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव (डिप्टी सीएम) ही मंत्रिमंडल में हैं। ऐसे में विभागों के बंटवारे के लिए कैबिनेट विस्तार होना तय है। कहा जा रहा है कि जदयू ने मंत्रिमंडल विस्तार में अपने कोटे के मंत्रियों की लिस्ट फाइनल करने के लिए ये बैठक बुलाई है। हालांकि पुष्ट रूप से कुछ भी नहीं बताया गया है। दूसरा कयास- क्या निशांत को बड़ी जिम्मेदारी देने की तैयारी जदयू विधायक दल की बैठक को लेकर ये कयास भी लगाए जा रहे हैं कि बिहार में निशांत कुमार को बड़ी जिम्मेदारी देने की तैयारी है। लिहाजा जदयू विधायक दल की बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में निशांत कुमार को जदयू में बड़ी जिम्मेदारी देने को लेकर भी संभावना जताई जा रही है। या बैठक का कोई और ही मकसद NDA के एक सूत्र ने हमें बताया कि 'बैठक का मकसद अभी तक साफ नहीं है।' एक तरह से देखा जाए तो ये बैठक 15 नवंबर को भी हो सकती थी, उस दिन जदयू विधायक दल की मीटिंग होनी जरूरी भी थी, क्योंकि बिहार में नई सरकार आकार लेने वाली थी। लेकिन नीतीश कुमार ने इसे टाल दिया। क्यों टाला गया, अब तक इसकी ठोस वजह नहीं बताई गई है। वहीं दूसरी तरफ ये भी चर्चा है कि नीतीश कुमार कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक तौर पर अभी कोई भी पुष्टि नहीं है।  

आरजेडी के कोर वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर, 10 यादव और 10 ब्राह्मणों को बनाया जिला अध्यक्ष

पटना बिहार विधानसभा चुनाव में सियासी मात खाने के बाद कांग्रेस अब दोबारा से खड़े होने की कवायद में जुट गई है. कांग्रेस ने सूबे में अपने संगठन को फिर से मजबूत और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुान खरगे की मंजूरी के बाद राज्य में संगठनात्मक जिलों के पुनर्गठन के प्रस्ताव को स्वीकृति के बाद सोमवार देर शाम बिहार के 53 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस ने लंबे इंतजार के बाद सोमवार को आखिरकार बिहार में सभी 53 संगठनात्मक जिलों में नए अध्यक्ष नियुक्त कर दिए हैं. बिहार जिला अध्यक्ष की जो 53 नेताओं की सूची जारी की है  उसमें 43 नए चेहरों को मौका दिया है तो 10 पुराने जिलाध्यक्षों पर भरोसा जताया है. बिहार में बीते साल नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था. कांग्रेस को बिहार की केवल 6 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जिसके बाद पार्टी के अंदर अंदरूनी कलह भी देखने को मिली थी. बिहार के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम को गंभीर आरोप भी झेलने पड़े. अब चार महीने के बाद कांग्रेस दोबारा से खड़े होने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जिसके लिए संगठन को नए तरीके से खड़े करने की स्टैटेजी अपनाई है. बिहार में कांग्रेस ने फिर बदली चाल विधानसभा चुनाव के चार महीने बाद अब कांग्रेस ने बिहार में पार्टी संगठन को फिर से खड़ा करने और इसके लिए जिलाध्यक्षों के चेहरे से सामाजिक समीकरण को साधने की राजनीति को अमलीजामा पहनाया है. हालांकि, कांग्रेस जिलाध्यक्षों के जरिए कांग्रेस किस सामाजिक वर्ग को साधना चाहती है इसे लेकर स्थिति कमोबेश ऊहापोह वाली ही नजर आती है. बिहार जिला अध्यक्षों की सूची देखें तो मोटे तौर कर कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने अपने उस दलित कार्ड वाले प्लान से अपने सियासी कदम पीछे खींच लिए हैं, जिसे उसने राजेश राम की प्रदेश की कमान देने में साथ एग्जीक्यूट किया था. कांग्रेस ने जिलाध्यक्षों की लिस्ट में दलित चेहरों के अलावा सवर्णों को भी तरजीह दी है. सवर्णों को प्रतिनिधित्व बताता है कि कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक को फिर से साधना चाहती है. कांग्रेस का सवर्ण और यादव पर भरोसा कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की लिस्ट में यादव जाति से आने वाले चेहरे इस बात का भी संकेत माना जा सकता है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस आरजेडी से दूरी बनाकर अकेले बिहार में आगे बढ़ने का प्रयास कर सकती है. यादव जाति को बिहार में आरजेडी का आधार वोट माना जाता है लेकिन इसी यादव समाज से 10 जिलाध्यक्ष बनाया जाना इसी तौर पर देखा जा रहा है. कांग्रेस जिलाध्यक्षों की लिस्ट में सबसे अधिक ब्राह्मण और यादव जाति के नेताओं को 10-10 जिलों की कमान मिली है. बिहार के 53 जिला अध्यक्षों में 7 मुस्लिम, 7 दलित, 7 भूमिहार और 5 राजपूत नेताओं को जिलों की कमान मिली है. कुल मिलाकर 53 संगठनात्मक जिलों में से 38 जिलों की कमान सवर्ण, दलित और मुसलमान नेताओं हाथों में दी गई है. पटना जिले में दो सवर्ण नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है. पटना ग्रामीण-1 की कमान भूमिहार जाति से आने वाले चंदन कुमार को तो पटना ग्रामीण-2 की कमान सिख समुदाय से आने वाले गुरजीत सिंह को दी गई है. पटना शहरी की कमान कायस्थ वर्ग से आन वाले कुमार आशीष को दी गई है. कांग्रेस फिर सवर्ण राजनीति पर लौटी कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की सूची को गौर से देखें तो जाहिर होता है कि बिहार में पार्टी की नजर ब्राह्मण और यादव वोट बैंक पर है. यूजीसी को लेकर ब्राह्मणों के साथ साथ अगड़ी जाति भारतीय जनता पार्टी से खफा है.शायद इसी को भुनाने के लिए कांग्रेस ने 53 में 10 जिलाध्यक्ष ब्राह्मण समुदाय से बनाए हैं. गौर करने वाली बात यह है कि इतने ही यादव समुदाय के नेताओं को जिलाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई है. यादव समुदाय राष्ट्रीय जनता दल कोर वोट बैंक है. ऐसे में यादवों को कांग्रेस की ओर से लुभाना राष्ट्रीय जनता दल को अखर सकता है.बिहार कांग्रेस में पहले 40 संगठन जिला इकाई थी, जिसे अब बढ़ाकर 53 कर दिया गया है. पार्टी ने जिलाध्यक्षों की तैनाती से पहले संगठन सृजन अभियान चलाया था और सभी जिलों में पर्यवेक्षक तैनात किए थे. जिलाध्यक्ष पद के दावेदारों के इंटरव्यू भी लिए गए थे और उसके बाद आलाकमान को रिपोर्ट सौंपी गई थी. इस आधार पर ही पार्टी आलाकमान ने जिलाध्यक्षों के नामों पर मुहर लगाई है.