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बिजली कटौती पर सरकार सख्त, मंत्री Arora ने गिनाए संकट के कारण और दिया राहत का भरोसा

चंडीगढ़. पंजाब में अचानक बढ़ी गर्मी ने बिजली व्यवस्था पर सीधा असर डाला है। भीषण लू और तापमान में लगातार बढ़ोतरी के कारण बिजली की मांग में तेजी से उछाल दर्ज किया गया है। विभाग के अनुसार इस तरह की मांग पहले कभी अप्रैल महीने में देखने को नहीं मिली, जिससे पूरे तंत्र पर दबाव बढ़ गया है।  बिजली मंत्री संजीव अरोड़ा ने बताया कि पहले से तय कार्यक्रम के तहत मरम्मत कार्य चल रहे थे। इसी वजह से कई स्थानों पर नियोजित बिजली कट लगाए गए, जिससे उपभोक्ताओं को कटौती अधिक महसूस हुई। 17 अप्रैल के बाद पैदा हुई स्थिति का यही सबसे बड़ा कारण है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अब ऐसे नियोजित कट चार घंटे से ज्यादा नहीं होंगे और व्यवस्था को सामान्य रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। खेती के मौसम ने भी बिजली की मांग बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस समय फसलों की कटाई के साथ-साथ आलू और टमाटर जैसी फसलों की खेती के लिए लगातार बिजली की जरूरत रहती है। किसानों को तय समय पर बिजली उपलब्ध कराना जरूरी होने के कारण ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव बन गया है। हालात पर विभाग रख रहा नजर विभाग के अनुसार राज्य में करीब छह हजार करोड़ रुपये की लागत से प्रसारण और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने का काम चल रहा है। लेकिन अचानक बढ़ी मांग के कारण इस काम की गति भी प्रभावित हो रही है। इसके बावजूद अधिकारियों का कहना है कि हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है। राहत के तौर पर उद्योगों को रात के समय खुले प्रावधान के तहत सीधे बिजली खरीदने की अनुमति दी गई है, ताकि दिन के समय ग्रिड पर लोड कम किया जा सके और आम उपभोक्ताओं को राहत मिल सके। अनावश्यक बिजली उपकरणों के इस्तेमाल से बचें विभाग का दावा है कि राज्य में जरूरत के अनुसार बिजली उपलब्ध कराई जा रही है और प्रदेश अभी भी बिजली के मामले में आत्मनिर्भर स्थिति में है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सभी तैयारियां पहले से थीं, लेकिन अप्रैल में इतनी अधिक मांग अप्रत्याशित रही। उपभोक्ताओं से भी अपील की गई है कि वे अधिक खपत वाले समय में अनावश्यक बिजली उपकरणों का इस्तेमाल न करें, ताकि सभी को सुचारु रूप से बिजली मिल सके। बिजली की अधिकतम मांग में 12% की बढ़ोतरी अप्रैल की शुरुआत में: बिजली का इस्तेमाल पिछले साल के मुकाबले 7% से 21% तक कम था। पिछले 10 दिनों में: भारी गर्मी की वजह से बिजली के इस्तेमाल और इसकी डिमांड में जबरदस्त उछाल आया है। बड़ी छलांग: अधिकतम मांग 15 अप्रैल को लगभग 7900 MW थी, जो 25 अप्रैल तक बढ़कर 12000 MW के पार पहुंच गई है। स्थिति को सुधारने के लिए उठाए गए कदम बिजली कटौती का समय तय: लोगों को परेशानी न हो, इसलिए बिजली कटौती को ज्यादा से ज्यादा 4 घंटे तक ही सीमित रखा गया है। दूसरे राज्यों से बिजली का लेनदेन: दूसरे राज्यों के साथ 1500-2000 MW बिजली के लिए बातचीत आखिरी दौर में है; ये समझौते जल्द ही पूरे कर लिए जाएंगे। हाइड्रो पावर प्लांट फिर से शुरू: 2025 की बाढ़ में सरकारी हाइड्रो यूनिट्स को नुकसान पहुँचा था। मरम्मत का काम 10 मई तक पूरा हो जाएगा, जिससे ग्रिड में 300 MW बिजली और जुड़ जाएगी। अतिरिक्त बिजली की खरीदारी: ग्रिड के लिए लगभग 1500 MW एक्स्ट्रा बिजली अलग-अलग राज्यों और प्राइवेट कंपनियों से खरीदी जा रही है। केंद्र सरकार से मदद: गर्मियों के पीक महीनों में राहत देने के लिए पंजाब केंद्र सरकार के कोटे से लगभग 2000 MW बिजली लेने की तैयारी कर रहा है। शॉर्ट-टर्म टेंडर: बाजार में कम समय वाले टेंडर निकाले गए हैं ताकि बिना किसी देरी के तुरंत फालतू बिजली खरीदी जा सके। चार्ज में छूट: अगले 2 महीनों के लिए शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक 'व्हीलिंग चार्ज' और 'क्रॉस सब्सिडी' में छूट दी गई है।

500 मेगावाट यूनिट ठप, एमपी में बिजली संकट की चिंता; मरम्मत में लगेंगे दो साल

 उमरिया बिरसिंहपुर पाली स्थित संजय गांधी ताप विद्युत केंद्र एक बार फिर तकनीकी संकट में फंस गया है। केंद्र की सबसे बड़ी 500 मेगावाट क्षमता वाली यूनिट रोटर की गंभीर खराबी के कारण बंद पड़ी है। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि रोटर की मरम्मत में करीब दो साल का समय लग सकता है। इसका सीधा असर प्रदेश की बिजली आपूर्ति पर पड़ेगा। ठेकेदारों से गारंटी नहीं सूत्र बताते हैं कि रोटर मरम्मत का काम जिस कंपनी को सौंपा गया है, उसने साफ कहा है कि मरम्मत के बाद रोटर कितने समय तक चलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। यानी करोड़ों का खर्च और लंबा इंतजार करने के बाद भी यूनिट का भविष्य अनिश्चित ही रहेगा। इतना ही नहीं, री-मेंटेनेंस की अवधि में भी इस यूनिट को केवल आंशिक लोड पर चलाने की बात सामने आई है। पहले भी खराब हो चुकी हैं यूनिटें यह पहला मौका नहीं है, जब केंद्र की यूनिटें तकनीकी खामी के कारण लंबे समय तक ठप हुई हों। कुछ समय पहले यहां की 210 मेगावाट क्षमता वाली एक नंबर यूनिट करीब 11 महीने बंद रही। मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद वह बार-बार उत्पादन बंद करती रही। इससे केंद्र की रखरखाव व्यवस्था और तकनीकी प्रबंधन पर सवाल खड़े होते रहे हैं। अभियंता और ठेकेदारों की मिलीभगत के आरोप केंद्र के मुख्य अभियंता एच. के. त्रिपाठी पर आरोप लग रहे हैं कि वे ठेकेदारों के भरोसे यूनिटों के संचालन का काम कर रहे हैं और तकनीकी खामियों पर सख्त कार्रवाई नहीं कर पा रहे। यूनिटों का मेंटेनेंस अक्सर सिर्फ कागजों में दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि करोड़ों खर्च करने के बावजूद उत्पादन स्थिर नहीं हो पाता। बताया जाता है कि क्वालिटी कंट्रोल और तकनीकी जांच में भी भारी लापरवाही बरती जा रही है। बिजली उत्पादन पर बड़ा असर प्रदेश की बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा इस केंद्र से पूरा होता है। अगर 500 मेगावाट यूनिट लंबे समय तक बंद रही तो उत्पादन में भारी कमी आएगी। नतीजतन उपभोक्ताओं को बिजली कटौती का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही सरकार को निजी कंपनियों से महंगी दर पर बिजली खरीदनी पड़ेगी, जिसका अप्रत्यक्ष बोझ आम जनता पर पड़ेगा। जवाबदेही तय करना जरूरी केंद्र का इतिहास बताता है कि यहां की यूनिटें बार-बार तकनीकी खामी और खराब प्रबंधन की वजह से ठप होती रही हैं। सवाल यह है कि जब करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं मिल रहा, तो आखिर जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती। क्या यह केवल ठेकेदारों की गलती है या अभियंताओं की लापरवाही भी उतनी ही जिम्मेदार है? सख्त कार्रवाई की मांग विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक मरम्मत कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी जांच और अभियंताओं से लेकर ठेकेदारों तक की जवाबदेही तय नहीं होगी तब तक यह केंद्र प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर बोझ बना रहेगा। अब वक्त आ गया है कि जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में बार-बार उत्पादन बंद होने की समस्या न दोहराई जाए।