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मोटर व्हीकल SI भर्ती पर बड़ा फैसला: डिग्री नहीं, सिर्फ डिप्लोमा उम्मीदवार होंगे शामिल

जयपुर राजस्थान में SI भर्ती 2021 पहले से ही विवादों में है, जिसे कोर्ट के आदेश पर रद्द कर दिया गया है. जबकि अब SI भर्ती की परीक्षा फिर से आयोजित होने वाली है. वहीं अब मोटर व्हीकल एसआई भर्ती (MVSI भर्ती 2021) को लेकर भी हाई कोर्ट का फैसला आय गया है, जिस पर काफी समय से विवाद चल रहा था. MVSI परीक्षा भी 2021 में हुई थी और इसमें सफल हुए अभ्यर्थी की मेरिट लिस्ट बन चुकी है. लेकिन अब हाई कोर्ट के फैसले से फिर विवाद खड़ा होने वाला है. दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने Motor Vehicle Sub Inspector (MVSI) भर्ती 2021 विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भर्ती नियमों में केवल डिप्लोमा योग्यता निर्धारित है, वहां डिग्री धारकों को स्वतः पात्र नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने राज्य सरकार को दिया आदेश कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने परिवहन उप निरीक्षक भर्ती (MVSI) से जुड़ी विशेष अपीलों पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया. कोर्ट ने केवल डिप्लोमा धारकों को भर्ती में शामिल करते हुए राज्य सरकार को भर्ती प्रक्रिया शीघ्र पूरी करने के निर्देश दिए. क्या था विवाद दरअसल, मोटर व्हीकल एसआई भर्ती परीक्षा में डिग्री धारक यानी बीटेक और बीई करे हुए अभ्यर्थियों ने दावा किया कि चूंकि वे उच्च योग्यता रखते हैं. ऐसे में उन्हें भर्ती में शामिल किया जाए. वहीं, डिप्लोमा धारकों ने तर्क दिया कि भर्ती विज्ञापन विशेष रूप से उनके लिए था और डिग्री धारकों को शामिल करना नियमों के खिलाफ होगा. हाईकोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद बुधवार (27 मई) को यह आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि भर्ती नियमों के शेड्यूल में MVSI पद के लिए “minimum qualification” शब्द का उल्लेख नहीं है. नियमों में स्पष्ट रूप से Automobile Engineering या Mechanical Engineering में डिप्लोमा को ही पात्रता माना गया है. साथ ही, केवल वही योग्यताएं मान्य हैं जिन्हें केंद्र या राज्य सरकार द्वारा समकक्ष घोषित किया गया हो. ऐसे में अदालत नियमों में ऐसी योग्यता नहीं जोड़ सकती जो वहां मौजूद ही नहीं है.

राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में अंधविश्वास पर जताई नाराजगी, अफसर बदला

नागौर  आज के आधुनिक दौर में भी क्या पुलिस किसी चोर को पकड़ने के लिए तांत्रिकों और अंधविश्वास का सहारा ले सकती है? आपका जवाब होगा- बिल्कुल नहीं. लेकिन राजस्थान के नागौर जिले में ऐसा ही एक हैरान करने वाला वाकया सामने आया है. यहां चोरी की वारदात को सुलझाने के लिए पुलिस खुद पीड़ित परिवार को लेकर एक तांत्रिक (भोपी) के पास पहुंच गई और उसके इशारे पर जांच भी शुरू कर दी. इस मामले पर अब राजस्थान हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा है कि देश का कानून अंधविश्वास से नहीं चलता और जांच केवल वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ही होनी चाहिए. क्या है यह पूरा मामला? यह अजीबो-गरीब मामला नागौर जिले के श्री बालाजी थाने का है. याचिकाकर्ता खेमी देवी ने जोधपुर हाईकोर्ट में जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी. खेमी देवी ने बताया कि इसी साल 7 मार्च 2026 को उनके घर में एक बड़ी चोरी हुई थी, जिसमें चोरों ने घर में रखे सोने-चांदी के गहने और मोटी नकदी साफ कर दी थी. पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया, लेकिन जांच का जिम्मा जिस हेड कांस्टेबल रतिराम को सौंपा गया, उनके काम करने का तरीका बड़ा अनोखा था. जब सबूत नहीं मिले, तो 'भोपी' के दरबार में ले गई पुलिस याचिका में पुलिस पर आरोप लगाया गया है कि जब काफी दिनों तक चोरी का कोई सुराग नहीं लगा, तो जांच अधिकारी रतिराम ने खुद पीड़ित महिला और गांव के कुछ लोगों को एक तरकीब सुझाई. उन्होंने कहा कि अलवर में एक बैठती है, जो सब सच बता देती है. हद तो तब हो गई जब हेड कांस्टेबल खुद इन लोगों को लेकर अलवर पहुंच गया. वहां उस भोपी ने बिना किसी सबूत के परिवादिया की बहू के पिता मोहनराम का नाम ले दिया और कहा कि चोरी इसी ने की है. इसके बाद पुलिस ने असली चोर को ढूंढने के बजाय मोहनराम को ही आरोपी मानकर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. कोर्ट में सरकारी वकील ने भी माना सच खेमी देवी की तरफ से पैरवी कर रहे वकील मनोहर सिंह राठौड़ ने हाईकोर्ट को बताया कि भारतीय कानून में कहीं भी किसी तांत्रिक या भोपी के कहने पर जांच आगे बढ़ाने का कोई नियम नहीं है. हैरान करने वाली बात तब हुई, जब कोर्ट रूम में मौजूद सरकारी वकील ने भी इस बात को स्वीकार किया कि हां, जांच अधिकारी सचमुच अलवर में उस भोपी के ठिकाने पर गया था. हाईकोर्ट ने बदल दिया जांच अफसर इस पूरे अंधविश्वास के खेल को सुनकर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई. कोर्ट ने माना कि इस तरीके से कभी भी निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती. जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की कोर्ट ने नागौर के पुलिस अधीक्षक को तुरंत आदेश जारी किया है कि इस मामले की जांच वर्तमान हेड कांस्टेबल से तुरंत वापस ली जाए. इस केस की डायरी को श्री बालाजी थाने से हटाकर किसी दूसरे थाने में ट्रांसफर किया जाए. अब इस चोरी के मामले की जांच किसी सब इंस्पेक्टर लेवल के अधिकारी से करवाई जाए, जो अगले 15 दिनों में अपनी जांच शुरू करे.

RPSC SI भर्ती 2021 विवाद: पुनर्परीक्षा पर हाईकोर्ट की सुनवाई, नया मोड़ आया

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट में आज एसआई भर्ती 2021 को लेकर सुनवाई हुई, जिसमें अभ्यर्थियों ने भर्ती प्रक्रिया में शामिल किए जाने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी. कोर्ट ने सभी याचिकाकर्ताओं को भर्ती में आवेदन करने के लिए प्रोविजनल अनुमति प्रदान की है. दोबारा होगी एसआई भर्ती परीक्षा हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) रद्द की गई एसआई भर्ती 2021 का पुनः आयोजन करवा रहा है.  हालांकि, आयोग ने स्पष्ट किया है कि पुनर्परीक्षा में केवल उन्हीं अभ्यर्थियों को शामिल किया जाएगा, जिन्होंने वर्ष 2021 की भर्ती परीक्षा में शामिल हुए थे. 3 लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों ने दी थी परीक्षा एसआई भर्ती 2021 के लिए लगभग 7.95 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था, लेकिन सितंबर 2021 में आयोजित परीक्षा में केवल 3,83,097 अभ्यर्थी ही दोनों पेपर में शामिल हुए थे. आयोग पुनर्परीक्षा में भी इन्हीं अभ्यर्थियों को शामिल करने पर कायम है. हाई कोर्ट में दायर की याचिका इस निर्णय का अन्य अभ्यर्थियों द्वारा विरोध किया गया, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कोरोना महामारी और अन्य कारणों से जो अभ्यर्थी उस समय परीक्षा में शामिल नहीं हो सके, उन्हें भी एक और अवसर दिया जाना चाहिए. याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट हरेंद्र नील, रवींद्र सैनी और निखिल कुमावत ने पैरवी की.

सरकार के तर्कों पर अदालत ने जताई कड़ी नाराजगी

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत और निकाय चुनाव टालने के मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है. राज्य सरकार ने बीते दिनों हाईकोर्ट में दलील देते हुए समय मांगा था. हालांकि, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की बेंच दलीलों से सहमत नहीं दिखी. बेंच ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को फटकार भी लगाई. हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार का रवैया ठीक नहीं है और उसे पहले ही पर्याप्त समय दिया जा चुका है. फिर दी ओबीसी आयोग की रिपोर्ट की दलील सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने दलील दी कि वार्डों के आंतरिक सीमांकन को लेकर हाईकोर्ट के दो अलग-अलग फैसले आने से देरी हुई. जबकि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट न आने के कारण आरक्षण तय नहीं हो पाया. बेंच ने इस पर सवाल उठाते हुए पूछा, "आदेश निकायों को लेकर था तो पंचायत चुनाव क्यों नहीं कराए गए? ओबीसी आयोग क्या कर रहा है, यह हमारे सामने नहीं है." कोर्ट ने सरकार के तर्क किए खारिज कोर्ट में सरकार की ओर से कहा गया कि राजस्थान का बड़ा हिस्सा रेगिस्तानी है. जून में हीटवेव चलती है और जुलाई में बरसात शुरू हो जाती है. ऐसे में चुनाव कराना मुश्किल होगा. लेकिन बेंच ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया. सुनवाई के बाद अदालत ने जजमेंट रिजर्व रख लिया है. 18 मई को अवमानना याचिका दायर हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को 439 याचिकाओं पर फैसला देते हुए 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए थे. वहीं, परिसीमन पूरा करने के लिए 31 दिसंबर 2025 तक की डेडलाइन दी गई थी. अब सरकार और चुनाव आयोग ने समय मांगा है. जबकि इस मुद्दे पर अवमानना याचिका भी दायर है, जिस पर 18 मई को सुनवाई होगी.

‘नौवें बम’ मामले में सरवर और शाहबाज की स्टे अपील खारिज, जेल में रहेंगे उम्रकैद

 जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने साल 2008 में हुए जयपुर सीरियल बम धमाकों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में दो दोषियों को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है. जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने शुक्रवार को मोहम्मद सरवर आजमी और शाहबाज अहमद की उस अर्जी (स्टे एप्लीकेशन) को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपनी सजा पर रोक लगाने की मांग की थी. क्या है 'नौवें बम' का मामला? 13 मई 2008 को जयपुर में हुए सिलसिलेवार धमाकों ने पूरे देश को दहला दिया था. इन धमाकों में 71 बेगुनाहों की जान गई थी, और 185 लोग घायल हुए थे. पुलिस को चांदपोल बाजार के पास एक 9वां बम भी मिला था, जिसे फटने से महज 15 मिनट पहले डिफ्यूज कर दिया गया था. इसी 'जिंदा बम' मामले में विशेष अदालत ने दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी है. 'जब 8 केस में बरी, तो यहां क्यों नहीं?' दोषियों के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट पहले ही मुख्य 8 ब्लास्ट मामलों में उन्हें बरी कर चुका है. ऐसे में 'जिंदा बम' मामले में भी उन्हें राहत मिलनी चाहिए. उन्होंने दलील दी कि अपील पर सुनवाई में लंबा समय लग सकता है, इसलिए उनकी सजा पर रोक लगाकर उन्हें जमानत दी जाए. ई-मेल बना मुख्य सबूत राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए इन दलीलों का पुरजोर विरोध किया गया. सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि इन आरोपियों के खिलाफ पुख्ता और अतिरिक्त साक्ष्य मौजूद हैं. धमाकों के तुरंत बाद दो न्यूज चैनलों को ई-मेल भेजकर इन लोगों ने धमाकों की जिम्मेदारी ली थी. ई-मेल के जरिए धमाकों को 'सही' ठहराना इनके शामिल होने का बड़ा प्रमाण है. अदालत का फैसला दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि मामले की गंभीरता को देखते हुए फिलहाल सजा पर रोक लगाना सही नहीं होगा. इस फैसले के बाद अब सरवर और शाहबाज को जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा.

जयपुर हाईकोर्ट में विरोध के बीच कामकाज जारी, 39 जज रहे मौजूद

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट में शनिवार (25 अप्रैल) को कार्य दिवस बनाए जाने पर एक बार फिर से विवाद रहा. हाईकोर्ट में आज महीने के चौथे शनिवार को कार्य दिवस घोषित किया गया है. हालांकि, हर शनिवार की तरह आज भी अधिवक्ताओं ने कार्य बहिष्कार किया. दरअसल, हाईकोर्ट में महीने के पहले और चौथे शनिवार को कार्यदिवस घोषित किया गया है. अधिवक्ता इस फैसले का विरोध कर रहे हैं. आज सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी जयपुर में है. इस दौरान जयपुर में 39 न्यायाधीश एक साथ हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए मौजूद रहे. आज विशेष रूप से 12 न्यायाधीशों की चार लार्जर बेंच का गठन भी किया गया है. पिछले साल लिया गया था फैसला हालांकि आज कोर्ट में न्यायाधीश तो उपस्थित रहे, लेकिन अधिवक्ता नदारद रहे. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने इस पर चिंता भी जताई. बता दें कि पिछले साल 12 दिसंबर 2025 को राजस्थान हाईकोर्ट की फुल कोर्ट की बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि जनवरी से हाईकोर्ट हर महीने के दो शनिवार खुला रहेगा. इससे वर्षभर में 24 दिन अतिरिक्त काम हो सकेगा और लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी. लगातार बढ़ रहा है केस का दवाब फुल कोर्ट बैठक में यह माना गया कि अदालतों में लगातार बढ़ते मामलों के दबाव को देखते हुए न्यायिक समय का विस्तार आवश्यक हो गया है. महीने के दो शनिवार को हाईकोर्ट के खुलने से न केवल लंबित मामलों की संख्या कम होगी, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी, तेज और समयबद्ध बनेगी.

राजस्थान में ‘बहू-बेटी’ का फर्क खत्म, नौकरी पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

जयपुर राजस्थान में अब अनुकंपा नियुक्ति को लेकर 'बहू और बेटी' के बीच का कानूनी फर्क खत्म हो गया है. हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट कर दिया कि ससुर की मौत के बाद उनकी बहू भी उतनी ही हकदार है, जितनी एक बेटी होती है. जस्टिस रवि चिरानियां की एकल पीठ ने सुंदरी देवी की याचिका पर फैसला सुनाते हुए विभाग की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जो बहू को परिवार का हिस्सा मानने से कतरा रही थीं. कोर्ट ने पीडब्ल्यूडी (PWD) विभाग की सुस्ती और आपत्तियों पर सख्त नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि बहू को नौकरी से रोकना कानून की मूल भावना के खिलाफ है. डिवीजन बेंच के फैसले का दिया हवाला सुनवाई के समय अदालत ने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली को आइना दिखाया. कोर्ट ने याद दिलाया कि साल 2023 में ही डिवीजन बेंच यह तय कर चुकी है कि बहू को बेटी के समान ही माना जाए. जब कानूनी रूप से बहू अनुकंपा नियुक्ति के लिए पूरी तरह योग्य है, तो विभाग का तकनीकी अड़ंगे लगाना समझ से परे है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब न्यायपालिका पहले ही इस मुद्दे पर स्थिति साफ कर चुकी है, तो प्रशासन को इसमें नई आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं है. बेटे की बीमारी और मौत ने बढ़ाई मुश्किलें इस मामले के पीछे एक परिवार के संघर्ष की लंबी कहानी है. याचिकाकर्ता के वकील आरसी गौतम ने कोर्ट को बताया कि सुंदरी देवी के ससुर सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) में तैनात थे और 19 नवंबर 2016 को ड्यूटी के दौरान ही उनकी मौत हो गई. उस समय मृतक के इकलौते बेटे यानी सुंदरी के पति एक गंभीर हादसे का शिकार होकर बिस्तर पर थे. ऐसे में बहू ने ही परिवार को संभालने के लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन किया, जिसे विभाग ने ठंडे बस्ते में डाल दिया. इस बीच 25 मई 2020 को सुंदरी के पति का भी निधन हो गया, जिससे पूरे परिवार के गुजर-बसर का संकट खड़ा हो गया. 30 दिन की नियुक्ति पत्र सौंपने के आदेश हाईकोर्ट ने सुंदरी देवी के हक में फैसला देते हुए पीडब्ल्यूडी विभाग को अल्टीमेटम दिया है. अदालत ने कहा कि विभाग बिना किसी बहानेबाजी के अगले 30 दिनों में याचिकाकर्ता को नियुक्ति पत्र सौंपे. कोर्ट ने कड़ी हिदायत दी है कि अब किसी भी तरह की तकनीकी अड़चन नहीं आनी चाहिए और प्रक्रिया में एक दिन की भी देरी बर्दाश्त नहीं होगी. 45 दिन में पेश करनी होगी रिपोर्ट अदालत ने इस मामले में सीधे अधिकारियों की जवाबदेही तय की है. कोर्ट ने आदेश दिया कि 45 दिनों के भीतर इस फैसले पर अमल की रिपोर्ट (Compliance Report) पेश की जाए. जस्टिस चिरानियां ने सख्त चेतावनी दी कि यदि आदेश लागू करने में लापरवाही हुई, तो जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी. इस फैसले ने उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद जगाई है जो ससुराल में रहकर पूरे परिवार का सहारा बनी हुई हैं.

भर्ती में धांधली और अनियमितताओं के आरोप, कोर्ट ने राजस्थान हाउसिंग बोर्ड से मांगा जवाब

जयपुर  राजस्थान हाउसिंग बोर्ड (RHB) में जूनियर असिस्टेंट बनने का सपना देख रहे अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा है। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने इस भर्ती प्रक्रिया में भारी अनियमितताओं को देखते हुए नियुक्तियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अगली सुनवाई तक इन पदों को नहीं भरा जाएगा। कोर्ट में क्यों नाराज हुए जज? आज कोर्ट रूम में माहौल काफी गरमाया रहा। दरअसल, सुनवाई के दौरान रेस्पोंडेंट (बोर्ड) पक्ष के वकील बार-बार समय मांग रहे थे, जिस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। अभ्यर्थियों के वकील आनंद शर्मा और अरविंद कुमार शर्मा ने मजबूती से पक्ष रखते हुए बताया कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। भर्ती में धांधली के आरोप सूत्रों और याचिकाकर्ताओं के वकीलों की मानें तो इस भर्ती में पारदर्शिता की भारी कमी रही है। कोर्ट के सामने दलील दी गई कि विज्ञापन में लिखा था कि मुख्य परीक्षा और टाइपिंग टेस्ट के नंबर जोड़कर मेरिट बनेगी, लेकिन बोर्ड ने टाइपिंग के अंक जोड़े ही नहीं। भर्ती का परिणाम कई बार संशोधित किया गया, जिसके पीछे कोई ठोस वजह नहीं दी गई। सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि जिन अभ्यर्थियों के नाम दस्तावेज सत्यापन (DV) सूची में थे, उन्हें बाद में बिना किसी कारण बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। वहीं मामले की गंभीरता और अभ्यर्थियों के भविष्य को देखते हुए न्यायालय ने अंतरिम आदेश जारी कर सभी संबंधित पदों को रिजर्व रखने के निर्देश दिए हैं। यानी जब तक कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक बोर्ड किसी को जॉइनिंग नहीं दे पाएगा।

SI भर्ती 2021 रद्द रहेगी, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सिंगल बेंच के फैसले पर लगाई मुहर

जयपुर राजस्थान हाइकोर्ट ने शनिवार को एसआई भर्ती 2021 भर्ती परीक्षा को लेकर बड़ा फैसला दिया है. हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2021 पर दिए गए सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा है. मतलब एसआई भर्ती 2021 रद्द रहेगी. हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला दिया है. हाई कोर्ट ने एकलपीठ के भर्ती रद्द रखने फैसले को बरकरार रखा है, लेकिन एकलपीठ द्वारा आरपीएससी के सदस्यों के ख़िलाफ़ लिए गए स्वप्रेरित प्रसंज्ञान को रद्द कर दिया है.   रद्द रहेगी SI भर्ती परीक्षा मामले में पर भी कर रहे एडवोकेट हरेंद्र नील बताया कि कोर्ट ने एकलपीठ (सिंगल बेंच) के फैसले को बरकरार रखा है. खंडपीठ ने यह भी माना है कि आरपीएससी सदस्यों के खिलाफ एकलपीठ की टिप्पणी सही है. भर्ती परीक्षा में अब छंटनी कर पाना संभव नहीं है. इसलिए परीक्षा रद्द रहेगी. एसआई भर्ती 2021 परीक्षा के लिए 3 फरवरी 2021 को नोटिफिकेशन जारी हुआ. 859 पदों के लिए 13 से 15 सितंबर 2021 को भर्ती परीक्षा आयोजित हुई. इसमें करीब 7 लाख 97 हजार अभ्यर्थियों ने आवेदन किया. SI भर्ती परीक्षा में 3 लाख 80 हजार अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में शामिल हुए. 20 हजार 359 अभ्यर्थी फिजिकल टेस्ट के लिए पास हुए. 3 हजार 291 अभ्यर्थी इंटरव्यू में शामिल हुए थे. जिसके बाद 1 जून 2023 को फाइनल रिजल्ट जारी किया गया. परीक्षा में लगे थे धांधली के आरोप परीक्षा में बड़े स्तर पर धांधली के आरोप लगे. जांच एसओजी को सौंपी गई. मामले में आरपीएससी के मेंबर तक के नाम सामने आए. इसके बाद मामले ने राजनीतिक तूल भी पकड़ा. आरपीएससी सदस्य रामूराम राईका और बाबूलाल कटरा की गिरफ्तारी हुई. इसके बाद  13 अगस्त 2024 को भर्ती परीक्षा रद्द करने को लेकर याचिका दायर हुई. इस याचिका की लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 28 अगस्त 2025 को भर्ती परीक्षा को रद्द करने का फैसला दिया था, लेकिन चयनित एसआई अभ्यर्थियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट की खंडपीठ में चुनौती दी. खंडपीठ ने 8 सितंबर को एकल पीठ के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी. इसके बाद वे अभ्यर्थी जो भर्ती परीक्षा को रद्द करवाना चाहते थे याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर को एकल पीठ के फैसले को बहाल करते हुए हाई कोर्ट की खंडपीठ को 3 महीने में फैसला लेने का आदेश दिया. इसके साथ ही चयनित एसआई अभ्यर्थियों की फील्ड पोस्टिंग पर रोक लगा दी थी.

‘शून्य अंक’ वाले अभ्यर्थी कैसे बने सरकारी कर्मचारी? राजस्थान हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई है। मामला सरकारी नौकरियों में क्लास IV कर्मचारियों की भर्ती से जुड़ा है, जहां आरक्षित वर्ग के लिए कट-ऑफ अंक जीरो के करीब रखे गए थे। जस्टिस आनंद शर्मा ने इस स्थिति को बेहद हैरान करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि भले ही नौकरी छोटे पद की हो, लेकिन सरकार को भर्ती के लिए एक न्यूनतम मानक जरूर रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा, जो शख्स परीक्षा में शून्य या उससे भी कम नंबर लाता है, वह सरकारी काम करने के लायक कैसे हो सकता है? कोर्ट ने साफ किया कि नियुक्ति प्राधिकारी के रूप में राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भर्ती में न्यूनतम मानक सुनिश्चित करे, ताकि चयनित उम्मीदवार अपने कर्तव्यों का संतोषजनक ढंग से पालन कर सकें। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक उम्मीदवार ने कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया गया कि हाल ही में हुई एक भर्ती प्रक्रिया में कुछ आरक्षित श्रेणियों के लिए कट-ऑफ महज 0.0033 रखी गई थी। माइनस में नंबर, फिर भी नौकरी ना मिलने की शिकायत दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि उसके अंक शून्य से भी कम थे और इसी आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई थी। उसने कोर्ट से शिकायत की कि जब सरकार ने पास होने के लिए कोई न्यूनतम नंबर तय ही नहीं किए हैं, तो उसे फेल क्यों किया गया? जांच में पता चला कि कुछ श्रेणियों में कट-ऑफ महज 0.0033 थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि या तो परीक्षा का पेपर जरूरत से ज्यादा कठिन था या फिर भर्ती प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि उन्होंने पास होने के लिए कम से कम नंबर की सीमा तय क्यों नहीं की? अब राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग के प्रमुख सचिव से जवाब मांगा है। उन्हें हलफनामा देकर यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी।