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राजस्थान में ‘बहू-बेटी’ का फर्क खत्म, नौकरी पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

जयपुर राजस्थान में अब अनुकंपा नियुक्ति को लेकर 'बहू और बेटी' के बीच का कानूनी फर्क खत्म हो गया है. हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट कर दिया कि ससुर की मौत के बाद उनकी बहू भी उतनी ही हकदार है, जितनी एक बेटी होती है. जस्टिस रवि चिरानियां की एकल पीठ ने सुंदरी देवी की याचिका पर फैसला सुनाते हुए विभाग की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जो बहू को परिवार का हिस्सा मानने से कतरा रही थीं. कोर्ट ने पीडब्ल्यूडी (PWD) विभाग की सुस्ती और आपत्तियों पर सख्त नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि बहू को नौकरी से रोकना कानून की मूल भावना के खिलाफ है. डिवीजन बेंच के फैसले का दिया हवाला सुनवाई के समय अदालत ने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली को आइना दिखाया. कोर्ट ने याद दिलाया कि साल 2023 में ही डिवीजन बेंच यह तय कर चुकी है कि बहू को बेटी के समान ही माना जाए. जब कानूनी रूप से बहू अनुकंपा नियुक्ति के लिए पूरी तरह योग्य है, तो विभाग का तकनीकी अड़ंगे लगाना समझ से परे है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब न्यायपालिका पहले ही इस मुद्दे पर स्थिति साफ कर चुकी है, तो प्रशासन को इसमें नई आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं है. बेटे की बीमारी और मौत ने बढ़ाई मुश्किलें इस मामले के पीछे एक परिवार के संघर्ष की लंबी कहानी है. याचिकाकर्ता के वकील आरसी गौतम ने कोर्ट को बताया कि सुंदरी देवी के ससुर सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) में तैनात थे और 19 नवंबर 2016 को ड्यूटी के दौरान ही उनकी मौत हो गई. उस समय मृतक के इकलौते बेटे यानी सुंदरी के पति एक गंभीर हादसे का शिकार होकर बिस्तर पर थे. ऐसे में बहू ने ही परिवार को संभालने के लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन किया, जिसे विभाग ने ठंडे बस्ते में डाल दिया. इस बीच 25 मई 2020 को सुंदरी के पति का भी निधन हो गया, जिससे पूरे परिवार के गुजर-बसर का संकट खड़ा हो गया. 30 दिन की नियुक्ति पत्र सौंपने के आदेश हाईकोर्ट ने सुंदरी देवी के हक में फैसला देते हुए पीडब्ल्यूडी विभाग को अल्टीमेटम दिया है. अदालत ने कहा कि विभाग बिना किसी बहानेबाजी के अगले 30 दिनों में याचिकाकर्ता को नियुक्ति पत्र सौंपे. कोर्ट ने कड़ी हिदायत दी है कि अब किसी भी तरह की तकनीकी अड़चन नहीं आनी चाहिए और प्रक्रिया में एक दिन की भी देरी बर्दाश्त नहीं होगी. 45 दिन में पेश करनी होगी रिपोर्ट अदालत ने इस मामले में सीधे अधिकारियों की जवाबदेही तय की है. कोर्ट ने आदेश दिया कि 45 दिनों के भीतर इस फैसले पर अमल की रिपोर्ट (Compliance Report) पेश की जाए. जस्टिस चिरानियां ने सख्त चेतावनी दी कि यदि आदेश लागू करने में लापरवाही हुई, तो जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी. इस फैसले ने उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद जगाई है जो ससुराल में रहकर पूरे परिवार का सहारा बनी हुई हैं.

भर्ती में धांधली और अनियमितताओं के आरोप, कोर्ट ने राजस्थान हाउसिंग बोर्ड से मांगा जवाब

जयपुर  राजस्थान हाउसिंग बोर्ड (RHB) में जूनियर असिस्टेंट बनने का सपना देख रहे अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा है। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने इस भर्ती प्रक्रिया में भारी अनियमितताओं को देखते हुए नियुक्तियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अगली सुनवाई तक इन पदों को नहीं भरा जाएगा। कोर्ट में क्यों नाराज हुए जज? आज कोर्ट रूम में माहौल काफी गरमाया रहा। दरअसल, सुनवाई के दौरान रेस्पोंडेंट (बोर्ड) पक्ष के वकील बार-बार समय मांग रहे थे, जिस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। अभ्यर्थियों के वकील आनंद शर्मा और अरविंद कुमार शर्मा ने मजबूती से पक्ष रखते हुए बताया कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। भर्ती में धांधली के आरोप सूत्रों और याचिकाकर्ताओं के वकीलों की मानें तो इस भर्ती में पारदर्शिता की भारी कमी रही है। कोर्ट के सामने दलील दी गई कि विज्ञापन में लिखा था कि मुख्य परीक्षा और टाइपिंग टेस्ट के नंबर जोड़कर मेरिट बनेगी, लेकिन बोर्ड ने टाइपिंग के अंक जोड़े ही नहीं। भर्ती का परिणाम कई बार संशोधित किया गया, जिसके पीछे कोई ठोस वजह नहीं दी गई। सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि जिन अभ्यर्थियों के नाम दस्तावेज सत्यापन (DV) सूची में थे, उन्हें बाद में बिना किसी कारण बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। वहीं मामले की गंभीरता और अभ्यर्थियों के भविष्य को देखते हुए न्यायालय ने अंतरिम आदेश जारी कर सभी संबंधित पदों को रिजर्व रखने के निर्देश दिए हैं। यानी जब तक कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक बोर्ड किसी को जॉइनिंग नहीं दे पाएगा।

SI भर्ती 2021 रद्द रहेगी, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सिंगल बेंच के फैसले पर लगाई मुहर

जयपुर राजस्थान हाइकोर्ट ने शनिवार को एसआई भर्ती 2021 भर्ती परीक्षा को लेकर बड़ा फैसला दिया है. हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2021 पर दिए गए सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा है. मतलब एसआई भर्ती 2021 रद्द रहेगी. हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला दिया है. हाई कोर्ट ने एकलपीठ के भर्ती रद्द रखने फैसले को बरकरार रखा है, लेकिन एकलपीठ द्वारा आरपीएससी के सदस्यों के ख़िलाफ़ लिए गए स्वप्रेरित प्रसंज्ञान को रद्द कर दिया है.   रद्द रहेगी SI भर्ती परीक्षा मामले में पर भी कर रहे एडवोकेट हरेंद्र नील बताया कि कोर्ट ने एकलपीठ (सिंगल बेंच) के फैसले को बरकरार रखा है. खंडपीठ ने यह भी माना है कि आरपीएससी सदस्यों के खिलाफ एकलपीठ की टिप्पणी सही है. भर्ती परीक्षा में अब छंटनी कर पाना संभव नहीं है. इसलिए परीक्षा रद्द रहेगी. एसआई भर्ती 2021 परीक्षा के लिए 3 फरवरी 2021 को नोटिफिकेशन जारी हुआ. 859 पदों के लिए 13 से 15 सितंबर 2021 को भर्ती परीक्षा आयोजित हुई. इसमें करीब 7 लाख 97 हजार अभ्यर्थियों ने आवेदन किया. SI भर्ती परीक्षा में 3 लाख 80 हजार अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में शामिल हुए. 20 हजार 359 अभ्यर्थी फिजिकल टेस्ट के लिए पास हुए. 3 हजार 291 अभ्यर्थी इंटरव्यू में शामिल हुए थे. जिसके बाद 1 जून 2023 को फाइनल रिजल्ट जारी किया गया. परीक्षा में लगे थे धांधली के आरोप परीक्षा में बड़े स्तर पर धांधली के आरोप लगे. जांच एसओजी को सौंपी गई. मामले में आरपीएससी के मेंबर तक के नाम सामने आए. इसके बाद मामले ने राजनीतिक तूल भी पकड़ा. आरपीएससी सदस्य रामूराम राईका और बाबूलाल कटरा की गिरफ्तारी हुई. इसके बाद  13 अगस्त 2024 को भर्ती परीक्षा रद्द करने को लेकर याचिका दायर हुई. इस याचिका की लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 28 अगस्त 2025 को भर्ती परीक्षा को रद्द करने का फैसला दिया था, लेकिन चयनित एसआई अभ्यर्थियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट की खंडपीठ में चुनौती दी. खंडपीठ ने 8 सितंबर को एकल पीठ के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी. इसके बाद वे अभ्यर्थी जो भर्ती परीक्षा को रद्द करवाना चाहते थे याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर को एकल पीठ के फैसले को बहाल करते हुए हाई कोर्ट की खंडपीठ को 3 महीने में फैसला लेने का आदेश दिया. इसके साथ ही चयनित एसआई अभ्यर्थियों की फील्ड पोस्टिंग पर रोक लगा दी थी.

‘शून्य अंक’ वाले अभ्यर्थी कैसे बने सरकारी कर्मचारी? राजस्थान हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई है। मामला सरकारी नौकरियों में क्लास IV कर्मचारियों की भर्ती से जुड़ा है, जहां आरक्षित वर्ग के लिए कट-ऑफ अंक जीरो के करीब रखे गए थे। जस्टिस आनंद शर्मा ने इस स्थिति को बेहद हैरान करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि भले ही नौकरी छोटे पद की हो, लेकिन सरकार को भर्ती के लिए एक न्यूनतम मानक जरूर रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा, जो शख्स परीक्षा में शून्य या उससे भी कम नंबर लाता है, वह सरकारी काम करने के लायक कैसे हो सकता है? कोर्ट ने साफ किया कि नियुक्ति प्राधिकारी के रूप में राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भर्ती में न्यूनतम मानक सुनिश्चित करे, ताकि चयनित उम्मीदवार अपने कर्तव्यों का संतोषजनक ढंग से पालन कर सकें। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक उम्मीदवार ने कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया गया कि हाल ही में हुई एक भर्ती प्रक्रिया में कुछ आरक्षित श्रेणियों के लिए कट-ऑफ महज 0.0033 रखी गई थी। माइनस में नंबर, फिर भी नौकरी ना मिलने की शिकायत दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि उसके अंक शून्य से भी कम थे और इसी आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई थी। उसने कोर्ट से शिकायत की कि जब सरकार ने पास होने के लिए कोई न्यूनतम नंबर तय ही नहीं किए हैं, तो उसे फेल क्यों किया गया? जांच में पता चला कि कुछ श्रेणियों में कट-ऑफ महज 0.0033 थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि या तो परीक्षा का पेपर जरूरत से ज्यादा कठिन था या फिर भर्ती प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि उन्होंने पास होने के लिए कम से कम नंबर की सीमा तय क्यों नहीं की? अब राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग के प्रमुख सचिव से जवाब मांगा है। उन्हें हलफनामा देकर यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी।

सिम लिमिट और डिजिटल सेफ्टी पर राजस्थान हाई कोर्ट सख्त: 3 से ज्यादा सिम नहीं मिलेंगे, बच्चों के फोन और नेट बैंकिंग पर भी निर्देश

जोधपुर साइबर ठगी और ऑनलाइन अपराध के मामले इन दिनों बढ़ते जा रहे हैं। साइबर अपराध इन दिनों देश की सबसे बड़ी समस्या बन गया है। सारबर ठगी और अपराधों पर नियंत्रण के लिए राजस्थान हाई कोर्ट की ओर से एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया गया है। अपने इस फैसले में राजस्थान हाई कोर्ट ने कई निर्देश दिए हैं। जैसे कि किसी व्यक्ति के नाम पर 3 से अधिक सिम जारी नहीं करना, बच्चों के सोशल-मीडिया इस्तेमाल करने के गाइडलाइन आदि। बता दें कि राजस्थान के जोधपुर हाई कोर्ट ने 84 साल के एक बुजुर्ग दंपती से 2 करोड़ की साइबर ठगी करने वाले दो आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए ये सभी निर्रेश जारी किए हैं। साथ ही कोर्ट ने आरोपियों की याचिका भी खारिज कर दी है। जोधपुर हाई कोर्ट के जस्टिस रवि चिरानिया ने सरकार, पुलिस और बैंकों के लिए यह निर्देश जारी किए हैं। इंटरनेट और मोबाइल चलाने को लेकर गाइडलाइन बनाने के निर्देश जोधपुर हाईकोर्ट ने मामले में सुनवाई करते हुए अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को निर्देश दिया। जिसमें कहा कि वे भारतीय साइबर क्राइम को-ऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) की तर्ज पर राजस्थान साइबर क्राइम कंट्रोल सेंटर (R4C) की स्थापना करें। 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्कूल में मोबाइल, ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया के इस्तेमाल लेकर एसओपी बनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने किसी भी व्यक्ति के नाम पर 3 से अधिक सिम कार्ड जारी नहीं करने का आदेश दिया।     जोधपुर हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि (I4C) की तर्ज पर राजस्थान में (R4C) की स्थापना की जाए।     गृह विभाग और कार्मिक विभाग को मिलकर DG साइबर के अधीन स्पेशल IT इंस्पेक्टर की भर्ती की जाएगी।     ये इंस्पेक्टर सिर्फ साइबर मामलों की जांच करेंगे। साथ ही इनका दूसरे विभाग में ट्रांसफर नहीं किया जाएगा।     कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी बैंक और फिनटेक कंपनियां ‘म्यूल अकाउंट’ और संदिग्ध ट्रांजैक्शन पकड़ने के लिए RBI की ओर से डवलप किए गए ‘Mule Hunter’ जैसे AI टूल्स का उपयोग अवश्य करें। इंटरनेट बैंकिंग और यूपीआई को नियंत्रित करने के निर्देश इसके साथ ही हाई कोर्ट ने इंटरनेट बैंकिंग को लेकर भी आदेश जारी किया है। कोर्ट ने कहा जिन खाताधारकों का सालाना ट्रांजैक्शन 50 हजार रुपए से कम है या जिनकी डिजिटल साक्षरता कम है, ऐसे ग्राहकों की इंटरनेट बैंकिंग और यूपीआई लीमिट को नियंत्रित किया जाए।