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उत्तराखंड में 160KM के 51 रोपवे बनेंगे, 2026 से शुरू होंगे 4 प्रमुख प्रोजेक्ट्स

 देहरादून उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थ यात्रा को आसान बनाने के लिए सरकार ने बड़ा मास्टर प्लान तैयार किया है। राज्यभर में 51 रोपवे प्रोजेक्ट्स विकसित किए जाएंगे, जिनकी कुल लंबाई करीब 160.75 किलोमीटर होगी। 2026 से शुरू होंगे मेगा प्रोजेक्ट्स इन परियोजनाओं में से कुछ पर काम तेजी से चल रहा है, जबकि केदारनाथ और हेमकुंड साहिब सहित 4 बड़े रोपवे प्रोजेक्ट्स पर 2026 से निर्माण कार्य शुरू करने की तैयारी है। इंटरहेडिंग के बाद पूरे क्रम में समझें तो, कई अन्य प्रोजेक्ट्स अभी DPR और प्री-फिजिबिलिटी स्टडी के चरण में हैं, जिन्हें उत्तराखंड रोपवे डेवलपमेंट लिमिटेड के जरिए आगे बढ़ाया जा रहा है। दुर्गम इलाकों तक आसान होगी पहुंच उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड के इंफ्रास्ट्रक्चर निदेशक दीपक खंडूरी के अनुसार, रोपवे उन क्षेत्रों तक पहुंच का बेहतर विकल्प हैं जहां सड़क बनाना कठिन है। इससे तीर्थ यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। देहरादून-मसूरी रोपवे जल्द होगा शुरू देहरादून से मसूरी तक बनने वाला 5.5 किलोमीटर लंबा रोपवे प्रमुख परियोजनाओं में शामिल है। करीब 285 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस प्रोजेक्ट का लगभग 70% काम पूरा हो चुका है। इस रोपवे में 10 यात्रियों की क्षमता वाले 71 केबिन होंगे और सफर करीब 20 मिनट में पूरा होगा। इसे इस साल के अंत तक शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है।     5.5 किलोमीटर का देहरादून-मसूरी रोपवे: देहरादून के पुरकुल से मसूरी के लाइब्रेरी चौक तक बनने वाला यह रोपवे राज्य के प्रमुख प्रोजेक्ट्स में शामिल है। करीब 285 करोड़ रुपए की लागत से इसका निर्माण किया जा रहा है। परियोजना का लगभग 70 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। इसमें 10 यात्रियों की क्षमता वाले 71 केबिन लगाए जाएंगे और देहरादून से मसूरी तक का सफर करीब 20 मिनट में पूरा होगा। इसे इस साल के अंत तक शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है।     0.93 KM का ठुलीगाड़-पूर्णागिरी मंदिर रोपवे: चंपावत जिले में पूर्णागिरी मंदिर तक पहुंच आसान बनाने के लिए यह रोपवे बनाया जा रहा है। करीब 35 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना का निर्माण कार्य जारी है। इसे 30 मई 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।     4.9 किलोमीटर का तपोवन-कुंजापुरी रोपवे: टिहरी में प्रस्तावित इस रोपवे के लिए मई 2025 में एक स्विस तकनीकी कंपनी को तकनीकी सहयोग के लिए चुना गया है। करीब 4.9 किलोमीटर लंबे इस रोपवे के लिए फिलहाल भूमि सर्वेक्षण और अंतिम मार्ग तय करने का काम चल रहा है। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद आगे निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।     3.38 किलोमीटर का जानकीचट्टी-यमुनोत्री मंदिर रोपवे: यमुनोत्री धाम तक पहुंच आसान बनाने के लिए यह रोपवे बनाया जा रहा है। करीब 167 करोड़ रुपए की लागत वाली इस योजना के लिए फरवरी 2023 में निर्माण एजेंसी के साथ समझौता किया गया था। मार्ग के एलाइनमेंट में बदलाव के प्रस्ताव के कारण फिलहाल शासन स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। लक्ष्य है कि निर्माण पूरा कर 1 सितंबर 2027 तक रोपवे शुरू कर दिया जाए।     12.9 किलोमीटर का गौरीकुंड-केदारनाथ रोपवे: रुद्रप्रयाग जिले में बनने वाले इस रोपवे का ठेका अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड को दिया गया है। इसके लिए 9 नवंबर 2025 को अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। 4081.28 करोड़ रुपए की लागत वाली इस परियोजना में कंपनी राज्य सरकार को राजस्व का 42 प्रतिशत हिस्सा देगी। इसका निर्माण कार्य मई 2026 में शुरू कर मई 2032 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।     12.4 किलोमीटर का गोविंदघाट-हेमकुंड साहिब रोपवे: चमोली जिले में बनने वाले इस रोपवे का जिम्मा विश्व समुद्र इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड को सौंपा गया है। 2730.13 करोड़ रुपए की लागत वाली इस योजना में कंपनी सरकार को 45 प्रतिशत राजस्व देगी। इसका निर्माण कार्य मई 2026 में शुरू कर मई 2032 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर साबित होंगे रोपवे उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड के इंफ्रास्ट्रक्चर निदेशक दीपक खंडूरी ने इन परियोजनाओं के दूरगामी फायदों पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार रोपवे के माध्यम से उन दुर्गम पहाड़ियों तक आसानी से पहुंचा जा सकेगा, जहां सड़क मार्ग बनाना भौगोलिक और पर्यावरणीय दृष्टि से कठिन है। केदारनाथ, यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब जैसे कठिन ट्रेक वाले स्थानों पर बुजुर्गों और बीमार यात्रियों को सुरक्षित और आरामदायक सफर मिलेगा। पहाड़ों पर वाहनों के धुएं से प्रदूषण बढ़ रहा है। प्रमुख रोपवे प्रोजेक्ट्स की झलक केदारनाथ रोपवे गौरीकुंड से केदारनाथ तक 12.9 किमी लंबा रोपवे बनाया जाएगा। इस प्रोजेक्ट की लागत करीब 4081 करोड़ रुपये है और इसका ठेका Adani Enterprises Limited को दिया गया है। निर्माण कार्य मई 2026 से शुरू होकर 2032 तक पूरा होगा। हेमकुंड साहिब रोपवे गोविंदघाट से हेमकुंड साहिब तक 12.4 किमी लंबा रोपवे बनेगा। इसकी लागत करीब 2730 करोड़ रुपये है और इसे 2032 तक पूरा करने का लक्ष्य है। यमुनोत्री रोपवे जानकीचट्टी से यमुनोत्री मंदिर तक 3.38 किमी लंबा रोपवे प्रस्तावित है। इसे 2027 तक शुरू करने की योजना है। अन्य प्रोजेक्ट्स टिहरी में तपोवन-कुंजापुरी रोपवे और चंपावत में पूर्णागिरी मंदिर रोपवे पर भी काम जारी है। कई परियोजनाएं सर्वे और योजना के चरण में हैं। पर्यटन और रोजगार को मिलेगा बढ़ावा रोपवे प्रोजेक्ट्स से न केवल यात्रा आसान होगी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही, पहाड़ों में वाहनों की संख्या कम होने से प्रदूषण में कमी आएगी। PPP मॉडल पर हो रहा निर्माण ये सभी परियोजनाएं पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर विकसित की जा रही हैं। इसमें निजी कंपनियां निवेश करती हैं और संचालन करती हैं, जबकि सरकार को तय हिस्सा राजस्व के रूप में मिलता है। इंटरहेडिंग के बाद पूरे क्रम में समझें तो, किसी भी रोपवे प्रोजेक्ट से पहले प्री-फिजिबिलिटी स्टडी और डीपीआर तैयार की जाती है, जिसके बाद निर्माण प्रक्रिया शुरू होती है। उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर योजना विशेषज्ञों का मानना है कि ये रोपवे प्रोजेक्ट्स उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर साबित होंगे। खासतौर पर बुजुर्गों और बीमार यात्रियों के लिए केदारनाथ और हेमकुंड साहिब जैसे कठिन रास्तों की यात्रा अब आसान और सुरक्षित हो जाएगी।

प्राचीन माँ बीजासन मंदिर में बुजुर्गों-महिलाओं-दिव्यांगों को रहत देने बनेगा रोप-वे

बूंदी. हाड़ौती की आराध्य देवी माँ बीजासन के दरबार में अब भक्तों को 750 से अधिक सीढ़ियां चढ़ने की मजबूरी नहीं रहेगी। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सोमवार को इन्द्रगढ़ में 18 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले रोप-वे का शिलान्यास किया। इन्द्रगढ़ (बूंदी) स्थित माँ बीजासन मंदिर राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र का एक अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी शक्तिपीठ है। यह मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला की एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध है। इन्द्रगढ़ माताजी: रोप-वे से सुगम होंगे दर्शन इन्द्रगढ़ की पहाड़ी पर स्थित माँ बीजासन मंदिर सदियों से लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। वर्तमान में यहाँ पहुँचने के लिए भक्तों को कड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। रोप-वे बनने से सबसे अधिक लाभ बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांग श्रद्धालुओं को होगा। अब वे मिनटों में पहाड़ी के शिखर पर स्थित मंदिर तक पहुँच सकेंगे। ओम बिरला ने कहा कि इस सुविधा के आने से श्रद्धालुओं की संख्या में भारी इजाफा होगा, जिससे स्थानीय व्यापारियों, होटल व्यवसायियों और गाइडों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इन्द्रगढ़ की पहाड़ी पर स्थित माँ बीजासन मंदिर पर्यावरण और पर्यटन का अद्भुत तालमेल चूंकि बीजासन माता मंदिर अभयारण्य क्षेत्र (रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के पास) में स्थित है, इसलिए विकास कार्यों में पर्यावरण का विशेष ध्यान रखा गया है।     इको-फ्रेंडली प्रोजेक्ट: रोप-वे को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वन्यजीवों और वन संपदा को न्यूनतम नुकसान हो।     पर्यटन मानचित्र पर इन्द्रगढ़: बिरला ने विश्वास जताया कि आगामी कुछ वर्षों में इन्द्रगढ़ राजस्थान के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर एक प्रमुख गंतव्य के रूप में उभरेगा। दो बार हो चुकी रोप-वे की घोषणा बीजासन माता मंदिर पर पूर्व में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी रोपवे की घोषणा हुई थी, लेकिन रोप-वे की घोषणा केवल कागजों में ही सिमट कर रह गई। और धरातल पर नहीं आ पाई। ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि प्राचीनता: माना जाता है कि यह मंदिर लगभग 2000 वर्ष से भी अधिक पुराना है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सिद्ध संत बाबा कृपानाथ जी महाराज ने यहाँ कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने स्वयं पर्वत की चट्टान चीरकर दर्शन दिए थे। नाम का रहस्य: 'बीजासन' नाम देवी दुर्गा के उस स्वरूप को दर्शाता है जो राक्षस रक्तबीज का संहार करने के बाद उसके ऊपर आसन लगाकर विराजमान हुई थीं। स्थापना: कहा जाता है कि बूंदी के शासक राव शत्रुसाल के भाई इंद्रसाल ने इन्द्रगढ़ नगर बसाया था और पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर को भव्य रूप दिया। मंदिर की भौगोलिक स्थिति और वास्तुकला स्थान: यह मंदिर बूंदी जिले की इन्द्रगढ़ तहसील में स्थित है। यह जयपुर से लगभग 160 किमी और कोटा से करीब 75 किमी दूर है। पहाड़ी और सीढ़ियाँ: मंदिर पहाड़ी की चोटी पर एक प्राकृतिक गुफा के अंदर बना हुआ है। वर्तमान में भक्तों को माता के दर्शन के लिए करीब 750 से 1000 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। प्रवेश: गुफा के अंदर माता की स्वयंभू (स्वयं प्रकट) प्रतिमा विराजमान है। मंदिर परिसर से अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। धार्मिक महत्व और मान्यताएँ नवदुर्गा स्वरूप: यहाँ माँ बीजासन को दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। मंदिर में सात बहनों (नवदुर्गा के स्वरूप) की पूजा का भी विधान है। मनोकामना पूर्ण: भक्तों का अटूट विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। विशेष रूप से निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना लेकर यहाँ आते हैं। अखंड ज्योति: मंदिर में एक अखंड ज्योति 24 घंटे प्रज्वलित रहती है, जिसका धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। प्रमुख उत्सव और मेले नवरात्रि मेला: साल में दोनों नवरात्रि (चैत्र और शारदीय) के दौरान यहाँ विशाल मेला लगता है। इस समय राजस्थान ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से भी लाखों श्रद्धालु मत्था टेकने आते हैं। धार्मिक आयोजन: नवरात्रि में यहाँ विशेष मंगल आरती, भोग आरती और संध्या आरती का आयोजन होता है, जिसमें शामिल होना पुण्यदायी माना जाता है।