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अव्यक्त दुःख को अभिव्यक्ति देतीं कहानियाँ: सारिका श्रीवास्तव

इंदौर, हिंदी में कहानी का कलेवर आमतौर पर छोटा होता है और उपन्यास या लंबी कहानी की तरह उसमें एक से ज़्यादा मुद्दे उठाने की गुंजाइश नहीं होती। दिनेश भट्ट अपनी कहानी में यह जोख़िम उठाते है और एक-एक कहानी में एक से ज़्यादा सवालों से दो-चार होने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में वे कहानी की औपन्यासिक संभावनाओं का अंत भी कर देते हैं जो अच्छा नहीं है। अवसर था समकालीन हिंदी कहानीकार दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा) के कहानी पाठ और उसके उपरांत हुई चर्चा का। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार और 'प्रगतिशील वसुधा' के संपादक विनीत तिवारी ने पढ़ी गई कहानियों पर अपनी उपरोक्त टिप्पणी दी। उन्होंने यह भी कहा कि भाषा की सरलता कहानी का लक्षण हो सकता है, विशेषता नहीं। आजकल अधिकांश कहानियाँ बोलचाल की भाषा में रची जाती हैं। इसीलिए वे प्रवाहमान भी होती हैं लेकिन साधारण भाषा और साधारण शब्दों के इस्तेमाल से एक अनोखा बिम्ब रचना कहानीकार की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बनती है। दिनेश की कहानियों में वे कहीं-कहीं इसमें सफल हुए हैं। दिनेश भट्ट की कहानियों के ब्यौरे दिलचस्प हैं लेकिन इसकी सावधानी रखनी चाहिए कि कथ्य कहीं विवरणों में ढँक न जाए, बल्कि विवरणों से कथ्य और खुलकर निखरे। प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर इकाई द्वारा 3 अक्टूबर 2025 को कल्याण जैन स्मृति वाचनालय में आयोजित इस कार्यक्रम में दिनेश भट्ट ने अपनी तीन चर्चित कहानियों, 'गोमती का बसेरा और ईश्वर', 'सीलू मवासी का सपना' और 'अंतिम बूढ़े का लाफ्टर डे' का प्रभावशाली पाठ किया। पाठ के बाद उपस्थित रचनाकारों एवं श्रोताओं ने अपनी प्रतिक्रियाएँ भी व्यक्त कीं। डॉ. संजय भालेराव ने कहा कि कहानियाँ अव्यक्त दुःख को व्यक्त करती हैं। जावेद आलम ने इन कहानियों को वेदना और पीड़ा की कहानी बताया। विजय दलाल, सारिका श्रीवास्तव, अभय नेमा, विवेक सिकरवार, अभय, रामआसरे पांडे आदि ने कहानियों के शिल्प और भाषा के द्वन्द्व की शिनाख़्त की और यथार्थवादी शैली की इन कहानियों को प्रभावशाली माना। उनका कहना था कि  यह कहानियाँ हमारे आसपास के जीवन की परतें इस तरह खोलती हैं कि जाना हुआ यथार्थ ही हमें नया और महत्त्वपूर्ण लगने लगता है। कार्यक्रम में विश्वनाथ कदम, फादर पायस लाकरा, डॉ. परमानंद भट्ट, अभय लोधी, निर्मल जैन और संजय वर्मा की भी सक्रिय भागीदारी रही। संचालन और आभार प्रदर्शन अभय नेमा ने किया।

जब एक-दूसरे पर गिर पड़े लोग… रैली में मौजूद गवाहों ने बताई सच्चाई

करूर तमिलनाडू के करूर में तमिलगा वेत्री कजगम (TVK) चीफ ऐक्टर विजय की रैली में मची भगदड़ में अब तक 39 लोगों की मौत हो गई है। वहीं रैली में मौजूद लोगों का कहना है कि जब भीड़ में अफरा-तफरी मचनी शुरू हुई तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह भगदड़ कैसे रुकेगी। इतनी ज्यादा भीड़ में किया भी क्या जा सकता था। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्यक्षदर्शी नंद कुमार ने कहा, हम भी वहां मौजूद थे। भीड़ को नियंत्रित करने का कोई रास्ता ही नहीं था। कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि विजय रैली स्थल पर दोपहर में ही पहुंचने वाले थे, हालांकि उन्हें पहुंचने में 6 घंटे की देरी हो गई। कुमार ने कहा, सबको यही लगा था कि रैली समय से शुरू होगी और इसीलिए लोग बच्चों को भी साथ लेकर गए थे। लोग भूख-प्यास से परेशान होने लगे। उन्होंने कहा, सुरक्षा का इंतजाम होने के बाद भी भीड़ इतनी थी कि स्थिति बिगड़ गई। उन्होंने कहा, जब भगदड़ मची तो कहीं इतनी जगह भी नहीं थी कि ऐंबुलेंस पहुंच सके। ऐसे में राहत-बचाव में भी देरी हुई। एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, हम मदद के लिए चिल्ला रहे थे लेकिन कोई हिलने-डुलने में भी सक्षम नहीं था। लोग एक दूसरे पर गिर रहे थे। हम सांस भी नहीं ले पा रहे थे। एक पिता अपनी 12 साल की बेटी को लेकर रैली में आया था। उन्होंने कहा, वह केवल बेहोश हुई थी। मुझे लगा सब ठीक हो जाएगा। लेकिन उसकी मौत हो गई। बता दें कि करूर-एरोड हाइवे पर वेलुसमीपुरम में ऐक्टर विजय की रैली आयोजित की गई थी। यहां वह भाषण देने आने वाले थे। शाम के 8 बजे के करीब उनका भाषण शुरू हुआ को ग्राउंड में कहीं पैर रखने की जगह नहीं थी। अनुमान से तीन गुना ज्यादा लोग वहां मौजूद थे। ऐक्टर विजय ने घटना पर दुख जताया है। वहीं तमिलनाडु के सीएम ने मृतकों के परिवारों को 10 लाख रुपये देने का ऐलान किया है।