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आध्यात्मिक सुरों से गूँजा विश्वरंग 2025, अनिरुद्ध जोशी व मनोज पाटीदार की मनमोहक प्रस्तुति

भोपाल  रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विश्वरंग 2025 के तीसरे और अंतिम दिन की शुरुआत एक आध्यात्मिक, सौम्य और मन को शांत करने वाली संगीत साधना के साथ हुई। प्रातः आयोजित मंगलाचरण में मध्यप्रदेश के युवा और लोकप्रिय सितार वादक अनिरुद्ध जोशी ने अपनी मनोहारी प्रस्तुति से पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके सितार से निकलती स्वरलहरियों ने न केवल वातावरण को पवित्र बनाया, बल्कि प्रतिभागियों और दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराइयों से जोड़ दिया। उनका साथ दे रहे प्रसिद्ध तबला वादक मनोज पाटीदार ने अपनी ताल और लय की अद्भुत संगति से इस प्रस्तुति को और ऊँचे सौंदर्य तक पहुँचाया, जिससे विश्वरंग के अंतिम दिन का प्रारंभ एक सांस्कृतिक उत्सव में बदल गया और आगे के सत्रों के प्रति उत्साह और अपेक्षाएँ और अधिक बढ़ गईं। प्रज्ञान ब्रह्म की सोच को सौरभ द्विवेदी ने किया रेखांकित संगीत की इस सुगंधित शुरुआत के बाद पहले वैचारिक सत्र में इंडिया टुडे मैगज़ीन और लल्लनटॉप के संपादक तथा सुविख्यात वक्ता सौरभ द्विवेदी ने अपनी बात एक गहरे सवाल से शुरू की—क्या हम वही बनकर रह जाते हैं, जहाँ से आते हैं, या हम स्वयं को निरंतर नए साँचों में ढाल सकते हैं? उन्होंने कहा कि मनुष्य तब तक आगे बढ़ता है, जब तक वह सीखता रहता है; सीखना रुकते ही ठहराव शुरू हो जाता है। इस संदर्भ में उन्होंने श्वेतकेतु के सूत्र ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ का उल्लेख किया और समझाया कि जो भीतर है, वही बाहर प्रकट होता है; और सरल बनना ही मनुष्य का सबसे कठिन लक्ष्य है। उन्होंने वेदांत के महावाक्य ‘तत्वमसि’ के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि मनुष्य का आंतरिक अस्तित्व उसी परम चेतना से अभिन्न है, जिससे सृष्टि संचालित है। सौरभ ने विद्यार्थियों को समझाया कि सीखने के लिए सुनना उतना ही जरूरी है जितना बोलना या पढ़ना, और इसी संदर्भ में आर्यभट्ट और आइंस्टीन के उदाहरण दिए। उन्होंने डिंडोरी के उस व्यक्ति की मार्मिक घटना भी साझा की जिसे मानव तस्करी के कारण बीस वर्षों तक तेलंगाना में बंधक बनाकर रखा गया था, और बताया कि दुनिया में कई लोग ऐसे कष्टों से गुजरते हैं जिनकी कल्पना भी कठिन है। उन्होंने कहा कि छात्र का मन एक रीते घड़े जैसा होता है, जिसकी क्षमता ब्लैक होल से भी अधिक विस्तृत है—जितना ज्ञान उसमें भरा जाए, वह और अधिक ग्रहण करने को तैयार रहता है। उन्होंने यह सवाल रखा कि अच्छा इंसान होना इतना मुश्किल क्यों है और साथ ही भारतीय संस्कृति के संरक्षणवादी स्वभाव पर प्रकाश डाला। विचारों की विविधता, मित्रता, संगीत, सिनेमा और पुस्तक-पठन को उन्होंने युवाओं के सीखने और संवर्धन के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि भारत को वैज्ञानिक चेतना विकसित करने की अत्यंत आवश्यकता है, ताकि समाज बाहरी दिखावे से अधिक मानवीय गुणों को महत्व दे सके। अंत में उन्होंने सलाह दी कि मनुष्य को जीवन के अंत में खालीपन नहीं, बल्कि ‘मुदित भावना’ के साथ विदा होना चाहिए। उनका पूरा संबोधन ज्ञान, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण रहा। सान्या ने दिए कैरेक्टर को बेहतर बनाने के टिप्स दोपहर के सत्र में फ़िल्म अभिनेत्री सान्या मल्होत्रा के साथ हुआ संवाद छात्र-युवाओं और कला प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना। रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय की प्रो–चांसलर एवं विश्वरंग की सह-निदेशक डॉ. अदिति चतुर्वेदी वत्स और विकास अवस्थी ने सान्या से उनकी फ़िल्मी यात्रा, कलात्मक अनुशासन और अभिनय की तैयारी पर गहन बातचीत की। सान्या ने कहा कि अभिनय उनके लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि एक सतत साधना है, जिसमें पात्र के मनोवैज्ञानिक आयामों का अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने बताया कि किसी भी भूमिका को भीतर तक महसूस करने के लिए वे पटकथा को बार-बार लिखती हैं और पात्र से जुड़ी जगहों और लोगों से संवाद स्थापित करती हैं, ताकि किरदार की वास्तविकता भीतर उतर सके। उन्होंने कहा कि अभ्यास ही कलाकार को परिपक्वता देता है, और यही कारण है कि वे लगातार वर्कशॉप करती रहती हैं। अपनी तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी फिल्मों पर उन्होंने कहा कि कोई भी सम्मान पहले से सुनिश्चित नहीं होता, लेकिन जब ईमानदारी और मेहनत से किए गए काम की सराहना होती है, तो वह कलाकार के लिए सबसे बड़ा प्रोत्साहन बन जाता है। उन्होंने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहा कि ऑडिशन और अस्वीकृति कलाकार को मजबूत बनाते हैं। युवाओं को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि अभिनय में करियर बनाने से पहले शिक्षा पूरी करना जरूरी है, क्योंकि पढ़ाई व्यक्ति को आत्मविश्वास और गहरी दृष्टि प्रदान करती है, जो कलाकार को जीवन और किरदार—दोनों को समझने में मदद करती है। माइथोलॉजी को शंकाओं के साथ पढ़े, तभी भीतर का ज्ञान समझ पाएंगे : देवदत्त पटनायक  मैं जब भी पौराणिक कथाओं पर बात करता हूं, टी9 एक शब्द का इस्तेमाल करता हूं मायथोलॉजी, और लोग मुझसे गुस्सा हो जाते हैं। लेकिन, क्या आपको पता है, जब तक आप उत्तेजित नहीं होंगे तो सरस्वती नहीं आएंगी। बहुत से लोग मानते हैं कि मायथोलॉजी शब्द मिथ्या से बना है, जो गलत है। संस्कृति में मिथ्या का मतलब incomplete truth। जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य…। मिथ्या असल में सच और झूठ से बिल्कुल अलग अधूरा सच है। आज हर आदमी के पास अपनी दुनिया का ज्ञान तो है, मगर संपूर्ण ज्ञान नहीं है। संपूर्ण ज्ञानी सिर्फ ईश्वर है। जबकि, मायथोलॉजी शब्द आया है ग्रीक के माइथोज से , यानि आख्यान।  दुनिया की हर संस्कृति  सभ्यता का अपना अलग आख्यान है  चीन, जापान, वियतनाम की अपनी अपनी माइथोलॉजी है। सब अपने संस्कृति के दृष्टिकोण को बताने के लिए आख्यानों का इस्तेमाल करते हैं। असल में, दुनिया को समझने का एक माध्यम है आख्यान, यानि माइथोलॉजी। जो विवाद करते हैं, वो जिज्ञासु नहीं होते, योद्धा होते हैं, उनके पास ज्ञान नहीं होता। पहले के जमाने में शास्त्रार्थ होते थे, जिसका मतलब होता था शास्त्रों का अर्थ निकलना। जबकि, टीवी पर और हमारे सीरियल्स में शास्त्रार्थ को सिर्फ बहस और अहंकार की लड़ाई की तरह दिखाते हैं। मगर, जहां सर्द बहस होती है, वहां से सरस्वती चली जाती है। याद रखिए, श्रद्धा ज्ञान का द्वार नहीं खोलती, जिज्ञासा ज्ञान का द्वार खोलती है। गुरु जो कहता है वो ही सही है, यदि आप मान लें तो यही आपकी श्रद्धा की शुरुआत हो जाएगी और फिर … Read more