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मोदी-योगी सरकार ने बदली काशी की तस्वीर, 13 वर्षों में 52.71 करोड़ पर्यटकों ने किया भ्रमण

वाराणसी गंगा के अर्धचन्द्राकार घाट, मंदिरों की घंटियां, संकरी गलियों की अपनी-अलग पहचान और सदियों पुरानी परंपराएं काशी को दुनिया के दूसरे शहरों से अलग बनाती हैं। यही वजह है कि देश-दुनिया के लोगों के लिए काशी हमेशा से आस्था और आकर्षण का केंद्र रही है।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने समय के साथ यहां सुविधाओं का विस्तार किया। प्राचीन विरासत को सहेजते हुए आधुनिक सुविधाओं के विस्तार ने काशी को देश-विदेश के पर्यटकों के लिए सुरक्षित और आकर्षक गंतव्य बनाया है। यही वजह है कि यहां पर्यटकों की संख्या साल-दर साल बढ़ती जा रही है। पर्यटन विभाग के अनुसार वर्ष 2014 से जुलाई 2026 तक  52 करोड़, 71 लाख 41 हजार 814 भारतीय और विदेशी पर्यटकों ने काशी का भ्रमण किया। इनमें 52 करोड़ 40 लाख 46 हजार 803  भारतीय और 30 लाख 95 हजार 11 विदेशी पर्यटक शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में जितने पर्यटक काशी आए, वर्ष 2016 के जुलाई माह तक ही उससे 4 करोड़ 10 लाख 70 हजार 422  अधिक लोग आ चुके हैं। पर्यटकों की बढ़ती संख्या से काशी की अर्थव्यवस्था को मिली नई रफ्तार   पर्यटकों की लगातार बढ़ती संख्या काशी की बदलती तस्वीर को दर्शाती है, जिसका सीधा असर काशी की स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग पर भी पड़ा है। पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से होटल, गेस्ट हाउस, रेस्तरां, नाव संचालन, फूल-माला, पूजा सामग्री , टैक्सी-ऑटो, टूर एवं ट्रैवल सेवाओं के साथ-साथ स्थानीय बाजारों और हस्तशिल्प उत्पादों की मांग में वृद्धि हुई है। इससे पर्यटन से जुड़े छोटे कारोबारियों, दुकानदारों, नाविकों, गाइडों, कारीगरों और सेवा क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर बने हैं।  इस तरह पर्यटन अब केवल धार्मिक और सांस्कृतिक अनुभव तक सीमित नहीं है, बल्कि काशी की स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल हो रहा है।    सुव्यवस्थित विकास के साथ बढ़ा काशी का आकर्षण वर्ष 2014 में केंद्र में मोदी सरकार और वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के गठन के बाद काशी में विकास और पर्यटन को नई गति मिली। सड़क, रेल और हवाई कनेक्टिविटी के विस्तार, बेहतर सार्वजनिक सुविधाओं, स्वच्छता, घाटों के विकास और प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों के सौंदर्यीकरण से काशी का पर्यटन अनुभव लगातार समृद्ध हुआ है। पर्यटकों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पर्यटन अवसंरचना तथा कानून-व्यवस्था को मजबूत किया गया, वहीं नए पर्यटन अनुभवों का भी विस्तार हुआ । काशी विश्वनाथ धाम के विकास से मंदिर क्षेत्र में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ीं, घाटों के सौंदर्यीकरण, बेहतर साफ-सफाई, सारनाथ के विकास और गंगा में रिवर क्रूज जैसी गतिविधियों ने पर्यटन के दायरे को और व्यापक किया। आज काशी में धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और विरासत पर्यटन के साथ आधुनिक सुविधाओं का संगम दिखाई देता है। सदियों पुरानी परंपराएं नए कलेवर में पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं। विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर काशी की यह बदलती तस्वीर बताती है कि विरासत को सहेजते हुए आधुनिक सुविधाओं का विस्तार पर्यटन को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।   वर्जन  "हमारा प्रयास है कि काशी की सदियों पुरानी परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए पर्यटकों को आधुनिक पर्यटन से जोड़ा जाए, ताकि दुनिया भर के पर्यटक यहां आकर केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि काशी की संस्कृति, विरासत और जीवन शैली का भी अनुभव लेकर लौटें।"  जयवीर सिंह पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ,उत्तर प्रदेश  वर्ष 2014 से जुलाई 2026 तक वाराणसी में पर्यटकों की संख्या -वर्ष-भारतीय पर्यटक-विदेशी पर्यटक-कुल पर्यटक -2014 –52,02,236 –2,87,761–54,89,997 -2015 –54,13,927–3,02,370– 57,16,297 -2016 –56,00,146 –3,12,519– 59,12,665 -2017– 59,47,355–34,860–62,82,215 -2018 –60,95,890 –3,49,270 –64,45,160 -2019 – 64,47,775– 3,50,000– 67,97,775 -2020 – 8,76,303–1,06,189 –9,82,492 -2021–30,75,913 –2,566 – 30,78,479 -2022 –7,11,47,310– 83,741–7,12,31,051 -2023–8,52,71,729 – 2,01,904 – 8,54,73,633 -2024–10,97,87,811– 3,09,932 –11,00,97,743 -2025 –17,27,52,530 – 3,21,358 –17,30,73,888 – 2026 जुलाई तक  – 4,64,27,878–1,32,541– 4,65,60,419

झारखंड की आदिवासी चिकित्सा पद्धति से बढ़ेगा पर्यटन, होड़ोपैथी को आयुष से जोड़ने की तैयारी

रांची  झारखंड के आदिवासी समाज के पास हजारों साल से संरक्षित अपनी चिकित्सा पद्धति है। राज्य में पर्यटन के विकास की योजनाओं के साथ पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को जोड़ने पर राज्य सरकार लंबे समय से काम कर रही है। राज्य के वनों में वेलनेस प्रोडक्ट के लिए उपयोगी वनस्पति की पूरी श्रृंखला उपस्थित है। संताल परगना में मलूटी, देवघर और गिरिडीह के धार्मिक पर्यटन के साथ होड़ोपैथी (आदिवासी चिकित्सा) को जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था का नया आधार तैयार हो सकता है। संताली और मुंडारी भाषा के शब्द होड़ोपैथी को विश्वभर में एथनो मेडिसन के तौर पर मान्यता दी जाती है। पेडों की छाल, जड़ और दूसरे वनस्पतियों के उपयोग से हड्डियों की मजबूती, नस और चर्मरोग का आसान उपचार किया जाता है। छोटानागपुर के कई हिस्सों में जलप्रपात देखने के लिए देशभर से लोग आते हैं। यहीं के जंगलों में औषधीय पौधे भी मिलते हैं। ऐसे में केरल के आयुर्वेदिक उपचार की तरह ही झारखंड के आदिवासी पारंपरिक चिकित्सा का समन्वय राज्य के पर्यटन को नई पहचान दे सकता है। रांची से सटे पुरुलिया के जंगलों में रहने वाले कई परिवार ऐसे प्रयोग से जुड़े हैं। आयुष में शामिल हो सकता है होड़ोपैथी पर्यटन के साथ स्वास्थ्यप्रद सेवाओं को जोड़ने के लिए झारखंड सरकार होड़ोपैथी को आयुष के तहत संबद्ध कराने का प्रयास कर रही है। संताली भाषा में ओलचिकी लिपि में होड़ोपैथी के दस्तावेज मौजूद हैं। राज्य सरकार इनके संरक्षण के साथ इन्हें उपयोगी बनाने में लगी है। आदिवासी युवाओं को इसकी जानकारी देकर पर्यटन स्थलों के पास सेंटर खोलने के लिए प्रेरित किया जाएगा।     झारखंड के आदिवासियों के पास पारंपरिक तौर पर अपनी चिकित्सा पद्धति है। प्रत्येक आदिवासी घर में वनों से मिलने वाली वनस्पति को औषधि बनाने की तकनीक मौजूद है। इसे पर्यटन से जोड़कर देशभर में प्रचार-प्रसार करने की आवश्यकता है। यह ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर लेकर आएगा। -डॉ. वेंकटेश कात्यायन पांडेय, आयुर्वेदाचार्य