samacharsecretary.com

बैटिंग की दादागीरी से नहीं मिलेगा वर्ल्ड कप, भारत को चाहिए ऐसी गेंदबाजी जो मैच छीन सके

नई दिल्ली
1983 और 2011… भारतीय क्रिकेट के ये दो साल सिर्फ विश्व कप जीतने की तारीखें नहीं हैं, बल्कि उस क्रिकेट की पहचान हैं, जिसमें भारत ने दुनिया को बताया था कि बड़े टूर्नामेंट कैसे जीते जाते हैं. 2027 में फिर वही गौरव हासिल करना है तो सिर्फ बल्लेबाजी के दम पर सपना देखना खतरनाक होगा. टीम इंडिया के पास बल्लेबाजी में रोहित शर्मा, विराट कोहली, केएल राहुल, शुभमन गिल और संजू सैमसन जैसे विकल्प हैं. रन बनाने की ताकत की कमी नहीं है. सवाल यह है कि रन बचाने और विकेट निकालने की ताकत कितनी है?

क्रिकेट अब सिर्फ 350 रन बनाने का खेल नहीं रह गया है. बड़े टूर्नामेंट में असली परीक्षा तब होती है जब सामने वाली टीम भी 300-350 के पार जाने की स्थिति में हो. ऐसे में आपकी गेंदबाजी कितनी जल्दी मैच का रुख बदल सकती है, यही खिताब और सिर्फ अच्छे प्रदर्शन के बीच का फर्क बनती है.

भारत अगर बल्लेबाजी की दादागीरी के भरोसे हर मुकाबला जीतने की सोचता रहेगा तो यह रणनीति लंबे टूर्नामेंट में जोखिम भरी होगी. एक खराब दिन बल्लेबाजों का आया और स्कोर 250-270 के आसपास अटक गया तो मैच बचाने के लिए गेंदबाजों के पास क्या हथियार होंगे?

यहीं जसप्रीत बुमराह और हार्दिक पंड्या की भूमिका बेहद अहम हो जाती है. बुमराह 100 फीसदी फिट हों और हार्दिक अपनी पूरी गेंदबाजी क्षमता के साथ उपलब्ध हों तो टीम का संतुलन ही बदल जाता है. लेकिन सवाल सिर्फ दो खिलाड़ियों का नहीं है. 2027 विश्व कप के लिए भारत को ऐसी गेंदबाजी यूनिट चाहिए जो परिस्थितियों की मोहताज न हो और बड़े मुकाबलों में खुद मैच छीन सके.

और इसके लिए सबसे जरूरी है- अब प्रयोगों की दुकान बंद कर विश्व कप के लिए चुनी जाने वाली टीम को साथ खेलने का पर्याप्त समय देना होगा.

विश्व कप से छह महीने पहले टीम बनाने की कोशिश करने की बजाय कम से कम छह महीने पहले एक पक्का टीम संयोजन तैयार होना चाहिए. कौन नई गेंद संभालेगा, डेथ ओवर में कौन आएगा, बीच के ओवरों में विकेट कौन निकालेगा, बुमराह के साथ दूसरा और तीसरा तेज गेंदबाज कौन होगा, हार्दिक की मौजूदगी में टीम का संतुलन कैसा होगा- इन सवालों के जवाब टूर्नामेंट शुरू होने से काफी पहले मिलने चाहिए.

बल्लेबाजी में पांच बड़े नाम होने से टीम कागज पर मजबूत दिख सकती है, लेकिन विश्व कप कागज पर नहीं जीते जाते. वहां एक विकेट मैच बदलता है, एक स्पेल कहानी बदलता है और एक दबाव भरा ओवर पूरा अभियान बदल सकता है.

1983 की टीम के पास कपिल देव थे, 2011 की टीम के पास जहीर खान… दोनों टीमों में बल्लेबाजी सितारों से भरी थी, लेकिन खिताब तक पहुंचने के लिए गेंदबाजी ने भी अपनी भूमिका निभाई.

इसलिए 2027 का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि भारत के पास कितने बड़े बल्लेबाज हैं. सवाल यह होना चाहिए कि क्या भारत के पास इतने धारदार गेंदबाज हैं जो बड़े मैच में सामने वाली टीम की बल्लेबाजी की कमर तोड़ सकें?

अगर जवाब अभी पूरी तरह साफ नहीं है तो वक्त अभी भी है. लेकिन वक्त को प्रयोगों में गंवाने की बजाय योजना में लगाना होगा. 2027 में 1983 और 2011 का गौरव दोहराना है तो बैटिंग की दादागीरी के साथ गेंदबाजी में भी बारूद चाहिए. वरना 350 रन भी कभी-कभी कम पड़ सकते हैं

 

Leave a Comment

हम भारत के लोग
"हम भारत के लोग" यह वाक्यांश भारत के संविधान की प्रस्तावना का पहला वाक्य है, जो यह दर्शाता है कि संविधान भारत के लोगों द्वारा बनाया गया है और उनकी शक्ति का स्रोत है. यह वाक्यांश भारत की संप्रभुता, लोकतंत्र और लोगों की भूमिका को उजागर करता है.
Click Here
जिम्मेदार कौन
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipiscing elit dolor
Click Here
Slide 3 Heading
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipiscing elit dolor
Click Here