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मौसम का कहर या आने वाली बड़ी चेतावनी? ग्लेशियर पिघलने से लेकर बाढ़ तक, क्यों बढ़ रही चिंता

 नई दिल्ली

जलवायु परिवर्तन का सबसे क्रूर और भयानक चेहरा अब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अधिक आबादी वाले महाद्वीप यानी एशिया के सामने आ चुका है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट – स्टेट ऑफ द क्लाइमेट इन एशिया 2025- ने वैश्विक पर्यावरण वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के पैरों तले जमीन खिसका दी है. 17 जून 2026 को सार्वजनिक की गई इस वैज्ञानिक रिपोर्ट में यह खौफनाक खुलासा हुआ है कि एशिया महाद्वीप में तापमान बढ़ने की रफ्तार वैश्विक औसत से कहीं अधिक तेज हो चुकी है। 

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि साल 1991 से 2025 के बीच एशिया में तापमान वृद्धि की दर, वर्ष 1961-1990 की अवधि की तुलना में लगभग दोगुनी दर्ज की गई है. इस बेकाबू होती तपिश के कारण ही पिछला साल यानी 2025 एशिया के इतिहास का दूसरा सबसे गर्म साल साबित हुआ। 

यह रिपोर्ट सिर्फ मौसमी आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक ऐसी गंभीर चेतावनी है जो यह साबित करती है कि जलवायु संकट अब किसी दूर के भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि भारत, चीन, जापान और पाकिस्तान सहित पूरे एशिया की वर्तमान और सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है। 

एशिया में तापमान वृद्धि की तेज रफ्तार
पिछले कुछ दशकों में एशिया दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल हो गया है जहां जलवायु परिवर्तन का सबसे तेज असर दिख रहा है.रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि वैश्विक औसत की तुलना में एशिया का तापमान कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. 1991-2025 की अवधि में तापमान वृद्धि की दर पिछले लंबे समय की तुलना में दोगुनी दर्ज की गई। 

2025 में यह प्रभाव साफ दिखा. जापान, चीन और दक्षिण कोरिया ने अपने रिकॉर्ड की सबसे गर्म गर्मियां देखीं. मध्य और पश्चिम एशिया में कई महीनों तक लू का कहर जारी रहा. कजाकिस्तान में कुछ महीनों में तापमान सामान्य से 14 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा, जबकि बहरीन में लगातार 10 दिन 40 डिग्री से ऊपर तापमान दर्ज किया गया। 

गर्मी और सूखे ने दक्षिण कोरिया में अब तक की सबसे बड़ी जंगल की आग को जन्म दिया. भारत में भी कई राज्यों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ीं और फसलों को नुकसान पहुंचा। 

कहीं भारी बारिश और बाढ़, कहीं सूखा और जल संकट
2025 में एशिया के मौसम ने चरम रूप दिखाया. एक तरफ दक्षिण एशिया में असामान्य भारी मानसूनी बारिश हुई, तो दूसरी तरफ पश्चिम और मध्य एशिया सूखे की चपेट में रहे. पाकिस्तान में बाढ़ ने 1000 से ज्यादा लोगों की जान ली और 30 लाख से अधिक लोगों को विस्थापित कर दिया. वियतनाम में बाढ़ से 200 से ज्यादा मौतें हुईं और करीब 1.9 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। 

चक्रवात सेन्यार ने थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया में भारी तबाही मचाई. वहीं ईरान समेत कई देशों में लंबे सूखे और जल संकट ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दीं. अप्रैल 2025 में पश्चिम एशिया में आए धूल-रेत के तूफानों ने परिवहन, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। 

भारत में भी कुछ राज्यों में भारी बारिश से बाढ़ आई, जबकि कई हिस्सों में बारिश की कमी से सूखे जैसे हालात बने. यह स्थिति दिखाती है कि जलवायु परिवर्तन अब एक साथ सूखा और बाढ़ दोनों का खतरा बढ़ा रहा है। 

हिमालय और तिब्बत के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं
रिपोर्ट का सबसे अलार्मिंग हिस्सा हिमालयी और तिब्बती क्षेत्र से आया है. तिब्बती पठार दुनिया का तीसरा ध्रुव माना जाता है क्योंकि यहां ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद सबसे ज्यादा बर्फ है. लेकिन अब यह बर्फ तेजी से पिघल रही है. अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच 23 ग्लेशियरों में से सभी ने बर्फ खोई। 

तियानशान और पामीर पर्वतों में बर्फ की भारी कमी दर्ज की गई. इससे न सिर्फ भविष्य में पानी की उपलब्धता पर असर पड़ेगा, बल्कि ग्लेशियर झील फटने (GLOF) जैसी आपदाओं का खतरा भी बढ़ गया है. भारत, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए यह बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि हिमालयी नदियां इन ग्लेशियरों पर निर्भर हैं. गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों का भविष्य इन ग्लेशियरों से जुड़ा हुआ है। 

अब क्या करना चाहिए?
डब्ल्यूएमओ की महासचिव प्रोफेसर सेलेस्टे साउलो ने स्पष्ट कहा है कि बढ़ते तापमान, गर्म महासागर, समुद्र स्तर वृद्धि और पिघलते ग्लेशियर एशिया के लिए गंभीर खतरा हैं. हमें तुरंत तीन काम करने होंगे- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां मजबूत करना और जलवायु अनुकूलन के उपाय तेज करना।  

भारत को सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन पर और ज्यादा निवेश करना चाहिए. शहरों में हरे-भरे क्षेत्र बढ़ाने, वर्षा जल संचयन, सूखा प्रतिरोधी फसलें विकसित करने और तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव संरक्षण जैसे कदम उठाने होंगे. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी मदद मिलनी चाहिए। 

समय अब कार्रवाई का है
डब्ल्यूएमओ की 2025 रिपोर्ट सिर्फ पिछले साल का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि भविष्य की चेतावनी है. एशिया जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े मोर्चे पर खड़ा है. गर्मी, बाढ़, सूखा, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ता समुद्र स्तर हर दिन हमें याद दिला रहे हैं कि अब इंतजार करने का समय नहीं रहा। 

भारत समेत पूरे एशिया को मिलकर काम करना होगा. अगर आज सही कदम उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित रहेंगी, वरना नुकसान बहुत भयानक होगा. जलवायु संकट अब कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है. समय रहते जागना और ठोस कार्रवाई करना ही एकमात्र रास्ता है। 

महासागरों का बढ़ता खतरा
एशिया के आसपास के महासागर भी खतरे की घंटी बजा रहे हैं. 2025 में समुद्री गर्मी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. जुलाई से सितंबर के दौरान एक करोड़ वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में समुद्री लू देखी गई, जो चीन या अमेरिका जितना बड़ा क्षेत्र है। 

उत्तरी हिंद महासागर में समुद्र स्तर वैश्विक औसत से तेजी से बढ़ रहा है. भारत के तटों पर यह दर 4.9 मिलीमीटर प्रति वर्ष है, जबकि वैश्विक औसत 3.6 मिलीमीटर है. समुद्र में एसिडिफिकेशन भी बढ़ रहा है, जिससे मछली पालन, कोरल रीफ और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में हैं. गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों के तटीय इलाकों के लिए यह गंभीर खतरा है। 

प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की भूमिका
रिपोर्ट में एक पॉजिटिव हिस्सा भी है. जहां समय पर मौसम पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणालियां मजबूत थीं, वहां जान-माल का नुकसान कम हुआ. चीन के सिचुआन प्रांत में चेतावनी से कई जिंदगियां बचाई गईं. लेकिन जहां ये सिस्टम कमजोर थे, वहां नुकसान बहुत ज्यादा हुआ। 

श्रीलंका में चक्रवात दित्वाह ने 24 घंटे में साल भर की बारिश का 10 प्रतिशत पानी बरसा दिया, जिससे 640 से ज्यादा मौतें हुईं और जीडीपी का 4 प्रतिशत नुकसान हुआ. यह उदाहरण साबित करता है कि बेहतर पूर्वानुमान और तैयारी कितनी जरूरी है। 

भारत के लिए खास चुनौतियां और विश्लेषण
भारत एशिया के जलवायु संकट की फ्रंटलाइन पर खड़ा है. बढ़ती गर्मी से स्वास्थ्य, कृषि और श्रम उत्पादकता पर असर पड़ रहा है. शहर हीट ट्रैप बनते जा रहे हैं. हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से लंबे समय में नदियों में पानी की कमी हो सकती है, जबकि कम समय में बाढ़ का खतरा बढ़ेगा। 

समुद्र स्तर बढ़ने से मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे तटीय शहर खतरे में हैं. मानसून की अनियमितता से खरीफ फसलें प्रभावित हो रही हैं. सूखा और बाढ़ दोनों किसानों के लिए मुसीबत बन रहे हैं. अगर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती नहीं हुई तो 2030 तक हालात और बिगड़ सकते हैं। 

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