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बच्चे की परवरिश का हक किसे? HC ने सुनाया अहम निर्णय, बना मिसाल

भुवनेश्वर 
ओडिशा हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में पत्नी की मौत के बाद नाबालिग की देखभाल और उसके गार्जियनशिप का अधिकार उसके पिता को दिया है। न्यायालय ने तर्क देते हुए कहाकि अगर नाबालिग की देखभाल का अधिकार किसी को नहीं दिया जाता है तो बच्चे और पिता दोनों एक-दूसरे के प्यार और स्नेह से वंचित हो जाएंगे, जिसके वे प्राकृतिक रूप से हकदार हैं। बता दें कि इस जोड़े की शादी 19 जून, 2019 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। दोनों पति-पत्नी के रूप में शांति से रह रहे थे। बच्चे की मां की मौत के बाद उसकी गार्जियनशिप को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
 
बच्चे के नाना ने बाद में बच्चे की देखभाल का अधिकार ले लिया। इसके बाद पिता ने इस मामले में पारिवारिक अदालत भद्रक में केस दायर किया अपीलकर्ता की याचिका को बाद में पारिवारिक अदालत, भद्रक ने 12 जुलाई, 2022 को पारिवारिक अदालत अधिनियम, 1984 की धारा 19 और गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 47 के तहत खारिज कर दिया था। पारिवारिक अदालत ने अपीलकर्ता की गार्जियनशिप की याचिका को सिर्फ इस आधार पर खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता ने हालांकि उसने खुद को बच्चे का प्राकृतिक पिता होने का दावा किया था, लेकिन वह नाबालिग का जन्म प्रमाण पत्र और अपनी पत्नी का मृत्यु प्रमाण पत्र पेश करने में विफल रहा।

वहीं, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश संजय कुमार मिश्रा की एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 के तहत कानूनी प्रावधानों, बच्चे के कल्याण, पिता की देखभाल के अधिकार को ध्यान में रखते हुए…यह अदालत यह पाती है कि पारिवारिक अदालत का बच्चे की देखभाल की ऐसी याचिका को तकनीकी आधार पर खारिज करना सही नहीं था क्योंकि अपीलकर्ता की पत्नी का मृत्यु प्रमाण पत्र और बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र पेश नहीं किया गया था।’ न्यायाधीश मिश्रा ने फैसले में कहा, ‘जब बच्चे की मां जीवित थी तब किसी वैवाहिक विवाद का कोई आरोप नहीं था। न ही पत्नी या बेटे के खिलाफ दुर्व्यवहार की कोई शिकायत थी। उसके कानूनी अधिकारों के खिलाफ कुछ भी नहीं है। एक प्राकृतिक अभिभावक के रूप में और अपने बच्चे की देखभाल पाने की उसकी वैध इच्छा है।’

न्यायाधीश मिश्रा ने पारिवारिक अदालत के फैसले को रद्द करते हुए कहाकि यह अदालत मानती है कि अपीलकर्ता प्राकृतिक अभिभावक होने के अलावा नाबालिग बच्चे की भलाई सुनिश्चित करने के लिए भी, खासकर उसकी मां की मौत के बाद उसे अपने असली पिता के साथ रहना चाहिए। यह अदालत उम्मीद करती है क्योंकि बच्चा बहुत छोटा है। अगर उसकी देखभाल अपीलकर्ता-पिता को सौंप दी जाती है, तो वह अपने असली पिता के साथ बहुत अच्छे से घुल-मिल जाएगा।

 

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