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एक किडनी से जीने वाले लोग: इस गांव की चौंकाने वाली सच्चाई जानें

नई दिल्ली क्या आपने कभी किसी ऐसे गांव के बारे में सुना है, जहां अधिकांश लोग सिर्फ एक ही किडनी के सहारे अपनी जिंदगी बसर कर रहे हों? सुनने में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन भारत के पड़ोस में एक ऐसा ही गांव मौजूद है। आइए जानते हैं इस अनोखे गांव के बारे में। एक किडनी वाला गांव कहां है? हम बात कर रहे हैं होक्से (Hokse Village) की, जिसे लोग किडनी वैली (Kidney Valley) के नाम से भी जानते हैं। यह गांव नेपाल में स्थित है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस गांव में रहने वाले अधिकांश लोगों के पास केवल एक किडनी है और उसी के सहारे वे अपना जीवन चला रहे हैं। इस वजह से उन्हें कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन मजबूरी और गरीबी ने इस स्थिति को जन्म दिया है।   आखिर एक ही किडनी क्यों? शुरुआत में ऐसा लग सकता है कि लोग जन्म से ही एक किडनी के साथ पैदा होते हैं, लेकिन सच कुछ और है। इस गांव में गरीबी बहुत ज्यादा है। लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए मजबूर होकर अपनी किडनी बेच देते हैं। किडनी बेचने से जो पैसा मिलता है, उससे परिवार का भरण-पोषण किया जाता है।   इलाके में अंगों की तस्करी मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस गांव और आसपास के इलाकों में अंगों की तस्करी करने वाले गिरोह सक्रिय हैं। गरीब और भोले-भाले लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर, उन्हें झूठे वादों और लालच में फंसाया जाता है। कई लोगों को यह भरोसा दिलाया जाता है कि एक किडनी निकलवाने के बाद दूसरी खुद बनने लगेगी, जो पूरी तरह गलत और जानलेवा होता है। इस तरह, यह गांव एक दर्दनाक लेकिन सचेत करने वाली कहानी का प्रतीक बन गया है, जहां गरीबी और अवैध अंग व्यापार ने लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल दिया है।  

17 फरवरी 2026 को पहला सूर्य ग्रहण, धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में, जानें भारत में सूतक काल की स्थिति

 नई दिल्ली Surya Grahan 2026: साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण आज से ठीक एक महीने बाद यानी 17 फरवरी को लगने वाला है. यह सूर्य ग्रहण धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में लगने वाला है. ज्योतिषविदों का कहना है कि यह एक कंकण सूर्य ग्रहण होगा. इसे वलयाकार सूर्य ग्रहण भी कहा जाता है. इस तरह के ग्रहण में चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के ठीक बीच में आ जाता है, लेकिन वो सूर्य को पूरी तरह नहीं ढक पाता है, जिससे सूर्य एक चमकदार कंगन की तरह प्रतीत होने लगता है. खगोलविदों की भाषा में इसे रिंग ऑफ फायर भी कहते हैं. आइए जानते हैं कि इस ग्रहण का भारत पर क्या प्रभाव रहने वाला है. कितने बजे लगेगा सूर्य ग्रहण? साल का यह पहला सूर्य ग्रहण भारतीय समयानुसार, 17 फरवरी को दोपहर 03.56 बजे से लेकर शाम 07.57 बजे तक रहने वाला है.  क्या भारत में दिखेगा सूर्य ग्रहण? साल का यह पहला सूर्य ग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं होगा. इसलिए भारतवर्ष पर इसका कोई खास प्रभाव भी नहीं रहने वाला है क्या भारत में लगेगा सूतक काल? सूर्य ग्रहण से ठीक 12 घंटे पहले सूतक काल मान्य हो जाता है. इस दौरान पूजा-पाठ और खान-पान जैसी चीजें वर्जित होती हैं. इतना ही नहीं, सूतक काल में मंदिरों के कपाट भी बंद रहते हैं और भगवान की प्रतिमा का स्पर्श वर्जित माना गया है. हालांकि सूतक तभी मान्य होता है, जब ग्रहण भारत में दृश्यमान हो. चूंकि आगामी सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिख रहा, इसलिए इसका सूतक काल भी यहां मान्य नहीं होगा. कहां-कहां दिखेगा सूर्य ग्रहण? यह सूर्य ग्रहण दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अर्जेंटीना और अंटार्कटिका के क्षेत्रों में देखा जा सकेगा. यह वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा, जिसमें सूर्य के चारों ओर आग की अंगूठी जैसी आकृति दिखाई देगी. 2026 के तीन अन्य ग्रहण कब कब लगेंगे? दूसरा सूर्य ग्रहण: 12 अगस्त वर्ष का दूसरा सूर्य ग्रहण 12 अगस्त 2026, बुधवार को लगेगा. यह पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा, जिसमें सूर्य पूरी तरह ढक जाएगा. भारत में यह दृश्य नहीं होगा, क्योंकि उस समय यहां रात्रि होगी. यह ग्रहण आर्कटिक, ग्रीनलैंड, आइसलैंड, स्पेन, रूस और पुर्तगाल में देखा जाएगा. पहला चंद्र ग्रहण: 3 मार्च 2026 का पहला चंद्र ग्रहण 3 मार्च, मंगलवार को होली के संयोग में लगने वाला है. यह ग्रहण भारत सहित एशिया के कई देशों में दिखाई देगा. इस ग्रहण का सूतक काल भी भारत में मान्य होगा. यह एक खंडग्रास चंद्र ग्रहण होगा, जिसे ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका समेत के क्षेत्रों में भी देखा जा सकेगा. दूसरा चंद्र ग्रहण: 28 अगस्त साल 2026 का दूसरा चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को पड़ेगा. यह भारत में दृश्य नहीं होगा, लेकिन उत्तर और दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में दिखाई देगा.

मध्यप्रदेश में पेंशन का बड़ा फैसला: अब अविवाहित-तलाकशुदा बेटियों के लिए खत्म हुई एज लिमिट

भोपाल प्रदेश में 50 साल बाद पेंशन नियम बदलेंगे। आश्रित विधवा, परित्याक्ता, तलाकशुदा और अविवाहित पुत्रियां आजीवन परिवार पेंशन की पात्र होंगी। इसके लिए अधिकतम 25 वर्ष की आयु सीमा समाप्त होगी। आश्रितों के लिए आय सीमा भी बढ़ाई जाएगी। यह न्यूनतम पेंशन और महंगाई राहत मिलाकर होगी। आश्रित बड़ी संतान चाहे वह बेटा हो या बेटी, जो बड़ा होगा, वह परिवार पेंशन का पात्र होगा। साथ ही कई प्रक्रियात्मक परिवर्तन भी प्रस्तावित किए गए हैं। राज्य में चार लाख से ज्यादा पेंशनधारक प्रदेश में चार लाख से अधिक पेंशनधारक हैं। इनके लिए 1976 में पेंशन नियम बनाए गए थे। तब से भारत सरकार कई संशोधन कर चुकी है, जिन्हें प्रदेश के पेंशनरों के लिए लागू करने की मांग पेंशनर्स एसोसिएशन उठाती रही है। मुख्य सचिव अनुराग जैन जब अपर मुख्य सचिव वित्त थे, तब नियमों में परिवर्तन को लेकर सहमति बनी थी, लेकिन प्रक्रिया लंबी खिंचती चली गई। अपर मुख्य सचिव वित्त मनीष रस्तोगी ने समिति बनाई और नियमों में संशोधन के प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया। सूत्रों के अनुसार पेंशन नियम में अब यह प्रविधान किया जा रहा है कि आश्रित के लिए आय सीमा में वृद्धि की जाएगी। यह न्यूनतम पेंशन, जो 7,750 रुपये प्रतिमाह होती है, और महंगाई राहत जोड़कर निर्धारित होगी यानी न्यूनतम पेंशन में 55 प्रतिशत महंगाई राहत जोड़ी जाएगी। इसका लाभ यह होगा कि इस सीमा के भीतर यदि आश्रित की आय है तो उन्हें भी परिवार पेंशन की पात्रता होगी। इसके साथ ही एक बड़ा परिवर्तन यह भी किया जा रहा है कि आश्रित में अविवाहित बेटी के लिए आयु सीमा का बंधन समाप्त किया जाएगा। अभी 25 वर्ष से अधिक अविवाहित पुत्री को पात्र नहीं माना जाता है। इसके साथ ही आश्रित विधवा, परित्याक्ता, तलाकशुदा बेटियां भी परिवार पेंशन के दायरे में आएंगी। विभागों के बढ़ेंगे अधिकार पेंशनर किसी भी श्रेणी का हो, अभी पेंशन रोकने के लिए प्रकरण कैबिनेट की स्वीकृति के लिए भेजना पड़ता है। लगभग हर कैबिनेट की बैठक में ऐसे प्रकरण आते हैं। अब यह प्रविधान किया जा रहा है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की पेंशन रोकने के मामले में निर्णय प्रशासकीय विभाग ही लेगा। प्रथम और द्वितीय श्रेणी के अधिकारियों के मामले वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत ही कैबिनेट के समक्ष निर्णय के लिए रखे जाएंगे।   केंद्रीय सेवा की अवधि भी जुड़ेगी सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय सेवा से प्रदेश में सेवा देने के लिए आने वाले कर्मचारियों की पेंशन की गणना की प्रक्रिया में भी सुधार होगा। इसमें केंद्रीय सेवा की अवधि को भी जोड़ा जाएगा। इसका स्पष्ट प्रविधान नियम में रहेगा। पेंशनर्स एसोसिएशन के संरक्षक गणेश दत्त जोशी का कहना है कि हम 18 वर्ष से नियम में संशोधन की मांग कर रहे हैं। जो संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं, वे वर्तमान समय के अनुकूल हैं।

रोपवे, पहाड़ियां और भक्ति का संगम: जयपुर का वैष्णो देवी मंदिर क्यों बन रहा है धार्मिक पर्यटन की पहचान

जयपुर राजस्थान की राजधानी जयपुर सिर्फ ऐतिहासिक किलों और महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में भी तेजी से अपनी अलग पहचान बना रहा है। जयपुर के पूर्वी हिस्से में अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित वैष्णो देवी माता मंदिर आज न केवल आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि आसपास मौजूद खोले के हनुमान मंदिर और आधुनिक रोपवे सुविधा के चलते यह पूरा क्षेत्र एक समग्र धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है। पहाड़ियों में बसा वैष्णो देवी माता मंदिर जयपुर का वैष्णो देवी माता मंदिर जम्मू स्थित माता वैष्णो देवी धाम से प्रेरित माना जाता है। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचते ही श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है। यहां माता वैष्णो देवी के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की गुफा रूपी प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो श्रद्धालुओं को उत्तर भारत के प्रमुख तीर्थों की अनुभूति कराती हैं। नवरात्र, नववर्ष और विशेष धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। जयपुर के प्रसिद्ध खोले के हनुमान जी मंदिर परिसर में पहाड़ी की चोटी पर स्थित प्राचीन माता वैष्णो देवी मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी अपनी मनोकामनाएं लिए माता के दर्शन करने पहुंच रहे हैं। रोपवे: श्रद्धा और सुविधा का आधुनिक संगम इस धार्मिक क्षेत्र की सबसे बड़ी खासियत है यहां संचालित रोपवे सेवा, जिसने पर्यटन के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। रोपवे के जरिए श्रद्धालु और पर्यटक कम समय में पहाड़ी तक पहुंच सकते हैं। जैसे-जैसे रोपवे ऊपर चढ़ता है, अरावली की हरियाली, घाटियां और जयपुर शहर का विहंगम दृश्य मन को मोह लेता है। यह सुविधा बुजुर्गों, बच्चों और दूर-दराज से आने वाले पर्यटकों के लिए विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र बन गई है। यही कारण है कि रोपवे ने इस पूरे क्षेत्र को पारंपरिक तीर्थ से आगे बढ़ाकर एक आधुनिक पर्यटन स्थल का रूप दे दिया है। 45 मिनट की जगह 5 मिनट का समय श्री नरवर आश्रम सेवा समिति खोल के हनुमान जी प्रन्यास के महामंत्री बृजमोहन शर्मा के मुताबिक खोल के हनुमान जी मंदिर परिसर स्थित माता वैष्णो देवी मंदिर में नवरात्रों के दौरान काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। रोपवे की शुरुआत होने से भक्तों और पर्यटकों को काफी सुविधा मिल रही है. श्रद्धालु सैकड़ों सीढ़ियां चढ़कर खोले के हनुमान जी मंदिर की पहाड़ियों पर बने माता वैष्णो देवी मंदिर के दर्शन करते हैं. सीढ़ियों से करीब 45 मिनट का समय लगता है, लेकिन अब रोपवे के जरिए केवल 5 मिनट में माता वैष्णो देवी मंदिर पहुंच सकते हैं। खोले के हनुमान: आस्था का प्राचीन केंद्र वैष्णो देवी माता मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित खोले के हनुमान मंदिर जयपुर के सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक है। मान्यता है कि यहां स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई थी। हर मंगलवार और शनिवार को यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु खोले के हनुमान के दर्शन के बाद वैष्णो देवी माता मंदिर तक की यात्रा करते हैं, जिससे यह पूरा इलाका एक धार्मिक परिक्रमा मार्ग जैसा अनुभव देता है। पर्यटन की नजर से बढ़ता आकर्षण बीते कुछ वर्षों में यह क्षेत्र केवल स्थानीय श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं रहा। देश के अन्य राज्यों और विदेशी पर्यटक भी अब जयपुर के इस धार्मिक सर्किट को अपनी यात्रा सूची में शामिल कर रहे हैं। मंदिर परिसर, पहाड़ी वातावरण, रोपवे की रोमांचक यात्रा और आसपास की प्राकृतिक सुंदरता इसे एक स्पिरिचुअल टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित कर रही है। सुबह की आरती से लेकर शाम की आराधना तक, यहां का माहौल पर्यटकों को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। जयपुर के पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान खोले के हनुमान, वैष्णो देवी माता मंदिर और रोपवे—तीनों मिलकर जयपुर को एक नया धार्मिक पर्यटन चेहरा दे रहे हैं। आमेर किला, सिटी पैलेस और हवा महल देखने आने वाले पर्यटक अब इस क्षेत्र को भी अपनी यात्रा में शामिल कर रहे हैं। इससे न सिर्फ धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि स्थानीय रोजगार और आसपास के इलाकों के विकास को भी गति मिल रही है। कुल मिलाकर, जयपुर का वैष्णो देवी माता मंदिर और खोले के हनुमान क्षेत्र आज आस्था, प्रकृति और आधुनिक सुविधाओं का ऐसा संगम बन चुका है, जो श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों को भी बार-बार यहां आने के लिए प्रेरित करता है।

आपका लिवर हेल्दी है या खराब, 20 सेकेंड में टेस्ट करें!

लिवर से जुड़ी समस्याएं आजकल काफी कॉमन होती जा रही हैं। खराब खानपान और लाइफस्टाइल का असर साफ-सीधा लिवर पर पड़ रहा है। फैटी लिवर तो आजकल बच्चों में भी आम होता जा रहा है। क्या आपने कभी अपने लिवर का टेस्ट किया है कि वो कितना हेल्दी है? इसके लिए आप घर पर ही 20 सेकेंड का एक छोटा सा टेस्ट कर सकते हैं। फैमिली फिजिशियन डॉ अमनदीप अग्रवाल ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए ये सिंपल सा लिवर टेस्ट शेयर किया है। ये मेडिकल जांच का विकल्प तो नहीं है लेकिन ये टेस्ट आपको एक जनरल संकेत दे सकता है, जिससे लिवर हेल्थ का मोटा-मोटा अंदाजा लगाया जा सकता है। आइए विस्तार में जानते हैं। 20 सेकेंड में अपनी लिवर हेल्थ टेस्ट करें डॉ अमनदीप अग्रवाल बताते हैं कि आपके हाथ आपकी लिवर हेल्थ के बारे में काफी कुछ बताते हैं। इसके लिए आप 20 सेकेंड का एक छोटा सा टेस्ट कर सकते हैं। बस अपनी उंगलियों से एक हाथ के अंगूठे को कुछ देर के लिए दबाकर रखें। अब आपको ये नोटिस करना है कि आपके नाखून का लाल रंग कितनी देर में वापस आता है। अगर वो जल्दी लाल हो जाता है, मतलब आपका लिवर हेल्दी है। वहीं अगर इसे लाल होने में काफी समय लग रहा है, तो इसका मतलब है कि आपके लिवर की सर्कुलेशन वीक है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का इसपर क्या कहना है? डॉक्टर्स की मानें तो ये 20 सेकेंड थंब प्रेस टेस्ट लिवर की बीमारी की पक्की जांच नहीं है। ये सिर्फ एक शुरुआती संकेत दे सकता है। ऐसे में खुद किसी भी तरह का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। लिवर की पक्की जांच के लिए डॉक्टर के बताए टेस्ट जैसे ब्लड टेस्ट, लिवर फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड आदि का सहारा लिया जाता है। किन लक्षणों के दिखने पर लिवर को ले कर सतर्क हो जाना चाहिए? लिवर में कोई भी समस्या होने पर कुछ संकेत दिखना काफी आम है। इनकी तुरंत पहचान कर के आप डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं। उदाहरण के लिए लगातार थकान बने रहना, भूख ना लगना, पेट के दाहिने हिस्से में दर्द रहना, स्किन या आंखों का पीला पड़ना, जैसे कोई भी लक्षण दिख रहे हैं, तो इन्हें नजरंदाज ना करें। ऐसे मामलों में तुरंत डॉक्टर की सलाह लेने और मेडिकल चेकअप की जरूरत होती है। लिवर को हेल्दी रखने के लिए क्या जरूरी है? लिवर को हेल्दी रखना है तो अपने खानपान और लाइफस्टाइल में बदलाव करना बेहद जरूरी होता है। इसके लिए घर का बना संतुलित भोजन करें, बाहर की तली भुनी चीजें, जंक फूड, ऑयली खाना, शराब, रिफाइंड शुगर आदि से जितना हो सके परहेज करें। इसके अलावा अपने रूटीन में फिजिकल एक्टिविटीज शामिल करें। कोई भी समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

केंद्रीय बजट को लेकर किरेन रिजिजू का बयान, कहा– भविष्य की जरूरतों का रखा जाएगा ध्यान

मुंबई बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) समेत महाराष्ट्र के दूसरे नगर निगमों में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने शानदार कामयाबी हासिल की है। इस जीत पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन मजबूती के साथ काम कर रही है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने मीडिया से बात करते हुए कहा, "महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की जीत प्रधानमंत्री मोदी और राज्य में देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई है। अब अजित पवार के भी शामिल होने से इस गठबंधन को लोगों ने खूब पसंद किया है।” बता दें कि महाराष्ट्र में बीएमसी समेत 29 नगर निगमों के चुनाव परिणामों में भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने जीत हासिल की है। अगर सिर्फ बीएमसी चुनाव की बात करें तो यहां कुल 227 सीटें हैं। महायुति (भाजपा और शिंदे गुट) ने कुल 118 सीटें जीती हैं, जो बीएमसी में बहुमत के आंकड़े से चार सीटें ज्यादा हैं। शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और एमएनएस का गठबंधन बुरी तरह पिछड़ गया। उन्होंने केंद्रीय बजट 2026 पर कहा, "संसद सत्र 28 जनवरी से शुरू होगा और बजट 1 फरवरी को पेश किया जाएगा। पीएम मोदी के नेतृत्व में हर बजट खास होता है, जो समाज, देश और उसके भविष्य का ख्याल रखता है। किसी भी तरह के सरकारी काम में कोई कमी नहीं है। हर फैसला सोच-समझकर लिया जाता है और लागू किया जाता है।” किरेन रिजिजू ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं तब से सरकार हर फैसला सोच समझकर लेती है। इसमें कोई दो राय नहीं है। चाहे आप बजट देखें या कोई योजना देखें, हर चीज पर सरकार सोच समझकर फैसला लेती है। हालांकि, उन्होंने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया पर कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अभी हम इस पर कुछ नहीं बोलना चाहते हैं। समय आने दीजिए, तब इसका जवाब दिया जाएगा।

खेलों से बदलेगा आदिवासी क्षेत्र का भविष्य, 100 करोड़ के मेगा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को हरी झंडी

खंडवा  खंडवा के आदिवासी बहुल क्षेत्र हरसूद में प्रदेश स्तरीय स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का निर्माण होगा। इसमें एथलेटिक्स, इंडोर गेम्स और आउटडोर खेलों की सुविधाएं होंगी। ग्रामीण आदिवासी बच्चों को उच्च स्तर पर प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं में भाग लेने का मौका मिलेगा। 100 करोड़ की लागत से हरसूद में स्पोर्ट कॉम्प्लेक्स के निर्माण से निमाड़ क्षेत्र की पहचान खेल के क्षेत्र में बढ़ेगी।   सरकार ने दी सहमति सरकार की सैद्धांतिक सहमति के बाद अफसर योजना को अमली जामा पहनाने में जुटे है। मध्य प्रदेश बिल्डिंग कारपोरेशन के इंजीनियरों ने जिले के हरसूद क्षेत्र में स्थित सेल्दामाल में भूमि का स्थली निरीक्षण के बाद डीपीआर तैयार कर रहे है। सबकुछ योजना के तहत हुआ तो जल्द निर्माण के लिए कागजी प्रक्रिया शुरु होगी। इंजीनियर मयंक राय ने बताया कि हरसूद के सेल्दामाल में स्पोर्ट कॉम्प्लेक्स के लिए 30 एकड़ भूमि अलाट हो गई है। शेष 9 एकड़ भूमि अलाट की कागजी प्रक्रिया चल रही है।   खिलाड़ियों को मिलेंगी ये आधुनिक सुविधाएं प्रदेश स्तरीय स्पोर्ट कॉम्प्लेक्स में खिलाडियों को आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी। इसमें मुख्य रुप से प्रशिक्षण और खेल इंफ्रास्ट्रक्चर, इनडोर, आउटडोर कोर्ट में बैडमिंटन, टेबल-टेनिस, बास्केटबॉल, वॉलीबॉल, स्क्वैश के लिए कोर्ट। एथलेटिक्स ट्रैक में सिंथेटिक एथलेटिक ट्रैक (400 मीटर)। कुश्ती, ताइक्वांडो, एरोबिक्स और वेटलिफ्टिंग के लिए हॉल। स्विमिंग पूल में इनडोर और आउटडोर स्विमिंग पूल। अन्य : क्रिकेट पिच, लॉन टेनिस कोर्ट, शूटिंग रेंज, हॉकी टर्फ। खिलाड़ियों के लिए सहायता चयनित प्रशिक्षु के लिए हॉस्टल और पौष्टिक भोजन। वित्तीय सहायता, किट और उपकरण में आधुनिक प्रशिक्षण उपकरण समेत अन्य सुविधाएं जैसे शैक्षिक सहायता शिक्षा संबंधी खर्च, प्रतियोगिता का अवसर मिलेगा। राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने का मौका। मनोरंजक की सुविधाएं प्रस्तावित है।

किला रायपुर में 11 साल बाद लौटेगा बैलगाड़ी रेस, ग्रामीण ओलंपिक में वापसी, DC ने नियमों का ध्यान रखने का दिया आश्वासन

चंडीगढ़  पंजाब में लुधियाना के किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक में एक बार फिर से बैलगाड़ी दौड़ की वापसी होने जा रही है। किला रायपुर में जो खेल शुरू होंगे उनमें बैलगाड़ी की दौड़ का भी आयोजन इस बार किया जाएगा। जिला प्रशासन, आयोजक और ग्रामीणों में इसे लेकर उत्साह है। 30 जनवरी से एक फरवरी तक ये गेम्स करवाई जानी हैं। डीसी हिमांशु जैन ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि यमों और कानून मुताबिक बैलगाड़ी की दौड़ होगी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2014 में किला रायपुर गेम्स में बैलगाड़ी की दौड़ बंद करवा दी थी। पंजाब सरकार ने 11 जुलाई को विधानसभा में बिल पास करके बैल गाड़ियों की दौड़ फिर से करवाने का रास्ता साफ कर दिया। सरकार के इस फैसले से इस बैलगाड़ी दौड़ शुरू होने का रास्ता साफ हुआ है। पिछले कुछ सालों से पंजाब सरकार इन खेलों का आयोजन कर रही है। किला रायपुर खेलों की रौनक हो गई थी खत्म बैल गाड़ियों की दौड़ शुरू से किला रायपुर खेलों में आकर्षण का मुख्य केंद्र रही हैं। जब किला रायपुर में बैलगाड़ियों की दौड़ पर प्रतिबंध लगा तो खेलों की रौनक ही खत्म हो गई। देश विदेश से पर्यटकों ने आना बंद कर दिया। इन शर्तों पर शुरू करवाई जाएगी बैलगाड़ियों की दौड़ किसी भी तरह की मारपीट, नुकीले औजार या क्रूरता पूरी तरह प्रतिबंधित होगी अत्यधिक गर्मी या खराब मौसम में दौड़ नहीं करवाई जाएगी सभी प्रतिभागियों और बैलों का पूर्व पंजीकरण जरूरी होगा नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई और प्रतिबंध लगाया जाएगा कैसे ग्रामीण ओलिंपिक बने किला रायपुर की खेल, जानिए 1933 में इंदर ग्रेवाल ने शुरू किया: किला रायपुर की ग्रामीण खेलों की शुरुआत साल1933 में हुई। इनको शुरू करने का श्रेय लुधियाना के किला रायपुर के इंदर सिंह ग्रेवाल को जाता है। इन खेलों को शुरू करने के पीछे उद्देश्य पंजाब के किसानों को एक प्लेटफार्म पर एकत्रित करना था। इनके मनोरंजन के लिए खेलें शुरू की गईं जो आगे चलकर पूरे पंजाब में फेमस हो गईं और इन्हें पंजाब का मिनी ओलिंपिक कहा जाने लगा। रायपुर के हॉकी में सिल्वर कप जीतने से हुई शुरुआात: साल 1933 में पहली बार रायपुर की हॉकी टीम ने जालंधर में सिल्वर कप जीता। इसी जीत से प्रेरित होकर ग्रेवाल जट्‌ट समुदाय ने गांवों के बीच वॉलीबॉल, कबड्डी और एथलेटिक्स की शुरुआत हुई और उसी साल "ग्रेवाल स्पोर्ट्स एसोसिएशन" बनाई गई। 1944 में पहली बार हुई बैल दौड़: साल 1940 में 440 गज का ट्रैक बनाकर एथलेटिक्स के मुकाबले शुरू हुए और साल 1944 में बाबा बक्शी के प्रयासों से बैलगाड़ी दौड़ शामिल की गई। साल 1950 में महिलाओं के लिए खेल आयोजनों की शुरुआत हुई, जो साल 1953 में औपचारिक रूप से शामिल किए गए। दुनियाभर को दिखाई जाती है पंजाब की विरासत: इंदर सिंह ग्रेवाल के प्रयासों के कारण, यह खेलें त्योहार की तरह बन गईं और हर साल आयोजित होने लगीं। अब ये खेलें दुनिया भर से लोगों को आकर्षित करती हैं। यह न केवल एक खेल आयोजन है, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है जो पंजाब की समृद्ध विरासत को दुनियाभर में दिखाता है। बैलों को पिलाते हैं देसी घी, खिलाते हैं ड्राई फ्रूट्स: बैलगाड़ी दौड़ में हिस्सा लेने वाले बैलों की कीमत लाखों रुपए तक होती है और उनकी देखभाल बच्चों की तरह की जाती है। पंजाब के पशुपालक बताते हैं कि वे अपने बैलों को देसी घी, ड्राई फ्रूट्स, चुनिंदा अनाज और पोषक आहार खिलाकर उन्हें ताकतवर बनाते हैं। अब जानें क्यों लगा बैलों की दौड़ पर प्रतिबंध जीत के लिए बैलों को नशे की गोलियां खिलाने के लगे आरोप: इन खेलों में बैल दौड़ पर सवाल उठने शुरू हो गए। कुई पशु प्रेमियों ने पशु क्रूरता को लेकर कोर्ट का रुख किया। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि कुछ मालिक अपने बैलों को दौड़ के दौरान तेज भगाने के लिए नशे की गोलियां खिलाते हैं और लोहे की नुकीली 'क्रिच' से मारते हैं, जिससे बैल दर्द से भागने लगता है। बैलों पर क्रूरता का हवाला देकर लगी थी रोक: साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद किला रायपुर समेत देशभर में बैलगाड़ी दौड़ों पर रोक लग गई थी। अदालत ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 का हवाला देते हुए कहा था कि इस तरह की दौड़ों में जानवरों के साथ क्रूरता की आशंका रहती है। इसके बाद किला रायपुर रूरल ओलिंपिक में यह प्रतियोगिता बंद कर दी गई। 2014 के बाद से फीका पड़ा खेल उत्सव: साल 2014 के आदेश और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बाद कानूनी रूप से बैल दौड़ पर बैन लगने के बाद किला रायपुर में खलों का आकर्षण फीका पड़ने लगा। धीरे-धीरे यहां आने वाले लोगों की संख्या भी कम होने लगी। विवादों से भी जुड़ा किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की रोक के आदेश को 11 साल बीत चुके हैं और कभी भी यहां बैल दौड़ देखने को नहीं मिली। बैल दौड़ के जाने के बाद यहां और भी विवाद पैदा हुए और ये खेल आयोजन कुछ सालों में ही बंद हो गया। विवाद उस समय और गहरा गया जब आयोजन स्थल की जमीन को लेकर कानूनी मसला खड़ा हो गया, जिससे साल 2018 के बाद खेल आयोजन पूरी तरह रुक गया। साल 2023 में गांव के पट्टी सुहाविया गुट के पक्ष में फैसला आने के बाद आयोजन को दोबारा शुरू करने की राह साफ हुई। साल 2024 से पंजाब सरकार ने खेलों के आयोजन की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली। पहले भी इसे शुरू करने के दो प्रयास हो चुके: पंजाब सरकार ने 2019 में विधानसभा में एक संशोधन विधेयक पारित किया था, जिससे बैल दौड़ को कानूनी मान्यता मिल सके। इसके तहत पशुओं की देखभाल और सुरक्षा से जुड़े विशेष प्रावधानों के साथ पारंपरिक खेल को संरक्षित करने की बात कही गई थी। 2024 में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी से मुलाकात कर इस खेल को दोबारा शुरू कराने की मांग भी की थी। अब 2025 में राज्य सरकार ने इस दिशा में अंतिम कदम बढ़ा दिया है। पंजाब विधानसभा ने सर्वसम्मति से विधेयक को पारित कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही … Read more

प्लेयर ऑफ द मैच के महारथियों की लिस्ट जारी, दिग्गजों के बीच जो रूट पड़े फीके

नई दिल्ली इंग्लैंड के दिग्गज बल्लेबाज जो रूट ने श्रीलंका के खिलाफ दूसरे वनडे में अहम पारी खेली। उन्होंने कोलंबो के आर प्रेमदासा स्टेडियम में 90 गेंदों में पांच चौकों की मदद से 75 बनाए। इंग्लैंड ने 220 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए पांच विकेट से जीत दर्ज की। 35 वर्षीय रूट प्लेयर ऑफ मैच चुने गए और इतिहास रच दिया। वह इंटरनेशनल क्रिकेट में इंग्लैंड के लिए सबसे ज्यादा प्लेयर ऑफ मैच अवॉर्ड जीतने वाले क्रिकेटर बन गए हैं। उन्होंने अपने करियर में अब तक 27 अवॉर्ड हासिल किए हैं। रूच ने इंग्लैंड के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन का रिकॉर्ड ध्वस्त किया। पीटरसन ने 26 अवॉर्ड जीते।   रूट भले ही इंग्लैंड की ओर से इतिहास रचने में कामयाब रहे लेकिन अपने-अपने देश के लिए सबसे ज्यादा प्लेयर ऑफ द मैच जीतने वालों की टॉप 10 लिस्ट में फिसड्डी हैं। महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के खाते में ना सिर्फ भारतीय टीम बल्कि इंटरनेशनल क्रिकेट में सर्वाधिक प्लेयर ऑफ द मैच पुरस्कार जीतने का रिकॉर्ड दर्ज है। सचिन ने अपने 24 साल लंबे करियर में कुल 76 अवॉर्ड पर कब्जा जमाया। सिर्फ तीन प्लेयर ही 50 प्लस अवॉर्ड हासिल कर पाए हैं। सचिन के बाद श्रीलंका के पूर्व ओपनर सनथ जयसूर्या हैं, जिन्होंने 58 प्लेयर ऑफ द मैच पर कब्जा जमाया। साउथ अफ्रीका के पूर्व ऑलराउंडर जैक्स कैलिस (57) तीसरे पायदान पर हैं। अपने-अपने देश के लिए सबसे ज्यादा प्लेयर ऑफ द मैच जीतने वालों की टॉप 10 लिस्ट भारत – सचिन तेंदुलकर (76) श्रीलंका – सनथ जयसूर्या (58) साउथ अफ्रीका – जैक्स कैलिस (57) ऑस्ट्रेलिया – रिकी पोंटिंग (48) बांग्लादेश – शाकिब अल हसन (45) पाकिस्तान – शाहिद अफरीदी (43) वेस्टइंडीज – ब्रायन लारा (42) न्यूजीलैंड – मार्टिन गुप्टिल (34) जिम्बाब्वे – सिकंदर रजा (33) इंग्लैंड – जो रूट (27) दूसरे वनडे मैच की बात करें तो इंग्लैंड ने टॉस गंवाने के बाद श्रीलंका को 49.3 ओवर में ढेर कर दिया। कप्तान चरिथ असलंका ने 45 और धनंजय डी सिल्वा ने 40 रनों का योगदान दिया। जवाब में इंग्लैंड की शुरुआत खराब रही। बतौर ओपन उतरे रेहान अहमद (13) छठे ओवर में पवेलियन लौट गए। इसके बाद, रूट ने मोर्चा संभाला। उन्होंने बेन डकेट (39) के साथ दूसरे विकेट के लिए 72 रनों की साझेदारी की। जैकब बेथेल (6) का बल्ला नहीं चला। रूट ने कप्तान हैरी ब्रूक (42) के साथ चौथे विकेट के लिए 81 रनों की साझेदारी की। विकेटकीपर जोस बटलर (नाबाद 33) और विल जैक्स (नाबाद 8) ने इंग्लैंड को जीत की दहलीज पार कराई।  

नई स्टडी ने बदली धारणा: पुरुषों की यौनेच्छा 20 के दशक में नहीं, इस उम्र में होती है चरम पर

 नई दिल्ली माना जाता है कि पुरुषों में यौनेच्छा यानी सेक्सुअल डिजायर उनके 20's के दौर में सबसे ज्यादा होती है लेकिन नई स्टडी में सामने आया है कि पुरुषों की पीक सेक्स ड्राइव का दौर उनकी उम्र से ज्यादा उनकी शारीरिक और मानसिक परिपक्वता से जुड़ा है. स्टडी दावा करती है कि पुरुषों में 40's में सेक्सुअल डिजायर पीक पर होती है. एस्टोनिया की टार्टू यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने 20 से 84 साल की उम्र के 67,000 से ज्यादा वयस्कों के डेटा का एनालिसिस कर ये दावा किया है. स्टडी में पाया गया कि पुरुषों की सेक्स की इच्छा 20's में बढ़ी, 40's की शुरुआत में चरम पर पहुंची और फिर धीरे-धीरे कम होने लगी. खास बात यह है कि 60's की उम्र के पुरुष भी उतने ही कामुक होते हैं जितने कि 20's के युवा. महिलाओं में मिले उलट नतीजे दूसरी ओर महिलाओं में एक अलग ट्रेंड देखा गया. उनकी सेक्स की इच्छा 20's से 30's साल की उम्र में सबसे ज्यादा थी लेकिन फिर उम्र के साथ ये कम होती गई और 50's के बाद इसमें तेजी से गिरावट आई. इस स्टडी से जुड़े रिसर्चर्स ने 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' जर्नल में लिखा, 'एक खास बात यह है कि पुरुषों की सेक्स की इच्छा, महिलाओं की तुलना में वयस्क जीवन के ज्यादातर समय में काफी ज्यादा थी.' 'जबकि पिछली रिसर्च में लगातार यह दिखाया गया है कि पुरुष महिलाओं की तुलना में ज्यादा सेक्स की इच्छा महसूस करते हैं. हमारे निष्कर्ष अलग-अलग उम्र में इस अंतर की गंभीरता को भी बताते हैं.' रिसर्चर्स ने कहा कि पुरुषों के बारे में उनकी खोज अप्रत्याशित है क्योंकि यह इस सोच के उलट है कि सेक्स की इच्छा बायोलॉजी (फिजिकल हेल्थ) और फर्टिलिटी से प्रभावित होती है.  यह अच्छी तरह से डॉक्यूमेंटेड है कि पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का लेवल 30 की शुरुआत से ही गिरने लगता है. इसके बावजूद स्टडी से पता चलता है कि पुरुषों की सेक्स ड्राइव अगले 10 साल या उससे ज्यादा समय तक बढ़ती रहती है. रिसर्चर्स ने लिखा, 'पुरुषों में मिड-लाइफ में पीक से पता चलता है कि बायोलॉजिकल एजिंग से परे फैक्टर्स जैसे कि रिश्तों की अंतरंगता भी अहम भूमिका निभा सकते हैं.' 'उदाहरण के लिए चालीस की उम्र के पुरुषों के स्टेबल और लंबे समय तक चलने वाले रिश्तों में होने की ज्यादा संभावना होती है जो बढ़ी हुई सेक्सुअल एक्टिविटी और इमोशनल नजदीकी से जुड़ा है.' एनालिसिस से यह भी पता चला कि 20 से 30 साल की उम्र में महिलाओं की सेक्स की इच्छा का चरम भी पुरुषों के वयस्कता के समय वाले औसत लेवल से कम था. प्रोफेशन का भी पड़ता है असर कुल मिलाकर जो लोग ऑफिस या सेल्स जॉब में काम करते थे, वे सबसे ज्यादा कामुक थे जबकि मशीन चलाने वाले और मिलिट्री में काम करने वाले सबसे कम. रिलेशनशिप संतुष्टि का इसमें थोड़ा रोल था क्योंकि ज्यादा खुश कपल्स थोड़ा ज्यादा कामुक होने की बात स्वीकार करते नजर आए. महिलाओं के लिए ज्यादा बच्चे होने का कनेक्शन लो सेक्सुअल डिजायर से जुड़ा था लेकिन पुरुषों में यह उल्टा था. रिसर्च टीम ने आगे लिखा, 'सेक्सुअल डिजायर इंसानी रिश्तों और वेलबीइंग का एक जरूरी हिस्सा है जो डेमोग्राफिक, रिश्ते, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारकों से मिलकर बनती है.'