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धारावी का ‘गरीबी का बाजार’: विदेशी 2 घंटे की बदहाली देखने के लिए देते हैं 15,000 रुपये

मुंबई  सपनों की इस नगरी में ऐसा तिलिस्म है कि यहां की बदहाली भी नीलाम होती है. कहते हैं कि मुंबई के गटर भी सोने के हैं, जहां गरीबी अब केवल एक हालात नहीं, बल्कि एक 'बिकाऊ वस्तु' बन चुकी है. यह विडंबना ही है कि यहां के अभावों को 'एक्सपोज़र' और 'एजुकेशन' का मुलम्मा चढ़ाकर नुमाइश के लिए रखा जाता है. और इस नुमाइश के खरीदार सिर्फ सात समंदर पार से आए सैलानी ही नहीं, बल्कि मालाबार हिल और पेडडर रोड के वो संभ्रांत रईस भी हैं, जिनके लिए गरीबी एक 'टूरिस्ट डेस्टिनेशन' बन गई है|  दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में से एक, धारावी में यह नज़ारा सबसे ज्यादा दिखाई देता है. मुंबई के दिल में बसी इस बस्ती की हालिया यात्रा के दौरान सबसे चौंकाने वाले दृश्यों में से एक था अभिजात वर्ग को गरीबी बेचा जाना, वह भी दो घंटे के 15,000 रुपये में.  जब धारावी की तंग गलियों में एक प्लंबर, राजू हनुमंता और उनके पड़ोसी इडली बेचने वाले शनप्पा का इंटरव्यू लिया, तो उसी वक्त वहां विदेशियों का एक समूह दिखाई दिया, एक ऐसी जगह जहां उनकी मौजूदगी की उम्मीद सबसे कम थी, उनके साथ एक "गाइड" भी था|  मुंबई का वो अंधेरा हिस्सा… धारावी में ऐसी कई गलियां हैं, जहां आम मुंबईकर भी जाने से हिचकिचाते हैं. ये गलियां मुंबई का वह अंधेरा हिस्सा हैं, जिन्हें कभी वरदराजन मुदलियार जैसे क्राइम बॉसों से जोड़कर देखा जाता था. उनके गुर्गे अब जबरन वसूली या खून-खराबे में तो नहीं, बल्कि उन धंधों में लगे हैं, जिन्हें अब वैध माना जाता है. जैसे रियल एस्टेट, जमीन से जुड़ी चीजें और ड्रग्स. लेखक और पूर्व खोजी पत्रकार एस. हुसैन जैदी, जो मुंबई के इस अंधेरे हिस्से को रग-रग से जानते हैं, उनका कहना है कि तरीके भले ही बदल गए हों, लेकिन फितरत अब भी वही है|  खैर, वह समानांतर अर्थव्यवस्था एक अलग कहानी है. यहां हम बात कर रहे हैं 'गरीबी के व्यापार' की…. गरीबी, खासकर भारत में, हाथों-हाथ बिकती है. धारावी की अरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था में यह एक ऐसा पहलू है जिसके बारे में हमने सोचा तक नहीं था. विदेशियों के उस समूह का नेतृत्व एक स्थानीय व्यक्ति, ओंकार ढमाले कर रहा था. जब उससे पूछा गया कि वह इस 'स्लम टूर' के लिए कितना शुल्क लेता है, तो उसका जवाब था, "प्रति व्यक्ति 15,000 रुपये." उसके साथ पांच विदेशी थे. यानी झुग्गियों में सिर्फ दो घंटे की पैदल सैर के लिए वह 75,000 रुपये कमाने वाला था|  गरीबी देखने आते हैं अमीर लोग सालों से चल रहा है गरीबी दर्शन  यह कोई नया चलन नहीं है,साल 2006 में ही पूरे भारत में फैल रहे 'गरीबी पर्यटन' (Poverty Tourism) पर रिपोर्ट दी थी, लेकिन अब कुछ बदल गया है. पहले इस तरह के टूर संगठित समूहों और प्रशिक्षित गाइडों द्वारा चलाए जाते थे. अब यह व्यवसाय खुद धारावी के निवासी संभाल रहे हैं और उनकी फीस किसी कॉर्पोरेट सैलरी के बराबर है. मुंबई आने वाले विदेशी अक्सर धारावी की लेदर मार्केट वाली सड़क तक ही आते हैं. लेकिन यह बस्ती उस मुख्य मार्ग से बहुत आगे, कई किलोमीटर तक गहराई में फैली हुई है. वहां ऐसी गलियां और कोने हैं जो दुनिया की नजरों से ओझल हैं, जहां सिर्फ वहां रहने वाले लोग ही जाते हैं. महज तीन फीट चौड़ी गलियां. ऐसी जगहें न केवल विदेशियों को, बल्कि मुंबई के उन निवासियों को भी आकर्षित करती हैं, जिन्होंने कभी यहां कदम रखने की हिम्मत नहीं की|  हालांकि, भारतीय इन स्लम टूर के लिए अलग कीमत चुकाते हैं- 1,500 रुपये से लेकर 7,000 रुपये के बीच, जहां अधिकतम कीमत भी किसी विदेशी पर्यटक से ली जाने वाली राशि की आधी होती है|  कई लोग इस तरह के दौरों को 'वॉयूरिज्म' (दूसरों की मजबूरी या निजी जिंदगी को मजे के लिए देखना) कहते हैं, लेकिन धारावी में पले-बढ़े और 12वीं तक पढ़े स्थानीय निवासी ढमाले के लिए अपने इलाके से कमाई करने में कुछ भी गलत नहीं है. उनका कहना है, "गोरे लोगों को झोपड़पट्टी पहली बार देखने को मिलता है इधर. अपना घर दिखा कर पैसा मिलता है, कायको नहीं दिखाएं? असली दिक्कत तब आती है, जब रईस लोग ही दूसरे अमीर लोगों को गरीबी की आधी-अधूरी जानकारी देकर पैसे कमाते हैं. धारावी की गलियों में कदम रखते ही आपको समझ आता है कि वहां जिंदगी कितनी जद्दोजहद भरी है, जहां हर शख्स अपनी पहचान बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है. जब आप ओंकार ढमाले जैसे गाइडों को विदेशियों के साथ वहां देखते हैं, जो बड़े शौक से उस गरीबी को देखने आते हैं, तब आपको मुंबई की उस उलझी हुई और अजीब सच्चाई का एहसास होता है|  धारावी वॉक्स का दूसरा पहलू जो केवल दिखावे से परे है लंबे समय तक, 'खाकी टूर्स' के संस्थापक भरत गोठोसकर ने पर्यटकों को धारावी ले जाने के विचार का विरोध किया. उन्होंने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया, "पहले तीन-चार साल हमने ऐसा कभी नहीं किया." उनके लिए यह सीधे तौर पर 'पॉवर्टी टूरिज्म' जैसा था. एक ऐसी स्थिति जैसा 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' फिल्म में दिखाया गया था, जहां एक जापानी पर्यटक मुंबई में "गरीब और भूखे लोगों" को देखने आता है|  कैसे बिक रही है गरीबी? लेकिन उन्होंने समझाया कि यह चलन अचानक पैदा नहीं हुआ था. 2005 में एक यूरोपीय सामाजिक कार्यकर्ता क्रिस वे और कृष्णा पुजारी द्वारा शुरू किए गए 'रियलिटी टूर्स' ने धारावी में व्यवस्थित तरीके से घूमने का एक खाका तैयार किया था. इसके पीछे विचार यह था कि स्थानीय छात्र इतना कमा सकें कि वे अपनी शिक्षा का खर्च उठा सकें. गोठोसकर ने कहा कि उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा वापस उसी समुदाय के काम आता था. समय के साथ, जो एक व्यवस्थित पहल के रूप में शुरू हुआ था, वह कुछ और ही बन गया. उन्होंने आगे कहा- "अब धारावी में स्लम टूरिज्म एक 'कुटीर उद्योग' बन गया है. आज, कोई भी जो कामचलाऊ अंग्रेजी बोल सकता है, खुद को गाइड के रूप में पेश कर सकता है और "गरीबी बेच" सकता है|  समय के साथ गोठोसकर का अपना नजरिया भी बदला. खुद एक ऐसे ही धारावी दौरे में शामिल होने के बाद, उन्होंने इसे अलग तरह … Read more

T20 वर्ल्ड कप 2026: चैम्पियन टीम को पुरस्कार राशि कितनी? पूरी जानकारी

नई दिल्ली  टी20 विश्‍व कप 2026 का आधे से अधिक सफर हुआ पूरा  20 टीमों के बीच होने वाले इस टूर्नामेंट की मेजबानी भारत और श्रीलंका संयुक्‍त रूप से कर रहा है। विश्‍व कप का फाइनल 8 मार्च को खेला जाएगा। टूर्नामेंट में सभी टीम खिताब अपने नाम करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देंगी। भारतीय टीम ने 2024 में खेले गए टी20 विश्‍व कप का खिताब अपने नाम किया था। ऐसे में टीम इंडिया की नजर ट्रॉफी का बचाव करने पर होगी। टूर्नामेंट के इतिहास में अब तक कोई भी टीम लगातार 2 बार विश्‍व कप नहीं जीती है। ऐसे में भारतीय कप्‍तान सूर्यकुमार यादव के पास इतिहास रचने का भी मौका है। फैंस के मन में उठ रहा सवाल विश्‍व कप की शुरुआत से पहले फैंस के मन में सवाल उठने लगा है कि आखिर जीतने वाली टीम को कितनी प्राइज मनी मिलेगी? तो आपको बता दें कि जीतने वाली टीम पर तो छप्‍परफाड़ पैसा बरसेगा। साथ ही हारने वाली टीम की भी चांदी होने वाली है। आइए जानते हैं कि विश्‍व कप की प्राइस मनी क्‍या है। 100 करोड़ से ज्‍यादा प्राइज मनी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबकि, टी20 विश्‍व कप 2026 में प्राइज मनी करीब 120 करोड़ रुपये (13.5 मिलियन डॉलर्स) होगी। यह विजेता, उपविजेता, सेमीफाइनल में हारने वाली और विश्‍व कप में हिस्‍सा लेने वाली टीमों को मिलती है। 2024 का खिताब जीतने वाली भारतीय टीम को 20 करोड़ रुपये मिले थे। इस बार प्राइज मनी में इजाफा होगा। टी20 विश्‍व कप 2026 जीतने वाली टीम को 27.48 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। वहीं, फाइनल में हारने वाली टीम को 14.65 करोड़ मिल सकते हैं। इसके अलावा सेमीफाइनल में जगह बनाने वाली टीम को 7.24 करोड़ रुपये, 5 से 12 नंबर तक रहने वाली टीमों को 3.48 करोड़ रुपये और 13 से 20 नंबर तक आने वाली टीमों को 2.29 करोड़ रुपये मिल सकते हैं।  

भोपाल में तैयार हुई रूपरेखा, 17 मार्च को दिल्ली में कर्मचारियों का बड़ा प्रदर्शन

भोपाल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के न्यू मार्केट के एक रेस्टोरेंट में शुक्रवार को 'अखिल भारतीय राज्य चतुर्थ श्रेणी सरकारी कर्मचारी महासंघ' की राष्ट्रीय बैठक संपन्न हुई। बैठक में देश के लगभग सभी राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और कर्मचारियों की उपेक्षा के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का शंखनाद किया। 1.44 करोड़ रिक्त पदों पर भर्ती और 8वें वेतनमान की मांग महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री एवं लघु वेतन कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र शर्मा ने बताया कि देश के विभिन्न राज्यों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती लंबे समय से बंद है, जिसके कारण लगभग 1 करोड़ 44 लाख पद रिक्त पड़े हैं। बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया कि इन पदों पर नियमित भर्ती शुरू की जाए। साथ ही, केंद्र के समान राज्यों में भी आठवां वेतनमान लागू करने और पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने की मांग की गई। आउटसोर्सिंग बंद हो, आयोग का हो गठन कर्मचारी नेताओं ने आउटसोर्सिंग प्रथा पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे पूरी तरह बंद करने की मांग की। प्रतिनिधियों ने सुझाव दिया कि जो कर्मचारी वर्तमान में आउटसोर्स पर कार्यरत हैं, उनके लिए 'आउटसोर्स आयोग' का गठन किया जाए और उन्हें नियमित करने के नियम बनाए जाएं। इसके अतिरिक्त, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका, कोटवार, और आशा-ऊषा कार्यकर्ताओं को कम से कम 30,000 रुपये का मासिक वेतन देने की मांग भी उठाई गई। 17 मार्च को दिल्ली में महासंग्राम बैठक में निर्णय लिया गया कि अपनी मांगों को लेकर 17 मार्च को देशभर के 'डी ग्रुप' कर्मचारी दिल्ली के रामलीला मैदान में एकत्रित होंगे। यहां एक विशाल रैली और आमसभा आयोजित की जाएगी, जिसके पश्चात केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को ज्ञापन सौंपा जाएगा। देशभर से जुटे प्रतिनिधि बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. के गणेशन. रामनारायण मीणा, बीके मधुराम, बीएम नटराजन, रामचंद्र गुप्ता, अरुण बावरिया, सुजान बिंदु, रणजीत सिंह राणा, ऋतिक बारी, वेंकट और गोविंद सिंह नेगी उपस्थित रहे। कई राज्यों के प्रतिनिधि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भीजुड़े। स्थानीय स्तर पर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अजय दुबे, राष्ट्रीय सहायक महासचिव सुधीर भार्गव और जिला अध्यक्ष राम कुंडल सेन विचार रखे।

2000 KM रेंज और ब्रह्मोस से तेज, दिल्ली से बटन दबाते ही किराना हिल्स बनेगा मलबा

नई दिल्ली  मॉडर्न एज वॉर में मिसाइल की भूमिका काफी अहम है. घर बैठे एक बटन दबाते ही दुश्‍मन के खेमे में तबाही लाई जा सकती है. आज दुनिया के कई देशों के पास ऐसी कई मिसाइल्‍स हैं, जो सैकडों टन विस्‍फोटक लेकर हजारों किलोमीटर तक ट्रैवल कर टार्गेट पर अटैक कर सकती हैं. इन्‍हें इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल यानी ICBM कहा जाता है. भारत ने अग्नि सीरीज के तहत इस तरह की मिसाइल डेवलप की है. अग्नि-5 बैलिस्टिक मिसाइल न्‍यूक्लियर वेपन ले जाने में सक्षम है. भारतीय डिफेंस साइंटिस्‍ट ऐसी मिसाइल डेवलप करने में जुटे हैं, जिसका इस्‍तेमाल बंकर बस्‍टर की तरह किया जा सके. बता दें कि अधिकांश देश अपने संवेदनशील सैन्‍य ठिकानों और परमाणु बम बनाने वाले प्‍लांट को जमीन के अंदर सुरक्षित कर रहे हैं. पिछले साल अमेरिका ने बंकर बस्‍टर बम का इस्‍तेमाल कर ईरान के ऐसे ही एक परमाणु ठिकाने को तबाह करने का दावा किया था. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने किराना हिल्‍स को टार्गेट कर पाकिस्‍तान को तबाही का ट्रेलर दिखाया था. पाकिस्‍तान का परमाणु ठिकाना किराना हिल्‍स की पहाड़ियों में ही अंडरग्राउंड स्थित है. इस अटैक से इस्‍लामाबाद थर-थर कांपने लगा था. अब भारत को अपने मिसाइल बेड़े में ब्रह्मोस से भी खतरनाक मिसाइल एड करने का ऑफर मिला है. इजरायल ने भारत को बेहद खतरनाक और सामरिक रूप से महत्‍वपूर्ण गोल्‍डन होराइजन एयर लॉन्‍च्‍ड बैलिस्टिक मिसाइल (ALBM) का ऑफर दिया है. यह मिसाइल डीप स्‍ट्राइक करने में सक्षम है. रेंज और स्‍पीड के मामले में यह मिसाइल ब्रह्मोस से दो कदम आगे है. इजरायल की ओर से भारत को लंबी दूरी की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए ‘गोल्डन होराइजन’ एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (ALBM) की पेशकश किए जाने की खबर सामने आई है. अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो भारत की स्‍ट्रैटजिक स्ट्राइक कैपेबिलिटी में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. यह मिसाइल खास तौर पर गहरे और अत्यधिक सुरक्षित ठिकानों पर हमला करने के लिए डिजाइन की गई बताई जा रही है. यह मिसाइल इजरायल की ‘सिल्वर स्पैरो’ टार्गेट मिसाइल पर आधारित बताई जाती है, जिसकी लंबाई लगभग आठ मीटर और वजन करीब तीन टन है. सिल्वर स्पैरो का इस्तेमाल पहले मिसाइल डिफेंस सिस्टम के ट्रायल के दौरान बैलिस्टिक खतरे की नकल करने के लिए किया जाता था. अब इसी तकनीक को ऑपरेशनल हथियार में बदलकर गोल्डन होराइजन को एक कॉम्बैट-रेडी डीप-स्ट्राइक सिस्टम के रूप में विकसित किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, यह मिसाइल लड़ाकू विमानों से लॉन्च की जा सकती है और दुश्मन के अत्यधिक सुरक्षित रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम होगी. हालांकि, इसकी आधिकारिक तकनीकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन विभिन्न रक्षा आकलनों के अनुसार इसकी मारक क्षमता 1500 से 2000 किलोमीटर तक हो सकती है. कुछ अनुमान इसकी न्यूनतम प्रभावी रेंज लगभग 1000 किलोमीटर बताते हैं, जो पारंपरिक एयर लॉन्च्ड वेपन से काफी अधिक है. गोल्‍डन होराइजन: कुछ नहीं बचेगा यह प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जब Indian Air Force अपनी स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता को लगातार मजबूत कर रही है. भारतीय वायुसेना युद्धक्षेत्र के सामरिक लक्ष्यों से लेकर लंबी दूरी के रणनीतिक ठिकानों तक अलग-अलग स्तर की मारक क्षमता विकसित करने पर जोर दे रही है. भारत के पास पहले से ही इजरायल से प्राप्त कई सटीक हमले करने वाले हथियार मौजूद हैं, जो युद्धक्षेत्र में तेज और सटीक कार्रवाई के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन गोल्डन होराइजन जैसी मिसाइल भारत को रणनीतिक स्तर पर अधिक गहरी मार करने की क्षमता दे सकती है. इस तरह के सिस्टम से भारत की ‘डीप स्ट्राइक’ क्षमता मजबूत होगी और भविष्य की सैन्य रणनीति में नया लेयर जुड़ सकता है. इजरायल पहले ही भारत को कई उन्नत मिसाइल सिस्टम उपलब्ध करा चुका है. इनमें एयर लोरा मिसाइल शामिल है, जिसकी मारक क्षमता लगभग 400 किलोमीटर है, जबकि रैम्पेज एयर-टू-सर्फेस मिसाइल करीब 250 किलोमीटर तक हमला कर सकती है. ये दोनों मिसाइलें मुख्य रूप से रडार स्टेशन, एयर डिफेंस सिस्टम, हथियार भंडार और कमांड सेंटर जैसे सामरिक लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए डिजाइन की गई हैं. लेकिन गोल्डन होराइजन इनसे अलग श्रेणी का हथियार है. इसे खास तौर पर अंडरग्राउंड न्‍यूक्लियर फैसिलिटी, मजबूत कमांड बंकर्स और कंक्रीट से सुरक्षित रणनीतिक ढांचों को नष्ट करने के लिए विकसित किया गया बताया जाता है. Golden Horizon मिसाइल क्या है? यह एक एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे लड़ाकू विमान से दागा जा सकता है. इसे इज़राइल की Silver Sparrow टारगेट मिसाइल तकनीक पर आधारित माना जाता है, जो पहले मिसाइल रक्षा परीक्षणों में इस्तेमाल होती थी. इस मिसाइल की मारक क्षमता कितनी बताई जा रही है? आधिकारिक जानकारी नहीं है, लेकिन अनुमान के अनुसार इसकी रेंज 1,000 से 2,000 किलोमीटर तक हो सकती है. यह दूरी भारत के मौजूदा एयर-लॉन्च्ड हथियारों से कहीं अधिक है. इसका उपयोग किन लक्ष्यों पर किया जाएगा? Golden Horizon को गहरे भूमिगत और मजबूत संरचनाओं जैसे परमाणु ठिकानों, कमांड बंकर और रणनीतिक सैन्य ढांचे को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है. यह मिसाइल इतनी खतरनाक क्यों मानी जा रही है? यह बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी में उड़ान भरती है और अंतिम चरण में हाइपरसोनिक गति के करीब पहुंच सकती है, जिससे इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है. इसकी तेज गति से टकराने पर भारी विनाशकारी ऊर्जा पैदा होती है. भारत के पास पहले से कौन-सी समान मिसाइलें हैं? इंडियन एयरफोर्स के पास पहले से Air LORA (लगभग 400 किमी रेंज) और Rampage (करीब 250 किमी रेंज) जैसी मिसाइलें हैं, लेकिन ये मुख्य रूप से सामरिक लक्ष्यों के लिए हैं. Golden Horizon रणनीतिक स्तर के हमलों के लिए अलग श्रेणी की प्रणाली होगी. क्या भारत ने इस मिसाइल को खरीदने का फैसला कर लिया है? अभी तक किसी आधिकारिक खरीद की पुष्टि नहीं हुई है. बातचीत प्रारंभिक चरण में बताई जा रही है, लेकिन इससे भारत की लंबी दूरी की सैन्य रणनीति में बदलाव के संकेत मिलते हैं. हाइपरसोनिक रफ्तार से अटैक एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल होने के कारण गोल्डन होराइजन लक्ष्य की ओर बढ़ते समय बैलिस्टिक मार्ग अपनाती है. लॉन्च के बाद यह ऊंचाई पर जाकर अत्यधिक तेज गति से नीचे आती है. इसकी अंतिम चरण की गति हाइपरसोनिक स्तर (कम से कम 6100 KMPH की रफ्तार) तक … Read more

ग्वालियर-भिंड-इटावा NH-719 फोर लेन बनेगा, 117 किमी के सफर में होगी सुविधा, NHAI की DPR अंतिम चरण में

भिंड/इटावा/ग्वालियर,    मध्य प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण NH-719 (ग्वालियर-भिण्ड-इटावा) अब जल्द ही फोर लेन हाईवे में तब्दील होगा. भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने का काम लगभग पूरा कर लिया है. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से जिम्मेदारी मिलने के बाद NHAI अब अगले कुछ महीनों में निर्माण कार्य शुरू करने की तैयारी में है. इस प्रोजेक्ट की कुल लंबाई लगभग 117 किलोमीटर रहेगी. मौजूदा हालत में इस 2 लेन रोड पर अत्यधिक यातायात दबाव रहता है. इसके चलते इसे फोर लेन बनाया जाएगा. इसमें बायपास निर्माण और ब्लैक स्पॉट्स का खात्मा हो जाएगा. वर्तमान में हर दिन तकरीबन 20 हजार वाहन इस मार्ग से गुजरते हैं. परियोजना के चरण: कब क्या होगा?     भविष्य के ट्रैफिक और सड़क सुरक्षा पहलुओं का अध्ययन पूरा होने वाला है.      DPR के बाद आवश्यक स्वीकृतियां मिलते ही भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) की प्रक्रिया शुरू होगी.     सभी वैधानिक औपचारिकताएं पूरी होते ही आगामी कुछ महीनों में टेंडर अवार्ड कर काम शुरू कर दिया जाएगा. फोर लेन बनने के 5 बड़े फायदे     शहरों में प्रस्तावित बायपास के कारण भारी वाहनों को शहर के अंदर नहीं घुसना पड़ेगा, जिससे स्थानीय नागरिकों को जाम और प्रदूषण से राहत मिलेगी.     मार्ग पर मौजूद 'ब्लैक स्पॉट्स' (दुर्घटना संभावित क्षेत्र) को समाप्त किया जाएगा. क्रैश बैरियर और आधुनिक रोड मार्किंग से यात्रा सुरक्षित होगी.     फोर लेन होने से वाहनों की गति बढ़ेगी, जिससे ग्वालियर से इटावा के बीच यात्रा समय में भारी गिरावट आएगी.     बेहतर कनेक्टिविटी से ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में औद्योगिक निवेश, कृषि परिवहन और लॉजिस्टिक्स गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.     एमपी और यूपी के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत होंगे और परिवहन लागत में कमी आएगी. कनेक्टिविटी को नई ऊंचाई NHAI के क्षेत्रीय कार्यालय के अनुसार, यह परियोजना ग्वालियर-चंबल संभाग के समग्र विकास के लिए मील का पत्थर साबित होगी. जिला प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित किया जा चुका है ताकि परियोजना के क्रियान्वयन में कोई देरी न हो.