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उपायों की अनदेखी बड़ी समस्या है: ‘विश्व और भारतीयता’ पर मोहन भागवत के विचार

नई दिल्ली
नई दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) और अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास की ओर से आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में 10वें अणुव्रत न्यास निधि व्याख्यान का आयोजन हुआ। इस मौके पर RSS सरसंघचालक Mohan Bhagwat ने 'विश्व की समस्याएं और भारतीयता' पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि समस्याओं पर तो चर्चा होती है, लेकिन उपायों पर कम चर्चा होती है। विश्व समस्याओं से घिरा है। हम आधुनिक युग में बैठे हैं। हमें जितना इतिहास पढ़ाया गया है, वह पश्चिम की ओर से पढ़ाया जाता है।

विश्व में भारत को लेकर विचार नहीं मिलते
भागवत ने कहा कि भारत के बारे में सामान्यतः विचार नहीं मिलते हैं, भले ही नक्शे पर भारत हो, पर विचारधारा में नहीं। जिन समस्याओं पर हजारों वर्षों से विचार होता रहा, उन पर प्रयास भी हुए, लेकिन समस्या जस की तस बनी रहीं। समस्याओं की वैश्विक सूची 2000 वर्ष पुरानी है। घर, परिवार, राष्ट्र, व्यक्ति आदि इनमें कोई भी समस्या हो, पहली समस्या 'दुख' है। कहा कि दुख दूर करने के प्रयास होते रहे, कुछ दुख दूर भी हुए।

सुख-सुविधा बढ़ी, लेकिन दुख वहीं हैं
सौ साल पहले भाषण देते तो लाउडस्पीकर नहीं था। अब भाषण देना आसान है, इसलिए भाषण भी लंबा हो गया है। पहले जोर-जोर से बोलना होता था तो 10 मिनट में ही बात खत्म करनी पड़ती थी। पहले इधर-उधर जाने में पदयात्रा करनी पड़ती थी, अब अमेरिका जाना भी आसान है। विज्ञान से सुख-सुविधा बढ़ी, लेकिन दुख वहीं हैं। कौन दुखी नहीं है? रास्ते से भीख मांगने वाला हो या करोड़पति, सब अपने-अपने दुख गिनाएंगे। जितना सुख बढ़ाया, दुख वही का वही है।

हर साल कहीं न कहीं युद्ध चलता रहता है
भागवत ने कहा कि आज भी कलह है। 1950 में मेरा जन्म हुआ, तब से देखता आ रहा हूं कि हर साल कहीं न कहीं युद्ध चलता रहता है। कलह से हानि, रक्तपात और जीव की हानि होती है, लेकिन फिर भी बार-बार वही अनुभव दोहराया जाता है।
पहले महायुद्ध के बाद शांति की किताबें लिखीं, लीग ऑफ नेशन बना, लेकिन दूसरा महायुद्ध भी हुआ और फिर यूएनओ बना। अब सोच रहे हैं कि क्या तीसरा महायुद्ध होगा? शांति आई क्या?

ज्ञान तो बढ़ा है, लेकिन अज्ञानी भी बढ़े हैं
उन्होंने कहा कि अज्ञानता भी एक समस्या है। क्या वह दूर हुआ? अज्ञान ने तो अपना रूप बदल लिया है। आज चंद्रमा, मंगल, क्रोमोसोम की बातें होती हैं, मनुष्य क्या नहीं कर सकता। बस एक जीव का निर्माण बाकी है, ज्ञान बढ़ा है, साथ ही अज्ञानी लोगों की संख्या भी बढ़ी है। सुशिक्षित कितने हैं, पता नहीं।

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