samacharsecretary.com

मानसिक प्रताड़ना तलाक का आधार, पत्नी के गुजारा भत्ते के अधिकार पर भी हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

बिलासपुर 
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पति के प्रति पत्नी के व्यवहार को मानसिक क्रूरता मानते हुए एक पारिवारिक अदालत द्वारा मंजूर किए गए तलाक के फैसले को सही ठहराया है. अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया कि शादीशुदा जिंदगी में बार-बार के विवाद और बिना मजबूत सबूतों के लगाए गए गंभीर आरोप मानसिक क्रूरता के दायरे में आते हैं। 

इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी कि यदि पत्नी ने निचली अदालत में स्थायी गुजारा भत्ते (अल्मोनी) की मांग नहीं की थी, तो वह इसके लिए कानून के मुताबिक अलग से आवेदन दायर कर सकती है। 

यह पूरा मामला 17 फरवरी 2016 को हुई एक शादी से जुड़ा है, जहां दंपत्ति विवाह के बाद महज छह से सात दिन ही साथ रहे. इसके बाद सरकारी कर्मचारी पति अपनी नौकरी के सिलसिले में दंतेवाड़ा चला गया, जबकि पत्नी नर्सिंग की पढ़ाई पूरी करने के लिए हॉस्टल में रहने लगी. इसके बाद दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। 

पति ने आरोप लगाया कि पत्नी अक्सर उसके और उसके माता-पिता के साथ झगड़ा करती थी, बिना बताए मायके चली जाती थी और किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंधों में थी. पति का यह भी आरोप था कि पत्नी ने उसे परेशान करने के लिए उसके सरकारी विभाग में झूठी शिकायतें दर्ज कराई थीं। 

दूसरी तरफ, पत्नी ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया था कि उसके ससुराल वाले उसे 4 लाख रुपये और पिता की जमीन ट्रांसफर करने के लिए प्रताड़ित करते थे. पत्नी का आरोप यह भी था कि पति के अन्य महिलाओं से संबंध हैं। 

अंबिकापुर की पारिवारिक अदालत ने 11 नवंबर 2024 को पति के पक्ष में तलाक की मंजूरी दी थी, लेकिन गुजारा भत्ता तय नहीं किया था. इसी फैसले को चुनौती देने और तलाक रद्द कराने के साथ-साथ गुजारा भत्ता पाने के लिए पत्नी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। 

जस्टिस पार्थ प्रतीक साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलों और सबूतों का गहन अध्ययन किया. हालांकि पति पत्नी के कथित अफेयर से जुड़े टेलीफोन रिकॉर्डिंग या चश्मदीद गवाह जैसे सीधे सबूत पेश नहीं कर सका, लेकिन जिरह के दौरान पत्नी के वकील द्वारा पूछे गए सवालों ने मामले का रुख बदल दिया. जिरह में पत्नी की ओर से यह सुझाव दिया गया था कि उसने विवादित घटना को लेकर माफी मांगी थी।  

पीठ ने टिप्पणी की कि यदि कोई घटना घटी ही नहीं थी, तो माफी मांगने जैसा सुझाव देने का कोई औचित्य नहीं बनता. इसके अलावा, पत्नी की मां ने उसके समर्थन में हलफनामा तो दिया, लेकिन वे जिरह के लिए कटघरे में उपस्थित नहीं हुईं. अदालत ने इन परिस्थितियों को देखते हुए पति के पक्ष को अधिक विश्वसनीय माना और तलाक को बरकरार रखा। 

जहां तक गुजारा भत्ते की बात है, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत वित्तीय सहायता तय करने के लिए दोनों पक्षों की आय और संपत्ति की जांच जरूरी है. चूंकि पत्नी ने पारिवारिक अदालत में इस मांग को नहीं रखा था और न ही कोई साक्ष्य पेश किए थे, इसलिए अपीलीय स्तर पर पहली बार इस पर निर्णय नहीं लिया जा सकता. अदालत ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए उसे सक्षम न्यायालय में गुजारा भत्ते के लिए अलग से नया आवेदन करने की स्वतंत्रता दी है। 

Leave a Comment

हम भारत के लोग
"हम भारत के लोग" यह वाक्यांश भारत के संविधान की प्रस्तावना का पहला वाक्य है, जो यह दर्शाता है कि संविधान भारत के लोगों द्वारा बनाया गया है और उनकी शक्ति का स्रोत है. यह वाक्यांश भारत की संप्रभुता, लोकतंत्र और लोगों की भूमिका को उजागर करता है.
Click Here
जिम्मेदार कौन
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipiscing elit dolor
Click Here
Slide 3 Heading
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipiscing elit dolor
Click Here