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सुप्रीम कोर्ट की लताड़: जाति मुक्त समाज का वादा, अब हम खुद बांटने लगे

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को जमकर लताड़ा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि देश में हमें एक जाति मुक्त समाज बनाना था, लेकिन हम लगातार बंटते जा रहे हैं। इसके साथ ही देश की सर्वोच्च अदालत ने 2027 की जनगणना में 'विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों' की अलग से गणना करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक नीतिगत निर्णय है और यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं है। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, "भारत एक बहुत ही अनूठा देश है। एक जातिविहीन समाज विकसित करने के बजाय, हम अधिक से अधिक वर्गीकरण बनाना चाहते हैं।" जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सरकार भी इसके पक्ष में है तो सीजेआई ने संदेह जताते हुए कहा, "ये बहुत ही नपे-तुले कदम हैं। ये कोई साधारण दावे नहीं हैं जो अचानक हमारे सामने आ गए हैं। यह समाज को विभाजित करने की एक बहुत ही गहरी साजिश है। ये एजेंसियां भारत के भीतर की नहीं हैं। यदि हम जांच करेंगे, तो पता चल जाएगा कि इन्हें कहां से रूट किया जा रहा है।" DNT समुदाय के नेता दक्षकुमार बजरंगे और अन्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि इन समुदायों ने ऐतिहासिक अन्याय सहा है। अंग्रेजों ने इन्हें आपराधिक जनजाति (Criminal Tribes) करार दिया था। वर्तमान जनगणना फॉर्म में केवल एससी, एसटी और 'अन्य' की श्रेणियां हैं। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि एक अलग विकल्प दिया जाए ताकि इन समुदायों की सटीक जनसंख्या का पता चल सके। अंतिम गणना 1913 में दवे ने कोर्ट को बताया कि आखिरी बार इन समुदायों की गणना 1913 में हुई थी। इदाते आयोग (2017) और रेनके आयोग (2008) जैसी कई समितियों ने भी इनकी अलग से गिनती की सिफारिश की है। याचिका में कहा गया है कि भारत में लगभग 10 से 12 करोड़ की आबादी वाले इन समुदायों को आजादी के बाद कभी अलग से नहीं गिना गया। आंकड़ों के अभाव के कारण ये समुदाय कल्याणकारी योजनाओं और आरक्षण का लाभ उठाने में असमर्थ हैं। 1871 के 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' के कारण इन पर जो कलंक लगा था, वह कानून रद्द होने के बावजूद आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से इनका पीछा कर रहा है। कोर्ट का अंतिम फैसला पीठ ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि जनगणना की प्रक्रिया में वर्गीकरण या उप-वर्गीकरण करना पूरी तरह से केंद्र सरकार और विशेषज्ञों के कार्यक्षेत्र में आता है। कोर्ट ने कहा, "हमारी सुविचारित राय में याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई मांग नीतिगत दायरे में आती है, जिस पर निर्णय भारत सरकार के सक्षम प्राधिकारी को लेना है। यह न्यायसंगत मुद्दा नहीं है।" अदालत के इस फैसले के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह आगामी 2027 की जनगणना में इन समुदायों की पहचान के लिए क्या कदम उठाती है।

मिडिल ईस्ट के तनाव से रियल एस्टेट प्रभावित, बढ़ सकते हैं घरों के दाम

मुंबई  रियल एस्टेट डेवलपर्स के संगठनों क्रेडाई (Credai) और नारेडको (Naredco) ने चेतावनी दी है कि अमेरिका-ईरान के बीच लंबे समय तक चलने वाला युद्ध निर्माण लागत को बढ़ा सकता है. ईंधन और माल ढुलाई की बढ़ती कीमतों के कारण स्टील और टाइल्स जैसी प्रमुख सामग्रियां महंगी हो सकती हैं. जिससे प्रोजेक्ट की समय-सीमा में देरी हो सकती है और घरों की कीमतें बढ़ सकती हैं।  यह प्रभाव मुख्य रूप से कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और लॉजिस्टिक्स में आने वाली बाधाओं के कारण है, जिसका असर स्टील और अन्य निर्माण सामग्रियों पर पड़ रहा है. इससे डेवलपर्स के मुनाफे पर भी दबाव बढ़ रहा है।  लगभग 20,000 डेवलपर्स का प्रतिनिधित्व करने वाले इन दोनों संगठनों ने निर्माण सामग्री की संभावित कमी के कारण रियल एस्टेट परियोजनाओं को पूरा करने में होने वाली देरी पर भी चिंता व्यक्त की है. रिपोर्ट्स के मुताबिक "स्टील, तार, पाइप और यहां तक कि कांच जैसी प्रमुख सामग्रियों की वर्तमान में कमी है. इसके अलावा, ईंधन से जुड़ी चुनौतियों के कारण सिरेमिक निर्माण जैसे क्षेत्र भी प्रभावित हुए हैं।  प्रोजेक्ट को पूरा करने में भी हो सकती है देरी एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह "संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो इससे निर्माण लागत में और वृद्धि हो सकती है और प्रोजेक्ट के पूरा होने की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है।  इससे पहले, एनारॉक (Anarock) द्वारा किए गए एक विश्लेषण में कहा गया था कि मार्च की शुरुआत से हॉर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने रियल एस्टेट क्षेत्र को प्रभावित किया है. इसकी वजह से निर्माण सामग्री की लागत बढ़ गई है, सप्लाई चेन बाधित हुई है और परियोजनाओं में देरी या उनके रुकने का जोखिम बढ़ गया है।  स्टील की छड़ों की बढ़ती कीमतों का असर मुंबई, दिल्ली-एनसीआर और हैदराबाद जैसे ऊंची इमारतों वाले बाजारों में निर्माण कार्य पर पड़ने की आशंका है. साथ ही, इससे लग्जरी घरों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं, क्योंकि डेवलपर्स द्वारा दरों में 5% से अधिक की वृद्धि किए जाने की संभावना है। 

लोकसभा में सीटों का विस्तार, महिलाओं को मिलेगा 2029 से रिजर्वेशन, सरकार लाएगी नया संशोधन बिल

नई दिल्ली लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने के लिए सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम लेकर आई थी. यह बिल पारित हो जाने के बावजूद लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू नहीं हो सका है. अब सरकार जल्द से जल्द महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने, यह कानून लागू करने की तैयारी में है।  महिलाओं को आरक्षण देने के लिए सरकार अब संसद में संशोधन विधेयक लाएगी. इस बिल में लोकसभा सीटों के परिसीमन और सीटें बढ़ाने के लिए 2011 की जनगणना को ही आधार मानने का प्रावधान किया जाएगा. यह संशोधन विधेयक पारित होने के बाद नए परिसीमन में लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाएंगी. 816 सदस्यों वाली लोकसभा में 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी।  गौरतलब है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम जो संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ था, उसमें यह प्रावधान था कि यह नई जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा. अब सूत्रों का कहना है कि सरकार इस हफ्ते नारी शक्ति अभिनंदन अधिनियम बिल में संशोधन लेकर आएगी. यह संशोधन इसलिए लाया जा रहा है, जिससे 2029 के लोकसभा चुनाव तक महिला आरक्षण लागू किया जा सके।  संविधान संशोधन लाने की भी तैयारी सरकार की तैयारी नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के साथ ही संविधान संशोधन लाने की भी है. यह संविधान संशोधन इसलिए लाया जाएगा, जिससे साल 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा में सीटें बढ़ाई जा सकें और 2029 के आम चुनाव में महिला आरक्षण लागू किया जा सके. साल 2011 की जनगणना के आधार पर 2029 के लोकसभा चुनाव में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती है. इसमें महिलाओं के लिए 273 सीटें आरक्षित की जा सकती हैं।  गृह मंत्री ने की विपक्ष के नेताओं से बात सरकार ने इसे लेकर विपक्षी दलों के नेताओं से बातचीत भी शुरू कर दी है. गृह मंत्री अमित शाह ने महिला आरक्षण बिल में संशोधन को लेकर शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (शरद पवार) जैसे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बातचीत की है. शुरुआत में गृह मंत्री ने छोटे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बातचीत की है. कांग्रेस जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी और अन्य बड़े दलों के नेताओं के साथ बातचीत अभी बाकी है। 

लारीजानी की मौत के बाद ईरान को नया सुरक्षा प्रमुख, बागेर को सौंपी गई कमान

ईरान ईरान में सुरक्षा परिषद के प्रमुख अली लारीजानी की मौत के बाद देश में बड़ा नेतृत्व परिवर्तन हुआ है। मोहम्मद बागेर जुल्घदर को नया सिक्योरिटी चीफ नियुक्त किया गया है। हाल ही में इजरायली हवाई हमलों में लारीजानी की मौत हो गई, जिसके साथ उनका बेटा मोर्तेजा लारीजानी और उनके कार्यालय के प्रमुख अलिरेजा बयात भी शहीद हो गए। यह घटना 17 मार्च को तेहरान के बाहरी इलाके में हुई, जब वे अपनी बेटी के घर जा रहे थे। लारीजानी ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (SNSC) के सचिव थे और देश की रक्षा, परमाणु व विदेश नीति के प्रमुख वास्तुकार माने जाते थे।  

सरकार का दावा: सभी रिफाइनरियां पूरी क्षमता पर, 18,700 टन LPG की रिकॉर्ड सप्लाई

नई दिल्ली सरकार ने मंगलवार को बताया कि देश की सभी गैस रिफाइनरियां पूरी क्षमता के साथ काम कर रही हैं और सोमवार तक 18,700 टन कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति की जा चुकी है। अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि सभी रिफाइनरियां उच्च क्षमता पर चल रही हैं और देश में पेट्रोल व डीजल का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। सरकार देश भर में पीएनजी कनेक्शन बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। उन्होंने बताया कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (पीएनजीआरबी) ने सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (सीजीडी) कंपनियों को निर्देश दिया है कि जहां सुविधा उपलब्ध हो, वहां 5 दिनों के अंदर स्कूलों, कॉलेजों और आंगनवाड़ी किचन में पीएनजी कनेक्शन दिया जाए। उनके अनुसार, सोमवार को देश के 110 प्रमुख क्षेत्रों में करीब 7,500 घरेलू और व्यावसायिक पीएनजी कनेक्शन दिए गए। शर्मा ने कहा कि देश में 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं और ज्यादातर सामान्य रूप से काम कर रहे हैं, जहां पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। उन्होंने यह भी बताया कि एलपीजी की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं और सरकार आपूर्ति के स्रोतों को बढ़ाने पर भी काम कर रही है ताकि स्थिति स्थिर बनी रहे। साथ ही, राज्यों से निगरानी और व्यवस्था को मजबूत करने की अपील की गई है। उन्होंने कहा कि देश में एलएनजी का भी पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। मार्च के पहले तीन हफ्तों में 3.5 लाख से ज्यादा घरेलू और व्यावसायिक पीएनजी कनेक्शन दिए गए हैं, जबकि एलपीजी सिलेंडर की डिलीवरी सामान्य रूप से जारी है और घबराहट में बुकिंग में काफी कमी आई है। वर्तमान के भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए एलपीजी सप्लाई पर लगातार नजर रखी जा रही है, लेकिन कहीं भी गैस खत्म होने की स्थिति सामने नहीं आई है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के अनुसार, किसी भी पेट्रोल पंप पर ईंधन की कमी नहीं है और सप्लाई नियमित रूप से जारी है। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे घबराहट में खरीदारी न करें, क्योंकि पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। जरूरी सेक्टरों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिसमें घरेलू पीएनजी और सीएनजी ट्रांसपोर्ट को 100 प्रतिशत सप्लाई दी जा रही है, जबकि औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को करीब 80 प्रतिशत सप्लाई दी जा रही है।

मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा: ईरान जंग से किन देशों की ऊर्जा सप्लाई पर संकट, भारत कितना सुरक्षित?

ईरान ईरान में अमेरिका और इजरायल की ओर से ताबड़तोड़ हमले हो रहे हैं। ईरान के तेल कुएं हों या फिर गैस फील्ड, सभी को अमेरिका और इजरायल ने टारगेट किया है। वहीं ईरान ने भी संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और बहरीन समेत कई ऐसे देशों पर हमले किए हैं, जहां से बड़ी संख्या में तेल और गैस की सप्लाई दुनिया भर में की जाती है। इस जंग ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी बाधित किया है, जहां से दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल कारोबार होता है। इसके चलते भारत समेत कई देशों में तेल और गैस का संकट पैदा हो गया है। हालांकि अब भी भारत के मुकाबले कई ऐसे देश हैं, जहां इस संकट का असर ज्यादा दिख रहा है। इसकी वजह है कि भारत ने अपनी तेल की जरूरतों को डाइवर्सिफाई किया है। वहीं पाकिस्तान, जापान, थाइलैंड और कोरिया जैसे देशों को ज्यादा परेशानी है। एक रिपोर्ट के अनुसार खाड़ी देशों से अपनी जरूरत का सबसे ज्यादा तेल आयात पाकिस्तान करता है। इसके बाद दूसरा नंबर जापान, तीसरा थाईलैंड और चौथा साउथ कोरिया का है। इसके बाद 5वां नंबर भारत का आता है। साफ है कि ईरान में चल रही जंग से भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा परेशान पाकिस्तान है। इस संकट के चलते एक तरफ सप्लाई पर असर पड़ा है तो वहीं कच्चे तेल के दाम भी 100 डॉलर के ऊपर लगातार बने हुए हैं। भारत के बाद अपनी जरूरत का सबसे ज्यादा तेल आयात करने वाले देशों में मालदीव, ताइवान, चीन, श्रीलंका, मलयेशिया, सिंगापुर और फिलीपींस हैं। पाकिस्तान ने तो अपने स्कूलों, दफ्तरों आदि को लेकर भी पाबंदियां लगाई हैं और लोगों को घरों में ही रहने के लिए प्रोत्साहित किया है। स्पष्ट है कि यह संकट उसे ज्यादा परेशान कर रहा है। अब भारत की बात करें तो वह अपनी जरूरत का करीब 40 फीसदी तेल मिडल ईस्ट के देशों से आयात करता है। इसके अलावा भारत अपनी जरूरत की 80 फीसदी प्राकृतिक गैस आयात करता है। देश में एलपीजी सिलेंडरों की कमी है और उनका संकट पहले ही परेशानी पैदा कर रहा है। हालांकि तेल के मामले में एक राहत की बात यह है कि भारत अपनी जरूरत का 40 फीसदी तेल ही खाड़ी देशों से खरीदता है। इसे भी घटाया जा सकता है क्योंकि रूस, अमेरिका और नॉर्वे जैसे देशों के तौर पर उसके पास एक विकल्प है। हालांकि गैस का संकट बड़ा है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी तेल खाड़ी देशों से ही लेता है। दुनिया में फिलहाल जेट फ्यूल की भी कमी है और इसके चलते हजारों उड़ानों पर भी सीधे तौर पर असर पड़ा है। रोचक बात यह है कि इस संकट से यूरोप लगभग अछूता ही है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपनी जरूरत की ज्यादातर गैस रूस से खरीदता है। फिर उसने अमेरिका और नॉर्वे को भी विकल्प के तौर पर चुना है। रूस और यूक्रेन के बीच जंग के बाद यूरोप ने कुछ खरीद रूस से घटाई थी, लेकिन अब भी वह बड़ा खरीददार है।  

मोबाइल यूजर्स से बड़ा झटका: 12 नहीं 13 रिचार्ज का खेल, संसद में गूंजा 28 दिन प्लान विवाद

नई दिल्ली भारत में मोबाइल रीचार्ज प्लान्स को लेकर एक बड़े सच पर चर्चा तेज हो गई है। जिन प्लान्स को कंपनियां ‘मंथली प्लान’ कहकर बेचती हैं, वे असल में पूरे 30 दिन नहीं बल्कि सिर्फ 28 दिन तक ही चलते हैं। इस मुद्दे को हाल ही में संसद में राघव चड्ढा ने उठाया, जहां उन्होंने बताया कि यह सिस्टम सीधे-सीधे सब्सक्राइबर्स की जेब पर एक्सट्रा बोझ डालता है। सांसद ने तर्क दिया कि 28 दिन का प्लान हर महीने 2-3 दिन कम पड़ जाता है। इस वजह से साल के 365 दिन पूरे करने के लिए यूजर्स को 12 की जगह 13 बार रीचार्ज करना पड़ता है। यानी बिना ध्यान दिए ही लोग हर साल एक एक्सट्रा रीचार्ज के पैसे चुका रहे हैं। यह मॉडल टेलिकॉम कंपनियों के लिए फायदे का सौदा है, लेकिन आम यूजर्स के लिए महंगा साबित होता है। टेलिकॉम मंत्री ने दिया जवाब मुद्दे पर जवाब देते हुए टेलिकॉम मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि सरकार इस स्थिति को जानती है और टेलिकॉम कंपनियों को 30 दिन वाले प्लान्स को ज्यादा प्रमोट करने के लिए कहा जा रहा है। उन्होंने यह भी साफ किया कि इस दिशा में पहले ही नियम बनाए जा चुके हैं। दरअसल, Telecom Regulatory Authority of India (TRAI) ने 2022 में एक बड़ा नियम लागू किया था। इस नियम के तहत हर टेलिकॉम कंपनी को अपने प्रीपेड प्लान्स में कम से कम एक 30 दिन की वैलिडिटी वाला प्लान देना अनिवार्य किया गया। इसका मकसद यूजर्स को 28 दिन वाले प्लान्स के अलावा एक सही ‘मंथली’ विकल्प देना था, जिससे उन्हें बार-बार रिचार्ज करने की जरूरत ना पड़े। ऑफर किए जा रहे हैं बेहद कम प्लान हालांकि, हकीकत कुछ और ही है। Reliance Jio, Bharti Airtel और Vodafone Idea जैसी बड़ी कंपनियां 30 दिन वाले प्लान्स तो देती हैं, लेकिन उनकी संख्या काफी कम है। जियो के पास 2-3, एयरटेल के पास 2-4 और Vi के पास 2-3 प्लान ऐसे हैं, जो 30 दिनों की वैलिडिटी के साथ आते हैं। ज्यादातर प्लान्स आज भी 28 दिन की वैलिडिटी के साथ आते हैं। वहीं, Bharat Sanchar Nigam Limited (BSNL) इस मामले में थोड़ा अलग नजर आता है, जहां करीब आधा दर्जन प्लान्स कैलेंडर मंथ के हिसाब से भी चलते हैं। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कंपनियों को ‘मंथली प्लान’ शब्द का इस्तेमाल करने की परमिशन होनी चाहिए, जब वे पूरे महीने की सेवा ही नहीं दे रही हैं। सब्सक्राइबर्स के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे रीचार्ज करते वक्त सिर्फ कीमत ही नहीं, बल्कि वैलिडिटी पर भी ध्यान दें। अगर सरकार इस पर सख्ती दिखाती है, तो संभव है कि 30 दिन वाले प्लान्स की संख्या बढ़े और यूजर्स को राहत मिले।  

ईरान संकट गहराया: भारत में बढ़ी हलचल, केंद्र ने बुलाई सर्वदलीय मीटिंग

नई दिल्ली मध्य एशिया में जारी तनाव का असर भारत पर भी देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दिन पहले ही कहा है कि हमें भी तैयार रहने की जरूरत है। वहीं अब सूत्रों का कहना है कि सरकार ने बुधवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। जानकारी के मुताबिक बुधवार को शाम पांच बजे सर्वदलीय बैठक होगी। इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बैठक करके क्षेत्रीय सुरक्षा की समीक्षा की थी। उन्होंने सीडीएस जनरल अनिल चौहान, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह और जनरल उपेंद्र द्विवेदी व ऐडमिरल डिनेश के त्रिपाठी के अलावा डीआरडीओ चेयरमैन के साथ बैठक करके तैयारियों की जानकारी ली। ईरान और इजरायल-ईरान के बीच जारी युद्ध अब चौथे सप्ताह में प्रवेश कर गया है। वहीं होर्मुज स्ट्रेट बंद होने की वजह से पूरी दुनिया ऊर्जा संकट से जूझने लगी है। बता दें कि अमेरिका और इजरायल ने अचानक ईरान पर हमला करके उसेक सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या कर दी थी। इसी के बाद से तनाव बढ़ता ही चला गया और ईरान ने खाड़ी देशों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया। राज्यसभा में भी बयान दे सकते हैं पीएम मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को लोकसभा में इस संकट को लेकर बयान दिया था। वहीं जानकारी के मुताबिक आज वह राज्यसभा में भी अपनी बात रख सकते हैं। पीएम मोदी ने लोकसभा में कहा था कि मध्य एशिया में जारी इस तनाव का असर भारत पर भी पड़ सकता है। ऐसे में भारत जिस तरह से कोरोना संकट के दौरान तैयार था, वैसे ही तैयार रहने की जरूरत है। पीएम मोदी ने कहा था कि पश्चिमी एशिया में जो कुछ भी हो रहा है वह बहुत ही दुखद और चिंतनीय है। उन्होंने कहा कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ ही आम आदमी के जीवन पर भी पड़ रहा है। ऐसे में सारा विश्व यही चाहता है कि युद्ध जल्द रुके। पीएम मोदी ने कहा कि भारत में तेल और गैस की आपूर्ति ज्यादातर उन्हीं देशों से होती है जो कि युद्ध के चपेट में हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और इसके कारण भारत के सामने आई चुनौतियों पर लोकसभा में वक्तव्य देते हुए यह भी कहा था कि इस संकट का सामना देशवासियों को कोरोना संकट की तरह ही करना होगा। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट और व्यावसायिक जहाजों पर हमलों को अस्वीकार्य बताते हुए कहा था कि इस समस्या का समाधान कूटनीति और बातचीत से ही संभव है तथा भारत तनाव को कम करने व संघर्ष समाप्त करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है।  

सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल को फटकार: हर चीज में ED मत घसीटिए, CM केस में जज सख्त

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या किसी सरकारी अधिकारी के मौलिक अधिकार नहीं होते हैं या केवल अधिकारी होने के कारण वे अपने मौलिक अधिकार खो देते हैं? जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि ED के कुछ अधिकारियों ने इस मामले में व्यक्तिगत रूप से भी याचिका दायर की है। ऐसे में यह तर्क देना कि प्रवर्तन निदेशालय अनुच्छेद 32 के तहत याचिका नहीं दायर कर सकती। यह याचिका पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर एक राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के खिलाफ की गई तलाशी अभियानों में कथित हस्तक्षेप के आरोप में दायर की गई थी। कोर्ट ने साफ कहा, “क्या ED के अधिकारी अधिकारी हो जाने की वजह से इस देश के नागरिक नहीं रह जाते? उनके मौलिक अधिकारों का क्या?” पीठ ने कहा कि ED के कुछ अधिकारियों ने अपनी व्यक्तिगत क्षमता में अदालत में याचिका दायर की है। पीठ ने यह भी चेताया कि केवल “ED, ED, ED” कहकर मामले को नहीं देखा जा सकता, बल्कि उन अधिकारियों के अधिकारों पर ध्यान देना जरूरी है जो कथित रूप से प्रभावित हुए हैं। सिर्फ 'ED, ED, ED' की रट न लगाएं बार एंड बेंच के मुताबिक, जस्टिस मिश्रा ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा, "कृपया ED के उन अधिकारियों के मौलिक अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करें, जिनके संबंध में अपराध किया गया है। अन्यथा, आप मुख्य मुद्दे से भटक जाएंगे। आप उस दूसरी याचिका को नहीं भूल सकते, जिसे उन व्यक्तिगत अधिकारियों ने दायर किया है, जो इस अपराध के पीड़ित हैं। मैं आपको बता रहा हूं, आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। सिर्फ 'ED, ED, ED' की रट न लगाएं।" राज्य सरकार का पक्ष पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि जांच करना कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक वैधानिक (statutory) अधिकार है। उन्होंने कहा कि अगर जांच में बाधा आती है, तो उसका समाधान कानून के तहत है, न कि अनुच्छेद 32 के जरिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हम किसी कानून की व्याख्या किसी विशेष परिस्थिति के संदर्भ में करके, आपराधिक कानून की मूल विशेषताओं के विपरीत जाकर 'मुसीबतों का पिटारा' (Pandora’s box) नहीं खोल सकते।" सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख कोर्ट ने चुनावी समय का हवाला देकर सुनवाई टालने की मांग भी खारिज कर दी। जस्टिस मिश्रा ने कहा, “हम न चुनाव का हिस्सा बनना चाहते हैं, न किसी अपराध का।” यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि कोर्ट इस मामले को गंभीरता से देख रहा है और इसे टालने के पक्ष में नहीं है। पूरा मामला क्या है? यह विवाद जनवरी में तब शुरू हुआ, जब ED ने पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के ठिकानों पर छापेमारी की। आरोप है कि उस दौरान सीएम ममता बनर्जी मौके पर पहुंचीं थी और उन्होंने कुछ दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण वहां से हटा लिए थे। ED का दावा है कि इससे उनकी जांच प्रभावित हुई। यह जांच कथित कोयला तस्करी मामले से जुड़ी है, जिसमें कारोबारी अनूप माजी पर आरोप हैं। कानूनी पेच: अनुच्छेद 32 बनाम वैधानिक अधिकार इस केस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोई सरकारी एजेंसी या उसके अधिकारी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का हवाला देकर सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं? या उन्हें केवल सामान्य कानूनी प्रक्रिया (जैसे FIR, पुलिस कार्रवाई) का सहारा लेना चाहिए? यह मामला सिर्फ एक जांच एजेंसी और राज्य सरकार के टकराव तक सीमित नहीं है, बल्कि केंद्र बनाम राज्य की शक्तियों, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और अधिकारियों के मौलिक अधिकार जैसे बड़े मुद्दों को भी छू रहा है। ऐसे में ED बनाम ममता बनर्जी का मामला अब एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस में बदल चुका है। सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल “क्या अधिकारी नागरिक नहीं हैं?” आने वाले समय में कानून की व्याख्या और जांच एजेंसियों की भूमिका दोनों को नई दिशा दे सकता है।

हरीश राणा ने 13 साल बाद ली अंतिम सांस, इच्छामृत्यु से मिली पीड़ा से मुक्ति

नई दिल्ली 13 साल तक कोमा में रहने के बाद आखिरकर हरीश राणा को कष्ट से मुक्ति मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से मिली इच्छामृत्यु की अनुमति के बाद एम्स में हरीश राणा ने मंगलवार को अंतिम सांस ली। हरीश 14 मार्च से एम्स के आईआरसीएच के पैलिएटिव केयर वार्ड में भर्ती थे। यह देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला मामला है। माता-पिता की ओर से गुहार लगाए जाने के बाद 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों की देखरेख में हरीश राणा के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। इसके बाद एम्स ने डॉक्टरों की एक कमेटी गठित की थी। यहां धीरे-धीरे हरीण राणा का भोजन और पानी बंद कर दिया गया। क्या हुआ था हरीश के साथ हरीश राणा चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक के छात्र थे। वह 2013 में चौथी मंजिल की बालकनी से गिर गए थे और सिर पर गंभीर चोटें आई थीं। इसके बाद वह कोमा में चले गए थे। परिवार और डॉक्टरों की ओर से हर संभव कोशिश की गई। उन्हें फूड पाइप के सहारे भोजन दिया जा रहा था। कभी-कभी ऑक्सीजन सहायता दी जाती थी। निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को कैसे अंजाम दिया जाता है एम्स-दिल्ली की ऑन्को-एनेस्थीसिया, दर्द एवं प्रशामक देखभाल विभाग की पूर्व प्रमुख डॉक्टर सुषमा भटनागर कहते हैं, 'इस प्रक्रिया में आम तौर पर दर्द से पर्याप्त राहत सुनिश्चित करते हुए धीरे-धीरे पोषण संबंधी सहायता को रोकना या वापस लेना शामिल होता है। रोगी को प्रशामक बेहोशी दी जाती है ताकि उसे परेशानी न हो। कृत्रिम पोषण, ऑक्सीजन और दवाएं जैसे जीवन सहायता उपाय धीरे-धीरे वापस ले लिए जाते हैं। इसका उद्देश्य मृत्यु को लंबा खींचना या जल्दी करना नहीं होता।'