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पितरों को प्रसन्न करने के लिए सर्वपितृ अमावस्या की रात अपनाएँ ये आसान उपाय

सर्वपितृ अमावस्या, जिसे आमतौर पर महालय अमावस्या भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह वह दिन होता है जब पितरों की पूजा और तर्पण किया जाता है। इस दिन पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए विभिन्न धार्मिक क्रियाएं की जाती हैं। सर्वपितृ अमावस्या की रात पितरों के लिए पानी रखने की प्रथा भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके पीछे कई धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कारण हैं, जिनको समझना आवश्यक है।  हिंदू धर्म के अनुसार, इस दिन पितरों की पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और उनके द्वारा दैहिक या मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। पितर तर्पण और श्राद्ध कर्म इस दिन विशेष रूप से किए जाते हैं ताकि वे संतुष्ट हो सकें और उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य बना रहे। जिन व्यक्तियों की श्राद्ध की तिथि न पता हो इस दिन उनका श्राद्ध किया जाता है। सर्वपितृ अमावस्या पर इस जगह रखें पानी सर्वपितृ अमावस्या का दिन श्राद्ध का आखिरी दिन होता है और इस दिन पितृ पृथ्वी लोक से अपने लोक वापिस चले जाते हैं। इस वजह से इस दिन अमावस्या की रात पितरों के लिए पानी रखा जाता है। यह पानी इस वजह से रखा जाता है ताकि वह पूर्ण तरीके से अपनी प्यास बुझा सकें। पानी कहां रखना चाहिए ? सर्वपितृ अमावस्या की रात या सुबह पितरों के लिए पानी रखने की सबसे उपयुक्त जगह होती है – घर का मुख्य द्वार या उसके पास का कोई स्वच्छ स्थान। ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर रखा गया जल और भोजन, पितरों तक आसानी से पहुंचता है क्योंकि यहीं से वे प्रतीकात्मक रूप से हमारे घर में प्रवेश करते हैं। पानी को कांसे, तांबे या मिट्टी के लोटे में रखा जाता है, जिसे साफ किया गया हो। इसके साथ ही कुछ लोग आटे से बनी छोटी रोटियां भी रखते हैं। इन रोटियों को अक्सर खुले में इसलिए रखा जाता है ताकि पक्षी, विशेषकर कौए, उन्हें खा सकें।  यह इस विश्वास पर आधारित है कि कौए पितरों के प्रतीक माने जाते हैं। पितृ दोष से मुक्ति का मार्ग ज्योतिष शास्त्र में यह माना गया है कि यदि किसी व्यक्ति के जन्म कुंडली में पितृ दोष होता है, तो उसे जीवन में बाधाएं, संघर्ष और मानसिक अशांति का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में, पितरों के लिए जल अर्पित करना और श्रद्धा से भोजन देना इस दोष को शांत करने का एक प्रभावशाली उपाय माना गया है। जब पूर्वज तृप्त और प्रसन्न होते हैं, तो उनका आशीर्वाद परिवार में सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य का कारण बनता है।

नवरात्रि परंपरा की अनकही कथा, पहला व्रत किससे शुरू किया?

नवरात्रि शक्ति साधना का महापर्व कहा जाता है. नौ दिनों तक मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना होती है. लेकिन सवाल उठता है नवरात्रि व्रत की शुरुआत कब और कैसे हुई? शास्त्र और परंपरा इस सवाल का जवाब दो रूपों में देते हैं. चैत्र नवरात्र का उद्गम प्राचीन काल से जुड़ा है, जबकि शारदीय नवरात्रि की परंपरा समय के साथ स्थापित होकर सबसे लोकप्रिय बन गई. शारदीय नवरात्रि की परंपरा किसने शुरू की? नवरात्रि भारत के सबसे बड़े उत्सवों में से एक है, जिसे शक्ति साधना का पर्व कहा जाता है. नौ दिनों तक मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है लेकिन अक्सर लोग पूछते हैं आखिर सर्वप्रथम नवरात्रि का व्रत किसने रखा था. शास्त्रों और परंपराओं में इसका उत्तर दो भागों में मिलता है एक ओर मार्कंडेय पुराण बताता है कि नवरात्रि व्रत की शुरुआत राजा सूरथ और समाधि वैश्य ने की थी, जबकि दूसरी ओर रामायण में उल्लेख है कि शारदीय नवरात्रि की परंपरा भगवान श्रीराम ने स्थापित की. आइए दोनों पहलुओं को विस्तार से समझते हैं. राजा सूरथ और समाधि वैश्य की कथा: नवरात्रि व्रत का उद्गम मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य यानी दुर्गा सप्तशती में विस्तार से वर्णन मिलता है कि सबसे पहले नवरात्रि का व्रत राजा सूरथ और समाधि वैश्य ने रखा. कथा के अनुसार, राजा सूरथ अपने शत्रुओं से हारकर राज्य से वंचित हो गए. दुखी होकर वे वन में चले गए, जहां उनकी मुलाकात समाधि नामक व्यापारी से हुई. समाधि को भी उसके परिवार ने त्याग दिया था. दोनों ही गहरी पीड़ा में थे और उत्तर खोजते-खोजते मेडा ऋषि के आश्रम पहुंचे. राजा और व्यापारी ने मुनि से अपने दुखों का समाधान पूछा. तब मुनि ने उन्हें बताया कि संसार की सारी शक्तियां आदिशक्ति दुर्गा के अधीन हैं और यदि वे नवरात्र के नौ दिनों तक मां की उपासना करें, तो उनकी मनोकामनाएं पूरी होंगी. राजा सूरथ और समाधि ने पूरे नियम से नौ दिनों तक उपवास और पूजा की. मां दुर्गा प्रसन्न हुईं और राजा को अगले जन्म में साम्राज्य तथा व्यापारी को मोक्ष का वरदान दिया. यही कारण है कि कहा जाता है नवरात्रि व्रत का प्रथम पालन राजा सूरथ और समाधि वैश्य ने किया था. भगवान श्रीराम और शारदीय नवरात्र: आकाल बोधन की परंपरा दूसरी ओर रामायण और लोककथाओं में उल्लेख है कि जब श्रीराम रावण से युद्ध की तैयारी कर रहे थे, तब उन्होंने विजय की कामना से मां दुर्गा की पूजा का संकल्प लिया. समस्या यह थी कि उस समय शरद ऋतु चल रही थी, जबकि नवरात्रि का पर्व पारंपरिक रूप से चैत्र मास में आता था. तब श्रीराम ने शास्त्रों से हटकर शरद ऋतु में ही मां दुर्गा की पूजा आरंभ की. इसे ही आकाल बोधन कहा गया यानी समय से अलग काल में देवी का आवाहन. मां दुर्गा ने श्रीराम को विजय का आशीर्वाद दिया और उसके बाद ही रावण-वध संभव हुआ. इस घटना के बाद से ही शारदीय नवरात्रि की परंपरा शुरू हुई, जो समय के साथ सबसे अधिक लोकप्रिय बन गई. चैत्र और शारदीय नवरात्र: दोनों का महत्व चैत्र नवरात्रि: इसका मूल उद्गम राजा सूरथ और समाधि वैश्य की साधना से जुड़ा है. इसे वसंत ऋतु की शुरुआत और नए साल के आरंभ (हिंदू पंचांग के अनुसार) के रूप में भी मनाया जाता है. वसंत ऋतु की शुरुआत में आता है, इसे आत्मशुद्धि और साधना का पर्व माना जाता है. शारदीय नवरात्रि: भगवान श्रीराम की पूजा और विजय की कथा से जुड़ा. यह आश्विन मास में आता है और आज भारतभर में सबसे अधिक धूमधाम से मनाया जाता है. शरद ऋतु में आने वाला यह नवरात्रि शक्ति, विजय और देवी की कृपा का प्रतीक बन गया. दोनों ही पर्व का आधार एक ही है आदिशक्ति मां दुर्गा की आराधना, लेकिन इनके स्वरूप और महत्ता समय के साथ अलग-अलग रूप में स्थापित हुए.इस तरह नवरात्रि का उद्गम चैत्र मास में हुआ, लेकिन समय के साथ शारदीय नवरात्रि सबसे बड़ी और लोकप्रिय परंपरा बन गया. यही कारण है कि आज लोग इसे शक्ति साधना, विजय और आस्था के महापर्व के रूप में मनाते हैं. इस तरह शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि व्रत की प्राचीन परंपरा राजा सूरथ और समाधि वैश्य से जुड़ी है, लेकिन शारदीय नवरात्रि की परंपरा भगवान श्रीराम ने शुरू की, जब उन्होंने रावण से युद्ध से पहले मां दुर्गा की पूजा की. यही वजह है कि आज शारदीय नवरात्रि को विजय, शक्ति और आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है.

बेहद तनाव में भी तुरंत पाएँ सुकून – अपनाएँ ये 5 असरदार उपाय

रोजाना के बिजी शेड्यूल की वजह से ज्यादा तर लोग खुद के लिए समय नहीं निकाल पाते। भागदौड़ भरी जिंदगी में बहुत से लोग तनावग्रस्त हैं। तनाव की वजह से मन अशांत रहता है और बड़े फैसले लेना मुश्किल होता है। टेंशन के बीच मन को शांत रखना सरल काम नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं है। छोटे-छोटे तरीकों को अपनाकर आप टेंशन में भी मन को शांत रख सकते हैं। जानें, मन शांत करने के 5 तरीके- गहरी सांस लेना अपनी नाक से गहरी सांस लें और फिर कुछ सेकंड के लिए रोककर रखें बाद में अपने मुंह से धीरे-धीरे सांस छोड़ें। ऐसा करते समय अपनी सांस की अनुभूति पर ध्यान केंद्रित करें। माइंडफुलनेस प्रेक्टिस आएगी काम अपने आस-पास के माहौल और शरीर की संवेदनाओं पर ध्यान दें। आप 5-4-3-2-1 तकनीक को आजमा सकते हैं। इसके लिए 5 ऐसी चीजें पहचानें जिन्हें आप देख सकते हैं, 4 ऐसी चीजें जिन्हें आप छू सकते हैं, 3 ऐसी चीजें जिन्हें आप सुन सकते हैं, 2 ऐसी चीजें जिन्हें आप सूंघ सकते हैं और 1 ऐसी चीज जिसे आप चख सकते हैं। टहलने से मिलेगी मदद टेंशन के बीच मन को शांत रखने का सबसे अच्छा तरीका है कुछ मिनटों के लिए बाहर निकलें और वॉक करें। इस दौरान अपने आस-पास के वातावरण पर ध्यान केंद्रित करें। शांत करने वाले म्यूजिक को सुनें बहुत ज्यादा टेंशन के बीच ऐसा करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। लेकिन अगर आप गलत फैसले लेने से बचना चाहते हैं तो मन शांत करने के लिए शांत करने वाले म्यूजिक को सुनें। म्यूजिक हृदय गति और ब्लडप्रेशर को कम करने में मदद कर सकता है। च्युइंग गम आएगी काम बहुत से लोग इसे खाना पसंद नहीं करते हैं लेकिन स्ट्रेस के बीच मन शांत करने में ये आपकी मदद कर सकती है। जब भी आपको तनाव महसूस हो तो च्युइंग गम चबाना शुरू कर दें। दरअसल च्युइंग गम चबाने से तनाव से जुड़े हार्मोन कोर्टिसोल के लेवल को कम करने में मदद मिलती है , जिससे यह तनाव को जल्दी से मैनेज करने में मदद करता है।

बेलन के जादू से आएगी समृद्धि, जानें कौन से उपाय हैं प्रभावी

बेलन सुनने में तो एक आम से चीज लगती है लेकिन इसके फायदे इसके नाम से भी बड़े हैं। आपको शायद सुनने में अजीब लगे लेकिन वास्तु एक्सपर्ट्स के अनुसार बेलन हमारे जीवन को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाता है। हिन्दू धर्म में ऐसी बहुत से चीजे बताई हुई हैं जो शायद ही हर व्यक्ति को पता हो। बेलन को मां अन्नपूर्णा से जोड़ा जाता है और इनके आशीर्वाद से ही हमारे जीवन की डोर जुड़ी है।  मां अन्नपूर्णा ही हमारे जीवन में सुख-समृद्धि लाने का काम करती हैं। तो चलिए ज्यादा देर न करते हुए जानते हैं कि बेलन से जुड़े उपायों से हम कैसे अपने जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। बेलन का स्थान: बेलन को हमेशा रसोई में उत्तर-पूर्व दिशा या पूर्व दिशा में रखें। यह स्थान शुभ माना जाता है और यहां रखे गए बेलन से सकारात्मक ऊर्जा निकलती है। बेलन की स्थिति: बेलन को हमेशा अपनी ओर से सही और साफ-सुथरे स्थान पर रखें। बेलन पर कभी भी दरार या टूट-फूट न होने दें। यदि बेलन में कोई दरार हो जाए तो उसे तुरंत बदल देना चाहिए क्योंकि टूटा हुआ बेलन घर में संकट लेकर आता है। बेलन की सफाई: बेलन को हमेशा साफ रखें। गंदा या खराब बेलन नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। घर में हमेशा साफ-सुथरी चीजें ही रखें। बेलन का रंग: वास्तु के अनुसार, बेलन का रंग भी महत्वपूर्ण है। सफेद, हल्का गुलाबी या प्राकृतिक लकड़ी के रंग के बेलन शुभ माने जाते हैं। अत्यधिक चमकीले या रंग-बिरंगे बेलन से बचें। रसोई में बेलन का प्रयोग: बेलन का प्रयोग नियमित रूप से करें। खाना बनाते समय इसका सही उपयोग करना घर में खुशहाली लाता है। बेलन को अनावश्यक रूप से घर के बाहर या गंदे स्थानों में न रखें। बेलन को कभी जमीन पर न रखें: बेलन को जमीन पर या फर्श पर न रखें। इसे हमेशा टेबल या किसी साफ स्थान पर रखें ताकि यह अपशिष्ट से दूर रहे। नए बेलन की पूजा करें: नया बेलन खरीदते समय उसकी पूजा करें। इसे हल्दी और कुमकुम से सजाएं और भगवान के चरणों में रखें। इससे घर में समृद्धि आती है। बेलन को दक्षिण-पश्चिम दिशा में न रखें: दक्षिण-पश्चिम दिशा में बेलन रखना अशुभ माना जाता है, क्योंकि यह दिशा घर के प्रमुख कार्यकर्ता या मुखिया से जुड़ी होती है और यहां बेलन रखने से धन की हानि हो सकती है। धन-धान्य से जुड़ी परेशानी से मुक्ति पाने के लिए खासतौर पर शुक्रवार के दिन नया चकला-बेलन खरीदें और किसी जरूरतमंद को दान दें। ऐसा करने से आपके जीवन में बेहतरीन बदलाव देखने को मिलेगा।

हाथ पर बंधा कलावा कितने दिन तक रखना शुभ होता है?

कलावा बांधना धार्मिक रूप से शुभ और मंगलकारी माना गया है, हिंदू धर्म में कलावा विशेष महत्व रखता है. कलाई पर बंधा कलावा कितने दिन बाद उतारें, जानें कलावा उतारने की विधि और धार्मिक महत्व. कलावा यानी मौली या धागा, इसे कई बार पूजा के समय बांधा जाता है. हिंदू धर्म में मौली या कलावा बांधना शुभ माना गया है. इसे पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक कार्यों के समय बांधा जाता है. कलावा बांधने से नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है. साथ ही भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है. कलावा बांधने का अर्थ है भगवान आपकी रक्षा कर रहे हैं, साथ ही सौभाग्य आएगा और देवी-देवताओं का आशीर्वाद आप पर बना रहेगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलावा को उतारने का कोई निश्चित दिन नहीं बताया गया है. यह व्यक्ति की श्रद्धा और अवसर पर निर्भर करता है. ऐसा माना जाता है किसी भी धार्मिक कार्य पूरा होने के बाद कलावा उतारा जा सकते हैं. कई बार लंबे समय तक कलावा फट जाए या गंदा हो जाने पर या टूट जाने पर इसे उतार देना चाहिए.कलावे को उतारने के बाद बहते जल या पवित्र पेड़ के पास रखना शुभ माना जाता है. ऐसा करना शुभ होता है. ध्यान रखें कलावे को किसी के पैरों में ना आने दें और ही कूड़े में फेंके. अगर आप किसी नई पूजा में बैठे हैं तो नया कलावा पहनने से पहले पुराने कलावे को जरूर उतार दें और उसके बाद नए कलावे को बंधवाना चाहिए.

श्राद्ध का आख़िरी दिन: सर्वपितृ अमावस्या पर जानें तर्पण का शुभ समय

रविवार, 21 सितंबर को पितृ पक्ष का अंतिम दिन है. श्राद्ध पक्ष के आखिरी दिन सर्व पितृ अमावस्या मनाई जाती है, जिसे आमतौर पर महालया अमावस्या भी कहते हैं. हिंदू धर्म में सर्व पितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि यह पितरों को विदाई देने का दिन होता है. पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज 15 दिनों के लिए धरती पर आते हैं और सर्व पितृ अमावस्या के दिन वापस अपने लोक लौट जाते हैं. ऐसे में इस दिन का महत्व और अधिक बढ़ जाता है. अगर आप भी अपने पितरों को सर्व पितृ अमावस्या के दिन प्रसन्न करना चाहते हैं, तो चलिए आपको बताते हैं शुभ मुहूर्त और इस अमावस्या से जुड़ी जरूरी जानकारी. सर्व पितृ अमावस्या 2025 मुहूर्त     अमावस्या तिथि शुरू – 21 सितंबर को रात 12:16 बजे.     अमावस्या तिथि समाप्त – 22 सितंबर को रात 1:23 बजे.     कुतुप मुहूर्त – 21 सितंबर को दोपहर 12:07 से दोपहर 12:56 बजे तक.     रौहिण मुहूर्त – 21 सितंबर को दोपहर 12:56 से दोपहर 1:44 बजे तक.     अपराह्न काल – 21 सितंबर को दोपहर 1:44 से शाम 4:10 बजे तक. सर्व पितृ अमावस्या का क्या महत्व है? धार्मिक मान्यता के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या पर किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितरों की आत्मा को तृप्ति और शांति मिलती है. कहते हैं कि इस दिन किए गए कर्मकांड सीधे पितृ लोक तक पहुंचते हैं, जिससे पितृ प्रसन्न होकर अपने वंशजों को लंबी उम्र, धन-धान्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. सर्व पितृ अमावस्या क्यों मनाई जाती है? सर्व पितृ अमावस्या को पितृ मोक्ष अमावस्या या सर्व मोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है. यह दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि अगर आपने अभी तक अपने पितरों का श्राद्ध नहीं किया है या उनकी श्राद्ध की तिथि पता नहीं है, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर अपने पितरों को तृप्त कर सकते हैं. ऐसा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है. सर्व पितृ अमावस्या के लिए कौन से मंत्र हैं? सर्व पितृ अमावस्या के दिन पितृ दोष से मुक्ति और पितरों को प्रसन्न करने के लिए आप नीचे दिए गए मंत्रों का जाप कर सकते हैं:-     पितृ गायत्री मंत्र:- ॐ पितृ गणाय विद्महे जगतधारिणे धीमहि तन्नो पित्रो प्रचोदयात्.     दूसरा पितृ मंत्र:- ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:.     पितृ देवता मंत्र:- ॐ पितृ देवतायै नमः. सर्वपितृ अमावस्या को क्या करना चाहिए? सर्व पितृ अमावस्या के दिन पितरों का तर्पण करने के बाद श्रद्धानुसार दान किया जाता है. सर्व पितृ अमावस्या के दिन पूजा के बाद अपनी आर्थिक स्थिति अनुसार दान करें और आप दान में अन्न, धन और कपड़े दे सकते हैं. इस दिन दान करने से व्यक्ति को अमोघ फल की प्राप्ति होती है. सर्व पितृ अमावस्या के दिन क्या दान करना चाहिए? सर्व पितृ अमावस्या के दिन अन्नदान, गौदान और वस्त्र दान का विशेष महत्व माना जाता है. सर्व पितृ अमावस्या पर ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन कराने, गुड़, चावल, गेहूं और घी का दान करने और गरीबों की सेवा करने से पितृ प्रसन्न होते हैं. सर्व पितृ अमावस्या के दिन क्या नहीं करना चाहिए? सर्व पितृ अमावस्या के दिन बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए, तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए, यात्रा और कपड़े धोने से बचना चाहिए और किसी से वाद-विवाद या मन में गलत विचार नहीं लाने चाहिए. ऐसा माना जाता है कि इन कार्यों को करने से नकारात्मक ऊर्जा आती है और शुभ फलों की प्राप्ति नहीं होती है. सर्व पितृ अमावस्या पर पितरों को खुश करने के क्या उपाय हैं? सर्व पितृ अमावस्या के दिन अपने पितरों को खुश करने के लिए पवित्र नदी में स्नान, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करें. इसके अलावा, ब्राह्मणों को भोजन कराएं और जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा दें. अमावस्या की शाम को पीपल के वृक्ष के नीचे चौमुखी दीपक जलाकर पितरों से क्षमा याचना करें और उन्हें विदाई दें.

शारदीय नवरात्रि में खास योग, रवि-अमृत और सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ मां दुर्गा का भव्य आगमन

इस साल शारदीय नवरात्रि बेहद खास रहने वाली है। आमतौर पर नवरात्रि 9 दिनों की होती है, लेकिन 2025 में यह पर्व पूरे 10 दिनों तक चलेगा। यह अद्भुत संयोग करीब 9 साल बाद बन रहा है। ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास बताते हैं कि इस बार नवरात्रि 22 सितंबर से शुरू होकर 2 अक्टूबर तक चलेगी। खास बात यह है कि इस बार तृतीया तिथि की वृद्धि हुई है, जिसकी वजह से नवरात्रि में एक अतिरिक्त दिन जुड़ गया है। किस देवी की होगी दो दिन पूजा? तृतीया तिथि दो दिन होने से इस बार मां चंद्रघंटा की पूजा लगातार 24 और 25 सितंबर को होगी। यानी भक्तों को मां के तृतीय स्वरूप की उपासना के लिए दो दिन का अवसर मिलेगा। नवरात्रि में वैसे तो नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। लेकिन इस साल भक्तों को एक अतिरिक्त दिन का सौभाग्य मिलेगा। नवरात्र में नौ दिन शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी चंद्रघंटा कूष्मांडा स्कंदमाता कात्यायनी कालरात्रि महागौरी सिद्धिदात्री नौ देवियों की पूजा हाेती हैं। 10 विधाओं में काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छित्रमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, और कमला की आराधना करते हैं। मंदिर में होगा श्रीमद् देवी भागवत कथा का आयोजन शारदीय नवरात्रों के अवसर पर श्री दुर्गा कीर्तन महिला मंडल रानियां की ओर से श्री दुर्गा कीर्तन मंदिर में श्रीमद् देवी भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा। मंदिर कमेटी उप प्रधान संजय आहूजा ने बताया कि 22 सितंबर को कथा का प्रारंभ होगा और 30 सितंबर तक चलेगी। कथा का समय शाम 5 बजे से 7 बजे तक रहेगा। रवि, अमृत व सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग संकल्प विशेष की साधना के लिए योग-संयोग का बड़ा महत्व होता है। इस बार नवरात्रि पर्व के दौरान रवि योग, अमृत सिद्धियोग, सर्वार्थ सिद्धि योग सभी रात्रि में आएंगे जो साधना उपासना की दृष्टि से विशेष माने जाते हैं। 24 व 25 सितंबर की मध्य रात में अमृत सिद्धियोग व रवि योग बनेगा। 26 और 27 सितंबर को रवि योग और 28 सितंबर को सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा। ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि जब बढ़ते क्रम में हो तो वह शुभ मानी जाती है। इस दौरान आदि शक्ति की कृपा प्राप्त करने के लिए उपासना करनी चाहिए। मां दुर्गा का आगमन हाथी पर नवरात्रि के प्रारंभ में मां दुर्गा किस वाहन पर आती हैं, यह भी बहुत शुभ संकेत देता है। इस बार नवरात्रि की शुरुआत रविवार से हो रही है, और मान्यता है कि जब नवरात्रि रविवार या सोमवार से शुरू होती है तो मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। हाथी को समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। इसका मतलब है कि इस साल नवरात्रि देश और समाज में सुख-समृद्धि और उन्नति लेकर आएगी। नवरात्रि घटस्थापना मुहूर्त अमृत मुहूर्त : सुबह 6:19 से 7:49 बजे तक शुभ मुहूर्त : सुबह 9:14 से 10:49 बजे तक अभिजीत मुहूर्त : सुबह 11:55 से 12:43 बजे तक  कलश स्थापना का विशेष महत्व है। इसे घट स्थापना भी कहते हैं, और इसी से नवरात्रि व्रतों की शुरुआत होती है। सही समय पर की गई कलश स्थापना को मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का मुख्य साधन माना जाता है। क्यों है यह नवरात्रि खास? इस बार 9 नहीं बल्कि पूरे 10 दिन तक मां दुर्गा की पूजा होगी। खासकर मां चंद्रघंटा की उपासना दो दिन तक करने का यह अद्वितीय संयोग भक्तों को दुगुना आशीर्वाद देगा। इसके साथ ही 2 अक्टूबर को विजयादशमी (दशहरा) मनाकर नवरात्रि का समापन होगा। शारदीय नवरात्रि तिथि     22 सितंबर, सोमवार : प्रतिपदा तिथि     23 सितंबर, मंगलवार : द्वितीय तिथि     24 सितंबर, बुधवार : तृतीया तिथि     25 सितंबर, गुरुवार : तृतीया तिथि     26 सितंबर, शुक्रवार : चतुर्थी तिथि     27 सितंबर, शनिवार : पंचमी तिथि     28 सितंबर, रविवार : षष्ठी तिथि     29 सितंबर, सोमवार : सप्तमी तिथि     30 सितंबर, मंगलवार : अष्टमी तिथि     01 अक्टूबर, बुधवार : नवमी तिथि     02 अक्टूबर, गुरुवार : दशहरा हरसिद्धि मंदिर में नवरात्रि में नहीं होगी शयन आरती देश के 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ हरसिद्धि मंदिर सहित अन्य देवी मंदिरों में नवरात्रि पर्व की तैयारी हो गई है। देवी आराधना का पर्व शारदीय नवरात्र 22 सितंबर से शुरू होगा। शक्ति पीठ हरसिद्धि मंदिर में परंपरा अनुसार नवरात्र के दौरान मंदिर में शयन आरती नहीं होती है। वहीं मंदिर के गर्भगृह में दर्शनार्थियों का प्रवेश बंद रहेगा। शहर में देवी के प्रसिद्ध मंदिर गढ़कालिका माता मंदिर, हरसिद्धि मातामंदिर व भूखी माता मंदिर में नवरात्रि में प्रतिदिन भक्तों के सहयोग से मंदिर के आंगन में लगी दीप मालिका प्रज्ज्वलित की जाएगी। 10 दिन रहेगी गरबों की धूम शारदीय नवरात्रि पर्व इस बार 10 दिन होने से शहर में गरबा पंडालों में दस दिन गरबा आयोजन होगा। शहर में कई स्थानों पर गरबा पंडाल बनाए गए हैं। कुछ बड़े मैदान में बने पंडाल पर भी नवरात्रि पर्व के दौरान गरबा का आयोजन प्रतिदिन होगा। गरबा प्रशिक्षण का दौर पिछले 15 दिनों से कई स्थानों पर चल रहा है।

आज का राशिफल: किस्मत देगी साथ या आएंगी चुनौतियाँ? जानें 21 सितंबर की राशियों का हाल

मेष आज आपको अपनी फीलिंग्स को कंट्रोल में रखने की जरूरत है। खर्च के कारण मन परेशान हो सकता है। आर्थिक स्थिति उतार-चढ़ाव भरी रहेगी। लव लाइफ में अच्छा समय देखने को मिलेगा। दोस्तों के साथ अच्छा समय बिताएंगे। करियर में उन्नति मिल सकती है। वृषभ आज वृषभ राशि वालों की पठन-पाठन में रुचि बढ़ेगी। लिखने पढ़ने से जुड़े कार्यों के लिए दिन अनुकूल रहने वाला है। आय में वृद्धि होगी। परिवार में सुख-शांति रहेगी। मान-सम्मान की प्राप्ति हो सकती है। आर्थिक रूप से आप बेहतर रहेंगे। मिथुन आज आपको अपनी डाइट को लेकर सतर्क रहना चाहिए। आपके परिवार में किसी सदस्य के बीमार पड़ने से आपको आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। परिवार के किसी सदस्य के व्यवहार के कारण आपका मूड खराब हो सकता है। सिंगल जातकों की किसी खास शख्स से मुलाकात होने की संभावना है। कर्क आज कर्क राशि वालों को नौकरी में अफसरों का सहयोग मिलेगा। ऑफिस में तरक्की के मार्ग प्रशस्त होंगे। कार्यक्षेत्र में बदलाव हो सकता है। परिवार से दूर किसी जगह की यात्रा करनी पड़ सकती है। व्यापारिक स्थिति मजबूत होगी। सिंह आज आपको बच्चों की सेहत को लेकर सतर्क रहना चाहिए। अपना आर्थिक पक्ष मजबूत करने के लिए कोई महत्वपूर्ण फैसला लेना पड़ सकता है। पारिवारिक तनाव आपको परेशान कर सकता है। जीवनसाथी का साथ मिलेगा। एनर्जी में वृद्धि होगी और आत्मविश्वास बढ़ेगा। कन्या आज दोस्तों की मदद से कारोबार में वृद्धि हो सकती है। परिवार के किसी सदस्य का साथ मिलने से आर्थिक स्थिरता प्राप्त होगी। आज कोई सपना पूरा करने में सफल हो सकते हैं। आपका जीवनसाथी आज आपको खुश करने की भरपूर कोशिश करेगा। व्यापार में विस्तार के योग हैं। तुला आज आपकी सेहत अच्छी रहने वाली है। दोस्तों के साथ एक अच्छी शाम बिताएंगे। आपको पैसों की अहमियत का पता चलेगा और आप पैसों की बचत करने पर जोर देंगे। आपका पार्टनर सहयोगी और मददगार रहेगा। जीवनसाथी की मदद से किसी महत्वपूर्ण काम में सफलता मिल सकती है। वृश्चिक आज आप अपने नजरिए से आसपास के लोगों को प्रभावित करेंगे। आज दूसरों की बातों में आकर निवेश करने से आर्थिक नुकसान हो सकता है। महत्वपूर्ण कार्यों को समय न देना और बेकार की बातों में अपना समय गुजारना आज आपके लिए खतरनाक हो सकता है। जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा। धनु आज आपको बेवजह मानसिक तनाव नहीं लेना चाहिए। भाई-बहन का साथ मिलेगा। आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है। वैवाहिक जीवन के लिए यह समय अच्छा रहने वाला है। किसी करीबी व्यक्ति से आपको सरप्राइज मिल सकता है। करियर में उन्नति मिल सकती है। मकर आज आपकी एनर्जी में वृद्धि होगी, जिसका प्रयोग आप महत्वपूर्ण कार्यों को पूरा करने में लगाएंगे। आपकी वित्तीय स्थिति में सुधार होगा। परिवार का साथ मिलेगा। जीवनसाथी की जरूरतें आपको मानसिक तनाव दे सकती हैं। व्यापारियों को नई पार्टनरशिप करने के मौके मिलेंगे। कुंभ आज आपका आत्मविश्वास भरपूर रहेगा। लेकिन धन की स्थिति को लेकर मन परेशान हो सकता है। नौकरी में बदलाव के मौके मिल सकते हैं। तरक्की के मार्ग प्रशस्त होंगे। आय में वृद्धि होगी। लव लाइफ बढ़िया रहेगी। बेवजह गुस्से से बचें। मीन आज मीन राशि वालों का मन परेशान हो सकता है। धैर्य के काम लें। क्रोध से बचें। माता की सेहत का ध्यान रखें। परिवार का साथ मिलेगा। शैक्षिक कार्यों में सफल रहेंगे। निवेश के अच्छे अवसरों की प्राप्ति हो सकती है। व्यापारियों को धन जुटाने में सफलता मिलेगी।

इस शारदीय नवरात्र में भारत को मिलेगी सामरिक, आर्थिक और कूटनीतिक सफलता: शुभ संकेत

उज्जैन  अश्विन शुक्ल प्रतिपदा पर 22 सितंबर को सोमवार के दिन शारदीय नवरात्र का आरंभ हो रहा है। इस बार नवरात्र नौ के बजाय दस दिन के रहेंगे। देवी आराधना के पर्वकाल में तिथि वृद्धि का यह योग विश्व पटल पर भारत को सामरिक, आर्थिक, कूटनीतिक मोर्चों पर सफलता दिलाने वाला माना जा रहा है। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार 81 साल में अब तक चार बार दस दिन के नवरात्र का योग बना है और इस योग ने हर बार भारत को विजयश्री का वरण कराया है। ज्योतिषाचार्य  ने बताया श्रीमद् भागवत देवी पुराण के अनुसार देवी दुर्गा की आराधना के नवरात्र के नौ दिन विशेष माने गए हैं। वर्षभर में चार बार नवरात्र का योग बनता है। इनमें दो गुप्त व दो प्राकट्य नवरात्र माने जाते हैं। चैत्र व अवश्विन मास की नवरात्र प्रकट तथा माघ व आषाढ़ मास के नवरात्र गुप्त नवरात्र माने गए हैं। आमतौर पर नवरात्र आठ या नौ दिन के होते हैं। लेकिन बीते 81 साल में चार बार ऐसा संयोग बना है, जब नवरात्र दस दिन के हुए हैं। अब तक ऐसा संयोग वर्ष 1944, 1971, 1998 तथा इस बार वर्ष 2025 में बनने जा रहा है। यह संयोग ही है कि जब-जब दस दिन के नवरात्र आए हैं, इसके आसपास युद्ध की स्थिति निर्मित हुई है। 1944 में विश्व युद्ध, 1971 में पड़ोसी देश से युद्ध, 1998 के बाद कारगिल वार तथा हाल ही में कुछ दिनों पहले आपरेशन सिंदूर की स्थिति निर्मित हो चुकी है। इन सभी के परिणाम किसी ना किसी दृष्टिकोण से भारत के अनुकूल रहे हैं। यह समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को सुदृढ़ करने वाला भी रहा है। पंचांग के पांच अंगों की स्थिति एक समान 81 साल में चार बार जब-जब दस दिन के नवरात्र योग बना है, पंचांग के पांच अंग तिथि,वार,योग,नक्षत्र, करण एक समान रहा है। इस बार भी अश्विन शुक्ल प्रतिपदा, सोमवार का दिन, उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र, शुक्ल योग, किंस्तुघ्न करण व कन्या राशि के चंद्रमा की साक्षी में नवरात्र का आरंभ होगा। प्रतिपदा तिथि के अधिपति अग्निदेव, सोमवार के अधिपति भगवान शिव, उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के अधिपति अर्यमा, शुक्ल योग की अधिष्ठात्री माता पार्वती तथा किंस्तुघ्न करण के स्वामी वायु देवता हैं। हर बार वैश्विक ऐतिहासिक परिवर्तन जब भी पंचांग के पांच अंगों का एक विशेष तिथि अथवा विशेष पर्वकाल के शुभारंभ पर संयुक्त योग बनता है, वह इतिहास बदल देता है। क्योंकि पंचांग के पांच अंगों का देवत्व अपनी विशिष्ट स्थितियों से यह परिवर्तन चक्र को प्रदर्शित करते हैं और आगाह करते हैं कि सावधानी के साथ सुरक्षा के आयामों को स्थापित करते हुए आगे बढ़ें। विदेश नीति में दूरदर्शिता की आवश्यकता भारत को इस समय संचार, तकनीक व सामरिक नीति के साथ साथ विदेश नीति में दूरदर्शिता रखना चाहिए। यह समय प्रतिद्वंदियों से संभलकर रहने और नए अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर चिंतन का है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक अपनी सूझबूझ से भारत पर किसी भी आर्थिक दबाव को आने नहीं दिया है। फिर भी पड़ोसी देशों से संभलकर रहने की आवश्यकता है, क्योंकि धोखे की संभावना बन सकती है।  

कल लगेगा अंतिम सूर्य ग्रहण 2025, इन राशियों पर होगा खास असर

नई दिल्ली  सूर्य ग्रहण एक अद्भुत खगोलीय घटना है। सूर्य ग्रहण तब होता है, जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है और सूर्य का कुछ या पूरा हिस्सा ढक जाता है। वहीं धार्मिक दृष्टिकोण से सूर्य ग्रहण तब होता है, जब राहु और केतु सूर्य को अपना ग्रास बना लेते हैं, जिससे कुछ समय के लिए सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाता। 21 सितंबर 2025 को साल का आखिरी सूर्य ग्रहण लगेगा। यह आंशिक सूर्य ग्रहण होगा। भारतीय समयानुसार यह ग्रहण रात 10 बजकर 59 मिनट पर शुरू होगा। मध्यकाल रात 1 बजकर 11 मिनट पर आएगा और समाप्ति सुबह 3 बजकर 23 मिनट पर होगी। हालांकि, यह खगोलीय घटना भारत में दिखाई नहीं देगी, क्योंकि उस समय भारत में रात होगी। यह ग्रहण मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध के क्षेत्रों जैसे ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अंटार्कटिका और कुछ प्रशांत द्वीपों में दिखाई देगा। चूंकि भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देगा, इसलिए सूतक नहीं लगेगा, जो आमतौर पर ग्रहण से 12 घंटे पहले लगता है। धार्मिक दृष्टि से सूर्य ग्रहण को अशुभ माना जाता है। इस समय भोजन नहीं करना, नए कार्य की शुरुआत न करना, पूजा और ध्यान करना शुभ माना जाता है। ग्रहण के दौरान तुलसी, जल, अक्षत और अन्य पवित्र वस्तुओं से तर्पण करना अत्यंत लाभकारी होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य ग्रहण का प्रभाव विभिन्न राशियों पर अलग-अलग पड़ता है। इस ग्रहण का प्रभाव विशेष रूप से सिंह, कन्या और मीन राशियों पर पड़ सकता है, जिनके लिए स्वास्थ्य और वित्तीय मामलों में सतर्क रहना आवश्यक है। अन्य राशियों के जातकों को भी ग्रहण के दौरान अनावश्यक कार्यों से बचना चाहिए। सूर्य ग्रहण के तीन प्रकार होते हैं। पहला है पूर्ण सूर्य ग्रहण, जिसमें चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह ढक देता है और दिन के समय कुछ समय के लिए अंधेरा छा जाता है। दूसरा है आंशिक सूर्य ग्रहण, जिसमें चंद्रमा केवल सूर्य के कुछ हिस्से को ढकता है। तीसरा है वृत्ताकार सूर्य ग्रहण, जिसमें चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह ढकने में छोटा रह जाता है और सूर्य के किनारों पर चमक दिखाई देती है।