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फसल विविधीकरण, किसान पंजीयन और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हुए ग्रामीण

रायपुर राज्य सरकार की योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए चलाए जा रहे सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत सूरजपुर जिले में एक विशेष शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर में कृषि, उद्यानिकी, मत्स्य पालन और स्वास्थ्य विभाग समेत विभिन्न विभागों के अधिकारियों ने ग्रामीणों को जनकल्याणकारी योजनाओं की विस्तार से जानकारी दी और उनका लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया। अधिकारियों ने योजनाओं की पात्रता, आवश्यक दस्तावेजों और आवेदन प्रक्रिया की पूरी जानकारी साझा की। कृषि एवं संबंधित विभागों की प्रमुख जानकारियां कृषक विविधीकरण एवं आदान सहायता के तहत कृषि विभाग ने बताया कि कृषक उन्नति योजना के तहत धान के स्थान पर अन्य पात्र फसलें लेने वाले किसानों को प्रति एकड़ 15 हजार रुपये की आदान सहायता राशि देने का प्रावधान है। इसके लिए डिजिटल क्रॉप सर्वे और गिरदावरी में फसल की सही प्रविष्टि होना अनिवार्य है। सिंचाई, ऋण एवं पंजीयन शिविर में श्प्रधानमंत्री आशा योजनाश् के तहत दलहन-तिलहन खरीदी, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अनुदान, कृषि यंत्रीकरण पर सब्सिडी और किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए ब्याजमुक्त ऋण की जानकारी दी गई। साथ ही, आगामी धान खरीदी में असुविधा से बचने के लिए किसानों से समय पर एग्रीस्टैक पंजीयन कराने की अपील की गई। उद्यानिकी व मत्स्य पालन उद्यानिकी विभाग ने मौसमी फसलों की खेती को अपनाने के लिए प्रेरित किया, वहीं मत्स्य विभाग ने मछली बीज वितरण पर मिलने वाले अनुदान और मत्स्य पालन के अवसरों की जानकारी दी। स्वास्थ्य विभाग और जनहितैषी योजनाएं शिविर में स्वास्थ्य सेवाओं पर विशेष जोर देते हुए आयुष्मान कार्ड बनवाने और मुफ्त उपचार का लाभ लेने की जानकारी दी गई। गर्भवती महिलाओं को जननी सुरक्षा योजना के तहत संस्थागत प्रसव कराने के लिए प्रेरित किया गया। साथ ही, सर्पदंश की स्थिति में तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुँचकर चिकित्सकीय उपचार लेने व एंटी स्नेक वेनम की उपलब्धता के बारे में बताया गया। इसके अलावा प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और जन औषधि केंद्रों की किफायती दवाइयों की भी जानकारी दी गई।

लटोरी की महिलाओं ने हस्तशिल्प को बनाया आजीविका का आधार, सूरजपति ने ऑटो और किराना व्यवसाय से हासिल की ‘लखपति दीदी’ की पहचान

रायपुर  कभी रोजगार के साधनों की कमी और आर्थिक निर्भरता ग्रामीण महिलाओं के आगे बढ़ने की राह में बड़ी चुनौती थी। आज वही महिलाएं अपने हुनर, मेहनत और हौसले से स्वरोजगार की नई राह बना रही हैं। कोई अपने हाथों के हुनर से खस की आकर्षक कलाकृतियां तैयार कर रही है, तो कोई ऑटो रिक्शा चलाने के साथ किराना दुकान संभालकर परिवार की आर्थिक ताकत बन रही है। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़ी सरगुजा की महिलाओं की ये कहानियां आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते ग्रामीण छत्तीसगढ़ की तस्वीर पेश करती हैं। सेवा संकल्प अभियान के बीच सामने आई लखनपुर विकासखंड के ग्राम लटोरी की स्व-सहायता समूह की महिलाओं और बतौली विकासखंड के ग्राम तारागी की मती सूरजपति की सफलता की कहानी बताती है कि जब महिलाओं के हुनर को प्रशिक्षण, आर्थिक सहयोग और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, तो वे अपनी मेहनत से परिवार की परिस्थितियां बदलने के साथ समाज में अपनी अलग पहचान भी बना सकती हैं। एक ओर लटोरी की 20 महिलाएं हस्तशिल्प के अपने हुनर को बाजार से जोड़कर आजीविका की नई राह पर आगे बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर सूरजपति ने समूह से मिले 60 हजार रुपये के ऋण को अपनी मेहनत से दो व्यवसायों में बदल दिया। आज ऑटो रिक्शा और किराना दुकान से होने वाली आय ने उन्हें ‘लखपति दीदी’ की पहचान दिलाई है। हुनर को मिला प्रशिक्षण, हाथों को मिला रोजगार लखनपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत लटोरी की महामाया और रेखा स्व-सहायता समूह से जुड़ी 20 महिलाओं ने दिखाया है कि हाथों के हुनर को सही प्रशिक्षण और अवसर मिले तो वही हुनर आजीविका का मजबूत आधार बन सकता है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत इन महिलाओं को हस्तशिल्प बोर्ड के माध्यम से विशेष प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने खस से आकर्षक और पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार करना शुरू किया। उनके हाथों से कलात्मक डलिया, टोकरी, सजावटी गुलदस्ते, पूजा की ट्रे और फ्रूट बास्केट जैसे विभिन्न उत्पाद आकार ले रहे हैं। स्थानीय स्तर पर तैयार ये उत्पाद पर्यावरण अनुकूल होने के साथ महिलाओं की रचनात्मकता और कौशल की पहचान भी बन रहे हैं। बाजार में इन उत्पादों की मांग ने महिलाओं को अपने हुनर को आजीविका में बदलने का अवसर दिया है। अब उनके हाथों से तैयार उत्पाद घर की चौखट से निकलकर बाजार तक पहुंच रहे हैं और परिवार की आय में योगदान दे रहे हैं। ‘पहले रोजगार नहीं था, अब अपना काम है’ रेखा महिला स्व-सहायता समूह की सदस्य मती कौशल्या राजवाड़े के लिए यह बदलाव विशेष मायने रखता है। उनके अनुसार पहले उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं था। बिहान से जुड़ने और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण मिलने के बाद आज उनके पास अपना काम और आय अर्जित करने का अवसर है। कौशल्या और समूह की अन्य महिलाओं की आकांक्षाएं अब केवल उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं हैं। वे अपने व्यवसाय को और आगे बढ़ाना चाहती हैं। उनका सपना है कि उनके हाथों से तैयार उत्पादों की पहचान गांव से निकलकर बड़े बाजारों तक पहुंचे और उनके गांव का नाम भी रोशन हो। उनकी यह आकांक्षा बताती है कि स्व-सहायता समूह महिलाओं को केवल आर्थिक गतिविधियों से नहीं जोड़ते, बल्कि उन्हें बड़े सपने देखने और उन सपनों को अपनी मेहनत से पूरा करने का आत्मविश्वास भी देते हैं। सूरजपति ने 60 हजार रुपये के ऋण को बनाया आत्मनिर्भरता की पूंजी बतौली विकासखंड के ग्राम तारागी की मती सूरजपति की कहानी बिहान से मिले अवसर को मेहनत के बल पर सफलता में बदलने का उदाहरण है। कभी आर्थिक तंगी और आय के स्थायी साधन के अभाव से जूझ रहीं सूरजपति वर्ष 2020 में बिहान के स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से उन्हें मार्गदर्शन के साथ आर्थिक सहयोग का रास्ता मिला। उन्होंने 60 हजार रुपये का ऋण लिया और इसे केवल घरेलू खर्च में उपयोग करने के बजाय अपने भविष्य की पूंजी बनाया। सूरजपति ने ऑटो रिक्शा संचालन शुरू किया और साथ ही किराना दुकान भी स्थापित की। एक ही आय स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय उन्होंने दो अलग-अलग आजीविका गतिविधियों को अपनाया। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और दोनों व्यवसाय उनके परिवार की आर्थिक मजबूती का आधार बन गए। 500 रुपये प्रतिदिन की आय, बनीं ‘लखपति दीदी’ आज सूरजपति को किराना दुकान से लगभग 200 रुपये प्रतिदिन और ऑटो रिक्शा संचालन से लगभग 300 रुपये प्रतिदिन की आय हो रही है। दोनों व्यवसायों से उनकी कुल दैनिक आय लगभग 500 रुपये है और वार्षिक आय लगभग 1.80 लाख रुपये तक पहुंच गई है। कभी आर्थिक तंगी से जूझने वाली सूरजपति आज ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी नई पहचान बना चुकी हैं। यह उपलब्धि उनके लिए केवल आय का आंकड़ा नहीं है। आज वे परिवार के पालन-पोषण में आर्थिक रूप से मजबूत भागीदारी निभा रही हैं और अपने भविष्य के संबंध में स्वयं निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी हासिल कर चुकी हैं। 60 हजार रुपये के ऋण से शुरू हुआ उनका सफर बताता है कि आर्थिक सहयोग को जब सही योजना, मेहनत और निरंतर प्रयास से जोड़ा जाता है तो छोटी शुरुआत भी आत्मनिर्भरता की बड़ी कहानी बन सकती है। एक ओर हस्तशिल्प, दूसरी ओर ऑटो और किराना—मंजिल एक, आत्मनिर्भरता लटोरी की 20 महिलाओं और सूरजपति की आजीविका के रास्ते अलग-अलग हैं, लेकिन मंजिल एक है—आर्थिक आत्मनिर्भरता। लटोरी की महिलाओं ने प्रशिक्षण लेकर हस्तशिल्प को रोजगार से जोड़ा। स्थानीय संसाधनों और अपने हुनर का उपयोग कर उन्होंने पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार किए और बाजार तक पहुंचने की दिशा में कदम बढ़ाए। दूसरी ओर सूरजपति ने समूह से मिले ऋण को पूंजी बनाकर ऑटो रिक्शा और किराना दुकान के रूप में आय के दो स्रोत विकसित किए। इन दोनों कहानियों में बिहान की भूमिका केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। संगठन, प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और वित्तीय सहयोग के माध्यम से महिलाओं को अपनी क्षमता पहचानने और उसे आजीविका में बदलने का अवसर मिला है। महिला की कमाई से मजबूत हो रहा परिवार, बढ़ रहा आत्मविश्वास जब कोई महिला स्वयं आय अर्जित करती है तो इसका प्रभाव केवल उसकी आर्थिक स्थिति पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरे परिवार के जीवन में दिखाई देता है। परिवार की जरूरतों को पूरा करने, बच्चों के भविष्य की योजना … Read more

पीडब्लूडी में 164 सहायक अभियंताओं सहित कुल 265 अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले

रायपुर प्रशासनिक कसावट और कार्यों में तेजी लाने लोक निर्माण विभाग द्वारा 265 अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले किए गए हैं। इनमें 142 सहायक अभियंता (सिविल), 22 सहायक अभियंता (वि/यां), 71 सहायक मानचित्रकार (सिविल), 10 अनुरेखक (सिविल) और 20 डॉटा एंट्री ऑपरेटर शामिल हैं।

समूह से मिला एक लाख रुपये का सहारा, दुकान और ठेले से आत्मनिर्भर बनीं लाजो

रायपुर खेती-बाड़ी का कोई साधन नहीं और चार सदस्यीय परिवार की जिम्मेदारी के बीच सरगुजा जिले की लाजो ने स्वरोजगार को अपनी आजीविका का आधार बनाया है। स्व-सहायता समूह से मिले एक लाख रुपये के ऋण ने उन्हें स्वयं का काम शुरू करने का अवसर दिया। उन्होंने इस राशि से दुकान और ठेले का व्यवसाय शुरू किया और आज इसी से होने वाली आमदनी के सहारे परिवार की जरूरतें पूरी करने के साथ समूह से लिए ऋण की मूल राशि और ब्याज भी चुका रही हैं। अम्बिकापुर विकासखंड के ग्राम लिबरा निवासी लाजो की यह कहानी बताती है कि स्व-सहायता समूहों के माध्यम से मिलने वाला आर्थिक सहयोग ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़कर आत्मनिर्भरता की राह दिखा सकता है। खेती का साधन नहीं होने के बावजूद लाजो ने अपनी मेहनत से आय का जरिया तैयार किया और आज वे अपने पैरों पर खड़ी होकर परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। एक लाख रुपये के ऋण से शुरू किया अपना व्यवसाय लाजो बताती हैं कि उनके पास खेती-बाड़ी नहीं है। ऐसे में परिवार के भरण-पोषण के लिए नियमित आमदनी का साधन जुटाना जरूरी था। स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें एक लाख रुपये का ऋण मिला। इस राशि का उपयोग उन्होंने अपना छोटा व्यवसाय शुरू करने में किया। लाजो ने दुकान के साथ ठेला भी शुरू किया। धीरे-धीरे व्यवसाय से आमदनी होने लगी और परिवार के लिए नियमित आय का रास्ता बना। अब इसी कमाई से वे घर के जरूरी खर्च पूरे कर रही हैं और अपने व्यवसाय को भी आगे बढ़ा रही हैं। चार सदस्यीय परिवार के लिए बनीं मजबूत सहारा लाजो के परिवार में चार सदस्य हैं। खेती-बाड़ी नहीं होने के कारण उनके व्यवसाय से होने वाली कमाई परिवार की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण सहारा बन गई है। वे बताती हैं कि ठेले और दुकान से होने वाली आय से घर का खर्च चलाने में मदद मिल रही है। स्वरोजगार ने उन्हें परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां संभालने के साथ आत्मनिर्भर बनने का भरोसा भी दिया है। नियमित रूप से व्यवसाय चलाते हुए वे अपनी आय से परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर रही हैं। परिवार भी संभाला, ऋण की जिम्मेदारी भी निभा रहीं लाजो की सफलता की खास बात यह है कि व्यवसाय से होने वाली आमदनी से वे केवल परिवार का भरण-पोषण ही नहीं कर रहीं, बल्कि समूह से लिए गए ऋण की मूल राशि और ब्याज का भुगतान भी कर रही हैं। इससे उनका व्यवसाय आर्थिक अनुशासन और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लाजो का कहना है कि उनका व्यवसाय अच्छी तरह चल रहा है और इससे उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिला है। समूह से मिली सहायता ने उन्हें किसी दूसरे आय के साधन पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं का काम शुरू करने का रास्ता दिया। समूह की मदद से आत्मनिर्भरता की राह हुई आसान स्व-सहायता समूह से मिला एक लाख रुपये का ऋण लाजो के लिए केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि स्वयं की आजीविका खड़ी करने का अवसर साबित हुआ। खेती का साधन नहीं होने के बावजूद उन्होंने स्वरोजगार को अपनाकर परिवार के लिए आय का स्रोत तैयार किया। लाजो ने इस सहयोग के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि समूह से मिली मदद के कारण वे आज अपने परिवार का भरण-पोषण कर पा रही हैं और आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ी हैं। उनकी कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि समूह से मिले अवसर और स्वयं की मेहनत से स्वरोजगार को परिवार की आजीविका का मजबूत आधार बनाया जा सकता है।

पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर दिया डिजिटल सशक्तिकरण का संदेश

रायपुर  सेवा संकल्प अभियान के तहत जशपुर के रणजीता स्टेडियम में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया के विजन को आकर्षक रंगोली के माध्यम से साकार किया गया। रंगों और रचनात्मकता के अनूठे संगम से तैयार इस विशाल रंगोली में डिजिटल तकनीक के जरिए सशक्त, आत्मनिर्भर और आधुनिक भारत की परिकल्पना को कलात्मक रूप से उकेरा गया। डिजिटल कनेक्टिविटी और ई-गवर्नेंस के साथ ही भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास का संदेश भी रंगोली का विशेष आकर्षण रहा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री  राजेश अग्रवाल ने रणजीता स्टेडियम पहुंचकर रंगोली का अवलोकन किया और इसके चारों ओर दीप प्रज्वलित कर अपनी सहभागिता निभाई। दीपों की रोशनी से जगमगाती रंगोली ने डिजिटल भारत की बदलती तस्वीर को और आकर्षक बना दिया। इस अवसर पर विधायक मती रायमुनी भगत भी उपस्थित रहीं। पर्यटन मंत्री  राजेश अग्रवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डिजिटल इंडिया ने देश में विकास और सुशासन को नई गति दी है। तकनीक के विस्तार से आज शासन की सेवाएं नागरिकों की पहुंच में आई हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग सहित अनेक क्षेत्रों में सुविधाएं अधिक सहज और सुलभ हुई हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल कनेक्टिविटी केवल तकनीकी प्रगति का माध्यम नहीं, बल्कि देश के अंतिम व्यक्ति को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की एक सशक्त कड़ी है। प्रधानमंत्री  मोदी का डिजिटल इंडिया का विजन आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। रंगोली में दिखी डिजिटल भारत की पूरी तस्वीर रंगोली के मध्य में ‘डिजिटल इंडिया’ का संदेश प्रमुखता से उकेरा गया। इसके ऊपर बनाया गया वाई-फाई का प्रतीक देश में बढ़ती डिजिटल कनेक्टिविटी और इंटरनेट की पहुंच को प्रदर्शित करता है। कंप्यूटर और क्लाउड तकनीक के चित्रों के माध्यम से डिजिटल सेवाओं, ऑनलाइन जानकारी और आधुनिक तकनीकी संसाधनों को दर्शाया गया, जबकि मोबाइल फोन और सरकारी भवन के चित्रों ने ई-गवर्नेंस तथा नागरिकों तक डिजिटल माध्यम से पहुंचती शासकीय सेवाओं की तस्वीर प्रस्तुत की। रंगोली में भारत के मानचित्र को दोनों हाथों से थामे हुए चित्र के माध्यम से तकनीक से सशक्त होते भारत और प्रत्येक नागरिक को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की भावना को अभिव्यक्त किया गया। मानचित्र के भीतर विभिन्न रंगों में बनाई गई डिजिटल लाइनें देश के अलग-अलग हिस्सों को तकनीक और संचार के माध्यम से आपस में जोड़ने का प्रतीक बनीं। इसके साथ ही हरी पत्तियों और पौधे की आकृति के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि आधुनिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ‘कनेक्टेड इंडिया, स्ट्रॉन्गर इंडिया’ का दिया संदेश रंगोली के नीचे अंकित ‘कनेक्टेड इंडिया, स्ट्रॉन्गर इंडिया’ का संदेश डिजिटल रूप से जुड़े नागरिकों के माध्यम से सशक्त भारत के निर्माण की परिकल्पना को सामने लाया। रंगोली के चारों ओर प्रज्वलित दीप भारतीय संस्कृति, ज्ञान, प्रकाश और सकारात्मकता के प्रतीक बने। रंगों और दीपों के इस अनूठे संगम ने डिजिटल जागरूकता की रोशनी से डिजिटल दूरी को कम कर नए अवसरों की ओर आगे बढ़ने का संदेश दिया। रणजीता स्टेडियम में तैयार इस रंगोली के माध्यम से डिजिटल कनेक्टिविटी, तकनीकी सशक्तिकरण, ई-गवर्नेंस, सुशासन, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को एक ही कलाकृति में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर नगर पालिका अध्यक्ष  अरविंद भगत, जनपद पंचायत अध्यक्ष  गंगाराम भगत,  कलेक्टर  रोहित व्यास, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. लाल उमेद सिंह, जिला पंचायत सीईओ  अभिषेक कुमार सहित जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उपस्थित रहे।

किराए के दो कमरों से सुविधायुक्त भवन तक, भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र को मिला अपना घर

रायपुर कभी किराए के मकान के महज दो छोटे कमरों में संचालित होने वाला सरगुजा जिले का भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र आज अपने नए और सुविधायुक्त भवन में बच्चों की किलकारियों से गुलजार है। जहां पहले सीमित जगह के कारण बच्चों को बैठने, सीखने और खेल-कूद की गतिविधियों में परेशानी होती थी, वहीं अब रंग-बिरंगे शैक्षणिक चित्रों से सजे भवन में नौनिहाल खेल-खेल में सीख रहे हैं। पर्याप्त जगह मिलने से पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और अन्य गतिविधियों का संचालन भी अधिक व्यवस्थित ढंग से हो रहा है। विकसित भारत-जी राम जी योजना के तहत अम्बिकापुर विकासखंड की ग्राम पंचायत चठिरमा के बढ़निझरिया ग्राम में 11.69 लाख रुपये की लागत से नए आंगनबाड़ी भवन का निर्माण किया गया है। नया भवन बच्चों के साथ गर्भवती और शिशुवती माताओं के लिए भी बेहतर सुविधाओं का केंद्र बना है। भवन निर्माण ने स्थानीय ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर भी तैयार किए और कार्य के दौरान कुल 439 मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ। सेवा संकल्प अभियान के बीच भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र में आया यह बदलाव बताता है कि गांव में तैयार होने वाली एक अधोसंरचना किस तरह बच्चों की शिक्षा और पोषण, माताओं की देखभाल तथा स्थानीय ग्रामीणों के रोजगार जैसी कई जरूरतों को एक साथ मजबूती दे सकती है। दो छोटे कमरों की परेशानी से मिली मुक्ति पहले भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र किराए के भवन के केवल दो छोटे कमरों में संचालित होता था। सीमित जगह में बच्चों के बैठने से लेकर प्रारंभिक शिक्षा और खेल-कूद की गतिविधियां संचालित करने तक कई व्यावहारिक कठिनाइयां आती थीं। नए भवन ने इन परिस्थितियों को बदल दिया है। बच्चों को अब गतिविधियों के लिए पर्याप्त स्थान मिल रहा है और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी पोषण, प्रारंभिक शिक्षा एवं अन्य गतिविधियों को बेहतर ढंग से संचालित कर पा रही हैं। अपना भवन मिलने से केंद्र की सेवाओं के लिए स्थायी और सुविधाजनक स्थान उपलब्ध हुआ है। 60 बच्चों के साथ गर्भवती और शिशुवती माताओं को मिल रहीं सेवाएं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती सुमित्रा व्यापारी बताती हैं कि वर्तमान में केंद्र से कुल 60 बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं। इनमें 3 से 6 वर्ष आयु वर्ग के 22 बच्चे तथा 6 माह से 3 वर्ष आयु वर्ग के 38 बच्चे शामिल हैं। इसके साथ ही 8 शिशुवती और 9 गर्भवती माताएं भी केंद्र की सेवाओं से जुड़ी हुई हैं। बच्चों को नियमित रूप से पोषण आहार उपलब्ध कराया जा रहा है। वहीं गर्भवती और शिशुवती माताओं को पूरक पोषण आहार के साथ पोषण, स्वास्थ्य और स्वच्छता से संबंधित आवश्यक जानकारी भी दी जा रही है। इस तरह नया भवन बच्चों के पोषण और प्रारंभिक शिक्षा के साथ मातृ-शिशु देखभाल से जुड़ी सेवाओं के संचालन का भी बेहतर माध्यम बना है। रंग-बिरंगी दीवारें बनीं बच्चों की पहली पाठशाला नए आंगनबाड़ी भवन की दीवारों पर बने अक्षर, शिक्षाप्रद चित्र और आकर्षक कार्टून बच्चों को सहज रूप से अपनी ओर आकर्षित करते हैं। रंगों और चित्रों से सजा वातावरण नौनिहालों के लिए सीखने की प्रक्रिया को रोचक बना रहा है। अब बच्चे पर्याप्त जगह में बैठकर सीख सकते हैं, खेल सकते हैं और सामूहिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं। आंगनबाड़ी का यह नया स्वरूप बच्चों के लिए केवल पोषण प्राप्त करने का स्थान नहीं, बल्कि खेल, सीख और आनंद से जुड़ी उनकी पहली पाठशाला के रूप में विकसित हो रहा है। भवन बना तो गांव में रोजगार भी आया नए आंगनबाड़ी भवन के निर्माण ने बच्चों और माताओं के लिए बेहतर सुविधा तैयार करने के साथ स्थानीय ग्रामीणों के लिए रोजगार भी उपलब्ध कराया। निर्माण कार्य के दौरान कुल 439 मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ। इस तरह गांव में एक स्थायी परिसंपत्ति के निर्माण के साथ स्थानीय परिवारों को गांव में ही काम मिला। अधोसंरचना निर्माण और ग्रामीण रोजगार का यह जुड़ाव विकास के दोहरे लाभ को सामने लाता है। एक भवन से बदली बच्चों और माताओं की सुविधा की तस्वीर भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र में आया बदलाव केवल पुराने किराए के कमरों से नए भवन तक पहुंचने की कहानी नहीं है। यह बच्चों को बेहतर वातावरण, माताओं को जरूरी सेवाएं और ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने की संयुक्त तस्वीर है। कभी दो छोटे कमरों में सीमित आंगनबाड़ी गतिविधियां आज सुविधायुक्त भवन में विस्तार पा रही हैं। बच्चों के लिए खेलने और सीखने की जगह है, माताओं के लिए पोषण और स्वास्थ्य संबंधी मार्गदर्शन है और गांव के लिए एक स्थायी सार्वजनिक परिसंपत्ति तैयार हुई है। सेवा संकल्प अभियान के बीच भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र की यह कहानी बताती है कि जब विकास की सुविधा गांव तक पहुंचती है, तो उसका प्रभाव केवल एक भवन तक सीमित नहीं रहता—उसमें बच्चों के बेहतर बचपन, माताओं की बेहतर देखभाल और ग्रामीण परिवारों की आजीविका की उम्मीद भी जुड़ जाती है।

कार्यो में तेजी लाने और 15 दिनों में कमियां दूर करने के दिए निर्देश

रायपुर नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने आज बिलासपुर के सकरी में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत निर्मित आवासों और कोनी में पीएम ई-बस सेवा के लिए निर्माणाधीन टर्मिनल एवं चार्जिंग स्टेशन का निरीक्षण किया। उन्होंने दोनों परियोजनाओं की प्रगति एवं निर्माण की गुणवत्ता का जायजा लिया और अधिकारियों को कमियां दूर कर कार्यों में तेजी लाने के निर्देश दिए। सूडा के सीईओ सुमित अग्रवाल और बिलासपुर नगर निगम के आयुक्त प्रकाश कुमार सर्वे सहित निगम के वरिष्ठ अधिकारी भी निरीक्षण के दौरान मौजूद थे। प्रमुख सचिव बोरा ने सकरी में प्रधानमंत्री आवास योजना के एएचपी घटक के तहत बनाए गए आवासों के निरीक्षण के दौरान फ्लोर पर टाइल्स नहीं लगे होने और फिनिशिंग कार्य अधूरा मिलने पर नाराजगी जताई। उन्होंने नगर निगम के इंजीनियरों तथा निर्माण एजेंसीज को कमियों में तत्काल सुधार करते हुए फिनिशिंग कार्य शीघ्र पूरा करने के निर्देश दिए। उन्होंने किचन और प्लेटफॉर्म के आकार को लेकर भी अधिकारियों से सवाल-जवाब किए तथा निर्माण में उपयोग की गई सामग्री एवं अब तक हुए कार्यों की जानकारी ली। श्री बोरा ने आवासीय परिसर में बाउंड्रीवाल निर्माण के लिए प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने परिसर में साफ-सफाई की समुचित व्यवस्था करने, लोगों के बैठने के लिए कुर्सियां लगाने और बच्चों के लिए खेल क्षेत्र विकसित करने को कहा। प्रमुख सचिव ने शेष कार्यों में तेजी लाने के निर्देश देते हुए 15 दिनों बाद प्रगति की पुनः समीक्षा करने की बात कही। सकरी में करीब 11 करोड़ 75 लाख रुपए की लागत से 261 आवास तैयार किए गए हैं, जिनमें अंतिम चरण के फिनिशिंग कार्य शेष हैं। प्रमुख सचिव बोरा ने कोनी स्थित सिटी बस डिपो पहुंचकर पीएम ई-बस सेवा के तहत निर्माणाधीन टर्मिनल कॉम्प्लेक्स, सब-स्टेशन एवं चार्जिंग स्टेशन का निरीक्षण कर निर्माण कार्यों की प्रगति की जानकारी ली। उन्होंने बसों के लिए बनाए गए स्टॉप को व्यवस्थित करने और वहां डिस्प्ले बोर्ड लगाने के निर्देश दिए, ताकि यात्रियों को बसों के समय एवं आवागमन की जानकारी आसानी से मिल सके। पीएम ई-बस सेवा के तहत बिलासपुर में 50 वातानुकूलित इलेक्ट्रिक बसें संचालित की जाएंगी। इनमें 9 मीटर की 35 और 7 मीटर की 15 बसें शामिल हैं। इन बसों का संचालन शहर के 12 मार्गों पर किया जाएगा। मार्ग निर्धारण में स्कूल, कॉलेज, औद्योगिक एवं व्यावसायिक क्षेत्र, पर्यटन स्थल तथा उच्च न्यायालय तक आवागमन की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। ई-बसों के संचालन के लिए कोनी स्थित सिटी बस डिपो में टर्मिनल कॉम्प्लेक्स, सब-स्टेशन एवं चार्जिंग स्टेशन के निर्माण के लिए 11 करोड़ 45 लाख रुपए स्वीकृत किए गए हैं। इसमें सिविल अधोसंरचना निर्माण के लिए 8 करोड़ 37 लाख रुपए, सब-स्टेशन के लिए 1 करोड़ 59 लाख रुपए तथा उच्च दाब विद्युत कनेक्शन के लिए 1 करोड़ 49 लाख रुपए का प्रावधान है। वर्तमान में सिविल अधोसंरचना निर्माण का लगभग 70 प्रतिशत और सब-स्टेशन निर्माण का 80 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। उच्च दाब विद्युत कनेक्शन के लिए आवश्यक अधोसंरचना का निर्माण सीएसपीडीसीएल द्वारा किया जाएगा। यात्रियों की सुविधा के लिए टर्मिनल कॉम्प्लेक्स में कैफेटेरिया एवं रैनबसेरा विकसित करने की भी योजना है।

रायपुर में ‘कहानीकार’ दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन, विभिन्न जिलों के शासकीय विद्यालयों के शिक्षक हो रहे शामिल

रायपुर बच्चों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, जिज्ञासा, रचनात्मक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के उद्देश्य से राजधानी रायपुर में विद्यालयीन शिक्षकों के लिए दो दिवसीय ‘कहानीकार’ कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। 6 एवं 7 अक्टूबर को आयोजित इस कार्यशाला में कला, कहानी और स्थानीय अनुभवों को शिक्षण से जोड़कर बच्चों को प्रकृति एवं पर्यावरण को समझने के लिए प्रेरित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। आईआईएसईआर पुणे के केयर प्रोजेक्ट, समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़, यूनिसेफ और छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर, रायपुर के संयुक्त सहयोग से आयोजित कार्यशाला की थीम ‘आर्ट ऐस स्टोरी, स्टोरी ऐस नॉलेज, नॉलेज ऐस एक्शन’ रखी गई है। कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न जिलों के शासकीय विद्यालयों के शिक्षक भाग ले रहे हैं।       कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर छत्तीसगढ़ साइंस सेंटर के महानिदेशक  पी. कवीश्वर ने कहा कि कहानी बच्चों को केवल जानकारी देने का माध्यम नहीं, बल्कि उन्हें अपने आसपास की दुनिया को देखने, समझने और उस पर स्वतंत्र रूप से विचार करने के लिए प्रेरित करने का प्रभावी माध्यम है। बच्चों को अपने आसपास की प्रकृति का स्वयं अवलोकन करने, प्रश्न पूछने और अपने अनुभवों को कहानी के रूप में अभिव्यक्त करने के अवसर मिलने चाहिए। इससे सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और अर्थपूर्ण होती है तथा उनमें पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है। भारत के पहले द्विभाषी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ का विमोचन कार्यशाला के दौरान बच्चों के लिए तैयार भारत के पहले द्विभाषी हिंदी-अंग्रेजी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ का भी विमोचन किया गया। ‘जुगनू’ को आईआईएसईआर पुणे के केयर प्रोजेक्ट के एक्शन रिसर्च के माध्यम से विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य बच्चों को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण जैसे विषयों को सहज एवं रचनात्मक तरीके से समझने और अपनी बात अभिव्यक्त करने के लिए मंच उपलब्ध कराना है। केयर प्रोजेक्ट की प्रोजेक्ट लीड एवं ‘जुगनू’ की पब्लिशर डॉ. शालिनी शर्मा ने बताया कि इसके माध्यम से देशभर के विद्यालयीन शिक्षकों और बच्चों की कहानियों एवं रचनात्मक सामग्री को मंच प्रदान करने की परिकल्पना की गई है। इसमें स्थानीय परिवेश, प्रकृति, पर्यावरण और जलवायु से जुड़े बच्चों एवं शिक्षकों के अनुभवों और विचारों को स्थान मिलेगा। उन्होंने बताया कि ‘जुगनू’ का उद्देश्य बच्चों में जलवायु परिवर्तन को लेकर केवल चिंता या भय पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने आसपास के पर्यावरण को देखने-समझने, प्रश्न पूछने, अपनी आवाज अभिव्यक्त करने और सकारात्मक बदलाव के लिए पहल करने हेतु प्रेरित करना है। ‘लेट अस टर्न इको-एंग्जायटी इन टू इको-एजेंसी’ की भावना के साथ यह पहल बच्चों को पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति संवेदनशील और समाधान की दिशा में सक्रिय बनने के लिए प्रोत्साहित करेगी। पर्यावरणीय संवेदनशीलता को बचपन से संस्कार का हिस्सा बनाना जरूरी        छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर की सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर मती प्रज्ञा कदम ने कहा कि कहानी बच्चों के विचारों, संवेदनाओं और दृष्टिकोण को विकसित करने का सशक्त माध्यम है। बचपन से ही बच्चों को प्रकृति और पर्यावरण को देखने, समझने और उससे जुड़ने के अवसर दिए जाएं तो उनमें पर्यावरण संरक्षण की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।  उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय संवेदनशीलता को केवल पाठ्यक्रम का विषय न रखकर बच्चों के दैनिक जीवन और संस्कार का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। कहानी, कला और स्थानीय अनुभवों के माध्यम से बच्चों को प्रकृति से जोड़ने से उनमें जिज्ञासा, अवलोकन क्षमता, स्वतंत्र विचार और जिम्मेदारी की भावना विकसित की जा सकती है। अनुभवात्मक और रचनात्मक शिक्षण के तरीके सीख रहे शिक्षक दो दिवसीय कार्यशाला में कला, कहानी और स्थानीय जलवायु अनुभवों पर आधारित विभिन्न गतिविधिपरक सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें शिक्षक अपने स्थानीय परिवेश, प्रकृति, समुदाय और पर्यावरण से जुड़े अनुभवों को कहानी एवं कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं। कार्यशाला के माध्यम से शिक्षकों को ऐसे रचनात्मक शिक्षण उपकरणों से परिचित कराया जा रहा है, जिनका उपयोग कर वे विद्यार्थियों को केवल जानकारी देने के बजाय स्वयं अवलोकन करने, प्रश्न पूछने, विचार करने, अनुभव साझा करने और समाधान तलाशने के लिए प्रेरित कर सकें। कार्यशाला में विकसित कहानियों और गतिविधियों का आगे कक्षा-कक्ष में शिक्षण-अधिगम के प्रभावी संसाधन के रूप में उपयोग किया जा सकेगा। छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से आए शासकीय विद्यालयों के शिक्षक इसमें उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं।

अरपा नदी प्रदूषण पर हाईकोर्ट का सवाल, 70 नालों के लिए सिर्फ 4 STP क्यों?

बिलासपुर. बिलासपुर में सीवरेज प्रबंधन और अरपा नदी में हो रहे प्रदूषण को रोकने हाईकोर्ट ने नगर निगम से विस्तृत कार्ययोजना मांगी है। चीफ जस्टिस कृष्ण राम महापात्र, जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शासन को नया एफिडेविट प्रस्तुत कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्या सिर्फ 4 एसटीपी से 70 नालों का पानी साफ हो जाएगा? चीफ सेक्रेटरी विकासशील ने इस बारे में हाईकोर्ट में शपथ पत्र प्रस्तुत कर कहा कि फिलहाल सभी एसटीपी पूरे होने वाले हैं। इसके बाद कितना गंदा पानी इनसे साफ होगा, इसकी समीक्षा की जाएगी। इसके बाद ही बताया जा सकता है कि और एसटीपी की जरूरत है या नहीं। हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को तय की है। अरपा नदी के संरक्षण और संवर्धन मामले में डिवीजन बेंच के समक्ष शासन की ओर से प्रस्तुत एफिडेविट के अनुसार, बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र की आबादी करीब 6 लाख 68 हजार 540 है और प्रतिदिन लगभग 72.20 एमएलडी सीवरेज उत्पन्न होता है। इसे सीवरेज नेटवर्क और करीब 70 नालों के माध्यम से चैनलाइज किया जाता है। कोर्ट ने मांगी ये जानकारी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी जानकारी मांगी कि अतिरिक्त एसटीपी जरूरी हैं तो शासन को उनकी क्षमता, स्थान, निर्माण की समय-सीमा और अरपा नदी में पानी छोड़े जाने से पहले पूर्ण ट्रीटमेंट सुनिश्चित करने के उपायों की जानकारी भी देनी होगी। शासन के अनुसार, वर्तमान में चार सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट संचालित हैं, जिनकी कुल क्षमता 78 एमएलडी है, जबकि इनका वास्तविक उपयोग करीब 43.90 एमएलडी हो रहा है। एफिडेविट में बताया गया कि 16 एमएलडी क्षमता के दो और एसटीपी निर्माणाधीन हैं। इनमें से एक ट्रायल रन के चरण में है, जबकि दूसरे के 31 दिसंबर 2026 तक पूरा होने की संभावना है। दोनों के चालू होने के बाद शहर की कुल सीवरेज ट्रीटमेंट क्षमता 94 एमएलडी हो जाएगी, जो वर्तमान अनुमानित सीवरेज उत्पादन 72.20 एमएलडी से अधिक है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रशासन से पूछा कि शहर के सभी नालों का सीवरेज का पानी वास्तव में एसटीपी तक पहुंच रहा है या नहीं। डिवीजन बेंच ने अतिरिक्त मुख्य सचिव, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, छत्तीसगढ़ शासन को नया एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। एफिडेविट में विशेष रूप से बताना होगा कि नगर निगम क्षेत्र के सभी 70 नाले, निर्माणाधीन दो एसटीपी समेत उपलब्ध छह एसटीपी से कवर और कनेक्टेड हैं या नहीं तथा प्रत्येक नाले से निकलने वाले सीवरेज को प्रभावी ढंग से इंटरसेप्ट, डायवर्ट और ट्रीट किया जा रहा है या नहीं।

अपने घर का सपना हुआ साकार, रागिनी के परिवार को मिला खुशियों का आशियाना

रायपुर अपना घर केवल चार दीवारों का निर्माण नहीं, बल्कि हर परिवार के लिए सुरक्षा, स्थायित्व और बेहतर भविष्य का आधार होता है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा नागरिकों को बेहतर आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराने और आम परिवारों के अपने घर के सपने को साकार करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। वित्त, आवास एवं पर्यावरण मंत्री श्री ओ.पी. चौधरी के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ गृह निर्माण एवं अधोसंरचना विकास मंडल द्वारा आवासीय परियोजनाओं को बेहतर कनेक्टिविटी और आवश्यक सुविधाओं के साथ विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। राज्य सरकार और मंडल की इन्हीं कोशिशों से रायपुर के समीप नरदहा में हितग्राही रागिनी का अपने घर का सपना साकार हुआ है। वर्षों से अपने परिवार के लिए एक स्थायी आशियाने की चाह रखने वाली रागिनी के लिए नया घर केवल एक संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार के सुरक्षित और बेहतर भविष्य की नई शुरुआत है। “अपना घर होना मेरा सपना था, हाउसिंग बोर्ड की पहल ने इसे पूरा किया” अपने अनुभव साझा करते हुए रागिनी कहती हैं, “अपना घर होना मेरा सपना था, जिसे छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड की इस पहल ने पूरा किया है। आज अपना घर होने की खुशी और संतुष्टि को शब्दों में बताना मुश्किल है।” उन्होंने बताया कि नरदहा स्थित परियोजना की लोकेशन उनके परिवार के लिए काफी सुविधाजनक है। रायपुर से बेहतर कनेक्टिविटी के साथ आसपास एजुकेशन हब, स्कूल और कॉलेज की उपलब्धता बच्चों की पढ़ाई के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। अच्छा सामाजिक वातावरण और आवश्यक सुख-सुविधाएं यहां रहने के अनुभव को और बेहतर बनाती हैं। घर के साथ मिला सुरक्षित भविष्य का भरोसा रागिनी के लिए अपना आशियाना मिलने की खुशी इसलिए भी खास है, क्योंकि अब परिवार के पास भविष्य के लिए अपना एक स्थायी ठिकाना है। बच्चों की शिक्षा के लिए अनुकूल वातावरण, रायपुर तक सुगम पहुंच और आसपास उपलब्ध आवश्यक सुविधाओं ने उनके नए घर की खुशी को और बढ़ा दिया है। श्रीमती रागिनी कहती हैं, “वर्तमान छत्तीसगढ़ सरकार और हाउसिंग बोर्ड की यह पहल हम जैसे हितग्राहियों के घर के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अपना आशियाना पाने का अवसर देने के लिए मैं छत्तीसगढ़ सरकार और हाउसिंग बोर्ड का हृदय से आभार व्यक्त करती हूं।” आम परिवारों तक बेहतर आवास पहुंचाने की दिशा में पहल मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वित्त, आवास एवं पर्यावरण मंत्री श्री ओ.पी. चौधरी के मार्गदर्शन में आवासीय योजनाओं के माध्यम से नागरिकों को सुव्यवस्थित और सुविधायुक्त रहवास उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। प्रयास है कि आवासीय परियोजनाएं केवल मकान उपलब्ध कराने तक सीमित न रहें, बल्कि उनमें कनेक्टिविटी, शिक्षा और रोजमर्रा की आवश्यक सुविधाओं तक सहज पहुंच जैसे पहलुओं का भी ध्यान रखा जाए। नरदहा की रागिनी की कहानी इसी प्रयास का मानवीय पक्ष सामने लाती है। अपना घर मिलने से उनके परिवार को एक छत के साथ सुरक्षा और स्थायित्व मिला है तथा बच्चों के बेहतर भविष्य को लेकर नई उम्मीद भी जगी है। अपने आशियाने की चाबी के साथ रागिनी के परिवार के जीवन में खुशियों का एक नया अध्याय शुरू हुआ है।