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PM2.5 प्रदूषण से सिर्फ सांस नहीं, बाल भी खतरे में, डॉक्टरों ने दी चेतावनी

अक्सर माना जाता है कि हवा प्रदूषण के कारण खांसने, दम घुटने और सांस की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स ने अब एक ऐसी चेतावनी दी है जो आपकी चिंताएं बढ़ा सकती है. हालिया रिसर्च में पाया गया है कि हवा में मौजूद PM2.5 जैसे बारीक कण न सिर्फ हमारे रेस्पिरेटरी सिस्टम को प्रभावित कर रहे हैं बल्कि इनका सीधा असर हमारे बालों और स्कैल्प पर भी पड़ रहा है. ये महीन कण इतने छोटे होते हैं कि ये आसानी से स्कैल्प की त्वचा के रोमछिद्रों में घुस जाते हैं जिससे बालों का गिरना और उनकी क्वालिटी खराब होना एक बड़ी समस्या बन गया है. इस बारे में डॉक्टर ने कुछ सावधानियां बरतने की सलाह दी है जो सभी को मानना चाहिए. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और बालों की कमजोरी बेंगलुरु के अपोलो हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजी और रेस्पिरेटरी मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. समीर बंसल का कहना है, 'PM2.5 सामान्य धूल नहीं है. इसका आकार इतना छोटा होता है कि यह नाक और ऊपरी एयरवे के सुरक्षा कवच को पार करके फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच जाता है. उन्होंने बताया कि प्रदूषण को केवल खांसी या सांस की तकलीफ तक सीमित नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इसका 'इन्फ्लेमेटरी बोझ' शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ता है जिससे शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इन्फ्लेमेटरी रिस्पॉन्स पैदा होते हैं.' बेंगलुरु के फोर्टिस हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजी डायरेक्टर डॉ. विवेक आनंद पडेगल का कहना है, 'लोग PM2.5 को फेफड़ों के लिए हानिकारक मानते हैं लेकिन अब यह स्पष्ट हो रहा है कि इसका प्रभाव हेयर फॉलिकल्स यानी बालों की जड़ों पर भी पड़ रहा है. लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से स्कैल्प में इन्फ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा होता है जो बालों के झड़ने, उनके पतले होने और स्कैल्प के अस्वस्थ होने का कारण बन सकता है.' स्कैल्प का इन्फ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन (NCBI) की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण के सूक्ष्म कण शरीर में फ्री रेडिकल्स को बढ़ाते हैं, जो बालों की जड़ों की प्रोटीन संरचना को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे बाल न केवल कमजोर और रूखे हो जाते हैं, बल्कि उनके टूटने की रफ्तार भी बढ़ जाती है. द मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदूषण की मार सिर्फ बालों की लंबाई तक सीमित नहीं है. विशेषज्ञों के मुताबिक, वायु प्रदूषण में मौजूद हानिकारक तत्व स्कैल्प में सूजन या इन्फ्लेमेशन पैदा करते हैं. जब स्कैल्प पर गंदगी और टॉक्सिन्स की परत जमती है तो यह बालों के रोमछिद्रों को प्रभावित करती है जिससे बालों को जरूरी ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिल पाते. इसका नतीजा ये होता है कि बाल समय से पहले पतले होने लगते हैं और स्कैल्प में खुजली व डैंड्रफ की समस्या आम हो जाती है. सिस्टमिक हेल्थ रिस्क डॉ. बंसल और डॉ. पडेगल इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि वायु प्रदूषण अब केवल एक अंग की समस्या न होकर एक 'सिस्टमिक हेल्थ रिस्क' बन गया है जो बालों सहित पूरे शरीर को प्रभावित कर रहा है. प्रदूषण की वजह से स्कैल्प पर जो गंदगी की परत जमती है वह स्कैल्प को सेंसिटिव बनाती है. यदि इसे समय रहते साफ न किया जाए तो यह बालों के पतले होने और बालों की जड़ों की मजबूती कम होने का कारण बनती है. बचाव के लिए क्या करें? इस समस्या से निपटने के लिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बाहर निकलते समय बालों को स्कार्फ या कैप से जरूर ढकें. प्रदूषण वाली जगहों पर जाने के बाद बालों को माइल्ड सल्फेट-फ्री शैम्पू से धोना चाहिए ताकि गंदगी जमा न हो. इसके अलावा, एंटीऑक्सीडेंट युक्त हेयर केयर प्रोडक्ट्स और संतुलित डाइट का सेवन बालों की जड़ों को प्रदूषण के असर से बचाने में मददगार साबित हो सकता है.

क्या अमेरिकी सेना बन रही है पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा? डॉक्युमेंट्री में पेंटागन को लेकर बड़ा दावा

वाशिंगटन  वैश्विक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर अक्सर बड़े-बड़े देशों और औद्योगिक घरानों को कटघरे में खड़ा किया जाता है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा महा-प्रदूषक है, जिसे अंतरराष्ट्रीय जलवायु संधियों में ‘फ्री पास’ यानी पूरी छूट मिली हुई है. प्रसिद्ध खोजी पत्रकार एबी मार्टिन (Abby Martin) की नयी खोजी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘अर्थ्स ग्रेटेस्ट एनिमी’ (Earth’s Greatest Enemy) ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है. 120 मिनट की फिल्म ने पुख्ता सबूतों और अविश्वसनीय आंकड़ों के साथ साबित किया है कि अमेरिकी सेना (US Military) और उसका रक्षा मुख्यालय पेंटागन वैश्विक जलवायु संकट को बढ़ाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा संस्थागत प्रदूषक है।  140 देशों के कुल उत्सर्जन से भी अधिक कार्बन फैलाता है पेंटागन लॉरा पोलक (Laura Pollock) की ओर से की गयी फिल्म की समीक्षा के अनुसार, इस डॉक्युमेंट्री में अमेरिकी रक्षा विभाग और उसकी नौसेना एवं वायुसेना के प्रदूषण फैलाने संबंधी जो आंकड़े पेश किये गये हैं, वे चौंकाने वाले हैं।      विमानों का ईंधन ईकोसाइड : फिल्म में पत्रकार एबी मार्टिन बताती हैं कि औसत अमेरिकी नागरिक अपने पूरे जीवनकाल में (लगभग 40 वर्ष) जितना ईंधन का इस्तेमाल करता है, बोइंग पेगासस (Boeing Pegasus) जैसे अमेरिकी सैन्य टैंकर की सिर्फ एक उड़ान में उतना ईंधन खत्म हो जाता है. अमेरिका ऐसे 600 से अधिक उड़ान टैंकर हवा में उड़ाता है।      140 देशों से भी बड़ा प्रदूषक पेंटागन : अमेरिकी सेना का कुल कार्बन उत्सर्जन दुनिया के 140 देशों के संयुक्त उत्सर्जन से भी कहीं अधिक है. इसके बावजूद वैश्विक जलवायु सम्मेलनों (जैसे COP26) में सैन्य उत्सर्जन के इन आंकड़ों को छिपा लिया जाता है।      लाखों समुद्री जीवों का कत्लेआम : एक डरावना आंकड़ा यह भी है कि अमेरिकी नौसेना (US Navy) को अपने 5 साल के युद्धाभ्यास और परीक्षणों के दौरान 2.6 मिलियन (26 लाख) से अधिक समुद्री स्तनधारी जीवों (Marine Mammals) को नुकसान पहुंचाने या उन्हें मार डालने की कानूनी छूट मिली हुई है. इतना ही नहीं, इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान छोड़े गये 2.5 लाख से अधिक गोले और प्रदूषण ने वहां की भूमि को स्थायी रूप से बंजर बना दिया है।  जहां-जहां अमेरिकी बेस, वहां-वहां ‘जहरीली मौत’ खोजी पत्रकार एबी मार्टिन और उनके पति माइक प्रिसनर ने इस सच्चाई को उजागर करने के लिए पूरी दुनिया का दौरा किया. वे ग्लासगो (स्कॉटलैंड) से लेकर अलास्का, हवाई और जापान के ओकिनावा द्वीप तक गये. कैंप लेज्यून और कोरल रीफ को कैसे नुकसान पहुंचा है, यहां जानें।  डॉक्युमेंट्री का संदेश : एक साथ कई मोर्चे पर संघर्ष कर रही है हमारी प्रकृति।  Earths Greatest Enemy: उत्तरी कैरोलिना के कैंप लेज्यून का सच उत्तरी कैरोलिना के ‘कैंप लेज्यून’ में अमेरिकी सेना के ही घरेलू बेस से हुए ईंधन रिसाव, जहरीले कचरे और औद्योगिक अपशिष्टों के कारण स्थानीय अमेरिकी बस्तियों के पानी में जहर घुल गया. फिल्म में उन माताओं का रुदन दिखाया गया है, जिन्होंने इस दूषित पानी के कारण अपने बच्चों को खो दिया।  हवाई और ओकिनावा में कोरल रीफ का विनाश हवाई और ओकिनावा (जापान) में अमेरिकी सैन्य ठिकानों के निर्माण के लिए पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाया जा रहा है. उसके मलबे को समुद्र में फेंककर दुर्लभ कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) को हमेशा के लिए दफन किया जा रहा है. जब पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कायक (नावों) के जरिये समुद्र में इसका विरोध किया, तो अमेरिकी स्पीडबोट्स ने उनकी नावें पलट दीं और उन्हें हिरासत में ले लिया।  अमेरिकी नेताओं का पाखंड डॉक्युमेंट्री में अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के पाखंड पर भी तीखा प्रहार किया गया है. फिल्म में दिखाया गया है कि एक तरफ तत्कालीन अमेरिकी हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी और प्रगतिशील प्रतिनिधि अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज जैसी नेता लाइव स्ट्रीम पर कॉप-26 (COP26) के लक्ष्यों को ‘ऐतिहासिक’ बताती हैं, लेकिन जब उनसे सवाल पूछा जाता है कि नेट-जीरो (Net-Zero) के दावों के बीच पेंटागन का बजट और सैन्य खर्च लगातार क्यों बढ़ाया जा रहा है, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता।  अमेरिकी पाखंड का सबसे अचूक और प्रामाणिक दस्तावेज यह फिल्म सीधे तौर पर व्हाइट हाउस और पेंटागन को कटघरे में खड़ा करती है, जो आम जनता को पर्यावरण बचाने के लिए ‘प्लास्टिक स्ट्रॉ’ छोड़ने और ‘इलेक्ट्रिक कारें’ खरीदने का उपदेश देते हैं, लेकिन खुद खरबों गैलन कच्चा तेल फूंकने वाली अपनी युद्ध मशीनरी के प्रदूषण को आधिकारिक रिकॉर्ड की किताबों से ही गायब रखते हैं. यह डॉक्युमेंट्री पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पूंजीवादी ताकतों द्वारा चलाये जा रहे इस सबसे बड़े पाखंड का एक अचूक और प्रामाणिक दस्तावेज है। 

नवंबर से नए नियम: पार्किंग महंगी, बिना PUCC नहीं मिलेगा ईंधन

नई दिल्ली  दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शुक्रवार को 'प्रोएक्टिव विंटर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट फ्रेमवर्क' का ऐलान करते हुए कई बड़े फैसलों की घोषणा की। इसके तहत नवंबर से सरकारी पार्किंग का शुल्क दोगुना किया जाएगा। साथ ही नवंबर 2026 से जनवरी 2027 तक दिल्ली में बाहर से पंजीकृत नॉन-बीएस-4 कमर्शियल वाहनों के राजधानी में प्रवेश पर पूरी तरह रोक रहेगी। मुख्यमंत्री ने बताया कि नए फ्रेमवर्क के तहत केवल वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण-पत्र (PUCC) वाले वाहनों को ही दिल्ली के पेट्रोल पंपों से पेट्रोल और डीजल मिलेगा। यानी जिन वाहनों के पास वैध PUCC नहीं होगा, उन्हें ईंधन नहीं दिया जाएगा। क्या हैं नए नियम?     वैध PUCC वाले वाहनों को ही पेट्रोल पंपों पर ईंधन मिलेगा।   1 नवंबर से 31 जनवरी तक दिल्ली के बाहर पंजीकृत गैर-BS VI वाणिज्यिक वाहनों के प्रवेश पर रोक रहेगी। CNG, EV, आपातकालीन सेवाओं और सरकारी कार्यों से जुड़े वाहनों को छूट मिलेगी।     1 नवंबर से 28 फरवरी तक अधिकृत पार्किंग स्थलों पर पार्किंग शुल्क दोगुना रहेगा।     आवश्यकता पड़ने पर कार्यालयों के समय में बदलाव और सरकारी-निजी कार्यालयों में 50% तक भौतिक उपस्थिति की व्यवस्था लागू की जा सकेगी।     1 नवंबर से 31 जनवरी तक निर्माण और ध्वस्तीकरण कार्यों में धूल नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।     10 दिसंबर से 20 जनवरी के बीच आवश्यकता पड़ने पर निर्माण कार्यों पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए जा सकेंगे।     बड़े निर्माण स्थलों और बड़ी बिल्डिंग्स पर एंटी-स्मॉग गन और मिस्ट सप्रेशन सिस्टम लगाना अनिवार्य होगा।     खुले में कचरा या अन्य सामग्री जलाने पर सख्त निगरानी और कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए ड्रोन और फील्ड मॉनिटरिंग का उपयोग किया जाएगा। प्रदूषण के खिलाफ बड़ा एक्शन दिल्ली सरकार का कहना है कि प्रदूषण से लड़ाई का सबसे अच्छा तरीका है समय रहते तैयारी। दिल्ली सरकार इसी संकल्प के साथ सर्दियों से पहले हर जरूरी तैयारी को मिशन मोड में आगे बढ़ा रही है।

पर्यावरण पर बड़ा खतरा, नई स्टडी में खुलासा- हिमालयी क्षेत्र भी प्रदूषण की चपेट में

नई दिल्ली  एक स्टडी में पाया गया है कि केवल एक दशक में PM प्रदूषण 20 फीसदी ये ज्यादा बढ़ गया है। इसमें बिहार और पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इतना ही नहीं, मैदानों से निकलने वाला प्रदूषण अब हिमालय तक भी पहुंच रहा है। कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट ने यह स्टडी की है, जिसे 'एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट' जर्नल में प्रकाशित करवाया गया है। स्टडी में यह भी सामने आया है कि अभी तक देश में बायोमास जलाने की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। अध्ययन से पता चला है कि थर्मल पावर प्लांट, बायोमास जलने और शहरी ठोस कचरा जलने से लगातार होने वाले उत्सर्जन से प्रदूषण की स्थिति गंभीर होते जा रही है। यह गंगा के मैदान, हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर भारत के 25 सालों के डेटा पर आधारित एक सैटेलाइट स्टडी है। हिमालय तक कैसे पहुंच रहा प्रदूषण स्टडी में बताया गया है कि मैदानों में हो उत्सर्जन हो रहा है, वह सीधे हिमालय में एरोसोल की मात्रा को प्रभावित कर रहा है। एरोसोल वातावरण में धूल, कालिख और रासायनिक बूंदों जैसे सूक्ष्म ठोस या तरल कणों के सस्पेंशन को कहते हैं। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली का प्रदूषण हिमालय की पश्चिमी और मध्य श्रेणियों तक पहुंच रहा है और बिहार और पश्चिम बंगाल का प्रदूषण पूर्वी हिमालय को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे पता चलता है कि पहाड़ों की हवा में भी अब वायु प्रदूषण घुल चुका है। चौंकाने वाले आंकड़े हालांकि अध्ययन में ये पाया गया कि भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के कारण बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में पार्टिकुलेट मैटर के स्तरों में मापने योग्य सुधार देखने को मिले। लेकिन ये राज्य अभी भी अभी भी कार्बनयुक्त एयरोसोल के हॉटस्पॉट बने हुए हैं। स्टडी से पता चला कि जो कार्बन प्रदूषण 2000–2009 के दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरी पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में केंद्रित था, वह 2020–2024 तक पूरे पश्चिम बंगाल, बिहार, बांग्लादेश और असम, मेघालय और त्रिपुरा तक फैल गया। अगर हिमालय न होता तो फिर क्या होता…  अगर हिमालय न होता तो भारत कैसा होता? जवाब सीधा है कि उत्तराखंड, हिमाचल, कश्मीर और पश्चिम उत्तर प्रदेश शीत रेगिस्तान होते। पंजाब और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति न होती और मध्य भारत में इतनी गर्मी होती कि वहां पर रहने लायक कुछ भी न होता।  यूरेशिया टेक्टॉनिक प्लेट खिसकने से विशाल समुद्र टेथिस से हिमालय की उत्पत्ति हुई और भारत का वो भूगोल बना जिसमें आज एक अरब 33 करोड़ लोग रहते हैं।  इस विशाल टेथिस समुद्र का प्रतिनिधित्व अब केवल लेह से 125 किलोमीटर दूरी पर स्थित पेंगोंग झील करती है। जो तीस प्रतिशत भारत क्षेत्र में है और बाकी का सत्तर फीसद चीन में। लाखों सालों की प्रक्रिया से जब हिमालय का निर्माण हुआ तो उससे तीन प्राकृतिक और भौगोलिक परिघटनायें हुई। जिससे भारत रहने योग्य बना। ये तीन परिघटनायें थीं- 1. मानसून बंगाल की खाड़ी से उत्पन्न होता है और साउथ वेस्ट होते हुये हिमालय से टकराता है। बादल हिमालय से टकराकर लौटते हैं और जिससे उत्तरी भारत समेत राजस्थान तक जमकर बारिश होती है। इससे उत्तरी भारत से लेकर मध्य और पश्चिम भारत को नई आक्सीजन मिलती है। जीवन खुशहाल रहता है।  इस बारिश से तमाम नदियां, जल धारायें, जंगल और भूजल रिचार्ज होते हैं। अगर हिमालय नहीं होता तो ये मानसून के बादल सीधे पश्चिमी चीन होते हुये मंगोलिया से रूस के साइबेरिया में दाखिल हो जाता। मतलब, भारत में जो जून 21 या 22 तारीख को मानसून आता है और सितंबर आखिरी तक रहता है। वो केवल भारत के ऊपर से गुजरते वक्त कुछ बारिश करता और आगे निकल जाता। जिससे मध्य भारत का भूजल रिचार्ज नहीं होता और हिमालय की नदियों में पानी कम रहता। मसलन, जिन इलाकों में नहरों के जरिये खरीफ की फसलें होती हैं। वहां कुछ नहीं होता।  2. हर साल जनवरी और फरवरी माह में उत्तरी ध्रुव से साइबेरिया होते हुये बर्फीली हवायें मंगोलिया पहुंचती हैं और वहां से चीन के शिंझियांग और तिब्बत होते हुये भारत में दाखिल होती। जिससे साइबेरिया, मंगोलिया और चीन के शिनझिंगया, गिनगाई, गानसू और तिब्बत की तरह हिमाचल, उत्तराखंड, कश्मीर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश शीत मरूस्थल होते। लेकिन हिमालय होते हुये ये चीन से लौट जाती है। जिस कारण चीन का गोबी मरूस्थल का निर्माण हुआ और आज वो पर्यावरण के हिसाब से शून्य है।  3. मानसून के अलावा पश्चमी, मध्य और उत्तर भारत में बारिश का एक मुख्य जरिया भू-मध्य सागर से उठने वाले पिश्चमी विक्षोभ का है। जो हर साल अपने साथ यूरोप के नीचे से भू-मध्य सागर से वाष्पीकरण कर बादल विकसित करता है और फिर ये बादल पाकिस्तान से होते हुये हिमालय से टकराते हैं। जिससे जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर को छोड़ (पोस्ट मानसून) भारत में बारिश होती है और हिमालय और इससे लगते कैचमेंट एरिया में बर्फबारी होती है। ग्लेशियर बनते हैं और फिर 12 महीने गंगा, यमुना, ब्रहमापुत्र सरीखी बड़ी नदियों में पानी रहता है। तापमान गर्मी से ठंडा हो जाता है।  कुल मिलाकर हिमालय का हमारे जीवन में बड़ा योगदान है। इसलिये इसे थर्ड पोल या तीसरा ध्रुव भी कहते हैं। एक प्रमाणिक तथ्य ये भी है कि हिमालय की अगर पूरी बर्फ भी पिघल जाये तो भी हिमालय से निकलने वाली कोई भी नदी नहीं सूखेगी। इसके पीछे मौसम विज्ञान केंद्र का शोध है। असल में, हिमालय के ग्लेशियर नदियों को 12 महीने  पानी नही देते। मसलन, नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी और मार्च में ग्लेश्यिर पूरी तरह से फ्रीज होते हैं। तापमान -20 डिग्री तक हो जाता है। तो ऐसे में फिर गंगा, यमुना, सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में पानी कहां से आता है? मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक बिक्रम सिंह बताते हैं कि ये पानी मानसून में विभिन्न जंगलों में स्टोर हुये पानी के जरिये नदियों तक पहुंचता है। उसी तरह से जैसे मध्य भारत में नर्मदा और गोदावरी में 12 महीने पानी रहता है और इन दोनों नदियों में  ग्लेशियर से पानी बिल्कुल भी नहीं आता। मैंने उनसे पूछा कि फिर अगर हिमालय की पूरी बर्फ पिघल जाये तो  क्या होगा? वो बताते हैं फिर होगा ये कि हिमालय क्षेत्र में जबरदस्त गर्मी पड़ेगी … Read more

ट्रैफिक और प्रदूषण पर काबू के लिए महाराष्ट्र सरकार ने नए ऑटो परमिट पर लगाई रोक

मुंबई महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में नए ऑटो रिक्शा परमिट जारी करने की प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया है. परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि राज्य में पहले से ही बहुत बड़ी संख्या में ऑटो परमिट जारी हो चुके हैं, जिससे शहरों में ट्रैफिक जाम और प्रदूषण की समस्या गंभीर रूप से बढ़ गई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में अब तक करीब 14 लाख ऑटो रिक्शा परमिट जारी किए जा चुके हैं. इनकी अधिकता के कारण मुंबई, पुणे, नागपुर जैसे बड़े शहरों में यातायात का बोझ बढ़ गया है. सड़कों पर भीड़-भाड़ से वाहनों की गति कम हो रही है, ईंधन की खपत बढ़ रही है और  प्रदूषण की समस्या भी गंभीर होती जा रही है. मौजूदा ऑटो परमिट धारकों ने भी सरकार से शिकायत की थी कि नए परमिट जारी होने से रिक्शा चालकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है और उन्हें पर्याप्त सवारी नहीं मिल पा रही हैं. जिससे आय पर भी बुरा असर पड़ रहा है. सरकार ने इन्हीं शिकायतों को ध्यान में रखते हुए ये महत्वपूर्ण कदम उठाया है. महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में नए ऑटो रिक्शा परमिट जारी करने पर फिलहाल पूरी तरह रोक लगा दी है. परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने विधानसभा के बाहर ये घोषणा करते हुए बताया कि ट्रैफिक जाम, बढ़ता प्रदूषण और अवैध परमिट धारकों की शिकायतों के बाद ये कड़ा कदम उठाया गया है. इसके अलावा जांच में ये भी सामने आया है कि कुछ मामलों में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को भी ऑटो परमिट मिल गए थे. इस मामले की भी जांच की जा रही है और नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी. ऑटो रिक्शा की अधिकता के कारण मुंबई, पुणे, नागपुर जैसे बड़े शहरों में यातायात का बोझ बढ़ गया है. सड़कों पर भीड़-भाड़ से वाहनों की गति कम हो रही है, ईंधन की खपत बढ़ रही है और  प्रदूषण की समस्या भी गंभीर होती जा रही है. सरकार ने बताया कि केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद राज्य में नए ऑटो परमिट जारी करने की प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया गया है.

सावधान दिल्ली-एनसीआर! आपकी सोचने-समझने की क्षमता पर मंडरा रहा है एक खतरनाक खतरा

लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी के साथ बढ़ती पर्यावरणीय समस्याएं कई तरह की बीमारियां बढ़ाती जा रही हैं। कम उम्र में ही दिल की बीमारी-हार्ट अटैक का खतरा हो या बढ़ते डायबिटीज और कैंसर के मामले, ये सभी स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता का कारण बने हुए हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि हाल के वर्षों में याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर करने वाली बीमारियों जैसे अल्जाइमर रोग-डिमेंशिया के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। आमतौर पर ये समस्याएं उम्रदराज लोगों, विशेषकर 60 साल के बाद वालों में अधिक देखी जाती रही हैं। हालांकि कई रिपोर्ट्स अलर्ट करते हैं कि अब 50 की उम्र में भी लोगों में अल्जाइमर के लक्षण देखे जा रहे हैं। कहीं आपकी भी  याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता कमजोर न हो जाए? दिल्ली जैसे शहरों में रहने वाले लोगों में इसका खतरा और भी देखा जा रहा है, आखिर इसके पीछे की वजह क्या है? आइए जान लेते हैं। वायु प्रदूषण के कारण अल्जाइमर रोग का खतरा अध्ययनकर्ताओं की एक टीम ने अलर्ट किया है कि जो लोग वायु प्रदूषण के अधिक संपर्क में रहते हैं, उनमें अल्जाइमर रोग होने का खतरा भी अधिक हो सकता है। अल्जाइमर एक गंभीर मस्तिष्क विकार है जो याददाश्त, सोचने की क्षमता और व्यवहार के तरीके को प्रभावित करती है। ऐसे लोगों में डिमेंशिया होने का जोखिम भी अधिक देखा जाता रहा है। यह मस्तिष्क कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी है, जिससे सोचने-समझने में कठिनाई, दैनिक कार्यों में असमर्थता और व्यवहार में बदलाव जैसे गुस्सा या उलझन जैसे लक्षण होते हैं। यूएस में 27.8 मिलियन (2.78 करोड़) से अधिक लोगों पर किए गए अध्ययन में पाया गया है कि वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से सीधे तौर पर अल्जाइमर रोग का खतरा बढ़ सकता है।       हाइपरटेंशन और स्ट्रोक जैसी पुरानी बीमारियों की तुलना में वायु प्रदूषण के संपर्क को इस बीमारी के लिए ज्यादा खतरनाक माना गया है।      जिन लोगों को पहले से ब्रेन स्ट्रोक की समस्या रही है, ऐसे लोगों में  एयर पॉल्यूशन का असर और भी गंभीर हो सकता है।     भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण, विशेषतौर पर दिल्ली जैसे शहरों में देखा जा रहा प्रदूषण का खतरा इस बीमारी की चिंता को और बढ़ाने वाला हो सकता है। अध्ययन में क्या पता चला? प्लस वन मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में प्रकाशित रिपोर्ट से पता चलता है कि अल्जाइमर रोग के खतरे कम को करने के लिए वायु प्रदूषण से बचाव जरूरी है। जॉर्जिया स्थित एमोरी यूनिवर्सिटी की टीम ने कहा कि एयर क्वालिटी में सुधार डिमेंशिया को रोकने का एक जरूरी तरीका हो सकता है। इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने साल 2000-2018 के दौरान 65 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों को शामिल किया।       शोधकर्ताओं ने कहा, इस दौरान लगभग 30 लाख अल्जाइमर रोग के मामलों की पहचान की गई।     लेखकों ने कहा कि पीएम 2.5 के अधिक संपर्क वाली आबादी में अल्जाइर रोग और डिमेंशिया का खतरा ज्यादा देखा गया।     पीएम 2.5 जैसे प्रदूषकों के प्रति 3.8 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर की बढ़ोतरी से दिमाग की बीमारियों का खतरा और भी बढ़ता देखा गया है। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, वायु प्रदूषण (पीएम2.5) के अधिक संपर्क में रहने से हाइपरटेंशन, डिप्रेशन और स्ट्रोक होने का खतरा भी समय के साथ बढ़ता जाता है। ऐसे लोगों में मेंटल हेल्थ की समस्या जैसे स्ट्रेस और डिप्रेशन होने का जोखिम भी ज्यादा देखा जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा, ब्रेन की सेहत पर प्रदूषक तत्वों का गहरा असर होता है। अगर व्यापक उपाय अपनाकर प्रदूषण को कम कर लिया जाए तो इससे कई तरह की बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है।  

रांची में वायु प्रदूषण रोकने एंटी स्माग गन और स्प्रिंकलर तथा मशीनों की होगी खरीदी

रांची. शहर की परिवेशी वायु गुणवत्ता को सुदृढ़ और नियंत्रित बनाए रखने के उद्देश्य से गठित सिटी लेवल इंप्लीमेंटेशन कमिटी की 11वीं बैठक शुक्रवार को रांची नगर निगम सभागार कक्ष में आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता प्रशासक सुर्शात गौरव ने की। इस दौरान एविएंट एयर क्वालिटी इंप्रूवमेंट के तहत अब तक किए गए कार्यों, व्यय और प्रगति की विस्तृत समीक्षा की गई तथा आगामी कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक में रांची जैसे शहरी क्षेत्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए गैप असेसमेंट कराने का निर्णय लिया गया। इसके आधार पर एंटी-स्माग गन, स्प्रिंकलर और मैकेनिकल स्विपिंग मशीन की खरीद के लिए नए प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया गया, ताकि वायु प्रदूषण नियंत्रण के लक्ष्य को प्रभावी रूप से हासिल किया जा सके। निर्माण स्थलों से फैलने वाले धूल प्रदूषण पर रोक लगाने के लिए सभी निर्माणाधीन भवनों और कंस्ट्रक्शन साइट्स को ग्रीन शॉट से ढकना अनिवार्य किया गया। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की गाइडलाइंस के अनुरूप कार्य सुनिश्चित करने और उल्लंघन की स्थिति में दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए। हरित आवरण बढ़ाने पर जोर हरित आवरण बढ़ाने पर विशेष जोर देते हुए प्रशासक ने हार्टिकल्चर शाखा को निगम क्षेत्र में उपयुक्त स्थलों की पहचान कर अधिकतम वृक्षारोपण सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही शहर के विभिन्न हिस्सों में वैज्ञानिक पद्धति से वायु गुणवत्ता की जांच के लिए रूट प्लान तैयार करने और एंबिएंट एयर क्वालिटी मानिटरिंग के लिए टीम गठन करने का निर्णय लिया गया। बैठक में ई-व्हीकल को प्रोत्साहन देने, स्वच्छ परिवहन व्यवस्था विकसित करने तथा उपलब्ध फंड्स का अधिकतम और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने की रणनीति तैयार करने पर भी बल दिया गया। वायु प्रदूषण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के लिए स्कूलों, कालेजों और सार्वजनिक स्थलों पर व्यापक आइईसी गतिविधियां आयोजित करने का निर्णय लिया गया। बैठक में उप प्रशासक गौतम प्रसाद साहू, सहायक प्रशासक, नगर प्रबंधक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण पर्षद झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, रांची वन प्रमंडल, बीआईटी मेसरा के प्रतिनिधि सहित अन्य संबंधित अधिकारी उपस्थित थे। रांची नगर निगम ने सभी नागरिकों से अपील की है कि वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए सामूहिक प्रयास करें, अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें और शहर को स्वच्छ, सुंदर एवं रमणीय बनाए रखने में सक्रिय सहयोग दें।

सांस लेना हुआ मुश्किल: जहरीली हवा का कहर जारी, फिलहाल राहत नहीं

नई दिल्ली राजधानी में स्थानीय कारकों के चलते प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में हवा की गति धीमी होने के चलते लगातार छठे दिन भी हवा बेहद खराब श्रेणी में बरकरार है। एयर क्वालिटी अर्ली वार्निंग सिस्टम फॉर दिल्ली के अनुसार, रविवार सुबह राजधानी का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 393 दर्ज किया गया है। यह हवा की बेहद खराब श्रेणी है। इससे पहले शनिवार को वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 398 दर्ज किया गया। रविवार को यानी आज हवा के गंभीर श्रेणी में पहुंचने की आशंका है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के सुबह आठ बजे के आंकड़ों के अनुसार, राजधानी दिल्ली के अलीपुर में एक्यूआई 375, आनंद विहार में एक्यूआई 426, अशोक विहार में 425, आया नगर में 309, बवाना में 439, बुराड़ी में 378, चांदनी चौक इलाके में 448 एक्यूआई दर्ज किया गया है। वहीं, डीटीयू में 433, द्वारका सेक्टर 8 इलाके में 408, आईजीआई एयरपोर्ट टी3 इलाके में 332, आईटीओ में 393, जहांगीरपुरी में 438, लोधी रोड 357, मुंडका 433, नजफगढ़ में 371, पंजाबी बाग में 420,  आरकेपुरम 394, रोहिणी 433, सोनिया विहार 410, विवेक विहार 413,  वजीरपुर में 443 दर्ज किया गया है। बीते आठ साल में सबसे प्रदूषित रहा दिसंबर दिल्ली में दिसंबर की ठंड के साथ इस बार जहरीली हवा ने भी लोगों की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि राजधानी में सांस लेना भी चुनौती जैसा महसूस हो रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि दिसंबर की शुरुआत से ही दिल्ली की हवा लगातार खराब बनी हुई है और पहले 18 दिनों में ही इसने बीते आठ साल की सबसे खराब वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) दर्ज किया। महीने की शुरुआत से ही हालात ऐसे रहे कि ज्यादातर दिनों में हवा बहुत खराब से गंभीर श्रेणी में बनी रही। दिसंबर के पहले आठ दिनों तक लगातार एक्यूआई 300 से ऊपर रहा जिससे पूरे महीने का औसत एक्यूआई करीब 343 तक पहुंच गया। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 14 दिसंबर को एक्यूआई 461 दर्ज किया गया, जो बीते आठ वर्षों में दिसंबर महीने का सबसे ऊंचा स्तर है। हवा के बिगड़ते हालात को देखते हुए 13 दिसंबर को दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रेप) का सबसे सख्त चरण, यानी स्टेज-चार लागू करना पड़ा।

ठंड के साथ बढ़ा प्रदूषण का प्रकोप, दिल्ली में घने कोहरे से उड़ान सेवाएं प्रभावित; सरकार अलर्ट

नई दिल्ली दिल्ली-NCR समेत उत्तर और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में आज भी घना कोहरा छाया हुआ है। कोहरे के कारण विज़िबिलिटी घटने से दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर शनिवार सुबह 100 से अधिक उड़ानें रद्द कर दी गईं। इस बीच, सरकार ने एयरलाइंस के लिए गाइडलाइंस जारी की हैं, जिनमें यात्रियों को उड़ान की वास्तविक स्थिति की सही जानकारी देने और देरी की स्थिति में उनकी सुविधाओं का ध्यान रखने के निर्देश शामिल हैं। दिल्ली एयरपोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, अब तक प्रस्थान करने वाली 50 से अधिक उड़ानें रद्द हो चुकी हैं और आने वाली लगभग इतनी ही उड़ानों के रद्द होने की सूचना है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली समेत उत्तर और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में इन दिनों तड़के और सुबह के समय घना कोहरा बन रहा है, जिससे उड़ान सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।  कोहरे और प्रदूषण से परेशान राजधानी दिल्ली अब ठंड की चपेट में भी आ गई है। शनिवार, 20 दिसंबर की सुबह मौसम ने अचानक करवट ली, जिसमें कड़ाके की ठंड, बर्फीली हवाओं और घने कोहरे ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दीं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 21 और 22 दिसंबर के लिए घने कोहरे को लेकर येलो अलर्ट जारी किया है। इस दौरान दिल्ली का अधिकतम तापमान गिरकर 21 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। वहीं प्रदूषण के मोर्चे पर हालात और गंभीर होते नजर आ रहे हैं। नोएडा का एयर क्वालिटी इंडेक्स लगभग 410 तक पहुंच गया है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है। मौसम और प्रदूषण दोनों के स्तर पर यह बदलाव अहम चिंता का विषय बना हुआ है। सर्द हवाएं और गिरता तापमान दिल्ली-NCR में सर्दी अब केवल रात तक सीमित नहीं रही, बल्कि दिन के समय भी ठंड का असर साफ महसूस किया जा रहा है। बीते 3-4 दिनों में अधिकतम तापमान में करीब 3 डिग्री सेल्सियस की गिरावट दर्ज की गई है। जहां कुछ दिन पहले तक अधिकतम तापमान 24 डिग्री सेल्सियस के आसपास था, अब यह घटकर 21 डिग्री सेल्सियस पर आ गया है। दिन में धूप कमजोर पड़ रही है और बादलों की आवाजाही बनी हुई है, जिससे ठंड और बढ़ रही है। हवाओं की रफ्तार भी मौसम को और सर्द बना रही है, जो बीते 24 घंटों में 11 किलोमीटर प्रति घंटे रही और अब लगभग 10 किलोमीटर प्रति घंटे चलने की संभावना है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने शुक्रवार रात एक निर्देश जारी किया है, जिसमें विमान सेवा कंपनियों को यात्रियों को उड़ानों में देरी, समय में बदलाव या रद्द होने की जानकारी अग्रिम और सही-सही देने का निर्देश दिया गया है। मंत्रालय ने कहा है कि अंतिम समय में देरी की घोषणा होने पर यात्रियों को तुरंत सूचित करना अनिवार्य होगा। निर्देश में यह भी कहा गया है कि निर्धारित सीमा से अधिक देरी होने पर यात्रियों के लिए जलपान की व्यवस्था करनी होगी। इसके अलावा, रीशेड्यूलिंग की स्थिति में किसी भी अतिरिक्त शुल्क की मांग नहीं की जा सकती। यदि रात में उड़ान निर्धारित समय से अधिक विलंबित होती है, तो यात्रियों के लिए होटल में ठहरने की व्यवस्था करना अनिवार्य होगा। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने कहा है कि यदि उड़ान रद्द होने की जानकारी तय समय सीमा के बाद दी जाती है, तो यात्रियों को पूरा रिफंड प्रदान करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, मार्ग परिवर्तन या रीशेड्यूलिंग की स्थिति में किसी भी अतिरिक्त शुल्क की मांग नहीं की जा सकती। मंत्रालय ने यह भी निर्देश दिया है कि यदि यात्री समय पर चेक-इन करता है, तो उसे बोर्डिंग से नहीं रोका जा सकेगा। निर्देश में यह भी कहा गया है कि पैसेंजर चार्टर के सभी नियमों का पालन अनिवार्य होगा, जिसमें डायवर्जन, रिफंड, हर्जाना और प्राथमिकता के आधार पर चेक-इन के नियम शामिल हैं। प्रदूषण ने भी किया जीना मुश्किल दिल्ली-NCR में प्रदूषण की स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। प्रमुख इलाकों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) बेहद खराब से गंभीर श्रेणी में दर्ज किया गया है। दिल्ली का AQI 580, शाहदरा 784, दरियागंज 736 और शास्त्री नगर 643 रिकॉर्ड किया गया है। पूरे दिल्ली-NCR में AQI 700 से 800 के बीच बना हुआ है, जिससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। बीते 24 घंटों में कई इलाकों में दृश्यता 100 मीटर से भी कम दर्ज की गई, जो घने कोहरे और प्रदूषण के संयुक्त असर को दर्शाता है। अधिकारियों ने लोगों को सतर्क रहने और अनावश्यक बाहर निकलने से बचने की सलाह दी है। अभी कुछ दिन छाए रहेंगे बादल मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले दिनों में मौसम में ज्यादा राहत की संभावना नहीं है। मौसम विभाग के मुताबिक, पहाड़ों पर एक सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ पहुंच रहा है, जिससे 20 से 22 दिसंबर के बीच अच्छी बर्फबारी होगी। इसका असर मैदानी इलाकों में बादलों और कोहरे के रूप में देखने को मिलेगा। हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बादल छाए रह सकते हैं, और गंगा के मैदानी क्षेत्रों में कोहरे का असर बना रहेगा।

बढ़ते प्रदूषण में खांसी ने किया बेहाल? अपनाएं गले की खराश दूर करने के 5 अचूक उपाय

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। राजधानी को चारों ओर से धुंध की चादर घेरे हुए है, जिसके कारण लोगों को सांस लेने में काफी तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है। प्रदूषण के कारण गले में खराश और खांसी की समस्या आम हो गई है। घर के अंदर भी गले में खराश, जलन और खांसी की समस्या बनी रहती है। ऐसे में इन समस्याओं से राहत पाने के लिए प्राकृतिक और घरेलू उपाय कारगर साबित हो सकते हैं। ये उपाय न सिर्फ गले की तकलीफ से राहत दिलाएंगे, बल्कि इम्युनिटी भी बढ़ाते हैं, जिससे प्रदूषण के दुष्प्रभावों से लड़ने में मदद मिलती है। आइए जानें गले की खराश दूर करने के 5 नेचुरल उपाय। गर्म पानी और नमक के गरारे यह सबसे पुराना और भरोसेमंद उपाय है। एक कप गर्म पानी में एक चौथाई चम्मच नमक मिलाकर दिन में 2-3 बार गरारे करें। नमक में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो गले की सूजन कम करते हैं और हानिकारक कणों को साफ करते हैं। गर्म पानी गले की ऐंठन में आराम देता है और बलगम को पतला करता है। शहद और अदरक का कॉम्बो शहद प्राकृतिक एंटीबायोटिक है, तो अदरक एंटी-इंफ्लेमेटरी। एक छोटा टुकड़ा अदरक पीसकर उसे एक चम्मच शहद में मिलाएं और दिन में दो बार खाएं। इसके अलावा, अदरक की चाय बनाकर शहद मिलाकर पी सकते हैं। यह कॉम्बो गले की खराश को शांत करता है और प्रदूषण के कारण जमे हानिकारक तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है। हल्दी वाला दूध रात को सोने से पहर एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच हल्दी पाउडर मिलाकर पिएं। हल्दी में करक्यूमिन होता है, जो पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी है। यह गले में जलन कम करता है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालता है। तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा 10-12 तुलसी के पत्ते, 5-6 काली मिर्च के दाने और एक चम्मच मुलेठी को दो कप पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाए, तो छानकर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर पिएं। तुलसी इम्युनिटी बूस्ट करती है, काली मिर्च बलगम कम करती है और मुलेठी गले की खराश में आराम देती है। प्रदूषण के कारण होने वाली जलन में यह काढ़ा रामबाण की तरह काम करता है। भाप लेना एक बर्तन में गर्म पानी लें, उसमें पुदीने का तेल की 2-3 बूंदें डालकर भाप लें। सिर पर तौलिया रखकर 5-10 मिनट तक भाप लेने से गले और नाक के मार्ग खुलते हैं, जिससे प्रदूषण के फंसे कण बाहर निकलते हैं। यह सूखी खांसी और गले की खराश में तुरंत आराम देता है। इन बातों का रखें ध्यान     दिनभर में भरपूर मात्रा में गर्म पानी पिएं ताकि गले की अंदरुनी परत नरम रहे।     बाहर निकलते समय मास्क जरूर पहनें।     विटामिन-सी से भरपूर फल जैसे, संतरा, आंवला आदि खाएं।     बिना जरूरत के घर से बाहर निकलने से बचें।