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पंजाब में मौसम शुष्क, लुधियाना और पटियाला की हवा हुई खराब

लुधियाना. पंजाब में मौसम शुष्क बना हुआ है। जिसके चलते दिन व रात के तापमान में उतार-चढ़ाव जारी है। बीती रात जहां तापमान जहां सामान्य से अधिक बना रहा, वहीं दिन के तापमान में 1.5 डिग्री की गिरावट देखने को मिली है। लेकिन इस मौसम के बीच राज्य की आबो-हवा बिगढ़ने लगी है। 6 प्रमुख जिलों में से 5 की वायु गुणवत्ता खराब श्रेणी में हैं। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की तरफ से सोमवार शाम जारी बुलेटिन के अनुसार, पंजाब के 5 जिलों व आसपास के इलाकों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार लुधियाना और पटियाला दोनों राज्यें में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 200 से ऊपर आंका गया है, जो गंभीर खराब श्रेणी में आता है। इसके अलावा तीन प्रमुख शहरों में AQI 100 से ऊपर बना हुआ है। खन्ना में AQI 100 से कम बना हुआ है। 

प्रदूषण से निपटने के लिए बड़ा फैसला, दिल्ली-NCR में 15 दिन घर से काम करेंगे कर्मचारी

नई दिल्ली दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण को रोकने और उसे नियंत्रित करने के लिए कई उपाय लागू किए जा रहे हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने दिल्ली और एनसीआर के पांच जिलों में सरकारी और निजी कार्यालयों को निर्देश दिया है कि 5 नवंबर से 20 नवंबर तक वे अपने 50 प्रतिशत कर्मचारियों के साथ ही काम करें, जबकि बाकी 50 प्रतिशत कर्मचारी घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) करें। आयोग ने इसी अवधि के दौरान पूरे एनसीआर में धूल उड़ाने वाले विध्वंस और बाहरी निर्माण कार्यों पर भी रोक लगा दी है। हालांकि, जरूरी सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, राष्ट्रीय सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं को इस रोक से छूट दी गई है। 30 अक्टूबर के अपने एक आदेश में CAQM ने कहा है कि दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत, गाजियाबाद तथा गौतम बुद्ध नगर जिलों में सरकारी और निजी कार्यालय अपने कुल कर्मचारियों में से अधिकतम 50 प्रतिशत के साथ ही काम करें, और बाकी कर्मचारी घर से काम करें। यह नियम उन औद्योगिक इकाइयों और आवश्यक सेवाओं पर लागू नहीं होगा, जहां इस तरह की व्यवस्था संभव नहीं है। आयोग ने आगे निर्देश दिया कि पूरे एनसीआर में ऐसी तोड़फोड़ और बाहरी निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाई जाए, जिनसे धूल उड़ती हो। इस रोक के दायरे में सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं भी आएंगी, जिनमें राजमार्ग, सड़कें, फ्लाईओवर, ओवरब्रिज, बिजली ट्रांसमिशन लाइनें, पाइपलाइन और दूरसंचार से जुड़े काम शामिल हैं। हालांकि, रेलवे, मेट्रो सेवाओं, हवाई अड्डों, अंतर-राज्य बस टर्मिनलों, अस्पतालों, जलापूर्ति और स्वच्छता, राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा से जुड़ी गतिविधियों तथा राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं को इस रोक से छूट दी गई है। इन एहतियाती उपायों के पीछे की वजह बताते हुए CAQM ने 2018 से 2025 तक नवंबर महीने के ऐतिहासिक दैनिक वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) आंकड़ों का हवाला दिया। इन आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली-एनसीआर में खासकर नवंबर की शुरुआत से मध्य तक प्रदूषण का स्तर बार-बार काफी बढ़ जाता है। आदेश में कहा गया है कि इस दौरान, स्थानीय उत्सर्जन स्रोतों, मौसमी कृषि अवशेषों और बायोमास को जलाने तथा अन्य घटनाओं से होने वाला उत्सर्जन प्रदूषण के स्तर को और बढ़ा देता है। वहीं, प्रतिकूल मौसमी स्थितियां जैसे हवा की धीमी गति, वायुमंडलीय सीमा परत का कम होना और हवा का वर्टिकल मिक्सिंग कम होना प्रदूषकों के फैलाव को और सीमित कर देती हैं। CAQM ने ये निर्देश 'राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021' की धारा 12 के तहत जारी किए हैं। यह अधिनियम आयोग को एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता की सुरक्षा और सुधार के लिए कदम उठाने का अधिकार देता है। आयोग ने गौर किया कि जांच की अवधि के दौरान कुछ दिनों में AQI का स्तर 'गंभीर' और 'अत्यंत गंभीर' श्रेणियों तक पहुंच गया था। इसमें कहा गया है कि इन उपायों का उद्देश्य प्रदूषण के स्रोतों पर ही उत्सर्जन को कम करना और उन अवधियों के दौरान जब ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक रहता है, प्रदूषकों के जमाव को न्यूनतम करना है। आदेश में कहा गया है कि प्रस्तावित उपाय एहतियाती प्रकृति के हैं, जो एक निश्चित अवधि और भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित हैं। इन्हें इस बात को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है कि यह क्षेत्र मौसमी रूप से वायु प्रदूषण के प्रति कितना संवेदनशील है।

दिल्ली-NCR की हवा होगी और जहरीली? राजस्थान में भी अलर्ट, 1 नवंबर से सख्त होंगे नियम

अलवर  सर्दियों की आहट के साथ ही एनसीआर में प्रदूषण से निपटने की तैयारियों का असली इम्तिहान शुरू होने जा रहा है। मौसम में बदलाव के बीच 31 अक्टूबर के बाद हवा की गुणवत्ता बिगड़ने और 6 नवंबर तक प्रदूषण के गंभीर श्रेणी में पहुंचने की आशंका जताई गई है। राजस्थान के अलवर सहित एनसीआर क्षेत्र के लिए अगले 15 दिन अहम माने जा रहे हैं। इसे देखते हुए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शामिल चारों राज्यों को अलर्ट किया है। एक्शन प्लान के तहत प्रदूषण नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। अलवर के प्रदूषण नियंत्रण मंडल को भी इस संबंध में पूर्व तैयारी करने के निर्देश दिए गए हैं। एक नवंबर से लागू होगा विंटर एक्शन प्लान एनसीआर से जुड़े राज्यों में सर्दियों के दौरान प्रदूषण से निपटने के लिए एक नवंबर से विंटर एक्शन प्लान प्रभावी होगा। इसके तहत सड़कों पर पानी का छिड़काव, मशीनों से सफाई, शत-प्रतिशत कचरा उठाने और कोयले के तंदूर व डीजल जनरेटर के इस्तेमाल पर रोकथाम जैसे उपाय किए जाएंगे। पुराने मकानों को तोड़ने और निर्माण कार्यों पर भी रोक लगाई गई है। वाहनों पर सख्ती दिल्ली में एक नवंबर से बीएस-6 से नीचे के मानक वाले पेट्रोल-डीजल से चलने वाले कमर्शियल और निजी वाहनों के संचालन पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अलावा बिना प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसी) वाले वाहनों को पेट्रोल पंपों पर ईंधन नहीं देने की नीति वर्तमान में लागू है। अलवर और एनसीआर क्षेत्र में विंटर एक्शन प्लान के कड़े नियम सर्दियों में हवा की गुणवत्ता को बिगड़ने से रोकने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) द्वारा अलवर सहित पूरे एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में 1 नवंबर से ग्रैप (GRAP – Graded Response Action Plan) के तहत विंटर एक्शन प्लान लागू किया जा रहा है, जिसमें निम्नलिखित मुख्य नियम शामिल हैं: कचरा और कोयला जलाने पर पूर्ण रोक: खुले में कूड़ा-कचरा या सूखी पत्तियां जलाने पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। इसके अलावा, ढाबों और होटलों में कोयले व लकड़ी वाले तंदूर के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। डीजल जनरेटर (DG Sets) पर पाबंदी: औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में बिजली बैकअप के लिए केवल सीएनजी, एलपीजी या डुअल-फ्यूल (पीएनजी समर्थित) पर चलने वाले जनरेटरों को ही सीमित अनुमति होगी। पारंपरिक डीजल जनरेटरों के इस्तेमाल पर रोक रहेगी। धूल नियंत्रण के उपाय: सभी नगर निगमों और स्थानीय निकायों को सड़कों पर रोजाना मशीनों से सफाई करने और लगातार पानी का छिड़काव करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि धूल न उड़े। निर्माण कार्यों पर आंशिक रोक: पुराने ढांचों (मकानों या व्यावसायिक भवनों) को ढहाने और नए निर्माण कार्यों पर सख्त गाइडलाइंस लागू होंगी। धूल रोकने के लिए ग्रीन नेट न लगाने वाले कंस्ट्रक्शन साइट्स को तुरंत सील किया जाएगा। वाहनों पर सख्ती और बीएस-6 (BS-VI) से जुड़े नियम एनसीआर में वाहनों से होने वाले धुएं को नियंत्रित करने के लिए इस बार प्रशासन बेहद सख्त रुख अपना रहा है: बीएस-4 और नीचे के वाहनों पर प्रतिबंध: 1 नवंबर से दिल्ली-एनसीआर के क्षेत्रों में बीएस-3 (BS-III) पेट्रोल और बीएस-4 (BS-IV) डीजल से चलने वाले चार पहिया वाहनों (निजी और कमर्शियल दोनों) के संचालन पर प्रतिबंध लागू रहेगा। केवल बीएस-6 मानक वाले या सीएनजी/इलेक्ट्रिक वाहनों को ही निर्बाध रूप से चलने की अनुमति होगी। ₹20,000 का भारी जुर्माना: यदि कोई व्यक्ति प्रतिबंधित श्रेणी (बीएस-3 पेट्रोल या बीएस-4 डीजल) का वाहन लेकर दिल्ली या एनसीआर के प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश करता है, तो मोटर व्हीकल एक्ट के तहत सीधे ₹20,000 का चालान काटा जाएगा। पेट्रोल पंपों पर 'नो पीयूसी, नो फ्यूल' नीति: वर्तमान में लागू नियम के अनुसार, यदि आपके वाहन का प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC Certificate) वैध नहीं है, तो एनसीआर के पेट्रोल पंपों पर आपको ईंधन (पेट्रोल/डीजल) नहीं दिया जाएगा। जरूरी सलाह: यदि आप अलवर से दिल्ली, गुरुग्राम या नोएडा की तरफ यात्रा करने की योजना बना रहे हैं, तो सबसे पहले अपने वाहन का BS मानक (BS-VI है या नहीं) चेक कर लें और अपना PUC सर्टिफिकेट अनिवार्य रूप से अपडेट करवा लें, ताकि भारी जुर्माने और असुविधा से बचा जा सके।

अरपा नदी प्रदूषण पर हाईकोर्ट का सवाल, 70 नालों के लिए सिर्फ 4 STP क्यों?

बिलासपुर. बिलासपुर में सीवरेज प्रबंधन और अरपा नदी में हो रहे प्रदूषण को रोकने हाईकोर्ट ने नगर निगम से विस्तृत कार्ययोजना मांगी है। चीफ जस्टिस कृष्ण राम महापात्र, जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शासन को नया एफिडेविट प्रस्तुत कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्या सिर्फ 4 एसटीपी से 70 नालों का पानी साफ हो जाएगा? चीफ सेक्रेटरी विकासशील ने इस बारे में हाईकोर्ट में शपथ पत्र प्रस्तुत कर कहा कि फिलहाल सभी एसटीपी पूरे होने वाले हैं। इसके बाद कितना गंदा पानी इनसे साफ होगा, इसकी समीक्षा की जाएगी। इसके बाद ही बताया जा सकता है कि और एसटीपी की जरूरत है या नहीं। हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को तय की है। अरपा नदी के संरक्षण और संवर्धन मामले में डिवीजन बेंच के समक्ष शासन की ओर से प्रस्तुत एफिडेविट के अनुसार, बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र की आबादी करीब 6 लाख 68 हजार 540 है और प्रतिदिन लगभग 72.20 एमएलडी सीवरेज उत्पन्न होता है। इसे सीवरेज नेटवर्क और करीब 70 नालों के माध्यम से चैनलाइज किया जाता है। कोर्ट ने मांगी ये जानकारी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी जानकारी मांगी कि अतिरिक्त एसटीपी जरूरी हैं तो शासन को उनकी क्षमता, स्थान, निर्माण की समय-सीमा और अरपा नदी में पानी छोड़े जाने से पहले पूर्ण ट्रीटमेंट सुनिश्चित करने के उपायों की जानकारी भी देनी होगी। शासन के अनुसार, वर्तमान में चार सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट संचालित हैं, जिनकी कुल क्षमता 78 एमएलडी है, जबकि इनका वास्तविक उपयोग करीब 43.90 एमएलडी हो रहा है। एफिडेविट में बताया गया कि 16 एमएलडी क्षमता के दो और एसटीपी निर्माणाधीन हैं। इनमें से एक ट्रायल रन के चरण में है, जबकि दूसरे के 31 दिसंबर 2026 तक पूरा होने की संभावना है। दोनों के चालू होने के बाद शहर की कुल सीवरेज ट्रीटमेंट क्षमता 94 एमएलडी हो जाएगी, जो वर्तमान अनुमानित सीवरेज उत्पादन 72.20 एमएलडी से अधिक है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रशासन से पूछा कि शहर के सभी नालों का सीवरेज का पानी वास्तव में एसटीपी तक पहुंच रहा है या नहीं। डिवीजन बेंच ने अतिरिक्त मुख्य सचिव, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, छत्तीसगढ़ शासन को नया एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। एफिडेविट में विशेष रूप से बताना होगा कि नगर निगम क्षेत्र के सभी 70 नाले, निर्माणाधीन दो एसटीपी समेत उपलब्ध छह एसटीपी से कवर और कनेक्टेड हैं या नहीं तथा प्रत्येक नाले से निकलने वाले सीवरेज को प्रभावी ढंग से इंटरसेप्ट, डायवर्ट और ट्रीट किया जा रहा है या नहीं।

PM2.5 प्रदूषण से सिर्फ सांस नहीं, बाल भी खतरे में, डॉक्टरों ने दी चेतावनी

अक्सर माना जाता है कि हवा प्रदूषण के कारण खांसने, दम घुटने और सांस की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स ने अब एक ऐसी चेतावनी दी है जो आपकी चिंताएं बढ़ा सकती है. हालिया रिसर्च में पाया गया है कि हवा में मौजूद PM2.5 जैसे बारीक कण न सिर्फ हमारे रेस्पिरेटरी सिस्टम को प्रभावित कर रहे हैं बल्कि इनका सीधा असर हमारे बालों और स्कैल्प पर भी पड़ रहा है. ये महीन कण इतने छोटे होते हैं कि ये आसानी से स्कैल्प की त्वचा के रोमछिद्रों में घुस जाते हैं जिससे बालों का गिरना और उनकी क्वालिटी खराब होना एक बड़ी समस्या बन गया है. इस बारे में डॉक्टर ने कुछ सावधानियां बरतने की सलाह दी है जो सभी को मानना चाहिए. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और बालों की कमजोरी बेंगलुरु के अपोलो हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजी और रेस्पिरेटरी मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. समीर बंसल का कहना है, 'PM2.5 सामान्य धूल नहीं है. इसका आकार इतना छोटा होता है कि यह नाक और ऊपरी एयरवे के सुरक्षा कवच को पार करके फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच जाता है. उन्होंने बताया कि प्रदूषण को केवल खांसी या सांस की तकलीफ तक सीमित नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इसका 'इन्फ्लेमेटरी बोझ' शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ता है जिससे शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इन्फ्लेमेटरी रिस्पॉन्स पैदा होते हैं.' बेंगलुरु के फोर्टिस हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजी डायरेक्टर डॉ. विवेक आनंद पडेगल का कहना है, 'लोग PM2.5 को फेफड़ों के लिए हानिकारक मानते हैं लेकिन अब यह स्पष्ट हो रहा है कि इसका प्रभाव हेयर फॉलिकल्स यानी बालों की जड़ों पर भी पड़ रहा है. लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से स्कैल्प में इन्फ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा होता है जो बालों के झड़ने, उनके पतले होने और स्कैल्प के अस्वस्थ होने का कारण बन सकता है.' स्कैल्प का इन्फ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन (NCBI) की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण के सूक्ष्म कण शरीर में फ्री रेडिकल्स को बढ़ाते हैं, जो बालों की जड़ों की प्रोटीन संरचना को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे बाल न केवल कमजोर और रूखे हो जाते हैं, बल्कि उनके टूटने की रफ्तार भी बढ़ जाती है. द मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदूषण की मार सिर्फ बालों की लंबाई तक सीमित नहीं है. विशेषज्ञों के मुताबिक, वायु प्रदूषण में मौजूद हानिकारक तत्व स्कैल्प में सूजन या इन्फ्लेमेशन पैदा करते हैं. जब स्कैल्प पर गंदगी और टॉक्सिन्स की परत जमती है तो यह बालों के रोमछिद्रों को प्रभावित करती है जिससे बालों को जरूरी ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिल पाते. इसका नतीजा ये होता है कि बाल समय से पहले पतले होने लगते हैं और स्कैल्प में खुजली व डैंड्रफ की समस्या आम हो जाती है. सिस्टमिक हेल्थ रिस्क डॉ. बंसल और डॉ. पडेगल इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि वायु प्रदूषण अब केवल एक अंग की समस्या न होकर एक 'सिस्टमिक हेल्थ रिस्क' बन गया है जो बालों सहित पूरे शरीर को प्रभावित कर रहा है. प्रदूषण की वजह से स्कैल्प पर जो गंदगी की परत जमती है वह स्कैल्प को सेंसिटिव बनाती है. यदि इसे समय रहते साफ न किया जाए तो यह बालों के पतले होने और बालों की जड़ों की मजबूती कम होने का कारण बनती है. बचाव के लिए क्या करें? इस समस्या से निपटने के लिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बाहर निकलते समय बालों को स्कार्फ या कैप से जरूर ढकें. प्रदूषण वाली जगहों पर जाने के बाद बालों को माइल्ड सल्फेट-फ्री शैम्पू से धोना चाहिए ताकि गंदगी जमा न हो. इसके अलावा, एंटीऑक्सीडेंट युक्त हेयर केयर प्रोडक्ट्स और संतुलित डाइट का सेवन बालों की जड़ों को प्रदूषण के असर से बचाने में मददगार साबित हो सकता है.

क्या अमेरिकी सेना बन रही है पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा? डॉक्युमेंट्री में पेंटागन को लेकर बड़ा दावा

वाशिंगटन  वैश्विक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर अक्सर बड़े-बड़े देशों और औद्योगिक घरानों को कटघरे में खड़ा किया जाता है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा महा-प्रदूषक है, जिसे अंतरराष्ट्रीय जलवायु संधियों में ‘फ्री पास’ यानी पूरी छूट मिली हुई है. प्रसिद्ध खोजी पत्रकार एबी मार्टिन (Abby Martin) की नयी खोजी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘अर्थ्स ग्रेटेस्ट एनिमी’ (Earth’s Greatest Enemy) ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है. 120 मिनट की फिल्म ने पुख्ता सबूतों और अविश्वसनीय आंकड़ों के साथ साबित किया है कि अमेरिकी सेना (US Military) और उसका रक्षा मुख्यालय पेंटागन वैश्विक जलवायु संकट को बढ़ाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा संस्थागत प्रदूषक है।  140 देशों के कुल उत्सर्जन से भी अधिक कार्बन फैलाता है पेंटागन लॉरा पोलक (Laura Pollock) की ओर से की गयी फिल्म की समीक्षा के अनुसार, इस डॉक्युमेंट्री में अमेरिकी रक्षा विभाग और उसकी नौसेना एवं वायुसेना के प्रदूषण फैलाने संबंधी जो आंकड़े पेश किये गये हैं, वे चौंकाने वाले हैं।      विमानों का ईंधन ईकोसाइड : फिल्म में पत्रकार एबी मार्टिन बताती हैं कि औसत अमेरिकी नागरिक अपने पूरे जीवनकाल में (लगभग 40 वर्ष) जितना ईंधन का इस्तेमाल करता है, बोइंग पेगासस (Boeing Pegasus) जैसे अमेरिकी सैन्य टैंकर की सिर्फ एक उड़ान में उतना ईंधन खत्म हो जाता है. अमेरिका ऐसे 600 से अधिक उड़ान टैंकर हवा में उड़ाता है।      140 देशों से भी बड़ा प्रदूषक पेंटागन : अमेरिकी सेना का कुल कार्बन उत्सर्जन दुनिया के 140 देशों के संयुक्त उत्सर्जन से भी कहीं अधिक है. इसके बावजूद वैश्विक जलवायु सम्मेलनों (जैसे COP26) में सैन्य उत्सर्जन के इन आंकड़ों को छिपा लिया जाता है।      लाखों समुद्री जीवों का कत्लेआम : एक डरावना आंकड़ा यह भी है कि अमेरिकी नौसेना (US Navy) को अपने 5 साल के युद्धाभ्यास और परीक्षणों के दौरान 2.6 मिलियन (26 लाख) से अधिक समुद्री स्तनधारी जीवों (Marine Mammals) को नुकसान पहुंचाने या उन्हें मार डालने की कानूनी छूट मिली हुई है. इतना ही नहीं, इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान छोड़े गये 2.5 लाख से अधिक गोले और प्रदूषण ने वहां की भूमि को स्थायी रूप से बंजर बना दिया है।  जहां-जहां अमेरिकी बेस, वहां-वहां ‘जहरीली मौत’ खोजी पत्रकार एबी मार्टिन और उनके पति माइक प्रिसनर ने इस सच्चाई को उजागर करने के लिए पूरी दुनिया का दौरा किया. वे ग्लासगो (स्कॉटलैंड) से लेकर अलास्का, हवाई और जापान के ओकिनावा द्वीप तक गये. कैंप लेज्यून और कोरल रीफ को कैसे नुकसान पहुंचा है, यहां जानें।  डॉक्युमेंट्री का संदेश : एक साथ कई मोर्चे पर संघर्ष कर रही है हमारी प्रकृति।  Earths Greatest Enemy: उत्तरी कैरोलिना के कैंप लेज्यून का सच उत्तरी कैरोलिना के ‘कैंप लेज्यून’ में अमेरिकी सेना के ही घरेलू बेस से हुए ईंधन रिसाव, जहरीले कचरे और औद्योगिक अपशिष्टों के कारण स्थानीय अमेरिकी बस्तियों के पानी में जहर घुल गया. फिल्म में उन माताओं का रुदन दिखाया गया है, जिन्होंने इस दूषित पानी के कारण अपने बच्चों को खो दिया।  हवाई और ओकिनावा में कोरल रीफ का विनाश हवाई और ओकिनावा (जापान) में अमेरिकी सैन्य ठिकानों के निर्माण के लिए पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाया जा रहा है. उसके मलबे को समुद्र में फेंककर दुर्लभ कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) को हमेशा के लिए दफन किया जा रहा है. जब पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कायक (नावों) के जरिये समुद्र में इसका विरोध किया, तो अमेरिकी स्पीडबोट्स ने उनकी नावें पलट दीं और उन्हें हिरासत में ले लिया।  अमेरिकी नेताओं का पाखंड डॉक्युमेंट्री में अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के पाखंड पर भी तीखा प्रहार किया गया है. फिल्म में दिखाया गया है कि एक तरफ तत्कालीन अमेरिकी हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी और प्रगतिशील प्रतिनिधि अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज जैसी नेता लाइव स्ट्रीम पर कॉप-26 (COP26) के लक्ष्यों को ‘ऐतिहासिक’ बताती हैं, लेकिन जब उनसे सवाल पूछा जाता है कि नेट-जीरो (Net-Zero) के दावों के बीच पेंटागन का बजट और सैन्य खर्च लगातार क्यों बढ़ाया जा रहा है, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता।  अमेरिकी पाखंड का सबसे अचूक और प्रामाणिक दस्तावेज यह फिल्म सीधे तौर पर व्हाइट हाउस और पेंटागन को कटघरे में खड़ा करती है, जो आम जनता को पर्यावरण बचाने के लिए ‘प्लास्टिक स्ट्रॉ’ छोड़ने और ‘इलेक्ट्रिक कारें’ खरीदने का उपदेश देते हैं, लेकिन खुद खरबों गैलन कच्चा तेल फूंकने वाली अपनी युद्ध मशीनरी के प्रदूषण को आधिकारिक रिकॉर्ड की किताबों से ही गायब रखते हैं. यह डॉक्युमेंट्री पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पूंजीवादी ताकतों द्वारा चलाये जा रहे इस सबसे बड़े पाखंड का एक अचूक और प्रामाणिक दस्तावेज है। 

नवंबर से नए नियम: पार्किंग महंगी, बिना PUCC नहीं मिलेगा ईंधन

नई दिल्ली  दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शुक्रवार को 'प्रोएक्टिव विंटर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट फ्रेमवर्क' का ऐलान करते हुए कई बड़े फैसलों की घोषणा की। इसके तहत नवंबर से सरकारी पार्किंग का शुल्क दोगुना किया जाएगा। साथ ही नवंबर 2026 से जनवरी 2027 तक दिल्ली में बाहर से पंजीकृत नॉन-बीएस-4 कमर्शियल वाहनों के राजधानी में प्रवेश पर पूरी तरह रोक रहेगी। मुख्यमंत्री ने बताया कि नए फ्रेमवर्क के तहत केवल वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण-पत्र (PUCC) वाले वाहनों को ही दिल्ली के पेट्रोल पंपों से पेट्रोल और डीजल मिलेगा। यानी जिन वाहनों के पास वैध PUCC नहीं होगा, उन्हें ईंधन नहीं दिया जाएगा। क्या हैं नए नियम?     वैध PUCC वाले वाहनों को ही पेट्रोल पंपों पर ईंधन मिलेगा।   1 नवंबर से 31 जनवरी तक दिल्ली के बाहर पंजीकृत गैर-BS VI वाणिज्यिक वाहनों के प्रवेश पर रोक रहेगी। CNG, EV, आपातकालीन सेवाओं और सरकारी कार्यों से जुड़े वाहनों को छूट मिलेगी।     1 नवंबर से 28 फरवरी तक अधिकृत पार्किंग स्थलों पर पार्किंग शुल्क दोगुना रहेगा।     आवश्यकता पड़ने पर कार्यालयों के समय में बदलाव और सरकारी-निजी कार्यालयों में 50% तक भौतिक उपस्थिति की व्यवस्था लागू की जा सकेगी।     1 नवंबर से 31 जनवरी तक निर्माण और ध्वस्तीकरण कार्यों में धूल नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।     10 दिसंबर से 20 जनवरी के बीच आवश्यकता पड़ने पर निर्माण कार्यों पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए जा सकेंगे।     बड़े निर्माण स्थलों और बड़ी बिल्डिंग्स पर एंटी-स्मॉग गन और मिस्ट सप्रेशन सिस्टम लगाना अनिवार्य होगा।     खुले में कचरा या अन्य सामग्री जलाने पर सख्त निगरानी और कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए ड्रोन और फील्ड मॉनिटरिंग का उपयोग किया जाएगा। प्रदूषण के खिलाफ बड़ा एक्शन दिल्ली सरकार का कहना है कि प्रदूषण से लड़ाई का सबसे अच्छा तरीका है समय रहते तैयारी। दिल्ली सरकार इसी संकल्प के साथ सर्दियों से पहले हर जरूरी तैयारी को मिशन मोड में आगे बढ़ा रही है।

पर्यावरण पर बड़ा खतरा, नई स्टडी में खुलासा- हिमालयी क्षेत्र भी प्रदूषण की चपेट में

नई दिल्ली  एक स्टडी में पाया गया है कि केवल एक दशक में PM प्रदूषण 20 फीसदी ये ज्यादा बढ़ गया है। इसमें बिहार और पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इतना ही नहीं, मैदानों से निकलने वाला प्रदूषण अब हिमालय तक भी पहुंच रहा है। कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट ने यह स्टडी की है, जिसे 'एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट' जर्नल में प्रकाशित करवाया गया है। स्टडी में यह भी सामने आया है कि अभी तक देश में बायोमास जलाने की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। अध्ययन से पता चला है कि थर्मल पावर प्लांट, बायोमास जलने और शहरी ठोस कचरा जलने से लगातार होने वाले उत्सर्जन से प्रदूषण की स्थिति गंभीर होते जा रही है। यह गंगा के मैदान, हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर भारत के 25 सालों के डेटा पर आधारित एक सैटेलाइट स्टडी है। हिमालय तक कैसे पहुंच रहा प्रदूषण स्टडी में बताया गया है कि मैदानों में हो उत्सर्जन हो रहा है, वह सीधे हिमालय में एरोसोल की मात्रा को प्रभावित कर रहा है। एरोसोल वातावरण में धूल, कालिख और रासायनिक बूंदों जैसे सूक्ष्म ठोस या तरल कणों के सस्पेंशन को कहते हैं। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली का प्रदूषण हिमालय की पश्चिमी और मध्य श्रेणियों तक पहुंच रहा है और बिहार और पश्चिम बंगाल का प्रदूषण पूर्वी हिमालय को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे पता चलता है कि पहाड़ों की हवा में भी अब वायु प्रदूषण घुल चुका है। चौंकाने वाले आंकड़े हालांकि अध्ययन में ये पाया गया कि भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के कारण बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में पार्टिकुलेट मैटर के स्तरों में मापने योग्य सुधार देखने को मिले। लेकिन ये राज्य अभी भी अभी भी कार्बनयुक्त एयरोसोल के हॉटस्पॉट बने हुए हैं। स्टडी से पता चला कि जो कार्बन प्रदूषण 2000–2009 के दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरी पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में केंद्रित था, वह 2020–2024 तक पूरे पश्चिम बंगाल, बिहार, बांग्लादेश और असम, मेघालय और त्रिपुरा तक फैल गया। अगर हिमालय न होता तो फिर क्या होता…  अगर हिमालय न होता तो भारत कैसा होता? जवाब सीधा है कि उत्तराखंड, हिमाचल, कश्मीर और पश्चिम उत्तर प्रदेश शीत रेगिस्तान होते। पंजाब और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति न होती और मध्य भारत में इतनी गर्मी होती कि वहां पर रहने लायक कुछ भी न होता।  यूरेशिया टेक्टॉनिक प्लेट खिसकने से विशाल समुद्र टेथिस से हिमालय की उत्पत्ति हुई और भारत का वो भूगोल बना जिसमें आज एक अरब 33 करोड़ लोग रहते हैं।  इस विशाल टेथिस समुद्र का प्रतिनिधित्व अब केवल लेह से 125 किलोमीटर दूरी पर स्थित पेंगोंग झील करती है। जो तीस प्रतिशत भारत क्षेत्र में है और बाकी का सत्तर फीसद चीन में। लाखों सालों की प्रक्रिया से जब हिमालय का निर्माण हुआ तो उससे तीन प्राकृतिक और भौगोलिक परिघटनायें हुई। जिससे भारत रहने योग्य बना। ये तीन परिघटनायें थीं- 1. मानसून बंगाल की खाड़ी से उत्पन्न होता है और साउथ वेस्ट होते हुये हिमालय से टकराता है। बादल हिमालय से टकराकर लौटते हैं और जिससे उत्तरी भारत समेत राजस्थान तक जमकर बारिश होती है। इससे उत्तरी भारत से लेकर मध्य और पश्चिम भारत को नई आक्सीजन मिलती है। जीवन खुशहाल रहता है।  इस बारिश से तमाम नदियां, जल धारायें, जंगल और भूजल रिचार्ज होते हैं। अगर हिमालय नहीं होता तो ये मानसून के बादल सीधे पश्चिमी चीन होते हुये मंगोलिया से रूस के साइबेरिया में दाखिल हो जाता। मतलब, भारत में जो जून 21 या 22 तारीख को मानसून आता है और सितंबर आखिरी तक रहता है। वो केवल भारत के ऊपर से गुजरते वक्त कुछ बारिश करता और आगे निकल जाता। जिससे मध्य भारत का भूजल रिचार्ज नहीं होता और हिमालय की नदियों में पानी कम रहता। मसलन, जिन इलाकों में नहरों के जरिये खरीफ की फसलें होती हैं। वहां कुछ नहीं होता।  2. हर साल जनवरी और फरवरी माह में उत्तरी ध्रुव से साइबेरिया होते हुये बर्फीली हवायें मंगोलिया पहुंचती हैं और वहां से चीन के शिंझियांग और तिब्बत होते हुये भारत में दाखिल होती। जिससे साइबेरिया, मंगोलिया और चीन के शिनझिंगया, गिनगाई, गानसू और तिब्बत की तरह हिमाचल, उत्तराखंड, कश्मीर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश शीत मरूस्थल होते। लेकिन हिमालय होते हुये ये चीन से लौट जाती है। जिस कारण चीन का गोबी मरूस्थल का निर्माण हुआ और आज वो पर्यावरण के हिसाब से शून्य है।  3. मानसून के अलावा पश्चमी, मध्य और उत्तर भारत में बारिश का एक मुख्य जरिया भू-मध्य सागर से उठने वाले पिश्चमी विक्षोभ का है। जो हर साल अपने साथ यूरोप के नीचे से भू-मध्य सागर से वाष्पीकरण कर बादल विकसित करता है और फिर ये बादल पाकिस्तान से होते हुये हिमालय से टकराते हैं। जिससे जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर को छोड़ (पोस्ट मानसून) भारत में बारिश होती है और हिमालय और इससे लगते कैचमेंट एरिया में बर्फबारी होती है। ग्लेशियर बनते हैं और फिर 12 महीने गंगा, यमुना, ब्रहमापुत्र सरीखी बड़ी नदियों में पानी रहता है। तापमान गर्मी से ठंडा हो जाता है।  कुल मिलाकर हिमालय का हमारे जीवन में बड़ा योगदान है। इसलिये इसे थर्ड पोल या तीसरा ध्रुव भी कहते हैं। एक प्रमाणिक तथ्य ये भी है कि हिमालय की अगर पूरी बर्फ भी पिघल जाये तो भी हिमालय से निकलने वाली कोई भी नदी नहीं सूखेगी। इसके पीछे मौसम विज्ञान केंद्र का शोध है। असल में, हिमालय के ग्लेशियर नदियों को 12 महीने  पानी नही देते। मसलन, नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी और मार्च में ग्लेश्यिर पूरी तरह से फ्रीज होते हैं। तापमान -20 डिग्री तक हो जाता है। तो ऐसे में फिर गंगा, यमुना, सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में पानी कहां से आता है? मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक बिक्रम सिंह बताते हैं कि ये पानी मानसून में विभिन्न जंगलों में स्टोर हुये पानी के जरिये नदियों तक पहुंचता है। उसी तरह से जैसे मध्य भारत में नर्मदा और गोदावरी में 12 महीने पानी रहता है और इन दोनों नदियों में  ग्लेशियर से पानी बिल्कुल भी नहीं आता। मैंने उनसे पूछा कि फिर अगर हिमालय की पूरी बर्फ पिघल जाये तो  क्या होगा? वो बताते हैं फिर होगा ये कि हिमालय क्षेत्र में जबरदस्त गर्मी पड़ेगी … Read more

ट्रैफिक और प्रदूषण पर काबू के लिए महाराष्ट्र सरकार ने नए ऑटो परमिट पर लगाई रोक

मुंबई महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में नए ऑटो रिक्शा परमिट जारी करने की प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया है. परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि राज्य में पहले से ही बहुत बड़ी संख्या में ऑटो परमिट जारी हो चुके हैं, जिससे शहरों में ट्रैफिक जाम और प्रदूषण की समस्या गंभीर रूप से बढ़ गई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में अब तक करीब 14 लाख ऑटो रिक्शा परमिट जारी किए जा चुके हैं. इनकी अधिकता के कारण मुंबई, पुणे, नागपुर जैसे बड़े शहरों में यातायात का बोझ बढ़ गया है. सड़कों पर भीड़-भाड़ से वाहनों की गति कम हो रही है, ईंधन की खपत बढ़ रही है और  प्रदूषण की समस्या भी गंभीर होती जा रही है. मौजूदा ऑटो परमिट धारकों ने भी सरकार से शिकायत की थी कि नए परमिट जारी होने से रिक्शा चालकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है और उन्हें पर्याप्त सवारी नहीं मिल पा रही हैं. जिससे आय पर भी बुरा असर पड़ रहा है. सरकार ने इन्हीं शिकायतों को ध्यान में रखते हुए ये महत्वपूर्ण कदम उठाया है. महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में नए ऑटो रिक्शा परमिट जारी करने पर फिलहाल पूरी तरह रोक लगा दी है. परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने विधानसभा के बाहर ये घोषणा करते हुए बताया कि ट्रैफिक जाम, बढ़ता प्रदूषण और अवैध परमिट धारकों की शिकायतों के बाद ये कड़ा कदम उठाया गया है. इसके अलावा जांच में ये भी सामने आया है कि कुछ मामलों में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को भी ऑटो परमिट मिल गए थे. इस मामले की भी जांच की जा रही है और नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी. ऑटो रिक्शा की अधिकता के कारण मुंबई, पुणे, नागपुर जैसे बड़े शहरों में यातायात का बोझ बढ़ गया है. सड़कों पर भीड़-भाड़ से वाहनों की गति कम हो रही है, ईंधन की खपत बढ़ रही है और  प्रदूषण की समस्या भी गंभीर होती जा रही है. सरकार ने बताया कि केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद राज्य में नए ऑटो परमिट जारी करने की प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया गया है.

सावधान दिल्ली-एनसीआर! आपकी सोचने-समझने की क्षमता पर मंडरा रहा है एक खतरनाक खतरा

लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी के साथ बढ़ती पर्यावरणीय समस्याएं कई तरह की बीमारियां बढ़ाती जा रही हैं। कम उम्र में ही दिल की बीमारी-हार्ट अटैक का खतरा हो या बढ़ते डायबिटीज और कैंसर के मामले, ये सभी स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता का कारण बने हुए हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि हाल के वर्षों में याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर करने वाली बीमारियों जैसे अल्जाइमर रोग-डिमेंशिया के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। आमतौर पर ये समस्याएं उम्रदराज लोगों, विशेषकर 60 साल के बाद वालों में अधिक देखी जाती रही हैं। हालांकि कई रिपोर्ट्स अलर्ट करते हैं कि अब 50 की उम्र में भी लोगों में अल्जाइमर के लक्षण देखे जा रहे हैं। कहीं आपकी भी  याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता कमजोर न हो जाए? दिल्ली जैसे शहरों में रहने वाले लोगों में इसका खतरा और भी देखा जा रहा है, आखिर इसके पीछे की वजह क्या है? आइए जान लेते हैं। वायु प्रदूषण के कारण अल्जाइमर रोग का खतरा अध्ययनकर्ताओं की एक टीम ने अलर्ट किया है कि जो लोग वायु प्रदूषण के अधिक संपर्क में रहते हैं, उनमें अल्जाइमर रोग होने का खतरा भी अधिक हो सकता है। अल्जाइमर एक गंभीर मस्तिष्क विकार है जो याददाश्त, सोचने की क्षमता और व्यवहार के तरीके को प्रभावित करती है। ऐसे लोगों में डिमेंशिया होने का जोखिम भी अधिक देखा जाता रहा है। यह मस्तिष्क कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी है, जिससे सोचने-समझने में कठिनाई, दैनिक कार्यों में असमर्थता और व्यवहार में बदलाव जैसे गुस्सा या उलझन जैसे लक्षण होते हैं। यूएस में 27.8 मिलियन (2.78 करोड़) से अधिक लोगों पर किए गए अध्ययन में पाया गया है कि वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से सीधे तौर पर अल्जाइमर रोग का खतरा बढ़ सकता है।       हाइपरटेंशन और स्ट्रोक जैसी पुरानी बीमारियों की तुलना में वायु प्रदूषण के संपर्क को इस बीमारी के लिए ज्यादा खतरनाक माना गया है।      जिन लोगों को पहले से ब्रेन स्ट्रोक की समस्या रही है, ऐसे लोगों में  एयर पॉल्यूशन का असर और भी गंभीर हो सकता है।     भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण, विशेषतौर पर दिल्ली जैसे शहरों में देखा जा रहा प्रदूषण का खतरा इस बीमारी की चिंता को और बढ़ाने वाला हो सकता है। अध्ययन में क्या पता चला? प्लस वन मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में प्रकाशित रिपोर्ट से पता चलता है कि अल्जाइमर रोग के खतरे कम को करने के लिए वायु प्रदूषण से बचाव जरूरी है। जॉर्जिया स्थित एमोरी यूनिवर्सिटी की टीम ने कहा कि एयर क्वालिटी में सुधार डिमेंशिया को रोकने का एक जरूरी तरीका हो सकता है। इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने साल 2000-2018 के दौरान 65 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों को शामिल किया।       शोधकर्ताओं ने कहा, इस दौरान लगभग 30 लाख अल्जाइमर रोग के मामलों की पहचान की गई।     लेखकों ने कहा कि पीएम 2.5 के अधिक संपर्क वाली आबादी में अल्जाइर रोग और डिमेंशिया का खतरा ज्यादा देखा गया।     पीएम 2.5 जैसे प्रदूषकों के प्रति 3.8 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर की बढ़ोतरी से दिमाग की बीमारियों का खतरा और भी बढ़ता देखा गया है। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, वायु प्रदूषण (पीएम2.5) के अधिक संपर्क में रहने से हाइपरटेंशन, डिप्रेशन और स्ट्रोक होने का खतरा भी समय के साथ बढ़ता जाता है। ऐसे लोगों में मेंटल हेल्थ की समस्या जैसे स्ट्रेस और डिप्रेशन होने का जोखिम भी ज्यादा देखा जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा, ब्रेन की सेहत पर प्रदूषक तत्वों का गहरा असर होता है। अगर व्यापक उपाय अपनाकर प्रदूषण को कम कर लिया जाए तो इससे कई तरह की बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है।