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ऑफिस में हड़कंप: बोर्ड मीटिंग के दौरान महिला ने कपड़े उतारे, सब रह गए दंग!

वाशिंगटन  अमेरिका के स्कूल में बीते दिनों चल रही एक बोर्ड मीटिंग में एक महिला की वजह से हड़कंप मच गया। दरअसल महिला मीटिंग में बीच अचानक एक-एक कर अपने कपड़े उतारने लगी और सिर्फ बिकनी पहनकर अपना भाषण देने लगी। मामला कैलिफोर्निया का है। न्यू यॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक महिला की पहचान बेथ बॉर्न के रूप में हुई है, जो पहले भी इस तरह के विवाद खड़े कर चुकी है। दरअसल महिला जिले की उस नीति का विरोध कर रही थी, जिसके मुताबिक ट्रांसजेंडर छात्रों को उनकी पसंद के लॉकर रूम और वॉशरूम का इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी गई है। महिला मॉम्स फॉर लिबर्टी नाम की एक संस्था की अध्यक्ष है। यह वाकया बीते 18 सितंबर को हुआ जब वह डेविस जॉइंट यूनिफाइड स्कूल डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की मीटिंग में भाग लेने पहुंची थी। कपड़े उतारने हुए महिला कहने लगी, “मैं डेविस यूनिफाइड स्कूल डिस्ट्रिक्ट की एक अभिभावक हूं, और मैं आज यहां जूनियर हाई स्कूलों के लॉकर रूम के लिए आपकी नीतियों पर बात करने आई हूँ। एमर्सन, होम्स, हार्पर जूनियर हाई। अभी, हम अपने छात्रों को फिजिकल एजुकेशन की क्लासेस के लिए कपड़े उतारने के लिए कहते हैं। इसलिए मैं आपको बस यह बताने जा रही हूं कि जब मैं कपड़े उतारती हूं तो उन्हें कैसा लगता है।” महिला ने कहा है कि वह अपने कपड़े उतारकर यह दिखाना चाहती थीं कि मौजूदा नियमों के तहत लड़कियां कितनी असुरक्षित महसूस कर सकती हैं। जैसे ही उसने अपने कपड़े उतारने शुरू किए, बैठक में अफरा-तफरी मच गई और बोर्ड के सदस्यों ने बैठक स्थगित कर दी।

‘गर्व’ का पल: पुतिन की उपलब्धि और डोनबास को लेकर बढ़ता विवाद

मास्को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मंगलवार को एक वीडियो संदेश जारी किया। जिसमें एक खास संदेश था। इसमें उन क्षेत्रों का उल्लेख था जो यूक्रेन के प्रभाव में थे और काफी अशांत रहे, बाद में रूस ने उन्हें मान्यता दी। मास्को के आरटी न्यूज ने पुतिन की बात का सार समझाया। जिसके मुताबिक पुतिन ने कहा, “हमने अपने मूल राष्ट्रीय हित, साझा स्मृति, मूल्य, रूसी भाषा, परंपराओं, संस्कृति और धर्म की रक्षा की है। साथ ही, अपने पूर्वजों की उपलब्धियों का सम्मान करना हमारा पवित्र अधिकार है।” 30 सितंबर को रूस 'एकीकरण दिवस' मनाता है। डोनेट्स्क और लुहान्स्क पीपुल्स रिपब्लिक, साथ ही खेरसन और जापोरिज्जिया के रूस से जुड़ाव की बात पुतिन ने कही। पुतिन ने गर्व से कहा, "हमें जो करना था, वह किया, और हमें इस पर गर्व है।" लेकिन इस कहानी में सिर्फ गर्व ही नहीं है। यह कदम 'अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादास्पद' माना गया है। यूक्रेन और पश्चिमी देशों ने इसे कानूनी रूप से मान्यता नहीं दी है। फिर भी, रूस इसे अपने 'ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा' के रूप में पेश करता है। इस कहानी के दो अहम पहलू हैं! पहला सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव – पुतिन इसे सिर्फ भू-राजनीति नहीं, बल्कि रूसी संस्कृति और परंपराओं के सम्मान के रूप में देखते हैं। दूसरा विवादास्पद अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया – पश्चिमी देश और यूक्रेन इसका विरोध करते हैं तो पुतिन इसे नजरअंदाज करते हैं। 2014 में कीव में तख्तापलट के बाद, मुख्यतः रूसी भाषी क्षेत्रों डोनेट्स्क और लुगांस्क ने स्वतंत्रता की घोषणा के लिए मतदान किया था। उसी वर्ष क्रीमिया ने रूस में शामिल होने के लिए मतदान किया था। यूक्रेन और अधिकांश देश रूस की नई सीमाओं को मान्यता देने से इनकार करते हैं। डोनबास दक्षिण-पूर्वी यूक्रेन में स्थित एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्र है, जिसके कुछ क्षेत्रों पर रूस-यूक्रेनी युद्ध के बाद से डोनेट्स्क पीपल्स रिपब्लिक और लुहान्स्क पीपल्स रिपब्लिक जैसे अलगाववादी समूहों का कब्जा रहा। डोनबास शब्द "डोनेट्स कोल बेसिन" का संक्षिप्त नाम है। मार्च 2014 में, यूरोमैडन और 2014 की यूक्रेनी क्रांति के बाद, डोनबास के बड़े इलाकों में तनाव रहा। अशांति को बाद में स्व-घोषित डोनेट्स्क और लुहान्स्क पीपल्स रिपब्लिक से जुड़े रूसी और रूसी समर्थक अलगाववादियों ने युद्ध में बदल दिया। इन दोनों संगठनों को 2022 में रूस ने मान्यता दे दी, लेकिन यूएन से जुड़े किसी भी अन्य देश ने इसे मान्यता नहीं दी। रूस इसे हर तरह की मदद मुहैया कराता है।

IMD का अलर्ट: Jammu Kashmir में इस साल की पहली Snowfall अब ज्यादा दूर नहीं

जम्मू-कश्मीर कश्मीर घाटी इस साल की पहली बर्फबारी के लिए तैयार है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने बताया है कि 5 से 7 अक्टूबर 2025 के बीच जम्मू-कश्मीर के ऊँचे इलाकों में बर्फ गिर सकती है। मौसम विभाग के अनुसार, इस दौरान पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) का असर रहेगा। इसी वजह से गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग और जोजिला दर्रे जैसे मशहूर पहाड़ी इलाकों में हल्की से मध्यम बर्फबारी हो सकती है। केवल कश्मीर ही नहीं, बल्कि लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पर्वतीय इलाके भी बर्फ से ढक सकते हैं। अगर ऐसा हुआ, तो यह इस साल की पहली बर्फबारी होगी। पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा इस शुरुआती बर्फबारी से घाटी और भी खूबसूरत लगने लगेगी और लोगों को सर्दियों का अहसास होगा। पर्यटकों के लिए भी यह अच्छी खबर है, क्योंकि गुलमर्ग और सोनमर्ग जैसे स्थल बर्फबारी के दौरान अधिक आकर्षक बन जाते हैं। होटल और पर्यटन कारोबारियों को उम्मीद है कि इस बार जल्दी बर्फबारी होने से सर्दियों का टूरिस्ट सीजन समय से पहले शुरू हो जाएगा। बर्फ से ढके पहाड़, हरी-भरी वादियां और झीलें यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को और बढ़ा देंगी, जिससे देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आकर्षित होंगे। लोग बर्फ में खेलेंगे, फोटो खींचेंगे और स्कीइंग, स्नोबोर्डिंग तथा स्लेजिंग जैसे एडवेंचर खेल भी जल्दी शुरू हो सकेंगे। इससे पर्यटक ज्यादा समय तक कश्मीर में ठहरेंगे और होटलों, हाउसबोट्स तथा ट्रैवल एजेंसियों को लाभ होगा। साथ ही, स्थानीय बाजार, रेस्टोरेंट और हस्तशिल्प की दुकानों में भी व्यापार बढ़ेगा। तापमान में गिरावट मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि बर्फबारी के बाद घाटी का न्यूनतम तापमान 5 से 8 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। भारी बर्फबारी की स्थिति में रजदान टॉप, सिन्थन टॉप, जोजिला पास, पीर की गली और मारगन टॉप जैसे दर्रे बंद हो सकते हैं। वहीं गुलमर्ग, सोनमर्ग, गुरेज, दूधपतरी और तोसा मैदान जैसे पर्यटन स्थलों पर भी बर्फ जमने की संभावना है। प्रशासन की अपील स्थानीय प्रशासन ने आम लोगों और पर्यटकों से सतर्क रहने की अपील की है। यात्रा पर जाने से पहले मौसम का ताज़ा अपडेट जरूर लें। माना जा रहा है कि यह बर्फबारी कश्मीर में सर्दियों की आधिकारिक शुरुआत होगी।

मोदी ने ट्रंप को दिया साथ, जानें गाजा पीस प्लान में शामिल देशों की पूरी जानकारी

गाजा  गाजा में जारी संघर्ष जल्द रुकने के आसार हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक पीस प्लान का ऐलान किया है, जिसमें 72 घंटों में बंधकों को रिहा करने की बात है। खास बात है कि इस 20 सूत्रीय योजना का भारत समेत कई देशों ने समर्थन किया है। फिलहाल, यह साफ नहीं है कि हमास ने इसपर मंजूरी दी है या नहीं। ट्रंप ने सोमवार को इजरायल-हमास युद्ध को समाप्त करने और युद्धग्रस्त फिलिस्तीन क्षेत्र में युद्धोत्तर शासन स्थापित करने के लिए एक 20-सूत्रीय योजना पेश की। ट्रंप की योजना के तहत एक अस्थायी शासी बोर्ड की स्थापना की जाएगी जिसके अध्यक्ष ट्रंप होंगे। इस बोर्ड में पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर भी शामिल होंगे। योजना के अनुसार यदि दोनों पक्ष इसे स्वीकार करते हैं तो युद्ध तुरंत समाप्त हो जाना चाहिए। इसमें यह भी कहा गया है कि इजरायल द्वारा योजना स्वीकार किए जाने के 72 घंटों के भीतर सभी शेष बंधकों को रिहा कर दिया जाएगा। ट्रंप ने कहा कि यदि हमास प्रस्तावित शांति समझौते को स्वीकार नहीं करता है तो उसे (हमास) हराने के लिए इजराइल को अमेरिका का 'पूर्ण समर्थन' प्राप्त होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्रंप की गाजा संघर्ष को समाप्त कराने संबंधी योजना का मंगलवार को स्वागत किया। उन्होंने कहा, 'सभी संबंधित पक्ष राष्ट्रपति ट्रंप की पहल के लिए एकजुट होंगे और संघर्ष को समाप्त करने तथा शांति सुनिश्चित करने के इस प्रयास का समर्थन करेंगे।' आठ अरब और मुस्लिम बहुल देशों ने गाजा में युद्ध समाप्त करने और अशांत क्षेत्रों में शांति बहाल करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 20-सूत्रीय योजना का मंगलवार को स्वागत किया। जॉर्डन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, तुर्किए, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों ने शांति योजना का स्वागत किया। इनके साथ फ्रांस, इटली, ब्रिटेन, जर्मनी, यूरोपीय परिषद ने भी ट्रंप की योजना पर सहमति जताई है। लगभग तीन साल से जारी युद्ध में 66,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे गए हैं। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने रविवार को यह जानकारी दी। मंत्रालय ने अपनी दैनिक रिपोर्ट में बताया कि सात अक्टूबर 2023 को इजराइल पर हमास के हमले के बाद दोनों पक्षों में छिड़े युद्ध में मरने वाले फिलिस्तीनियों की संख्या बढ़कर 66,005 हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल-हमास युद्ध में अब तक 1,68,162 फिलिस्तीनी घायल हुए हैं। इसमें कहा गया है कि मृतकों में 79 ऐसे फिलिस्तीनी भी शामिल हैं, जिन्हें पिछले 24 घंटों के दौरान अस्पतालों में भर्ती कराया गया था। गाजा में अभी भी 48 लोग बंधक है।  

इस शहर में तनाव चरम पर! ‘आई लव मोहम्मद’ पर हुई हिंसक झड़प, दर्जनों गिरफ्तार

मुंबई उत्तर प्रदेश के बरेली में शुरू हुआ आई लव मोहम्मद (I Love Mohammad) का विवाद अब महाराष्ट्र जा पहुंचा है। महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में सोमवार को सड़क पर ‘आई लव मोहम्मद’ लिखे होने के बाद मुस्लिम समुदाय भड़क उठा और लोगों ने सड़कों पर उतर कर इसके खिलाफ विरोध- प्रदर्शन किया। देखते ही देखते मुस्लिमों का विरोध-प्रदर्शन हिंसक रूप ले लिया। आरोप है कि इस प्रदर्शन के दौरान गुस्साए लोगों ने पुलिस दल पर पथराव किया, जिससे हालात बिगड़ गए और पुलिस को लाठीचार्ज करनी पड़ गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अहिल्यानगर जिले के कोटला गांव में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया है। इसमें कई प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं। पुलिस ने बवाल बढ़ता देख 29 लोगों को गिरफ्तार किया है, जबकि 150 से ज्यादा लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि सोमवार को कोतवाली क्षेत्र के कोटला में विरोध प्रदर्शन तू शुरू हुआ, जब किसी ने सड़क पर 'आई लव मोहम्मद' लिख दिया। इस पर मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने आपत्ति जताई और कोतवाली थाने में इस संबंध में एक शिकायत दर्ज कराई। हालात को काबू में करने के लिए लाठीचार्ज अधिकारी ने कहा, "सड़क पर 'आई लव मोहम्मद' लिखने को लेकर एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के बावजूद, कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस ने उनसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने का आग्रह किया, लेकिन भीड़ में से कुछ लोगों ने पथराव शुरू कर दिया। पुलिस ने स्थिति सामान्य करने के लिए लाठीचार्ज किया।" 29 लोगों को गिरफ्तार किया गया अहिल्यानगर के पुलिस अधीक्षक सोमनाथ घारगे ने बताया कि विरोध प्रदर्शन, सड़क पर अवरोध और पथराव के सिलसिले में 29 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। घारगे ने कहा, “हमने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल का इस्तेमाल किया। पुलिस आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। स्थिति नियंत्रण में है। लोगों को अफवाहों पर विश्वास नहीं करना चाहिए और न ही अफवाहें फैलानी चाहिए।” ध्रुवीकरण करने की कोई साजिश तो नहीं यवतमाल की यात्रा कर रहे मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने कहा कि अधिकारी इस बात का पता लगाएंगे कि क्या राज्य में शांति भंग करने और तरह-तरह के बोर्ड लगाकर समाज का ध्रुवीकरण करने की कोई साजिश तो नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा, “हर कोई अपने धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन ध्रुवीकरण में शामिल होने की किसी को इजाजत नहीं है।”  

CJI की मां RSS शताब्दी कार्यक्रम में आमंत्रित, भाई ने बताई ये खास बात

नई दिल्ली  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अमरावती में 5 अक्टूबर को होने वाले कार्यक्रम के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई की माताजी को निमंत्रण मिला है. मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई के छोटे भाई ने कहा कि उनकी मां को आरएसएस के कार्यक्रम का निमंत्रण मिला है. उन्हें यह कार्यक्रम अटेंड करना चाहिए, जबकि कमलबाई गवई को लेकर एक पत्र वायरल हो रहा है, जिसमें वो हिंदू धर्म की आइडियोलॉजी के खिलाफ बात करती नजर आ रही है. हालांकि ये पत्र कमलबाई गवई का लिखा है या नहीं. इसकी पुष्टि नहीं हुई है, जबकि उनके बेटे राजेंद्र गवई की मानें तो उनकी मां ये कार्यक्रम अटेंड करने वाली हैं. कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र भी सार्वजनिक हुआ है, जिसमें कमलबाई गवई का नाम लिखा हुआ है. 5 अक्टूबर को अमरावती में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का विजयादशमी और आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर शताब्दी वर्ष का विशेष कार्यक्रम होने जा रहा है. क्या कार्यक्रम में शिरकत करेंगी CJI की मां? सूत्रों का कहना है कि कमलताई गवई ने इस कार्यक्रम में शामिल होने से साफ इंकार किया है और वो खुद को अंबेडकरी विचारधारा और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध बताती हैं और किसी भी परिस्थिति में संघ के आयोजन में हिस्सा नहीं लेंगी. वहीं उनके पुत्र और रिपब्लिकन पार्टी के नेता राजेंद्र गवई ने दावा किया है कि उनकी मां ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया है और वे कार्यक्रम में उपस्थित होंगी. राजेंद्र गवई ने कहा कि संघ का कार्यक्रम अमरावती में हो रहा है और उसका निमंत्रण मेरी माताजी को मिला है, जिसे उन्होंने स्वीकार किया है. पहले भी नागपुर में संघ के मुख्य कार्यक्रमों में दिवंगत रिपब्लिकन पार्टी के नेता राजाभाऊ खोब्रागडे और दादासाहेब गवई शामिल हो चुके हैं. दादासाहेब गवई के इंदिरा गांधी और विदर्भ के नेता गंगाधर फडणवीस से भी घनिष्ठ संबंध थे. जानें CJI के भाई ने क्या कहा उन्होंने आगे कहा, रिश्ते भाईचारे के हैं, लेकिन विचारधाराएं अलग-अलग हैं. किसी कार्यक्रम में जाने का मतलब यह नहीं कि विचारधारा बदल जाएगी. हमारी मित्रता रहेगी, पर विचारधारा हमारी पक्की है. वहीं, सोशल मीडिया पर हो रही आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए राजेंद्र गवई ने कहा कि, भूषणजी गवई बड़े पद पर पहुंचे हैं, इस कारण विरोधी जानबूझकर टीका-टिप्पणी कर रहे हैं. कुछ सकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं, लेकिन हम उस पर अधिक ध्यान नहीं दे रहे. उन्होंने कहा कि आईसाहेब ने जो निर्णय लिया है, मैं उनके साथ मजबूती से खड़ा हूं. हम सर्वधर्मसमभाव को मानने वाले हैं और यह रास्ता हमने पहले भी अपनाया था, आज भी मानते हैं और भविष्य में भी मानते रहेंगे.  

क्वेटा में बड़ा आतंकी हमला: सैन्य ठिकाने पर फिदायीन हमला और गोलीबारी, 10 जवान शहीद

 क्वेटा पाकिस्तान के क्वेटा शहर में स्थित सेना के मुख्यालय आज भयंकर धमाका हुआ है. पूर्वी क्वेटा में फ्रंटियर कॉर्प्स मुख्यालय के पास मंगलवार को एक ज़ोरदार विस्फोट के बाद अचानक गोलीबारी हुई. विस्फोट की आवाज मॉडल टाउन और आसपास के इलाकों में सुनी गई, जिसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है. विस्फोट से आस-पास के घरों और इमारतों की खिड़कियां टूट गईं. पाकिस्तान की न्यूज वेबसाइट डॉन के अनुसार इस धमाके में अबतक 10 लोगों की मौत की खबर है, जबकि 32 लोग घायल हो गए हैं. मरने वालों का आंकड़ा बढ़ सकता है. बलूचिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री बख्त मुहम्मद काकर और स्वास्थ्य सचिव मुजीब-उर-रहमान ने सिविल अस्पताल क्वेटा, बीएमसी अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर में आपातकाल की घोषणा कर दी है. स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, सभी सलाहकार, डॉक्टर, फार्मासिस्ट, स्टाफ नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ ड्यूटी पर हैं. बचाव सूत्रों ने पुष्टि की है कि घायलों और मृतकों के शवों को सिविल अस्पताल क्वेटा भेज दिया गया है. सूत्रों के अनुसार धमाके के बाद शहर में अफरा-तफरी का माहौल हो गया है. धमाके के बाद मौके पर फायरिंग की भी आवाज सुनी गई है. इसके बाद लोग सुरक्षित स्थान पर चले गए हैं. धमाके के बाद घटनास्थल से धुएं का गुबार निकलते हुए देखा गया.  शुरुआती रिपोर्ट में पता चला है कि धमाका बेहद तेज था, लेकिन धमाके की स्पष्ट वजह सामने नहीं आ पाई है.  इलाके में रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है. सुरक्षा बलों ने इलाके को घेर लिया है और कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रही है.  धमाके की तस्वीरें वहां लगी एक सीसीवीटी कैमरे में रिकॉर्ड हो गई है. इसमें धमाके की आवाज और आग की लपटें देखी जा सकती हैं.  पुलिस अधिकारियों ने बताया कि विस्फोट का पता लगाने के लिए जांच जारी है. बचाव दल और पुलिसकर्मी घटनास्थल पर पहुंच गए हैं, जबकि तलाशी अभियान के लिए इलाके को सील कर दिया गया है. स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, सभी डॉक्टर, फार्मासिस्ट, स्टाफ नर्स और पैरामेडिकल कर्मचारी ड्यूटी पर हैं.  क्वेटा पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी है. ये स्थान चरमपंथी हिंसा का प्रमुख केंद्र रहा है. यहां पर अलगाववादी और चरमपंथी हिंसा की घटनाएं आम है. इसमें लश्कर-ए-झंगवी (LeJ) और इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविंस (ISKP) के नाम आते हैं.  इसके अलावा तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) भी इस इलाके में सक्रिय है. हाल-फिलहाल में बलूच अलगाववादी हमले भी यहां बढ़े हैं.

नई शुरुआत: भारत-ईएफटीए समझौते से मिलेगा वैश्विक बाजार का फायदा

नई दिल्ली  भारत और चार देशों के यूरोपीय समूह ईएफटीए के बीच मुक्त व्यापार समझौता बुधवार से लागू होगा। इसके तहत भारत को इस समूह से 15 साल में 100 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता मिली है। इसके अलावा स्विजरलैंड की घड़ियों, चॉकलेट और कटे एवं पॉलिश किए गए हीरों जैसे कई उत्पादों पर कम या शून्य शुल्क की अनुमति दी गई है। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के सदस्य आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विजरलैंड हैं। इस समझौते पर 10 मार्च 2024 को हस्ताक्षर किए गए थे। घरेलू ग्राहकों को घड़ियां, चॉकलेट, बिस्कुट और घड़ियां जैसे उच्च-गुणवत्ता वाले स्विजरलैंड के उत्पाद कम कीमतों पर उपलब्ध होंगे क्योंकि भारत इस व्यापार समझौते के तहत इन वस्तुओं पर सीमा शुल्क को 10 वर्ष में चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर देगा। संघ ने 100 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। समझौते के कार्यान्वयन के बाद 10 वर्ष के भीतर 50 अरब अमेरिकी डॉलर तथा अगले पांच वर्ष में 50 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता है जिससे भारत में 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे। यह भारत द्वारा अब तक हस्ताक्षरित किसी भी व्यापार समझौते में सहमत अपनी तरह की पहली प्रतिबद्धता है। इस समझौते को आधिकारिक तौर पर व्यापार एवं आर्थिक भागीदारी समझौता (टीईपीए) कहा जाता है। इसमें यह प्रावधान है कि यदि प्रस्तावित निवेश किसी कारणों से नहीं आता है तो भारत चारों देशों को दी जाने वाली शुल्क रियायतों को पुनः संतुलित या निलंबित कर सकता है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सोमवार को दोहराया था कि टीईपीए एक अक्टूबर से लागू होगा। ईएफटीए देश यूरोपीय संघ (ईयू) का हिस्सा नहीं हैं। यह मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने और उसे तेज करने के लिए एक अंतर-सरकारी संगठन है। इसकी स्थापना उन देशों के लिए एक विकल्प के रूप में की गई थी जो यूरोपीय समुदाय में शामिल नहीं होना चाहते थे। भारत 27 देशों के समूह यूरोपीय संघ के साथ एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते पर अलग से बातचीत कर रहा है।

पहला ड्रोन अभ्यास तैनात — सेना की करवाई से मिले संकेत, तनाव प्रबंधित करने की तैयारी

नई दिल्ली भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना खुद को ड्रोन युद्ध के लिए तैयार कर रही है। अंबाला के पास नारायणगढ़ फील्ड फायरिंग रेंज में सेना का वायु समन्वय युद्धाभ्यास चल रहा है। यह अभ्यास पांच दिन चलने वाला है। पश्चिमी और दक्षिणी कमांड इसमें हिस्सा ले रहे हैं। इसमें कई तरह के ड्रोन के संचालन और ड्रोन हमले से बचने पर फोकस है। वेस्टर्न कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार के मुताबिक, सेना अब ड्रोन का काफी इस्तेमाल कर रही है। खास तौर पर ऊंचाई वाले इलाकों में सप्लाई के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है। ड्रोन ऑपरेशन को लेकर ऑपरेशन सिंदूर से काफी सबक मिला है। ऐसे में ड्रोन के निर्माण और सेना को उसकी ट्रेनिंग पर फोकस किया जा रहा है। उन्होंने कहा अगर फिर से किसी दु्श्मन के साथ भिड़ंत होती है तो उसे और बड़ी सजा दी जाएगी। इस युद्धाभ्यास में जिन ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है वे स्थानीय स्तर पर ही बनाए गए हैं। इनकी रेंज पांच किलोमीटर तक है और ये 5 किलो वजन ले जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि आर्मी के पास ज्यादा रेंज और ज्यादा पेलोड ले जाने वाले ड्रोन भी मौजूद हैं। कटियार ने कहा कि आने वाले समय में लॉजिस्टिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हजारों ऐसे ड्रोन की जरूरत पड़ेगी। वहीं इन ड्रोन से हमला करने के लिए जिन हथियारों का इस्तेमाल होगा, उन्हें देश में ही तैयार किया जाएगा। बता दें कि ना सिर्फ युद्ध के समय में बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के समय भी सेना ड्रोन का इस्तेमाल करतीहै। बाढ़ के दौरान भी उत्तर और पश्चिमी कमांड ने राहत सामग्री पहुंचाने में ड्रोन का खूब इस्तेमाल किया गया। इस युद्धाभ्यास में दोनों कमांड को अलग-अलग नाम दिया गया है। एक का नाम सूर्यादेश और दूसरे का चंद्रादेश है। दोनों अलग-अलग देशों के तौर पर एक दूसरे के साथ युद्धाभ्यास कर रहे हैं। इन ड्रोन से बम बरसाए जा रहे हैं और उनसे बचने में भी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। अधिकारियों ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद हमें समझ में आ गया है कि कैसे दुश्मन के ड्रोन से निपटा जा सकता है और कैसे दुश्मन को ड्रोन से पस्त किया जा सकता है। इस अभ्यास में शामिल अधिकारियों ने कहा कि सेना के अलावा अब ड्रोन का इस्तेमाल खेती में भी किया जा रहा है। इसके लिए सरकार ने 'ड्रोन दीदी' स्कीम भी चलाई है जिसके तहत महिलाओं को ड्रोन की ट्रेनिंग दी जाती है।

युवाओं के उग्र आंदोलन से हिली मेडागास्कर सरकार, बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी बड़ी वजह

अंतानानारिवो अफ्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित द्वीपीय राष्ट्र मेडागास्कर में युवाओं के नेतृत्व में भड़के हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने सरकार को भंग करने पर मजबूर कर दिया। बिजली और पानी की किल्लत से तंग आ चुके युवाओं ने पिछले हफ्ते शुरू हुए आंदोलन में राजधानी अंतानानारिवो के सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ खुला विद्रोह किया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इन प्रदर्शनों में कम से कम 22 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 100 से अधिक लोग घायल हुए हैं। राष्ट्रपति एंड्री रजोएलिना ने सोमवार को टेलीविजन पर संबोधन में पूरी सरकार को भंग करने की घोषणा की और जनता से माफी मांगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह 2023 में रजोएलिना के फिर से चुने जाने के बाद उनकी सत्ता के लिए सबसे गंभीर चुनौती है और हाल के वर्षों में द्वीप राष्ट्र में देखी गई सबसे बड़ी अशांति है। प्रदर्शनों की शुरुआत और हिंसा का दौर विरोध प्रदर्शन पिछले हफ्ते शुरू हुए और सोमवार, 29 सितंबर को चरम पर पहुंच गए। राजधानी अंतानानारिवो के मुख्य विश्वविद्यालय में सैकड़ों युवा इकट्ठा हुए, जहां उन्होंने प्लेकार्ड थामे राष्ट्रीय गान गाया और शहर के केंद्र की ओर मार्च करने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों ने नेपाल के हालिया आंदोलनों से प्रेरित होकर वहां के झंडे का इस्तेमाल किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर एकजुट हुए ये युवा मुख्य रूप से बेरोजगारी, आर्थिक संकट और दैनिक जीवन की बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे थे। हालांकि, मार्च के दौरान पुलिस ने आंसू गैस और रबर की गोलियां चलाकर भीड़ को तितर-बितर कर दिया। इससे स्थिति और बिगड़ गई। राजधानी में लूटपाट की घटनाएं बढ़ गईं, जिसमें सुपरमार्केट, उपकरण की दुकानें, बैंक और राजनेताओं के घरों को निशाना बनाया गया। अंतानानारिवो की आबादी 14 लाख है, लेकिन इन दंगों ने पूरे शहर को अराजकता की चपेट में ला दिया। पिछले हफ्ते से ही शाम ढलते ही सुबह तक कर्फ्यू लगा हुआ है, जिसे सुरक्षा बल सख्ती से लागू कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने मृतकों की संख्या 22 बताई है, जिसमें प्रदर्शनकारी, राहगीर और लूटपाट के दौरान मारे गए लोग शामिल हैं। घायलों की संख्या 100 से अधिक है। हालांकि, मेडागास्कर के विदेश मंत्रालय ने इन आंकड़ों को खारिज करते हुए कहा कि ये "अफवाहों या गलत सूचनाओं" पर आधारित हैं। मौतों में कुछ गुटों द्वारा की गई हिंसा भी शामिल है, जो प्रदर्शनों से अलग थीं। बिजली-पानी की कमी: आंदोलन की जड़ प्रदर्शनकारियों का मुख्य गुस्सा बिजली की बार-बार होने वाली कटौती और पानी की भारी कमी पर केंद्रित था। मेडागास्कर अफ्रीका के सबसे गरीब देशों में से एक है। यह लंबे समय से आर्थिक संकट से जूझ रहा है। विश्व बैंक के अनुसार, 2022 में इसकी 3 करोड़ आबादी का लगभग 75 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे जी रहा था। युवा बेरोजगारी और महंगाई ने हालात को और बदतर बना दिया है। प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति रजोएलिना की सरकार को इन बुनियादी सुविधाओं में सुधार न करने का दोषी ठहरा रहे थे। ये आंदोलन केन्या, नेपाल और मोरक्को के युवा-नेतृत्व वाले हालिया प्रदर्शनों से प्रेरित दिखे, जहां सोशल मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रदर्शनकारियों ने सरकार की नाकामी को "दैनिक जीवन पर हमला" करार दिया। राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया: सरकार भंग, माफी और संवाद का वादा राष्ट्रपति एंड्री रजोएलिना 2023 में फिर से चुने गए थे। उन्होंने इन घटनाओं को अपनी सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना। सोमवार को टेलीविजन संबोधन में उन्होंने कहा, "हम मानते हैं और माफी मांगते हैं यदि सरकार के सदस्यों ने उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारियां पूरी नहीं कीं।" उन्होंने आगे कहा, "मैं गुस्से, उदासी और बिजली कटौती तथा पानी की आपूर्ति की समस्याओं से उत्पन्न कठिनाइयों को समझता हूं। मैंने पुकार सुनी, दर्द महसूस किया, दैनिक जीवन पर प्रभाव को समझा।" रजोएलिना ने सरकार को तत्काल भंग करने की घोषणा की और लूटपाट से प्रभावित व्यवसायों को सहायता देने का वादा किया। उन्होंने युवाओं से संवाद खोलने की इच्छा जताई, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। यह कदम मेडागास्कर में वर्षों बाद सबसे बड़ा राजनीतिक उथल-पुथल का संकेत देता है। मेडागास्कर की राजनीतिक पृष्ठभूमि मेडागास्कर लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता से ग्रस्त रहा है। 2009 में रजोएलिना खुद एक तख्तापलट के जरिए सत्ता में आए थे, लेकिन 2023 के चुनावों में वे फिर जीते। देश की अर्थव्यवस्था कृषि और खनन पर निर्भर है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, चक्रवात और वैश्विक महामारी ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया है। युवा आबादी, जो कुल जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है, वह बदलाव की मांग कर रही है, लेकिन सरकार की नीतियां अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र ने हिंसा की निंदा की है, लेकिन कोई विशेष प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकती है, यदि मूल समस्याओं का समाधान न हो।