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नया नियम: प्राइवेट सेक्टर में 10 घंटे की शिफ्ट, ओवरटाइम के घंटे बढ़े

नई दिल्‍ली  इन्‍फोसिस के फाउंडर नारायणमूर्ति ने पिछले दिनों सप्‍ताह में 70 घंटे काम करने का जो शिगूफा छोड़ा था, उसका असर अब दिखने वाला है. महाराष्‍ट्र सरकार अपने प्रदेश की प्राइवेट कंपनियों में वर्किंग ऑवर यानी काम के घंटे बढ़ाने की तैयारी में है. फिलहाल सरकार और कंपनियों के बीच बातचीत चल रही है और इस पर फैसला हुआ तो रोजाना 9 घंटे के बजाय 10 घंटे काम करने होंगे. सरकार महाराष्‍ट्र शॉप एंड स्‍टैब्लिशमेंट (रेगुलेशन ऑफ एम्‍पलॉयमेंट एंड कंडीशन ऑफ सर्विस) एक्‍ट, 2017 में बदलाव करने पर विचार कर रही है. इसके तहत दुकानों, होटल और कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए काम के घंटे बढ़ाने का प्रस्‍ताव दिया गया है. राज्‍य के श्रम विभाग ने इस प्रस्‍ताव पर कैबिनेट की बैठक में भी चर्चा किया और सबकुछ सही रहा तो जल्‍द ही इस नए नियम को लागू किया जा सकता है. कैबिनेट में हुई चर्चा हिंदुस्तान टाइम्स (एचटी) की रिपोर्ट के अनुसारमंगलवार को राज्य श्रम विभाग ने इस प्रस्ताव को कैबिनेट के सामने पेश किया। मंत्रियों ने इस पर चर्चा तो की, लेकिन उन्होंने इसे मंजूरी देने से पहले कुछ और जानकारियां मांगी हैं। एक वरिष्ठ मंत्री ने बताया कि प्रस्ताव के प्रावधानों और उनके प्रभाव को लेकर अभी और स्पष्टता की जरूरत है। इसलिए अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है । प्रस्तावित परिवर्तन क्या हैं? श्रम विभाग 2017 के कानून में लगभग पांच बड़े बदलाव करने की योजना बना रहा है, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण काम के घंटों में वृद्धि होगी। इसके अतिरिक्त, प्रस्ताव में यह भी सुझाव दिया गया है कि वयस्क एक बार में छह घंटे से ज़्यादा काम तभी कर सकते हैं जब उन्हें आधे घंटे का ब्रेक दिया जाए। फ़िलहाल, एक कर्मचारी अधिकतम पाँच घंटे तक लगातार काम कर सकता है। विभाग ने तीन महीने की अवधि में कर्मचारियों के लिए अनुमेय ओवरटाइम की सीमा 125 घंटे से बढ़ाकर 144 घंटे करने की भी सिफारिश की है। वर्तमान में, कर्मचारी 10.5 घंटे (ओवरटाइम सहित) तक काम कर सकते हैं, लेकिन नए प्रस्ताव में इस सीमा को बढ़ाकर 12 घंटे करने का प्रस्ताव है। अत्यावश्यक कार्य के मामलों में, 12 घंटे की मौजूदा दैनिक सीमा को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है, जिससे कार्य घंटों की कोई अधिकतम सीमा नहीं रहेगी। ये परिवर्तन किस पर लागू होंगे? अगर ये नियम लागू होते हैं, तो प्रस्तावित बदलाव केवल 20 या उससे ज़्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों पर ही लागू होंगे। मौजूदा नियम 10 या उससे ज़्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों पर लागू होते हैं। एक वरिष्ठ मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर एचटी को बताया, "मंत्री प्रावधानों और उनके प्रभाव पर अधिक स्पष्टता चाहते थे, इसलिए आज निर्णय स्थगित कर दिया गया।" अधिकारियों ने बताया कि इस क्षेत्र की लंबे समय से लंबित मांग के बाद कैबिनेट में यह प्रस्ताव रखा गया। लंबे कार्य घंटों पर बहस इस वर्ष जनवरी में, लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) के अध्यक्ष एस.एन. सुब्रह्मण्यन ने 90 घंटे के कार्य सप्ताह की वकालत करके एक ऑनलाइन बहस छेड़ दी थी और सुझाव दिया था कि कर्मचारियों को रविवार सहित सप्ताहांत पर भी काम करना चाहिए। उद्योग जगत के एक नेता के इस बयान ने कार्य-जीवन संतुलन पर बहस को फिर से हवा दे दी है, जो पिछले वर्ष इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति द्वारा 70 घंटे के कार्य सप्ताह के आह्वान के बाद शुरू हुई थी। जैसे-जैसे अधिक नेता काम के घंटों को बढ़ाने की वकालत करने के लिए आगे आ रहे हैं, थकान, मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट और ऐसी अपेक्षाओं की स्थिरता के बारे में चिंताएं बढ़ रही हैं।  कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और स्मार्ट एक्सेसरीज़ ब्रांड, एलिस्टा ने पहले कहा था कि "उत्पादकता लंबे समय तक काम करने से नहीं, बल्कि ध्यान और दक्षता से बढ़ती है। ज़रूरत से ज़्यादा काम करने से थकान, रचनात्मकता में कमी और काम की गुणवत्ता में गिरावट आती है।" ओवरटाइम पर भी नया प्रस्‍ताव श्रम विभाग ने ओवरटाइम की लिमिट को भी बढ़ाने का प्रस्‍ताव दिया है, जो एक तिमाही में 125 से बढ़ाकर 144 घंटे किए जाने की तैयारी है. अभी कोई भी कर्मचारी ओवरटाइम को मिलाकर अधिकतम 10.5 घंटे रोजाना काम कर सकता है, जबकि नए प्रस्‍ताव में इस अवधि को बढ़ाकर 12 घंटे किया जाएगा. आपात स्थिति के समय मौजूदा 12 घंटे की टाइम लिमिट को खत्‍म करके अनलिमिटेड किया जाएगा. इसका मतलब है कि ऐसी स्थिति में कर्मचारी 24 घंटे काम कर सकेंगे. यह बदलाव किनपर लागू होंगे? अगर यह प्रस्ताव कानून बन जाता है, तो यह बदलाव उन्हीं कंपनियों पर लागू होंगे, जहां 20 या उससे ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। अभी यह कानून 10 या उससे ज्यादा कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों पर लागू होता है। आखिर ऐसा प्रस्ताव क्यों लाया गया? अधिकारियों का कहना है कि यह प्रस्ताव उद्योग जगत की लंबे समय से चली आ रही मांग को ध्यान में रखकर लाया गया है । हालांकि, कैबिनेट में इसपर अभी चर्चा जारी है और कोई निर्णय होने में अभी समय लग सकता है। किन कंपनियों पर लागू होगा श्रम विभाग का यह प्रस्‍ताव ऐसी कंपनियों पर लागू किया जाएगा, जहां 20 से ज्‍यादा कर्मचारी काम करते हैं. अभी यह नियम 10 कर्मचारी वाली कंपनियों और दुकानों पर लागू है. फिलहाल सरकार इस पर और स्‍पष्‍टीकरण चाहती है और उसकी मंशा है कि नियम बनाने से पहले इसके सभी पहलू पर विचार किया जाना चाहिए. पिछले दिनों लार्सन एंड ट्रूबो के चेयरमैन एसएन सुब्रमण्‍यन ने सप्‍ताह में 90 घंटे काम कराने और सप्‍ताहांत यानी रविवार को भी काम करने की बात कहकर यह विवाद छेड़ा था.

हर मन्नत पूरी करने वाले लालबागचा राजा के दरबार में भक्तों का सैलाब

मुंबई  हर साल जब गणेश चतुर्थी का त्योहार आता है तो मुंबई की गलियों से लेकर मंदिरों तक एक अलग ही रौनक दिखाई देती है। ढोल-ताशों की गूंज, बप्पा के स्वागत में लगने वाले जयघोष, फूलों से मंडलों की सजावट और उन्हें देखने के लिए लाखों लोगों की भीड़, ये सब मिलकर इस त्योहार को बेहद खास बना देते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, हर कोई इस आयोजन का बेसब्री से इंतजार करता है। ऐसे में जब बात मुंबई की गणेश चतुर्थी की होती है तो सबसे पहला नाम जो हर किसी की जुबान पर आता है, वह है लालबागचा राजा मंदिर का। मुंबई का सबसे अधिक लोकप्रिय सार्वजनिक गणेश मंडल लालबागचा राजा लोगों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है। लालबाग परेल क्षेत्र स्थित यह पंडाल हर साल गणेश चतुर्थी के दौरान दुनियाभर से भक्तों को अपनी ओर खींचता है। यहां श्रद्धालु न सिर्फ दर्शन के लिए, बल्कि मन की मुरादें पूरी करने की आस लेकर दूर-दूर से आते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी सच्चे दिल से लालबागचा राजा से प्रार्थना करता है, उसकी हर मुराद जरूर पूरी होती है। इसलिए तो इन्हें 'मन्नतों का राजा' भी कहा जाता है। हर साल की तरह बड़ी और और मशहूर हस्तियों के साथ-साथ हजारों लाखों की संख्या में भक्त यहां बप्पा के दर्शन करने आ रहे हैं। इस बार यहां गणपति की 22 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित की गई, जो तमिलनाडु के रामेश्वरम की पौराणिक कथा से प्रेरित है। लालबागचा राजा मंडल के उपाध्यक्ष सिद्धेश कोरगावकर ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "यह लालबाग इलाके का सबसे पुराने गणपति हैं। इस बार उनकी 22 फीट ऊंची मूर्ति बनाई गई है।" उन्होंने कहा कि मूर्ति और इसकी सजावट में रामेश्वरम की थीम को दर्शाया गया है, जिसमें हनुमानजी रामेश्वरम से भगवान शंकर का पिंड लेकर आते हैं। लालबागचा राजा मंडल की स्थापना साल 1934 में हुई थी। दरअसल, करीब नौ दशक पहले कुछ मछुआरों और दुकानदारों ने मिलकर बप्पा से बाजार के लिए एक पक्की जगह मिलने की मन्नत मांगी थी। जब उनकी यह मन्नत पूरी हुई तो उन्होंने आभार स्वरूप एक छोटी सी गणेश मूर्ति स्थापित की। वहीं से यह परंपरा शुरू हुई और आज 91 साल बाद भी पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही है। लालबागचा राजा के दर्शन के लिए दो मुख्य कतारें होती हैं। एक होती है 'नवसाची लाइन', जिसमें वे लोग लगते हैं जो अपनी किसी विशेष मन्नत लेकर बप्पा के चरणों तक जाना चाहते हैं। इस लाइन में दर्शन के लिए 25 से 40 घंटे तक का समय भी लग सकता है। दूसरी लाइन होती है "मुखदर्शन लाइन", जिसमें भक्त बप्पा को दूर से देख सकते हैं। यह लाइन अपेक्षाकृत छोटी होती है। कई बार यहां 4 से 5 घंटे लग जाते हैं। हर बार की तरह इस साल भी गणेश चतुर्थी पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। मंडल द्वारा सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। हजारों पुलिसकर्मी और स्वयंसेवक तैनात किए गए हैं ताकि भक्तों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। पंडाल के अंदर भी श्रद्धालुओं के लिए मेडिकल असिस्टेंस, पानी और शौचालय जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।

स्ट्रीट वेंडर्स को राहत, पीएम स्वनिधि योजना 31 मार्च 2030 तक बढ़ी

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) योजना के पुनर्गठन और विस्तार को 31 मार्च, 2030 तक मंजूरी दे दी। इस योजना के लिए कुल 7,332 करोड़ रुपए का प्रावधान है। कैबिनेट की एक रिलीज में कहा गया है कि इस पुनर्गठित योजना का लक्ष्य 50 लाख नए लाभार्थियों सहित 1.15 करोड़ लाभार्थियों को लाभ पहुंचाना है। आवास एवं शहरी मंत्रालय और वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) पर संयुक्त रूप से इस योजना के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी रहेगी। इसमें डीएफएस की भूमिका, बैंकों/वित्तीय संस्थानों और उनके जमीनी स्तर के अधिकारियों के माध्यम से ऋण/क्रेडिट कार्ड तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने की रहेगी। बयान में कहा गया है कि पुनर्गठित योजना की प्रमुख विशेषताओं में पहली और दूसरी किस्तों में बढ़ी हुई ऋण राशि, दूसरा ऋण चुकाने वाले लाभार्थियों के लिए यूपीआई-लिंक्ड रुपे क्रेडिट कार्ड का प्रावधान और खुदरा व थोक लेनदेन के लिए डिजिटल कैशबैक प्रोत्साहन शामिल हैं। इस योजना का दायरा चरणबद्ध तरीके से जनगणना कस्बों व अर्ध-शहरी क्षेत्रों आदि बढ़ाया जा रहा है। इस बढ़ी हुई ऋण संरचना में पहली किस्त के ऋण को 10,000 रुपए से बढ़ाकर 15,000 रुपए और दूसरी किस्त के ऋण को 20,000 रुपए से बढ़ाकर 25,000 रुपए तक कर दिया गया है, जबकि तीसरी किस्त 50,000 रुपए पर अपरिवर्तित रहेगी। यूपीआई-लिंक्ड रुपे क्रेडिट कार्ड की शुरुआत से रेहड़ी-पटरी वालों को किसी भी आकस्मिक व्यावसायिक और व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तत्काल ऋण उपलब्ध होगा। इसके अलावा, डिजिटल अपनाने को बढ़ावा देने के लिए, रेहड़ी-पटरी वाले खुदरा और थोक लेनदेन पर 1,600 रुपए तक के कैशबैक प्रोत्साहन का लाभ उठा सकते हैं। यह योजना उद्यमिता, वित्तीय साक्षरता, डिजिटल स्किल और कनवर्जेंस के माध्यम से मार्केटिंग पर ध्यान केंद्रित करते हुए रेहड़ी-पटरी वालों की क्षमता निर्माण पर भी केंद्रित है। एफएसएसएआई के साथ साझेदारी में, रेहड़ी-पटरी वालों के लिए मानक स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा प्रशिक्षण आयोजित किया जाएगा। रेहड़ी-पटरी वालों और उनके परिवारों के समग्र कल्याण और विकास को सुनिश्चित करने के लिए, मासिक लोक कल्याण मेलों के माध्यम से 'स्वनिधि से समृद्धि' घटक को मजबूत किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत लाभ लाभार्थियों और उनके परिवारों तक पूर्ण रूप से पहुंचे। सरकार ने कोरोना महामारी के दौरान कठिनाइयों का सामना करने वाले रेहड़ी-पटरी वालों का समर्थन करने के लिए 1 जून, 2020 को पीएम स्वनिधि योजना शुरू की थी। हालांकि, इस योजना की शुरुआत से ही, यह रेहड़ी-पटरी वालों के लिए वित्तीय सहायता से कहीं अधिक साबित हुई है। प्रसिद्ध प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना ने पहले ही महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर ली हैं। 30 जुलाई, 2025 तक, 68 लाख से अधिक रेहड़ी-पटरी वालों को 13,797 करोड़ रुपए के 96 लाख से अधिक ऋण वितरित किए जा चुके हैं। लगभग 47 लाख डिजिटल रूप से सक्रिय लाभार्थियों ने 6.09 लाख करोड़ रुपए के 557 करोड़ से अधिक डिजिटल लेनदेन किए हैं, जिससे उन्हें कुल 241 करोड़ रुपए का कैशबैक प्राप्त हुआ है। 'स्वनिधि से समृद्धि' पहल के तहत, 3,564 शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के 46 लाख लाभार्थियों का प्रोफाइल तैयार किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप 1.38 करोड़ से अधिक योजनाओं को मंजूरी दी गई है। बयान में कहा गया है कि इस योजना के विस्तार में व्यवसाय विस्तार और सस्टेनेबल ग्रोथ के अवसरों को समर्थन देने के लिए वित्त का एक विश्वसनीय स्रोत प्रदान कर रेहड़ी-पटरी वालों के समग्र विकास की परिकल्पना की गई है। इससे न केवल रेहड़ी-पटरी वालों को सशक्त बनाया जाएगा, बल्कि समावेशी आर्थिक विकास, रेहड़ी-पटरी वालों और उनके परिवारों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान को भी बढ़ावा मिलेगा, उनकी आजीविका में वृद्धि होगी और अंततः शहरी क्षेत्रों को एक जीवंत, आत्मनिर्भर इकोसिस्टम में बदला जा सकेगा।

महिला समेत मणिपुर में 10 लाख रुपये मूल्य का ड्रग्स पकड़ा गया

इंफाल मणिपुर के चुराचंदपुर जिले में सुरक्षा बलों ने 49 वर्षीय एक महिला के घर से 10 लाख रुपये मूल्य के मादक पदार्थ बरामद होने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बुधवार को यह जानकारी दी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि महिला को सोमवार को जिले के एस मुन्नुअम इलाके में उसके घर से गिरफ्तार किया गया। उन्होंने कहा, ‘‘उसके पास से 1,200 नशीली गोलियां जब्त की गईं, जिन्हें ‘याबा टैबलेट’ के नाम से जाना जाता है। उनकी कीमत लगभग 10 लाख रुपये है।’’ याबा टैबलेट में मेथामफेटामीन और कैफीन का मिश्रण होता है। इसे ‘क्रेजी ड्रग’ भी कहा जाता है। यह भारत में प्रतिबंधित है। इस बीच, पुलिस ने बताया कि प्रतिबंधित गुट प्रीपैक (पीआरओ) के एक सक्रिय सदस्य को सोमवार को इंफाल पूर्वी जिले के नापेट पल्ली से गिरफ्तार किया गया। मणिपुर में दो साल पहले जातीय हिंसा भड़कने के बाद से सुरक्षा बल तलाशी अभियान चला रहे हैं। मई 2023 से मेइती और कुकी-जो समूहों के बीच जातीय संघर्ष में 260 से अधिक लोग मारे गए हैं और हजारों लोग बेघर हुए हैं। राज्य के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफा देने के बाद केंद्र ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था। राज्य विधानसभा को निलंबित कर दिया गया है।  

राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हुआ जामनगर का सरकारी डेंटल कॉलेज, CM ने दी बधाई

जामनगर गुजरात के जामनगर स्थित सरकारी डेंटल कॉलेज और हॉस्पिटल को ओरल हेल्थ के प्रति लोगों को जागरुक करने और तंबाकू से होने वाले नुकसानों को लेकर चलाए गए अभियानों के लिए सम्मानित किया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने जामनगर के सरकारी डेंटल कॉलेज को प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया। इस पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने भी खुशी जताई है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि यह सम्मान न सिर्फ संस्थान के लिए, बल्कि पूरे गुजरात के लिए गौरव की बात है। गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में लिखा, “स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए दांतों का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। सरकारी डेंटल कॉलेज और अस्पताल, जामनगर को मौखिक और दंत स्वास्थ्य के साथ-साथ तंबाकू सेवन से होने वाले नुकसान के बारे में जन जागरूकता को लेकर अलग-अलग कार्यक्रमों के आयोजन के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने लगातार दूसरे साल प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया है।” इससे पहले, जामनगर कलेक्टर ने सरकारी डेंटल कॉलेज और हॉस्पिटल को बधाई दी। कलेक्टर ऑफिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल कर राज्य को गौरवान्वित करने के लिए राजकीय डेंटल कॉलेज और हॉस्पिटल, जामनगर को बहुत-बहुत बधाई।” केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय देशभर के डेंटल कॉलेज और अस्पतालों को मुंह और ऑरल हेल्थ के साथ-साथ तंबाकू सेवन से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूकता अभियान चलाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस अभियान के तहत आयोजित किए जाने वाले सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रमों के लिए हर साल पुरस्कार दिए जाते हैं। इसी क्रम में जामनगर के डेंटल कॉलेज और हॉस्पिटल ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर अनूठी उपलब्धि हासिल कर पूरे सौराष्ट्र को गौरवान्वित किया है।  

आवारा कुत्तों का कहर: बुजुर्ग की नाक काटी, बच्चे भी बने शिकार

बड़वानी देश-प्रदेश के साथ शहर में भी आवारा श्वानों द्वारा आमजन को निशाना बनाने का सिलसिला जारी हैं। बुधवार को सुबह से दोपहर तक चंद घंटे में एक दर्जन के करीब लोग श्वान के काटने के शिकार बने। इस दौरान एक बुजुर्ग के मुंह पर श्वान ने झपट्टा मारकर नाक काट दी। लहुलहान हालात में स्वजन उन्हें जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। वहीं इस दौरान आधे दिन में ही बच्चों सहित बड़े लोग श्वानों के शिकार होकर जिला अस्पताल उपचार के लिए पहुंचे। बुधवार सुबह करीब 10 बजे शहर के गुरुद्वारा के पीछे नवलपुरा मुख्य मार्ग पर वेल्डिंग व ऑटो गैरेज व्यवसायी हाजी बसीर मंसूरी को श्वान ने बुरी तरह जख्मी किया। यह घटना सामने लगे सीसीटीवी में कैद हुई। उक्त घटना का सीसीटीवी फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों ने जमकर रोष व्यक्त किया। हाजी मंसूरी अपने घर से सटी दुकान पर आए और वहां मंडरा रहे श्वानों को भगाने का प्रयास किया, इस दौरान अचानक श्वान ने लंबी छलांग लगाकर उनके चेहरे पर बुरी तरह झपट्टा मारा। श्वान के हमले से वे सड़क पर गिरे, जिसके बाद श्वान ने उनके हाथ-पैर में निशाना बनाया। आसपास के लोगों के पहुंचने पर श्वान दूर भागा। इस हमले से बुजुर्ग बसीर मंसूरी की नाक का एक ओर का हिस्सा निकल गया और हड्डी तक क्षतिग्रस्त हो गई। स्वजन उन्हें तत्काल जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। बुधवार को जिला अस्पताल में अवकाश के चलते नए सोलह पलंग वार्ड की इमरजेंसी ओपीडी में उनका टीकाकरण कर भर्ती कर उपचार शुरू किया। वहीं शाम चार बजे तक जिला अस्पताल में श्वान के काटने के शिकार करीब 10 लोग उपचार के लिए पहुंचे। इसमें बड़ों के साथ बच्चे भी शामिल थे। इस वर्ष अब तक 1400 से अधिक घायल जिला अस्पताल से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस वर्ष जनवरी से जुलाई तक श्वान टीकाकरण केंद्र पर 1400 से अधिक लोग दर्ज हुए हैं, जिन्हें श्वानों ने निशाना बनाया हैं। इसमें महिला-पुरुषों के साथ युवा-बच्चे शामिल हैं। वहीं अधिकांश मामलों में श्वानों द्वारा खूंखार रुप से लोगों और बच्चों पर हमला कर घायल किया है। कई लोगों को शरीर में दो-तीन या अधिक स्थानों पर जख्म व खरोंचे भी आई हैं। बता दें कि डेढ़ वर्ष पूर्व न्यू हाउसिंग बोर्ड मैदान के समीप आवारा श्वानों ने दो वर्षीय मासूम को झपटकर मौत के घाट उतार दिया था। कॉलोनियों व स्कूलों के आसपास अधिक समस्या शहर में वर्षाकाल के बीच आवारा श्वानों के जगह-जगह झुंड विचरण करते देखे जा सकते हैं। मुख्य रुप से पालाबाजार, पानवाड़ी, न्यु हाउिंगस बोर्ड, हाट बाजार, मीट मार्केट, माडल स्कूल परिसर, नवलपुरा, राजघाट रोड से सटी कालोनियां, आनंद नगर सहित मुख्य रुप से स्कूलों के आसपास श्वानों के झुंड मंडराने से बच्चों पर खतरा बना हुआ हैं। हालांकि गत दिनों से नगर पालिका अमले द्वारा श्वानों को पकड़कर आबादी क्षेत्र से बाहर छोड़ने की कार्रवाई की जा रही हैं, बावजूद इससे फिलहाल राहत मिलती नहीं दिख रही हैं। इस वर्ष अब तक श्वानों के शिकार     जनवरी में 284     फरवरी में 178     मार्च में 250     अप्रैल में 171     मई में 170     जून में 112     जुलाई में 182     1400 से अधिक अगस्त अब तक (प्रतिदिन औसत 6 से 10 मरीज)

गुजरात दंगों पर तरलोचन सिंह बोले: नरेंद्र मोदी न होते तो पूरा राज्य जल उठता

नई दिल्ली सिख मामलों के जानकार और पूर्व राज्यसभा सांसद तरलोचन सिंह ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी की भूमिका की सराहना की है। कहा कि यह दंगा साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड से उपजे गुस्सा का नतीजा था और इसे नरेंद्र मोदी ने अच्छे से संभाला वरना पूरा गुजरात ही जल जाता। उन्होंने कहा कि ट्रेन में जिंदा जले लोगों के परिजन उनके शवों को अपने गांव ले जाना चाहते थे, लेकिन नरेंद्र मोदी ने उनका अंतिम संस्कार वहीं करा दिया। तरलोचन सिंह ने कहा कि यदि ये शव उनके गांवों में पहुंचते तो सोचिए कि कितना गुस्सा लोगों का भड़कता और पूरा गुजरात ही जल जाता, लेकिन नरेंद्र मोदी ने साहस दिखाया और ऐसा नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि 2002 का दंगा जनता के गुस्से का परिणाम था, उसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। बता दें कि 2002 में गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम हुआ करते थे। उस दंगे को लेकर उन पर भी कांग्रेस की ओर से आरोप लगाए जाते रहे हैं। 2002 के दंगों के दौरान तरलोचन सिंह अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि गुजरात का दंगा दिल्ली में हुए 1984 के दंगों की तरह सरकार प्रायोजित नहीं था। उन्होंने कहा कि 2002 में मैं अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष था। तरलोचन सिंह ने कहा कि घटना होने के बाद सबसे पहले पहुंचने वाले लोगों में मैं था। मैंने उसके बारे में पूछताछ की। कोई उसके बारे में नहीं जानता था। मैं 2000 में अल्पसंख्यक आयोग का चेयरमैन बना था और गुजरात दंगा 2002 में हुआ। मैंने गुजरात दंगे पर एक बुकलेट भी लिखी है। उन्होंने कहा कि यह बुकलेट छपी भी थी और नरेंद्र मोदी ने इसकी 500 कॉपियां बटवाई थीं। मैंने गुजरात दंगों से दिल्ली के सिख दंगों की तुलना की थी। मैंने कहा था कि दिल्ली का दंगा सरकार प्रायोजित था, लेकिन गुजरात का दंगा जनता के गुस्से की अभिव्यक्ति थी। उस दंगे में सरकार या उसके किसी एक भी आदमी की भूमिका नहीं थी। मैंने अपनी जांच में यह बात कही थी। पीएम नरेंद्र मोदी की सराहना करते हुए तरलोचन सिंह ने कहा कि तब गुजरात सीएम के तौर पर उनका रोल सराहनीय था। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी ने तय किया कि मारे गए सभी कारसेवकों का अंतिम संस्कार वहीं कर दिया जाए। यदि वे शव गांवों में पहुंचते तो कितना गुस्सा भड़कता। हम इसकी कल्पना ही कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में तो पूरा गुजरात ही जल जाता, लेकिन नरेंद्र मोदी ने साहस दिखाया और हालात को संभाल लिया। उन्होंने कहा कि इसी का परिणाम था कि दंगे अहमदाबाद और उसके आसपास के इलाके में ही हुए। पूरे गुजरात में स्थिति नहीं बिगड़ी।

हाईवे पर फंसे मालवाहक वाहन, भाड़ा भी नहीं मिलेगा; बर्बाद हो रही लाखों की सब्जियां

हिमाचल  चंडीगढ़-मनाली नेशनल हाईवे पिछले तीन दिनों से पंडोह से औट के बीच बंद है, जिससे कुल्लू-मनाली और लाहौल-स्पीति की ओर जाने वाले सैकड़ों मालवाहक वाहन फंस गए हैं। इन ट्रकों में फल, सब्जियां और अन्य जरूरी सामान लदा है, जो अब खराब होने लगा है। सोमवार को कुछ समय के लिए सड़क खोली गई थी, लेकिन भारी बारिश के कारण यह फिर से बंद हो गई। दवाड़ा में सबसे ज्यादा नुकसान हाईवे को सबसे ज्यादा नुकसान दवाड़ा के पास हुआ है, जहाँ ब्यास नदी का पानी हाईवे पर आ गया और सड़क का एक बड़ा हिस्सा बह गया। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से आ रहे ये ट्रक 9 मील के पास खुले मैदानों में खड़े हैं। ट्रक चालक तीन दिनों से यहाँ फंसे हुए हैं, जिससे उनकी चिंताएँ बढ़ गई हैं। चालकों का दर्द: "अब तो भाड़ा भी नहीं मिलेगा" एक ट्रक चालक ने बताया कि तीन दिन से हाईवे पर फंसे होने के कारण उनके ट्रक में लदी हुई सारी सब्जियां और फल सड़ने लगे हैं। उनका कहना है कि इस नुकसान की भरपाई करना मुश्किल है, क्योंकि उन्हें अब भाड़ा भी नहीं मिलेगा। कुछ अन्य चालकों ने कहा कि उन्होंने कभी भी हाईवे की ऐसी खराब हालत नहीं देखी। हालाँकि, प्रशासन की तरफ से फंसे हुए चालकों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था की गई है, लेकिन खराब हो रहे सामान की वजह से चालकों की परेशानी कम नहीं हो रही है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से अपील की है कि इस सड़क को जल्द से जल्द खोला जाए और इसका रखरखाव बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) को सौंपा जाए। प्रशासन का बयान: युद्ध स्तर पर चल रहा काम मंडी जिला प्रशासन ने बताया कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) और लोक निर्माण विभाग (PWD) की टीमें सड़क बहाली के काम में जुटी हुई हैं। सड़क खोलने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है। प्रशासन ने यह भी जानकारी दी है कि मंडी से कुल्लू जाने वाले वैकल्पिक मार्ग, कटौला रोड को भी जल्द से जल्द ठीक करने की कोशिशें की जा रही हैं। यह स्थिति न केवल चालकों के लिए, बल्कि कुल्लू-मनाली में जरूरी सामान की सप्लाई पर भी असर डाल रही है। प्रशासन का कहना है कि वे इस समस्या को जल्द से जल्द हल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।  

ट्रंप भारत संग कर रहे थे बड़ी डील की बात, अचानक क्यों बिगड़ गया माहौल?

वाशिंगटन  भारत पर अमेरिकी टैरिफ की मार जारी है। बुधवार से अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी लागू हो गया। इसके साथ ही भारतीय निर्यात पर अब कुल 50 फीसदी शुल्क लगेगा। खास बात है कि भारत और ब्राजील दो ही ऐसे देश हैं, जिनपर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इतना टैरिफ लगाया है। सवाल है कि आखिर कैसे बड़े सहयोगी माने जाने वाले दो देश व्यापार के लिहाज से तकरार का सामना कर रहे हैं। ट्रंप क्या बताते हैं ज्यादा टैरिफ की वजह जुलाई में जब ट्रंप ने भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगाया तो इसकी वजह ब्रिक्स बताई। तब उन्होंने कहा था, 'हम अभी बातचीत कर रहे हैं और इसमें ब्रिक्स का मसला भी शामिल है। आप जानते हैं, ब्रिक्स अमेरिका विरोधी देशों का एक समूह है और भारत इसका सदस्य है। यह अमेरिकी मुद्रा पर हमला है और हम किसी को भी ऐसा नहीं करने देंगे।' ट्रंप ने घाटे की भी बात कही थी। उन्होंने कहा था, 'यह निर्णय आंशिक रूप से ‘ब्रिक्स’ की वजह से लिया गया है और इसमें कुछ हद तक घाटे की भूमिका है। हमें बहुत बड़ा घाटा हुआ है। जैसा कि आप जानते हैं, प्रधानमंत्री मोदी मेरे मित्र हैं लेकिन वे हमारे साथ व्यापार के मामले में बहुत ज्यादा जुड़े नहीं हैं।' 7 महीनों में ऐसा क्या हो गया फरवरी- भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिका के साथ सीमित व्यापार समझौते और साल 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 बिलियन डॉलर तक करने पर सहमत हुए। साथ ही उन्होंने अमेरिका से ऊर्जा खरीद में भी इजाफा का वादा किया था। मार्च- केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल वॉशिंगटन पहुंचते हैं और ट्रंप सरकार में मंत्री हॉवर्ड लुटनिक से मुलाकात करते हैं। साथ ही उन्होंने अधिकारी जैमिसन ग्रीर से भी चर्चा की। इसके बाद मार्च में ही अमेरिकी अधिकारी बातचीत के लिए दिल्ली पहुंचे थे। तब तक भारत ने कहा था कि अमेरिका के साथ अच्छी चर्चा चल रही है। खबर है कि एक रिपोर्ट में भारत की तरफ से लगाए जाने वाले भारी टैरिफ, डेटा कानून और पेटेंट के मुद्दे का जिक्र किया गया था। अप्रैल- उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भारत पहुंचे और द्विपक्षीय वार्ता की रूपरेखा तैयार हुई। तब भारतीय अधिकारियों की तरफ से कहा गया था कि 9 जुलाई की डेडलाइन से पहले डील साइन हो जाएगी। मई- गोयल ने फिर वॉशिंगटन का दौरा किया और इस बार उनके साथ बड़े वार्ताकार राजेश अग्रवाल भी थे। कहा जा रहा था कि भारत को अच्छे नतीजों की उम्मीद थी। जून- अमेरिका के वाणिज्य मंत्री लुटनिक 3 जून को भारत आते हैं। उन्होंने कहा था कि भारत और अमेरिका अच्छी प्रगति कर रहे हैं और जल्द ही डील पर अंतिम मुहर लग सकती है। खुद ट्रंप ने भी कहा था कि भारत के साथ बड़ी डील होने वाली है। रॉयटर्स से बातचीत में भारतीय अधिकारियों ने बताया था कि खासतौर से कृषि उत्पादों पर इम्पोर्ट ड्यूटी के मामले में असहमति होने के चलते बातचीत रुक गई है। इसके बाद 20 जून को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि उन्होंने ट्रंप का अमेरिका आने का न्योता अस्वीकार कर दिया था। जुलाई- गोयल ने 4 जुलाई को कहा था कि भारत डेडलाइन के लिए डील नहीं करेगा और राष्ट्र के हित को सबसे ऊपर रखा जाएगा। इसके बाद 15वें दौर की बातचीत के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल एक बार फिर अमेरिका पहुंचा। खास बात है कि उस दौरान ट्रंप लगातार दावा कर रहे थे कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष को रुकवाया। पीएम मोदी ने जुलाई में संसद में कहा कि 'विश्व के किसी भी नेता ने हमें ऑपरेशन रोकने के लिए नहीं कहा।' इसके बाद 31 जुलाई को ट्रंप ने पहली बार भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने का ऐलान किया। अगस्त- 7 अगस्त को ही नए टैरिफ रेट लागू हुए थे कि कुछ समय बाद ट्रंप ने 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क की भी घोषणा कर दी। इससे पहले पीएम मोदी ने कहा था कि भारत किसानों के हित से समझौता नहीं करेगा। खास बात है कि 25-29 अगस्त के बीच भारत आ रहे अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा रद्द हो गई। इधर, पीएम मोदी ने चीन जाने की तैयारी कर ली थी। इन मुद्दों पर फंसा पेंच रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों का कहना है कि कई स्तर पर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। खासकर अमेरिका चाहता है कि उसके डेयरी और कृषि से जुड़े उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ती दरों पर बेचे जाएं। इसके लिए बीटीए के तहत भारत आयात शुल्क में रियायत दे, जिस पर भारत सहमत नहीं है। भारत उन उत्पादों को समझौते में शामिल नहीं करना चाहता है या फिर उन उत्पादों पर आयात शुल्क कम करने को तैयार नहीं है, जिनसे घरेलू बाजार, उद्योग और किसान प्रभावित हों। क्या चाहता है भारत रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित व्यापार समझौते के तहत भारत श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लेकर विशेष शुल्क रियायत देने की मांग कर रही है। इनमें वस्त्र, रत्न एवं आभूषण, चमड़े के सामान, परिधान, प्लास्टिक, रसायन, झींगा, तिलहन, अंगूर और केले जैसे उत्पाद शामिल हैं। समझौते के तहत भारत अतिरिक्त शुल्क (26 प्रतिशत) को हटाने की मांग कर रहा है। वहीं, स्टील और एल्युमीनियम (50 प्रतिशत) और ऑटो क्षेत्र (25 प्रतिशत) के शुल्क भी कमी चाहता है।  

मोहन भागवत का बड़ा बयान: हिंदू राष्ट्र सत्ता की राजनीति से अलग

नई दिल्ली ऐसे समय में जब देश में हिंदू राजनीति अपने चरमोत्कर्ष की ओर जा रही हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का मंगलवार को दिया गया भाषण महत्वपूर्ण हो जाता है. भागवत कहते हैं कि हिंदू राष्ट्र शब्द का सत्ता से कोई मतलब नहीं है. भाजपा सरकार पर विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि वह इस विचारधारा को सत्ता पाने और उसमें बने रहने के औजार के रूप में इस्तेमाल करती है. आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि संघ बीजेपी को समय समय पर बौद्धिक खुराक देता रहा है. अपने तमाम मतभेदों के बावजूद संघ और बीजेपी एक बिंदु पर जाकर एक हो जाते हैं. जाहिर है कि भागवत का कथन सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि संघ की मूल वैचारिक धारा को तो व्यक्त करता ही है देश में सत्तासीन बीजेपी सरकार के लिए एक दिशा का निर्धारण भी करता है. पर सवाल यह है कि संघ प्रमुख के इस बयान के मायने क्या हैं?  क्या यह सीधे -सीधे बीजेपी नेताओं को संदेश देता है? राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश भागवत का यह ताज़ा बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्ष भाजपा पर लगातार यह आरोप लगा रहा है कि वह बहुसंख्यकवाद और ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रही है. भाजपा लगातार दूसरी बार केंद्र में सत्तासीन है और कई राज्यों में भी उसके हाथ में ताकत है. ऐसे में संघ प्रमुख का यह कहना कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ सत्ता से नहीं है, एक राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है. इसके साथ ही इस तरह भी देखा जा सकता है कि संघ अब बीजेपी को हिंदू राष्ट्र के मुद्दे को थोड़ा नरम करके चलने का संकेत देना चाहता हो. आरएसएस अपनी स्थापना के शुरुआती दिनों से ही हिंदू राष्ट्र की बात पर मुखर रहा है. गोलवलकर, जिन्हें गुरुजी कहा जाता है ने इसे परिभाषित करते हुए कहा था कि भारत की आत्मा हिंदू है और यहां की संस्कृति की जड़ें हिंदुत्व से निकली हैं. संघ का शुरू से ही मानना रहा है कि हिंदू शब्द सिर्फ धार्मिक नहीं है. इसमें सभ्यता, परंपरा, जीवनशैली और सामाजिक मूल्य सभी शामिल हैं. यही कारण है कि संघ हमेशा कहता रहा कि मुसलमान, ईसाई, पारसी या अन्य धार्मिक समूह भी इस राष्ट्र के उतने ही हिस्से हैं, जितने हिंदू.  संघ अपनी पुरानी लाइन पर] बीजेपी के लिए इस बयान की टाइमिंग महत्वपूर्ण इसलिए यह बिल्कुल सीधा और साफ है कि भागवत का बयान संघ की पुरानी लाइन को ही दोहराता हैृ.चूंकि आरएसएस सीधे सत्ता की राजनीति में शामिल नहीं होता.  संघ की असली ताकत समाज-निर्माण, शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक कार्य में है. इसलिए संघ प्रमुख के इस बात में कुछ भी नया नहीं है कि हिंदू राष्ट्र का लक्ष्य संसद में बहुमत पाना नहीं है, बल्कि समाज को ऐसा बनाना है जिसमें नैतिकता, समरसता और सांस्कृतिक एकता हो. हां लेकिन उनकी इस बात की टाइमिंग महत्वपूर्ण है. यह हो सकता है कि संघ प्रमुख बीजेपी के लिए कोई सीमा रेखा खींच रहे हैं या अल्पसंख्यकों को कोई संदेश दे रहे हों. अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर बीजेपी से नरम रुख चाहता है संघ दरअसल भारत में हिंदू राष्ट्र का सीधा संबंध अक्सर मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना से लिया जाता है. विपक्ष इसे बहुसंख्यकवादी एजेंडा मानता है. यही कारण रहा है कि कांग्रेस नेताओं के मुंह से बीजेपी के बजाय आरएसएस के लिए ज्यादा अपशब्द निकलता रहा है. शायद यही कारण है कि भागवत कहते हैं कि हिंदू राष्ट्र का सत्ता से कोई संबंध नहीं है तो यह संदेश जाता है कि संघ का उद्देश्य किसी पर वर्चस्व थोपना नहीं है. बल्कि यह अवधारणा सबको साथ लेकर चलने वाली सांस्कृतिक पहचान की है. जरूरी बात यह है कि संघ यह बात बार-बार क्यों दुहरा रहा है. कहीं यह बीजेपी को अगले विधानसभा चुनावों के लिए इशारा तो नहीं है  . क्योंकि भारतीय जनता पार्टी बिहार और बंगाल विधानसभा चुनावों में डेमोग्रेफी चेंज और मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर अल्पसंख्यकों पर लगातार जुबानी हमले कर रही है. हो सकता है कि संघ यह चाहता हो कि बीजेपी को अपने रुख में थोड़ी नरमी लानी चाहिए. बेरोजगारी जैसे बुनियादी मुद्दों पर भी फोकस जरूरी भागवत का बयान भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से यह याद दिलाता है कि संघ की दृष्टि सत्ता से आगे है. भाजपा हिंदू राष्ट्र को राजनीतिक नारे के रूप में इस्तेमाल सत्ता हासिल करने के लिए कर सकती है. भागवत का यह बयान केवल वैचारिक नहीं बल्कि जमीनी राजनीति से भी जुड़ा हो सकता है .क्योंकि बार-बार यह सवाल उठ रहा है कि देश में बेरोजगारी, किसान संकट जैसे मुद्दे हिंदू-मुसलमान की राजनीति के चलते गौण हो गए हैं. संघ शायद यह संदेश देना चाहता है कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ इन समस्याओं से मुंह मोड़ना नहीं बल्कि इन्हें समाज-आधारित समाधान देना है. भागवत के इस उपदेश का भविष्य में ये असर हो सकता है. -भाजपा-विरोधी दलों का आरोप कमजोर हो सकता है कि हिंदू राष्ट्र सिर्फ सत्ता हथियाने का औजार है. -भाजपा को अपनी भाषा और नीतियों में “समावेशिता” दिखानी पड़ सकती है. -अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश भी जाएगा कि भारत का राष्ट्रवाद अधिनायकवादी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और समावेशी है. -भागवत का कहना है कि स्वाभाविक धर्म समन्वय है संघर्ष नहीं है. इससे कम से कम हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन धर्म में तो समन्वय दिखाई ही देगा. राष्ट्रवादी मुसलमानों में भी हिंदू धर्म के साथ समन्वयव की उम्मीद जगेगी.