samacharsecretary.com

कच्चे से पक्के आशियाने का सफर, जनमन योजना ने रनिया बाई को दिया सम्मानभरा जीवन

रायपुर कभी भिक्षाटन और दिहाड़ी मजदूरी से जीवन यापन करने वाली श्रीमती रनिया बाई के परिवार के लिए हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता था। कोरिया जिला के बैकुण्ठपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत गढ़तर में रहने वाला यह परिवार कच्ची झोपड़ी में मौसम की मार झेलते हुए जीवन गुजार रहा था। पति अवतार साय के साथ रनिया बाई को जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत अकुशल श्रम में रोजगार मिलने लगा, तब कुछ राहत मिली, लेकिन स्थायी आवास का सपना अब भी दूर था। परिस्थितियां तब बदलीं जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की दूरदर्शी पहल पर संचालित ‘प्रधानमंत्री जनमन योजना‘ के अंतर्गत उन्हें पक्के मकान के लिए सहायता स्वीकृत हुई। ग्राम पंचायत के सहयोग और अपनी मेहनत से उन्होंने नया पक्का घर बनाया। अब उनके पास सुरक्षित आवास और शौचालय की सुविधा है। रनिया बाई बताती हैं कि बरसात की रातें अब चिंता में नहीं, सुकून में गुजरती हैं। बच्चों के भविष्य को लेकर भी मन में विश्वास जागा है। सिर्फ आवास ही नहीं, बल्कि अंत्योदय राशन कार्ड से नियमित खाद्यान्न और आयुष्मान भारत योजना के तहत स्वास्थ्य सुरक्षा ने उनके जीवन को स्थिरता दी है। साथ ही राष्ट्रीय पेंशन योजना का लाभ भी मिल रहा है।   शासन की योजनाओं का समुचित लाभ मिलने से एक निराश्रित परिवार की जिंदगी में आशा, सुरक्षा और आत्मविश्वास का नया अध्याय जुड़ गया है।

जल संरक्षण के साथ ही ग्रामीण आजीविका संवर्धन का प्रभावी माध्यम

रायपुर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना: मजबूत हुई आजीविका की राह जिले के विकासखण्ड लोरमी अंतर्गत ग्राम पंचायत औराबांधा में एक छोटी-सी पहल ने ग्रामीण आजीविका को नई दिशा दी है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत हितग्राही किसान किशन सिंह के खेत में निर्मित “आजीविका डबरी” आज जल संरक्षण, सिंचाई और मछली पालन का सशक्त माध्यम बन चुकी है। हितग्राही किशन सिंह ने बताया कि पहले सिंचाई के लिए पानी की कमी बनी रहती थी, लेकिन अब डबरी बनने से खेत में वर्षभर पानी उपलब्ध रहेगा और मछली पालन से आय भी बढ़ेगी।  जिले में कलेक्टर  कुन्दन कुमार एवं जिला पंचायत सीईओ  प्रभाकर पाण्डेय के मार्गदर्शन में आजीविका डबरी न केवल जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि ग्रामीण आजीविका संवर्धन का भी प्रभावी माध्यम बन रहा है। योजना के तहत स्वीकृत 1.94 लाख रुपये की लागत से इस डबरी का निर्माण कराया गया। कार्य के दौरान कुल 792 मानव दिवस सृजित किए गए, जिससे स्थानीय मजदूरों को गांव में ही रोजगार मिला और पलायन में कमी आई। निर्मित डबरी अब खेतों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है। वर्षा जल संचयन और भू-जल रिचार्ज के माध्यम से सिंचाई सुविधा सुनिश्चित हुई है, जिससे खरीफ और रबी दोनों मौसमों में फसल उत्पादन की संभावना बढ़ी है। पहले जहां पानी की कमी के कारण फसल प्रभावित होती थी, वहीं अब किसान आत्मविश्वास के साथ बहुफसली खेती की ओर अग्रसर है। साथ ही, डबरी में मछली पालन की योजना से अतिरिक्त आय का स्थायी स्रोत विकसित हो रहा है, जो परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बना रहा है। जिले में आजीविका संवर्धन की दृष्टि से आजीविका डबरी निर्माण की अभिनव पहल व्यापक स्तर पर क्रियान्वित की जा रही है। वर्ष 2025-26 हेतु कुल 285 डबरी निर्माण कार्य स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से 218 कार्य प्रारंभ हो चुके हैं और 20 पूर्ण किए जा चुके हैं। शेष कार्यों को मार्च 2026 तक पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित है। यह पहल जल संरक्षण के साथ-साथ कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन को एकीकृत कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

पिता के संघर्ष को मिला साथ – चिरायु योजना ने बचाई अंजलि की जिंदगी

रायपुर  छत्तीसगढ़ शासन की अत्यंत महत्वाकांक्षी चिरायु योजना (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) आज प्रदेश में उन मासूमों के लिए जीवनदायिनी सिद्ध हो रही है, जो आर्थिक अभाव और सूचना की कमी के कारण इलाज की राह देख रहे थे। बस्तर की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और सुदूर वनांचल ग्रामों में जहाँ शिक्षा और सुगम आवागमन आज भी एक चुनौती है, वहां यह योजना न केवल बीमारियों की पहचान कर रही है, बल्कि बच्चों को उनके स्वास्थ्य का अधिकार दिलाकर धरातल पर एक सुखद बदलाव ला रही है। विकासखंड बस्तर के ग्राम भोंड की 6 वर्षीय बालिका अंजलि कश्यप की कहानी इसी संकल्प की एक जीवंत मिसाल है, जो जन्मजात नाक के बाहरी ट्यूमर जैसी गंभीर समस्या से जूझ रही थी। अंजलि के परिवार पर दुखों का पहाड़ तब टूटा जब इलाज की प्रारंभिक प्रक्रिया के दौरान ही उसके पिता का निधन हो गया। इस वज्रपात के बाद शिक्षा की कमी और घर की बिगड़ती आर्थिक स्थिति ने माँ देवकी को इतना हताश कर दिया कि उन्होंने सर्जरी का विचार त्याग दिया और इलाज के लिए स्पष्ट मना कर दिया। ऐसी कठिन परिस्थिति में चिरायु टीम ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। डॉ. गौरव चौरसिया और डॉ. रेखा जैन के नेतृत्व में समर्पित चिकित्सा दल ने बार-बार अंजलि के घर जाकर परिवार को भावनात्मक संबल दिया और बीमारी की गंभीरता समझाते हुए उन्हें उपचार के लिए प्रेरित किया। कलेक्टर के मार्गदर्शन में स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के समन्वय से न केवल निःशुल्क इलाज का भरोसा दिलाया गया, बल्कि दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद चिरायु वाहन के माध्यम से अंजलि को जिला अस्पताल महारानी जगदलपुर तक पहुँचाया गया। इस दौरान टीम ने बालिका का आयुष्मान कार्ड बनवाने में भी पूर्ण मार्गदर्शन प्रदान किया। अंततः 12 मई 2024 को रायपुर के नवकार हॉस्पिटल में प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. रमेश जैन द्वारा बालिका की सफल सर्जरी संपन्न की गई, जिससे अंजलि को एक नया चेहरा और नया जीवन प्राप्त हुआ। इस पूरी प्रक्रिया की सफलता में स्वास्थ्य विभाग के मैदानी अमले का विशेष योगदान रहा। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय बसाक और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की जिला कार्यक्रम प्रबंधक सु रीना लक्ष्मी के सटीक समन्वय से योजना का लाभ समय पर सुनिश्चित हुआ। वहीं जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र प्रबंधक  शिवम पाराशर द्वारा केस की निरंतर मॉनिटरिंग और वाहन प्रबंधन किया गया, जबकि खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. नारायण सिंह नाग और बीपीएम  राजेन्द्र कुमार बघेल ने जमीनी स्तर की बाधाओं को दूर किया। आज अंजलि पूर्णतः स्वस्थ है और उसकी खिलखिलाती मुस्कान चिरायु योजना की सार्थकता का प्रमाण दे रही है। अंजलि की माँ और समस्त ग्रामीणों ने शासन की इस कल्याणकारी पहल की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इसे बस्तर के वनांचल में उम्मीद की एक नई किरण बताया है।

पानी की जंग से मिली आज़ादी: जल जीवन मिशन ने बदली फुलमत बाई की तकदीर

रायपुर जल जीवन मिशन से बदली फुलमत बाई की जिंदगी आदिवासी बहुल कोरबा जिले के पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड के ग्राम नवापारा की 60 वर्षीय फुलमत बाई कभी पानी की एक-एक बूंद के लिए जूझा करती थीं। घर में नल नहीं होने के कारण उन्हें प्रतिदिन दो से तीन किलोमीटर दूर स्थित ढोढ़ी तक जाना पड़ता था। नाले के पास बने उस अस्थायी स्रोत से बड़े बर्तन में पानी भरकर सिर पर लादकर घर लाना उनकी मजबूरी ही नहीं, बल्कि दिनचर्या बन गई थी। बरसात के दिनों में फिसलन भरे रास्तों पर जोखिम उठाकर ढोढ़ी तक पहुँचना कठिन होता था और गर्मी के मौसम में पानी का स्तर घट जाने पर समस्या और भी विकराल रूप ले लेती थी। बकरी पालन से जीवन यापन करने वाली वृद्धा इस कष्ट को वर्षों से सहती आ रही थीं। लेकिन जल जीवन मिशन के अंतर्गत उनके घर में नल कनेक्शन लगने के बाद उनका जीवन बदल गया। अब रोज सुबह 8 बजे और शाम 4 बजे उनके नल से नियमित रूप से पानी उपलब्ध होता है। फुलमत बाई कहती हैं कि अब उन्हें ढोढ़ी तक नहीं जाना पड़ता, जिससे उनके समय, श्रम और स्वास्थ्य तीनों की बचत हो रही है। फुलमत बाई को महतारी वंदन योजना के तहत प्रतिमाह एक हजार रुपये भी प्राप्त होते हैं, जो उनके दैनिक खर्चों में बड़ी सहारा बनते हैं। सरकारी योजनाओं ने मिलकर उनके जीवन को सरल, सुरक्षित और सम्मानजनक बनाया है।

कच्चे से पक्के घर तक का सफर: पीएम आवास योजना से शिव शंकर के जीवन में आया बदलाव

रायपुर  शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से जरूरतमंद परिवारों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के माध्यम से सरगुजा जिले के लखनपुर नगर पंचायत में रहने वाले  शिव शंकर का वर्षों पुराना पक्का मकान का सपना साकार हुआ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व तथा मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के दृढ़ संकल्प से पात्र हितग्राहियों को आवास उपलब्ध कराने का कार्य प्राथमिकता से किया जा रहा है। इसी क्रम में शिव शंकर को योजना अंतर्गत स्वीकृत आवास का लाभ प्राप्त हुआ, जिससे उनका परिवार अब सुरक्षित एवं सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रहा है। कठिन परिस्थितियों से मिली राहत  शिव शंकर ने बताया कि पहले उनका परिवार जर्जर कच्चे मकान में रहा करता था। बारिश के दिनों में छत से पानी टपकने के कारण बच्चों सहित पूरे परिवार को गंभीर असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। सीमित आय और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते पक्का मकान बनवाना संभव नहीं हो पा रहा था। ऐसे समय में प्रधानमंत्री आवास योजना उनके लिए आशा की किरण बनकर आई। हितग्राही शिव शंकर ने प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी एवं मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि योजना के सहयोग से उन्हें पक्का घर मिला है, जिससे उनके परिवार को सुरक्षा और स्थायित्व प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि अब वे अपने बच्चों के साथ सुरक्षित वातावरण में सुख-चौन से रह रहे हैं और उनका वर्षों पुराना सपना पूरा हो गया है। समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य केवल आवास उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर जरूरतमंद परिवारों को सम्मानजनक जीवन प्रदान करना है। योजना के प्रभावी क्रियान्वयन से जिले में पात्र लाभार्थियों को पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से सीधे लाभ मिल रहा है।  

एक्सपोजर विजिट में सीखीं इंटीग्रेटेड फार्मिंग की बारीकियां

जगदलपुर बस्तर के नवाचार देख उत्साहित हुईं बिलासपुर की दीदियाँ छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में आजीविका के नए आयाम गढ़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए बिलासपुर जिले के बिल्हा ब्लॉक से आए 50 सदस्यीय दल ने बस्तर जिले का दो दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण किया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत आयोजित इस एक्सपोजर विजिट का मुख्य उद्देश्य बस्तर के जगदलपुर, लोहंडीगुड़ा और तोकापाल ब्लॉकों में संचालित सफल कृषि और पशुपालन मॉडल्स का गहन अध्ययन करना था। इस भ्रमण कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत जनपद पंचायत के सभागार में आयोजित एक विस्तृत तकनीकी सत्र से हुई, जहाँ पीपीटी प्रेजेंटेशन के माध्यम से इंटीग्रेटेड फार्मिंग क्लस्टर के क्रियान्वयन, किसानों के चयन की वैज्ञानिक प्रक्रिया और भविष्य की कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान बिलासपुर से आए प्रतिभागियों, समूह सदस्यों और कार्यालय स्टाफ को उप-समिति के कार्यों के साथ-साथ आजीविका सेवा केंद्रों द्वारा महिला किसानों को दिए जा रहे तकनीकी सहयोग की जानकारी दी गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि कैसे एक व्यवस्थित कार्ययोजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बना सकती है। सैद्धांतिक जानकारी प्राप्त करने के पश्चात दल ने क्षेत्र का भ्रमण कर जमीनी स्तर पर संचालित गतिविधियों का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। सदस्यों ने विशेष रूप से ब्रुडिंग सेंटर और उन्नत मुर्गी पालन की बारीकियों को समझा, जिसमें मुर्गियों के आहार प्रबंधन से लेकर टीकाकरण की महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसके साथ ही दल ने क्लस्टर के भीतर मछली पालन और बकरी पालन जैसे आजीविका के पूरक माध्यमों का भी अध्ययन किया। भ्रमण के दौरान बस्तर की दीदियों द्वारा अपनाई गई उन्नत सब्जी उत्पादन तकनीक, नर्सरी प्रबंधन और कीट-रोग नियंत्रण के तरीकों ने बिलासपुर के दल को खासा प्रभावित किया। केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि कटाई के बाद होने वाली ग्रेडिंग, पैकेजिंग और स्थानीय मंडियों के माध्यम से सीधे बाजार से जुड़कर बेहतर मूल्य प्राप्त करने की रणनीति भी साझा की गई। बस्तर की दीदियों के द्वारा बुक्स ऑफ रिकॉर्ड के सटीक संधारण और उनके आत्मविश्वास ने आगंतुक दल के भीतर एक नया उत्साह भर दिया। 24 से 25 फरवरी तक आयोजित यह दो दिवसीय दौरा न केवल ज्ञानवर्धन का माध्यम बना, बल्कि दो अलग-अलग जिलों के महिला समूहों के बीच तकनीकी कौशल और अनुभवों को साझा करने का एक सशक्त मंच भी साबित हुआ। इस पूरी यात्रा ने प्रतिभागियों को यह विश्वास दिलाया कि समेकित खेती और आधुनिक मार्केटिंग के तालमेल से ग्रामीण जीवन में आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खोले जा सकते हैं।

पानी पहुंचा तो आई मुस्कान, ठरकपुर में विकास की नई कहानी

रायपुर जल जीवन मिशन से मुंगेली जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर ग्राम ठरकपुर में हर घर नल, हर घर जल का सपना साकार हुआ है। मिशन के अंतर्गत ठरकपुर में पाइपलाइन बिछाकर प्रत्येक घर को नल कनेक्शन प्रदान किया गया है। इसके बाद से गांव में न केवल पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है, बल्कि पानी की गुणवत्ता और नियमितता भी बेहतर हुई है। अब गांव के हर घर में स्वच्छ पेयजल पहुंच रहा है। इसने ठरकपुर की कहानी बदल गई है। कभी पेयजल संकट से जूझने वाले ठरकपुर की तस्वीर आज पूरी तरह बदल चुकी है। एक समय था जब पानी के लिए हैंडपंपों पर लंबी कतारें, मटकों और बाल्टियों के साथ ग्रामीणों की भीड़ तथा गर्मी के दिनों में गांव में जल संकट होता था। पहले पूरा गांव पेयजल के लिए 8 हैंडपंपों के भरोसे था। गर्मियों में जलस्तर गिरने से ये हैंडपंप अक्सर जवाब दे जाते थे, जिससे ग्रामीणों विशेषकर महिलाओं को दूर-दराज के जल स्रोतों से पानी लाने मजबूर होना पड़ता था। ठरकपुर की श्रीमती गंगा यादव बताती हैं कि पहले छोटे बच्चों को घर पर छोड़कर दूर हैंडपंप से पानी लाना पड़ता था। गर्मी में बहुत परेशानी होती थी। अब घर में नल लग गया है, भरपूर पानी मिल रहा है और जीवन आसान हो गया है। नल जल योजना से महिलाओं की मेहनत और समय की बचत हो रही है, जिसे अब वे परिवार, बच्चों की देखभाल और अन्य रचनात्मक कार्यों में लगा पा रही हैं, इससे वहां की महिलाओं के चेहरे में मुस्कान आई है। ठरकपुर में जल जीवन मिशन केवल पानी की व्यवस्था नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सुविधा और सम्मान का माध्यम बनकर आया है। स्वच्छ जल से बीमारियों में कमी आई है और ग्रामीणों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है।

टेलरिंग के व्यवसाय में पूजा देवांगन को मिला मजबूत आधार

रायपुर कोरबा जिले की रहने वाली पूजा देवांगन आज आत्मनिर्भरता और नारी सशक्तिकरण की एक प्रेरणादायी मिसाल बन चुकी हैं। सिलाई-कढ़ाई के क्षेत्र में आगे बढ़ने की उनकी इच्छा ने उन्हें लाईवलीहुड कॉलेज कोरबा तक पहुँचाया, जहाँ से उनके जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन की शुरुआत हुई। उन्होंने सबसे पहले टेलर दर्जी के बेसिक प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। यह उनके लिए वह पहला अवसर था, जिसने आगे उनकी प्रगति को गति दी। सात दिवस का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें चार हजार रुपये की स्टाइपेंड राशि और एक लाख रुपये तक का बिना गारंटर लोन प्राप्त हुआ, जिसके सहारे उन्होंने अपने छोटे व्यवसाय के काम को आगे बढ़ाना शुरू किया। अपने कौशल को और निखारने के उद्देश्य से पूजा ने आगे एडवांस टेलर दर्जी प्रशिक्षण में प्रवेश लिया। पंद्रह दिवसीय इस प्रशिक्षण ने उन्हें आधुनिक तकनीकों, नए तरीकों से डिज़ाइन तैयार करने और उन्नत उपकरणों के उपयोग की विस्तृत जानकारी प्रदान की। इस दौरान उन्हें प्रतिदिन पाँच सौ रुपये के मान से कुल साढ़े सात हजार रुपये स्टाइपेंड और एक हजार रुपये यात्रा भत्ता भी मिला। साथ ही उन्हें दो लाख रुपये तक का बिना गारंटर ऋण स्वीकृत होने का लाभ भी प्राप्त हुआ, जिससे उनके बढ़ते व्यवसाय को मजबूत आधार मिला। धीरे-धीरे पूजा ने अपने हुनर को कार्य में बदलना शुरू किया और घर पर ही सिलाई का काम शुरू कर दिया। उनके परिश्रम, प्रशिक्षण से मिले आत्मविश्वास और वित्तीय सहायता ने मिलकर उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाया। आज पूजा अपने परिवार की मजबूती का आधार हैं और अपने व्यवसाय को विस्तार देने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। उनका यह सफर अनेक महिलाओं के लिए भी प्रेरणादायी है कि अवसर, दृढ़ इच्छाशक्ति और सही मार्गदर्शन मिल जाए तो हर महिला आत्मनिर्भर बन सकती है और अपने सपनों को साकार कर सकती है।

विदेशी मेहमानों ने बढ़ाई गिधवा टैंक की शान, मल्लार्ड के आगमन से खिला पर्यटन

रायपुर छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध पक्षी विहार क्षेत्र गिधवा टैंक में इस वर्ष अक्टूबर 2025 में एक खास प्रवासी मेहमान ने दस्तक दी। यह मेहमान है सुंदर और आकर्षक जलपक्षी मल्लार्ड बत्तख, जिसने पहली बार यहां अपना आगमन दर्ज कराया।        लंबी प्रवासी यात्रा पूरी कर आई यह मल्लार्ड गिधवा टैंक के शांत और स्वच्छ वातावरण में सहज रूप से बस गई। यहां उपलब्ध सुरक्षित आवास, भरपूर जल और प्राकृतिक भोजन ने उसे रुकने के लिए अनुकूल माहौल दिया। धीरे-धीरे वह अन्य स्थानीय और प्रवासी पक्षियों के साथ घुल-मिल गई और क्षेत्र का हिस्सा बन गई। गिधवा टैंक अपनी समृद्ध जैव-विविधता और पक्षी प्रेमियों के लिए विशेष पहचान रखता है। मल्लार्ड के आगमन से यह क्षेत्र और भी आकर्षण का केंद्र बन गया है। पक्षी प्रेमी और प्रकृति पर्यवेक्षक इस दुर्लभ अतिथि को देखने और उसके व्यवहार का अध्ययन करने के लिए उत्साहित हैं।       यह इस बात का प्रमाण है कि राज्य में जलाशयों के संरक्षण, स्वच्छता और पर्यावरण सुरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयास सफल हो रहे हैं। सुरक्षित और अनुकूल वातावरण मिलने पर प्रवासी पक्षी यहां रुकना पसंद कर रहे हैं। स्थानीय प्रशासन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभागों द्वारा निरंतर संरक्षण कार्य, जनजागरूकता और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के कारण गिधवा टैंक आज प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय बन चुका है।        मल्लार्ड का यह आगमन न केवल क्षेत्र की प्राकृतिक समृद्धि को दर्शाता है, बल्कि छत्तीसगढ़ की पारिस्थितिक महत्वता को भी उजागर करता है। यह कहानी बताती है कि जब संरक्षण और संवर्धन के प्रयास लगातार किए जाते हैं, तो प्रकृति भी सकारात्मक परिणाम देती है।

मेहनत, हुनर और आत्मनिर्भरता – रेबेका की सफलता ने लिखी नई कहानी

रायपुर बहुआयामी व्यवसाय से संवरा जीवन, रेबेका बनीं ‘लखपति दीदी’राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित एक गरीबी उन्मूलन परियोजना है। यह योजना स्वरोजगार को बढ़ावा देने और ग्रामीण गरीबों को संगठित करने पर केंद्रित है। इस कार्यक्रम का मूल विचार गरीबों को स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित करना और उन्हें स्वरोजगार के लिए सक्षम बनाना है।     बलरामपुर जिले के ग्राम पंचायत चिलमा की  रेबेका ने आत्मविश्वास, मेहनत और समूह की ताकत से अपनी जिंदगी की दिशा बदल दी है। कभी मजदूरी पर निर्भर उनका परिवार सीमित आय के कारण आर्थिक तंगी से जूझता था, लेकिन आज वही रेबेका बहुआयामी व्यवसाय के जरिए सालाना लगभग 1 लाख 71 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं और क्षेत्र में ‘लखपति दीदी’ के रूप में पहचानी जा रही हैं।          रेबेका ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के तहत स्वयं शक्ति महिला स्व-सहायता समूह से जुड़कर नई शुरुआत की। समूह के माध्यम से उन्हें नियमित बचत, आंतरिक ऋण और स्वरोजगार संबंधी प्रशिक्षण की जानकारी मिली। उन्होंने समूह से ऋण लेकर बागवानी, बकरी पालन, मुर्गी पालन, किराना दुकान संचालन तथा कृषि कार्य जैसे विविध व्यवसाय शुरू किए।         बहुआयामी आजीविका मॉडल अपनाने से उनकी आय के कई स्रोत बने, जिससे आमदनी स्थिर और सतत हुई। आय में वृद्धि के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है। अब वे बच्चों की शिक्षा, बेहतर पोषण और घर की आवश्यकताओं की पूर्ति सहजता से कर पा रही हैं।       रेबेका बताती हैं कि बिहान से जुड़ने के बाद उन्हें न केवल आर्थिक सहयोग मिला, बल्कि आत्मविश्वास और प्रबंधन कौशल भी विकसित हुआ। आज वे आत्मनिर्भर बनकर अन्य महिलाओं को भी स्वयं सहायता समूह से जुड़कर स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।