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कैंसर जांच में बड़ी सफलता: IIT दिल्ली ने 60 रुपए में पैंक्रियाज कैंसर टेस्ट का दावा किया

अंबाला. बब्याल के रहने वाले एवं आइआइटी दिल्ली के छात्र शिवम ने शोध कर पैंक्रियाज कैंसर की बीमारी की जांच के लिए उपकरण यूरोस्मार्ट बनाया है। शिवम का दावा है कि इससे यूरिन (पेशाब) के सैंपल से शरीर में पैंक्रियाज कैंसर का पता चल जाएगा। कुछ लोगों पर इसका टेस्ट भी किया गया है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। शिवम ने इस उपकरण के पेटेंट के लिए आवेदन किया है। इससे सिर्फ 60 रुपये में जांच हो सकेगी। उम्मीद है कि जल्द ही यह बाजार में उपलब्ध होगा, जिसके लिए एक प्रक्रिया से गुजरना होगा। वर्ष 2024 में शिवम कुमार बग्गन, कुशाग्र जैन, खालिद भट्ट और प्रो. नवीन की टीम ने शोध शुरू किया था। यह एक साइंस जर्नल में प्रकाशित भी हो चुका है। ऐसे काम करता उपकरण शिवम ने बताया कि यूरोस्मार्ट उपकरण सेंसर पर काम करता है। इस में पोटेंशियो स्टेट सेंसर लगाया है, जो मोबाइल से जुड़ा होता है। मरीज का यूरिन सैंपल इस उपकरण में लिया जाता है। इस पर एक बटन लगाया गया है, जिसे दबाना होता और यूरिन की एक बूंद सेंसर पर पहुंच जाती है। इसके बाद सारा काम सेंसर करता है। करीब 15 मिनट का समय लगता है और रिपोर्ट मोबाइल पर आ जाती है और स्पष्ट हो जाता है कि मरीज को पैंक्रियाज कैंसर है या नहीं। यह जांच ब्लड से होती है, जिसमें काफी समय लगता है। जिसे पैंक्रियाज कैंसर होगा, उसका शरीर बायोमार्कर सीए 19.9 रिलीज करता है। यह ब्लड और यूरिन दोनों में पाया जाता है। अभी इसका ट्रायल प्रथम चरण में है। उम्मीद है कि जल्द ही यह उपकरण बाजार में उपलब्ध होगा। यह है पैंक्रियाज कैंसर पैंक्रियाज कैंसर एक गंभीर बीमारी है जो पैंक्रियाज में कोशिकाओं के अनियंत्रित रूप से बढ़ने के कारण होता है। यह पाचन एंजाइम और इंसुलिन बनाने वाली ग्रंथि को प्रभावित करता है। शुरुआत में इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होता और देरी से पता चलने के कारण यह और घातक हो जाता है। यही कारण है कि इस तरह का कैंसर काफी घातक हो जाता है, जबकि उपचार काफी महंगा है। आइआइटी दिल्ली के प्रो. एवं शोध टीम के नेतृत्वकर्ता डॉ. नवीन कुमार सिंह ने बताया कि सुबह का पहला यूरिन जांच के लिए बेहतर होता है, क्योंकि इसमें इन्फार्मेशन अधिक होती है। इस टेस्ट में यदि रीडिंग 37 यूनिट प्रति एमएल से नीचे आती है तो पैंक्रियाज कैंसर नहीं मान सकते, जबकि इससे अधिक यह जितना अधिक जाएगा उतना कैंसर माना जाता है। अब इस उपकरण को लेकर एम्स में जा रहे हैं, जहां आगामी प्रक्रिया अपनाई जाएगी। उपचार की निगरानी में इस्तेमाल हो सकता: डॉ. यशपाल कैंसर विशेषज्ञ एवं अटल कैंसर केयर सेंटर के निदेशक डा. यशपाल वर्मा का कहना है कि सीए 19-9 एक गैर-विशिष्ट परीक्षण है, इसलिए स्वास्थ्य सेवा प्रदाता इसे एक स्वतंत्र नैदानिक उपकरण के रूप में उपयोग करने के बजाय, उपचार की निगरानी और पुनरावृत्ति का पता लगाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। पित्त की पथरी और अग्नाशयशोथ जैसी सामान्य स्थितियों में भी इसका स्तर अधिक हो सकता है।

शिक्षकों को राहत: चाइल्ड केयर लीव पर DC की अनुमति की बाध्यता खत्म

चंडीगढ़. शिक्षा विभाग में अब शिक्षकों और गैर शिक्षक कर्मचारियों को बाल देखभाल अवकाश (सीसीएल) के लिए उपायुक्तों से मंजूरी नहीं लेनी पड़ेगी। शिक्षक संगठनों के विरोध के चलते शिक्षा विभाग ने नौ मार्च को जारी किया गया आदेश वापस ले लिया है, जिसमें बाल देखभाल अवकाश के लिए जिला उपायुक्त की अनुशंसा अनिवार्य की गई थी। माध्यमिक शिक्षा विभाग के महानिदेशक जितेंद्र कुमार ने सोमवार को पत्र जारी कर सभी उपायुक्तों और जिला शिक्षा अधिकारियों सहित सभी संबंधित अधिकारियों को नए फैसले से अवगत कराते हुए निर्देशों का पालन करने को कहा है। सीसीएल के लिए उपायुक्तों की अनुशंसा समाप्त किए जाने से अब शिक्षकों और गैर शिक्षक कर्मचारियों के आवेदन पर स्वीकृति मिलने में अनावश्यक देरी नहीं होगी। सीसीएल से संबंधित मामलों को जिला उपायुक्त की अनुशंसा के बाद मुख्यालय भेजने संबंधी आदेश को वापस लिए जाने का स्वागत करते हुए हरियाणा स्कूल लेक्चरर एसोसिएशन (हसला) के राज्य प्रधान सतपाल सिंधु ने कहा कि विगत 15 जून को उन्होंने शिक्षा महानिदेशक के साथ बैठक में यह मुद्दा उठाया था। सीसीएल फाइलों को उपायुक्त के माध्यम से भेजने संबंधी अनिवार्यता समाप्त होने के बाद अब उम्मीद है कि जल्द ही स्नातकोत्तर शिक्षक (पीजीटी) से प्रिंसिपल पदोन्नति (आरओएच) के मामले भी निपटाए जाएंगे। शिक्षा महानिदेशक की ओर से मेवात क्षेत्र के पीजीटी से प्रिंसिपल पदोन्नति संबंधी फाइल पर भी तेजी दिखाई गई है। इसके अलावा वर्ष 2016 से अब तक की वरिष्ठता सूची तैयार करने के लिए गठित समिति को भी निदेशक ने मंजूरी प्रदान कर दी है। समिति को तत्काल प्रभाव से कार्य शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि लंबे समय से लंबित इस प्रक्रिया को शीघ्र पूरा किया जा सके। यात्रा रियायत भत्ता (टीए) और महंगाई भत्ता (डीए) को वेतन की तर्ज पर नियमित रूप से वितरित करने के प्रस्ताव को अनुमति के लिए वित्त विभाग के समक्ष भेजा गया है।

अब AI और ड्रोन रखेंगे पक्षियों पर नजर, सुल्तानपुर नेशनल पार्क में बनेगा डिजिटल डेटा बैंक

चंडीगढ़. सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान में अब कृत्रिम बुद्धिमता (एआइ) और ड्रोन के माध्यम से पक्षियों की गणना होगी। पहली बार डिजिटल रिकार्ड तैयार किया जाएगा कि आगामी सीजन में कितने प्रवासी पक्षी आए, कब पहुंचे और किन हिस्सों में रुके। साथ ही पता लगाया जाएगा कि कितने समय तक प्रवासी पक्षी रहे और पर्यावरणीय बदलावों का उनकी गतिविधियों पर क्या असर पड़ा। गुरुग्राम जिले में फरुखनगर के पास स्थित सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान में अभी तक पक्षियों की गणना प्रत्यक्ष अवलोकन पर आधारित रही है। इसमें पक्षियों की मौजूदगी का केवल एक समय का चित्र सामने आता था। जलभराव, दलदली हिस्से और संवेदनशील क्षेत्र कई बार प्रत्यक्ष गणना को सीमित कर देते हैं। निगरानी टावरों पर लगाए एआई कैमरे  नई व्यवस्था में ड्रोन उन हिस्सों का सर्वे भी करेंगे जहां सामान्य टीमें नहीं पहुंच पातीं। इससे पक्षियों की गतिविधि का ज्यादा व्यापक और सटीक रिकार्ड तैयार होने की उम्मीद है। ड्रोन से मिलने वाली तस्वीरें और वीडियो एआइ विश्लेषण के साथ जोड़कर गणना को अधिक विश्वसनीय बनाने की योजना है। उद्यान में दो स्थानों पर बने निगरानी टावरों पर एआइ आधारित कैमरे लगाए जा रहे हैं, जो पार्क की झीलों, जलभराव वाले क्षेत्रों और आसपास के खुले भूभाग को लगातार रिकार्ड करेंगे। इससे पूरे मौसम का व्यावहारिक डेटा तैयार होगा, जिससे पता लगेगा कि कौन सी प्रजाति किस समय सबसे ज्यादा सक्रिय रही, किस हिस्से में आवाजाही बढ़ी या घटी और किन इलाकों का उपयोग कम हुआ। एआई से इन कामों में मिलेगी मदद एआइ सिस्टम दुर्लभ और संवेदनशील प्रजातियों की पहचान के साथ उनके व्यवहार और आवास में बदलाव के संकेत भी रिकार्ड करेगा। देखा जाएगा कि जल क्षेत्र कितना बदला, वनस्पति की स्थिति कैसी रही और किस हिस्से में पक्षियों की गतिविधि कम या ज्यादा हुई। अक्टूबर से शुरू होने वाली डिजिटल निगरानी से यह समझने में मदद मिलेगी कि बदलता मौसम, मानसून में देरी, गर्मी-सर्दी, सिकुड़ते वेटलैंड और बढ़ती मानवीय गतिविधियां प्रवासी पक्षियों को किस तरह प्रभावित कर रही हैं। इसके आधार पर भविष्य में पानी प्रबंधन, वनस्पति नियंत्रण, संवेदनशील क्षेत्रों में आगंतुकों की आवाजाही और संरक्षण की रणनीति तय की जा सकेगी। लगातार बदल रही पक्षियों की संख्या सुल्तानपुर में हर साल 250 से अधिक प्रजातियों के पक्षी होते हैं, जिनमें 100 से ज्यादा प्रवासी प्रजातियां शामिल रहती हैं। हाल के वर्षों के आंकड़े दिखाते हैं कि पक्षियों की संख्या और प्रजातियों की संरचना लगातार बदल रही है। 2025 में यहां 48 प्रजातियों के 2,593 प्रवासी पक्षी दर्ज किए गए, जबकि 2024 में 43 प्रजातियों के 2686 और 2023 में 61 प्रजातियों के 6,036 पक्षी दर्ज किए गए थे।

‘मेडल की खान’ बने हरियाणा के अखाड़े, यहां तैयार हो रहे देश के अगले चैंपियन

झज्जर. हर साल 23 जून को जब पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक दिवस मनाती है, तो झज्जर जिले में इस दिन के मायने कुछ अलग ही नजर आते हैं। झज्जर की हवाओं में केवल फसलों की महक नहीं, बल्कि अखाड़ों की मिट्टी और पसीने की वह सोंधी खुशबू भी घुली है, जिसने देश को कई ओलिंपिक पदक विजेता दिए हैं। झज्जर जिला हरियाणा में कुश्ती के सबसे बड़े केंद्रों में से एक है। जिले में 50 से अधिक निजी और पंजीकृत अखाड़े संचालित हो रहे हैं, जहां पर वर्तमान में 3,000 से अधिक युवा पहलवान सुबह और शाम के सत्रों में कड़ा अभ्यास करते हैं। झज्जर के छारा, खुड्डन, बिरोहड़ और गोरिया जैसे गांवों ने देश को ऐसे नायाब हीरे दिए हैं। छारा गांव की बात करें तो अकेले इस गांव में 5 सक्रिय अखाड़े हैं। यहां का ''लाला दीवान चंद माडर्न कुश्ती एवं योग केंद्र'' देश भर में अपनी एक अलग पहचान रखता है, जिसने बजरंग पूनिया और दीपक पूनिया जैसे अंतरराष्ट्रीय पहलवान देश को दिए हैं। इन अखाड़ों में हरियाणा के ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र तक के युवा आकर ओलंपिक पदक जीतने का सपना संजोए मिट्टी और मैट पर खुद को तपा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकने वाले सितारों की गौरवगाथा – मनु भाकर: निशानेबाजी की दुनिया में रचा इतिहास गांव: गोरिया, जिला झज्जर खेल: निशानेबाजी (10 मीटर एयर पिस्टल) प्रमुख उपलब्धि:  पेरिस ओलिंपिक 2024 में दो कांस्य पदक (एकल और मिश्रित टीम) जीतकर एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय बनीं। सफलता की कहानी: झज्जर के गोरिया गांव में जन्मी मनु भाकर की कहानी असाधारण एकाग्रता की मिसाल है। उनके पिता राम किशन भाकर मर्चेंट नेवी में चीफ इंजीनियर हैं, जिन्होंने मनु की प्रतिभा को पहचाना और उनके खेल के लिए शुरुआती निवेश किया। मनु ने निशानेबाजी से पहले कराटे, स्केटिंग, टेनिस और मुक्केबाजी में भी हाथ आजमाया था, लेकिन 14 साल की उम्र में उन्होंने पूरी तरह शूटिंग को अपना लिया। टोक्यो ओलिंपिक में पिस्टल खराब होने के कारण लगे बड़े झटके के बाद मनु टूटी नहीं, बल्कि अपने गुरु जसपाल राणा के मार्गदर्शन में रोजाना 12 से 16 घंटे अभ्यास किया। कड़ी तपस्या का परिणाम रहा कि पेरिस के मंच पर उन्होंने दो बार तिरंगा ऊंचा कर झज्जर और पूरे देश का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया। अमन सहरावत: दुखों के पहाड़ को चीरकर बने सबसे युवा पदक विजेता गांव: बिरोहड़, जिला झज्जर खेल: फ्रीस्टाइल कुश्ती (57 किलोग्राम भार वर्ग) प्रमुख उपलब्धि: पेरिस ओलिंपिक 2024 में कांस्य पदक विजेता, व्यक्तिगत ओलिंपिक पदक जीतने वाले भारत के सबसे युवा खिलाड़ी (21 वर्ष 24 दिन)। सफलता की कहानी: अमन सहरावत का जीवन संघर्ष किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं है। मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में अमन ने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया था। इस भयानक पारिवारिक त्रासदी के बाद वह गहरे अवसाद और तनाव से जूझे, लेकिन उनके दादा मांगेराम और चाचाओं ने उन्हें संभाला। अमन ने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में कोच ललित कुमार की देखरेख में अपनी कुश्ती को धार दी। गति और आक्रामक खेल शैली के धनी अमन ने साल 2022 में अंडर-23 विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा था। ओलिंपिक में देश के शीर्ष पहलवान रवि दहिया को ट्रायल्स में हराकर जगह बनाने वाले अमन ने पेरिस में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। वह आज झज्जर के हर उस बच्चे के लिए रोल माडल हैं जो अभावों में जी रहा है। बजंरग पूनिया: मिट्टी से उठकर विश्व स्तर पर धाक जमाने वाले पहलवान गांव: खुड्डन, जिला झज्जर खेल: फ्रीस्टाइल कुश्ती (65 किलोग्राम भार वर्ग) प्रमुख उपलब्धि: टोक्यो ओलिंपिक 2020 में कांस्य पदक विजेता, विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में 4 पदक जीतने वाले भारतीय पहलवान। सफलता की कहानी: खुड्डन गांव के एक साधारण परिवार में जन्मे बजरंग पूनिया के पास बचपन में महंगे खेल उपकरणों के लिए पैसे नहीं थे। उनके पिता बलवान सिंह स्वयं पहलवान थे, जिन्होंने बजरंग को 7 साल की उम्र में स्थानीय मिट्टी के अखाड़े में उतारा। बजरंग की खुराक और दूध-बादाम का खर्च पूरा करने के लिए उनके पिता बस का किराया बचाकर साइकिल से सफर करते थे। बजरंग ने छारा गांव के वीरेंद्र आर्य के अखाड़े से शुरुआत की और बाद में ओलिंपिक पदक विजेता योगेश्वर दत्त को अपना मेंटर माना। राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले बजरंग ने टोक्यो ओलंपिक में घुटने की चोट के बावजूद देश को कांस्य पदक दिलाकर अपनी वीरता का परिचय दिया था। दीपक पूनिया: ओलंपिक पदक के बेहद करीब पहुंचने वाले जांबाज गांव: छारा, जिला झज्जर खेल: फ्रीस्टाइल कुश्ती (86 किलोग्राम भार वर्ग) प्रमुख उपलब्धि: टोक्यो ओलंपिक 2020 में चौथे स्थान पर रहे, राष्ट्रमंडल खेल 2022 में स्वर्ण पदक विजेता। सुमित नागल: भारतीय टेनिस के नए सिरमौर गांव: जैतपुर, जिला झज्जर खेल: टेनिस (पुरुष एकल) प्रमुख उपलब्धि: टोक्यो ओलिंपिक 2020 और पेरिस ओलंपिक 2024 में भारत का प्रतिनिधित्व किया, एटीपी चैलेंजर खिताब विजेता और देश के नंबर-1 एकल टेनिस खिलाड़ी।  दो बार के ओलिंपियन सुमित नागल ने विश्व रैंकिंग के शीर्ष 70 खिलाड़ियों में जगह बनाकर यह तक साबित किया कि हरियाणा की माटी टेनिस जैसे खेल में भी वैश्विक स्तर पर कमाल कर सकती है। दीक्षा डागर: बाधाओं को पार कर गोल्फ कोर्स पर रची इबारत मूल संबंध: गांव छप्पार खेल: गोल्फ प्रमुख उपलब्धि: टोक्यो ओलिंपिक 2020 और पेरिस ओलंपिक 2024 में भारत का प्रतिनिधित्व किया, डेफलिंपिक (मूक-बधिर ओलंपिक) में दो बार की स्वर्ण पदक विजेता। – यह यात्रा दर्शाती है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो कोई भी शारीरिक कमजोरी आपकी सफलता की राह में रोड़ा नहीं बन सकती। राहुल रोहिल्ला: बहादुरगढ़ (हरियाणा) के रहने वाले है। 20 किलोमीटर रेस वाक (पैदल चाल) में टोक्यो ओलिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया। सुजीत मान पहलवान, सिदिपुर लोवा भी ओलिंपिक में भाग ले चुके हैं।

प्रवासी पक्षियों पर रहेगी स्मार्ट नजर: सुल्तानपुर में AI कैमरे और ड्रोन करेंगे निगरानी

चंडीगढ़  सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान में अब कृत्रिम बुद्धिमता (एआइ) और ड्रोन के माध्यम से पक्षियों की गणना होगी। पहली बार डिजिटल रिकार्ड तैयार किया जाएगा कि आगामी सीजन में कितने प्रवासी पक्षी आए, कब पहुंचे और किन हिस्सों में रुके। साथ ही पता लगाया जाएगा कि कितने समय तक प्रवासी पक्षी रहे और पर्यावरणीय बदलावों का उनकी गतिविधियों पर क्या असर पड़ा। गुरुग्राम जिले में फरुखनगर के पास स्थित सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान में अभी तक पक्षियों की गणना प्रत्यक्ष अवलोकन पर आधारित रही है। इसमें पक्षियों की मौजूदगी का केवल एक समय का चित्र सामने आता था। जलभराव, दलदली हिस्से और संवेदनशील क्षेत्र कई बार प्रत्यक्ष गणना को सीमित कर देते हैं। निगरानी टावरों पर लगाए गए एआई आधारित कैमरे नई व्यवस्था में ड्रोन उन हिस्सों का सर्वे भी करेंगे जहां सामान्य टीमें नहीं पहुंच पातीं। इससे पक्षियों की गतिविधि का ज्यादा व्यापक और सटीक रिकार्ड तैयार होने की उम्मीद है। ड्रोन से मिलने वाली तस्वीरें और वीडियो एआइ विश्लेषण के साथ जोड़कर गणना को अधिक विश्वसनीय बनाने की योजना है। उद्यान में दो स्थानों पर बने निगरानी टावरों पर एआइ आधारित कैमरे लगाए जा रहे हैं, जो पार्क की झीलों, जलभराव वाले क्षेत्रों और आसपास के खुले भूभाग को लगातार रिकार्ड करेंगे। इससे पूरे मौसम का व्यावहारिक डेटा तैयार होगा, जिससे पता लगेगा कि कौन सी प्रजाति किस समय सबसे ज्यादा सक्रिय रही, किस हिस्से में आवाजाही बढ़ी या घटी और किन इलाकों का उपयोग कम हुआ। इन कामों में एआई से मिलेगी मदद एआइ सिस्टम दुर्लभ और संवेदनशील प्रजातियों की पहचान के साथ उनके व्यवहार और आवास में बदलाव के संकेत भी रिकार्ड करेगा। देखा जाएगा कि जल क्षेत्र कितना बदला, वनस्पति की स्थिति कैसी रही और किस हिस्से में पक्षियों की गतिविधि कम या ज्यादा हुई। अक्टूबर से शुरू होने वाली डिजिटल निगरानी से यह समझने में मदद मिलेगी कि बदलता मौसम, मानसून में देरी, गर्मी-सर्दी, सिकुड़ते वेटलैंड और बढ़ती मानवीय गतिविधियां प्रवासी पक्षियों को किस तरह प्रभावित कर रही हैं। इसके आधार पर भविष्य में पानी प्रबंधन, वनस्पति नियंत्रण, संवेदनशील क्षेत्रों में आगंतुकों की आवाजाही और संरक्षण की रणनीति तय की जा सकेगी। लगातार बदल रही पक्षियों की संख्या सुल्तानपुर में हर साल 250 से अधिक प्रजातियों के पक्षी होते हैं, जिनमें 100 से ज्यादा प्रवासी प्रजातियां शामिल रहती हैं। हाल के वर्षों के आंकड़े दिखाते हैं कि पक्षियों की संख्या और प्रजातियों की संरचना लगातार बदल रही है। 2025 में यहां 48 प्रजातियों के 2,593 प्रवासी पक्षी दर्ज किए गए, जबकि 2024 में 43 प्रजातियों के 2686 और 2023 में 61 प्रजातियों के 6,036 पक्षी दर्ज किए गए थे।

हाई कोर्ट ने दिए निर्देश, MPHW भर्ती में अनुभव अंक जोड़कर तैयार की जाए नई मेरिट लिस्ट

चंडीगढ़. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा में मल्टी-पर्पज हेल्थ वर्कर (पुरुष) भर्ती से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत कार्यरत कर्मचारियों के अनुभव को केवल पदनाम के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइजर (एसटीएस) और पैरा मेडिकल वर्कर (पीएमडब्ल्यू) के रूप में प्राप्त अनुभव को अनुभव अंक देने से इनकार करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों को अभ्यर्थियों के अनुभव अंक जोड़कर उनकी मेरिट स्थिति दोबारा तय करने का निर्देश दिया है। जस्टिस संदीप मौदगिल ने वर्ष 2015 के विज्ञापन के तहत एमपीएचडब्ल्यू (पुरुष) पदों की भर्ती से संबंधित याचिकाओं का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने एनएचएम की विभिन्न योजनाओं के तहत कार्य किया था और हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के समक्ष अनुभव प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किए थे, लेकिन उन्हें चयन मानदंडों के अनुसार अनुभव अंक नहीं दिए गए। उनका तर्क था कि यदि अनुभव अंक जोड़ दिए जाते तो वे अपने-अपने वर्ग में चयन क्षेत्र में आ जाते।राज्य सरकार और आयोग ने अदालत को बताया कि अनुभव अंक केवल उसी क्षमता में कार्य करने वाले उम्मीदवारों को दिए जा सकते हैं, जिन्होंने आरसीएच, एनआरएचएम, एनएचएम परियोजनाओं अथवा स्वास्थ्य विभाग में समान पद पर कार्य किया हो। चूंकि याचिकाकर्ता एमपीएचडब्ल्यू (पुरुष) के बजाय एसटीएस, डीआर-टीबी/एचआईवी समन्वयक, टीबीएचवी अथवा पीएमडब्ल्यू पदों पर कार्यरत रहे थे, इसलिए उन्हें अनुभव अंक देने का प्रश्न नहीं उठता। अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति मौदगिल ने कहा कि इसी भर्ती प्रक्रिया में अन्य अभ्यर्थियों को एसटीएस के अनुभव के आधार पर अंक दिए जा चुके हैं। ऐसे में समान परिस्थितियों वाले याचिकाकर्ताओं को इससे वंचित रखना तर्कसंगत नहीं है। अदालत ने स्वास्थ्य विभाग की 12 अगस्त 2024, 29 नवंबर 2024 और 31 जनवरी 2025 की स्पष्टीकरण रिपोर्टों का भी उल्लेख किया, जिनमें एसटीएस और पीएमडब्ल्यू के कार्यों को एमपीएचडब्ल्यू (पुरुष) के दायित्वों के समान बताया गया था। हाई कोर्ट ने कहा कि जब स्वयं विभाग ने कार्यों और जिम्मेदारियों में समानता स्वीकार कर ली है तो केवल पदनाम के आधार पर अनुभव को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि एसटीएस पद के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता एमपीएचडब्ल्यू (पुरुष) से अधिक है और दोनों पदों की जिम्मेदारियां काफी हद तक समान हैं। अदालत ने 5 जून 2019 के परिणाम को याचिकाकर्ताओं के अनुभव अंक नहीं देने की सीमा तक निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि उनके एनएचएम अनुभव को जोड़कर मेरिट सूची का पुनर्गणना किया जाए। यदि संशोधित मेरिट में याचिकाकर्ता चयन क्षेत्र में आते हैं तो उन्हें नियुक्ति सहित सभी परिणामी लाभ दिए जाएं। पूरी प्रक्रिया दो माह के भीतर पूरी करने के आदेश दिए गए हैं।

तथ्य छिपाने पर पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट सख्त, जमानत याचिका पर लगा झटका

चंडीगढ़  पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करनाल के निसिंग क्षेत्र में 21 वर्षीय युवती से कथित छेड़छाड़ और पीछा करने के मामले में आरोपित की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी अदालत ने पाया कि आरोपित ने एफआईआर के अनुवादित संस्करण में एक महत्वपूर्ण आरोप को जानबूझकर हटाकर अदालत के समक्ष अधूरी और भ्रामक तस्वीर पेश की। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी तथ्यात्मक जानकारी छिपाने वाला व्यक्ति अग्रिम जमानत जैसी विवेकाधीन राहत पाने का हकदार नहीं हो सकता। जस्टिस संदीप मौदगिल ने अपने आदेश में कहा कि यह कोई मामूली भाषाई त्रुटि नहीं, बल्कि अभियोजन के पूरे मामले की नींव से जुड़ा गंभीर आरोप है। अदालत के अनुसार आरोपी ने रिकार्ड का गलत प्रस्तुतीकरण किया और महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए, जिससे उसकी नीयत पर सवाल खड़े होते हैं। मामले के अनुसार निसिंग थाना पुलिस ने 14 मई को भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी। शिकायतकर्ता युवती ने आरोप लगाया था कि 12 मई को वह गांव के मंदिर जा रही थी, तभी आरोपित उसका पीछा करते हुए आया। उसने पीछे से उसकी चप्पल पर पैर रखा, कंधे और निजी अंगों को छुआ तथा विरोध करने पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। शिकायत में यह भी कहा गया कि आरोपित काफी समय से उसका पीछा कर रहा था, अशोभनीय इशारे करता था और बाद में उसके घर के आसपास भी घूमता रहा, जिससे वह भयभीत थी। युवती का बयान बाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 के तहत भी दर्ज किया गया, जिसमें उसने अपने आरोप दोहराए।दूसरी ओर आरोपित ने अदालत में दलील दी कि एफआईआर दो दिन की देरी से दर्ज हुई और यह उसे फंसाने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया एक जवाबी कदम है। उसने दोनों परिवारों के बीच पुरानी रंजिश का हवाला देते हुए खुद को निर्दोष बताया।हालांकि सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि आरोपित द्वारा पेश किए गए एफआईआर के अंग्रेजी अनुवाद में निजी अंगों को छूने संबंधी आरोप को हटा दिया गया था। अनुवाद में केवल कंधा छूने और अन्य सामान्य आरोपों का उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि यदि पूरा आरोप निष्पक्ष रूप से सामने रखा जाता तो स्पष्ट होता कि मामला केवल पीछा करने या अभद्र टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें निजी अंगों से शारीरिक छेड़छाड़ का विशिष्ट आरोप भी शामिल है। अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत मांगने वाले व्यक्ति का दायित्व है कि वह सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का पूर्ण और निष्पक्ष खुलासा करे। चूंकि आरोपित ने ऐसा नहीं किया और रिकार्ड के महत्वपूर्ण हिस्से को दबाया, इसलिए वह अदालत के समक्ष साफ हाथों से नहीं आया। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

डॉ. कीर्ति की दोहरी उपलब्धि, NEET PG में टॉप और सेना में कैप्टन बनकर बढ़ाया रोहतक का मान

रोहतक. कभी भारतीय सेना के अधिकारियों के कंधों पर चमकते सितारों को देखकर उनके जैसी वर्दी पहनने का सपना देखने वाली गांव गरनावठी की बेटी डा. कीर्ति बड़क आज खुद भारतीय सेना में कैप्टन बन गई है। खास बात यह है कि कीर्ति बड़क गांव की पहली बेटी के रूप में कैप्टन बनी है। किसान परिवार से संबंध रखने वाली कीर्ति के पिता महावीर खेती करते हैं, जबकि उनकी माता सुनीता रानी गृहिणी है। बचपन से ही कीर्ति का सपना डाक्टर बनने का था। बता दें कीर्ति ने कक्षा 11वीं व 12वीं की पढ़ाई रोहतक के सरकारी स्कूल से की है। वहीं इसके बाद उन्होंने नीट परीक्षा उत्तीर्ण कर मेडिकल क्षेत्र में कदम रखा, लेकिन इसी दौरान उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। कीर्ति ने बताया कि इस दौरान उन्होंने मिलिट्री नर्सिंग सर्विस (एमएनएस) की परीक्षा भी पास की थी। किस वजह से सेना में गईं कीर्ति? इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें भारतीय सेना के अधिकारियों और जवानों के साथ संवाद करने का अवसर मिला और सेना के अधिकारियों के कंधों पर लगे सितारों ने उन्हें आकर्षित किया। सेना का अनुशासन, सेवा भाव और अधिकारियों के कंधों पर लगे सितारे उन्हें इतने प्रभावित कर गए कि उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि एक दिन वह भी सेना में अधिकारी बनेंगी। हालांकि इसके बाद उन्होंने एमएनएस के माध्यम से नर्सिंग क्षेत्र में जाने के बजाय केएमसी मणिपाल से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की, लेकिन डाक्टर बनने के बाद भी उनका लक्ष्य सेना की वर्दी पहनना ही रहा। इंटर्नशिप के साथ-साथ उन्होंने आर्मी मेडिकल कोर शार्ट सर्विस कमीशन की तैयारी शुरू की और अपने सपने को साकार करने के लिए लगातार मेहनत की। उन्होंने नीट पीजी में आल इंडिया 65वीं रैंक हासिल की। डॉक्टर बनना उनके जीवन का पहला सपना था इसके बाद उनका चयन भारतीय सेना में हुआ। कीर्ति का कहना है कि डॉक्टर बनना उनके जीवन का पहला सपना था, लेकिन भारतीय सेना में अधिकारी बनकर देश के सैनिकों की सेवा करना उनका सबसे बड़ा लक्ष्य था। वह चाहती है कि सीमाओं पर देश की रक्षा करने वाले जवानों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध करवाने में अपना योगदान दे सकें। बता दें कि उनके चचेरे चाचा भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे चुके है। जबकि दादा पंजाब पुलिस में अपनी सेवाएं दे चुके है।

भूजल संकट बढ़ाने में 45 फैक्ट्रियां जिम्मेदार! नारनौल में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की अनदेखी

नारनौल. भूजल स्तर में लगातार गिरावट को देखते हुए सरकार वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। औद्योगिक क्षेत्रों, संस्थानों और बड़े भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करना अनिवार्य किया गया है, लेकिन नारनौल का एकमात्र औद्योगिक क्षेत्र निजामपुर रोड इन दावों की जमीनी हकीकत बयान कर रहा है। नारनौल के औद्योगिक क्षेत्र में कुल 45 छोटी फैक्ट्रियां संचालित हैं। करीब दो दशक पहले विकसित किया गया यह औद्योगिक क्षेत्र आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। यहां कई स्थानों पर जल निकासी व्यवस्था कमजोर है। वर्षा के दौरान सड़कों पर पानी जमा होना आम बात है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब औद्योगिक क्षेत्र में ड्रेनेज व्यवस्था ही पूरी तरह व्यवस्थित नहीं है तो वर्षा जल संचयन के नियमों का पालन किस स्तर तक हो रहा होगा। कई इकाइयों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग से संबंधित कोई स्पष्ट संरचना दिखाई नहीं देती। जल संचयन प्रणाली स्थापित करना आवश्यक अधिकांश वर्षा जल सीधे सड़कों, खाली भूखंडों और नालियों में बह जाता है। जबकि हरियाणा सरकार और संबंधित विभागों के दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्धारित क्षेत्रफल से अधिक भूखंडों पर स्थापित औद्योगिक इकाइयों, संस्थानों और व्यावसायिक भवनों में वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित करना आवश्यक है। इसका उद्देश्य वर्षा के पानी को सीधे जमीन में पहुंचाकर भूजल स्तर को बढ़ाना है। कई मामलों में भवन नक्शा स्वीकृति और अन्य अनुमतियों के दौरान भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग की शर्त शामिल रहती है। भूजल संकट वाले जिले में बढ़ रही चिंता महेंद्रगढ़ जिला लंबे समय से गिरते भूजल स्तर की चुनौती का सामना कर रहा है। कई क्षेत्रों में भूजल दोहन लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि औद्योगिक क्षेत्रों में प्रभावी वर्षा जल संचयन व्यवस्था विकसित की जाए तो हर वर्ष लाखों लीटर पानी भूगर्भ में पहुंचाया जा सकता है। औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि क्षेत्र में कई मूलभूत समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। जगह-जगह टूटी सड़कें, जल निकासी की समस्या और अधोसंरचना की कमी के बीच उद्योगों को संचालित करना आसान नहीं है। उनका तर्क है कि सरकार को वर्षा जल संचयन के नियमों के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्रों की आधारभूत सुविधाओं को भी मजबूत करना चाहिए। जल संग्रहण व संरक्षण की अनूठी मिसाल उधर, कनीना में जल संकट से उबरने के लिए गांव रामबास के युवाओं ने वर्षा जल संग्रहण एवं संरक्षण का एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। युवा पर्यावरण प्रेमी मनोज कुमार रामबास के नेतृत्व में गांव के युवाओं ने मिलकर वर्ष 2022 में एक ऐसे तालाब का निर्माण किया, जिसने न केवल वर्षा जल को संरक्षित किया बल्कि आसपास की गोचर भूमि को भी हरियाली से आच्छादित कर दिया। 35 फीट लंबा और 6 फीट गहरा तालाब तैयार मनोज कुमार ने बताया कि लगातार गिरते भूजल स्तर और पानी की बढ़ती समस्या को देखते हुए उनके मन में वर्षा जल को संरक्षित कर उसका उपयोग पौधारोपण एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए करने का विचार आया। इसके बाद गांव के युवाओं ने श्रमदान करते हुए लगभग 35 फीट लंबा और 6 फीट गहरा तालाब तैयार किया। तालाब का निर्माण कम लागत में करने के उद्देश्य से बेकार पड़े कंक्रीट, पुरानी ईंटों तथा अन्य अनुपयोगी निर्माण सामग्री का उपयोग किया गया। पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे तालाब तक वर्षा जल पहुंचाने के लिए विशेष रूप से जल निकासी मार्ग बनाए गए ताकि बारिश का अधिकतम पानी तालाब में एकत्रित हो सके। बरसात के मौसम में यह तालाब भर जाता है और इसमें संचित पानी लगभग तीन से चार महीने तक बना रहता है। इसी जल का उपयोग आसपास लगाए गए पौधों की सिंचाई के लिए किया जाता है। तालाब के चारों ओर सुरक्षा के लिए फेंसिंग की गई तथा पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से बेलपत्र, जामुन, लेहसुआ, नीम, कचनार, अमलतास, करोंदा, पापड़ी और अर्जुन सहित अनेक प्रजातियों के पौधे लगाए गए। आज ये पौधे वृक्ष बनने की ओर अग्रसर हैं और क्षेत्र की सुंदरता बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। जल संकट जैसी बड़ी समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पहल से आसपास की गोचर भूमि में हरियाली बढ़ी है और अनेक पौधे गर्मी के मौसम में भी सुरक्षित रह पाए हैं। वर्षा जल संरक्षण का यह माडल ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रहा है। सीमित संसाधनों में युवाओं द्वारा किया गया यह कार्य दर्शाता है कि यदि सामूहिक प्रयास और सकारात्मक सोच हो तो जल संकट जैसी बड़ी समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर भी संभव है। दूसरे गांव के लिए बनी प्रेरणा पर्यावरण प्रेमी मनोज कुमार ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यदि हर गांव में वर्षा जल संग्रहण के ऐसे छोटे-छोटे प्रयास किए जाएं तो भूजल स्तर सुधारने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी नई दिशा मिल सकती है। उन्होंने युवाओं से अधिक से अधिक पौधारोपण करने और वर्षा जल को व्यर्थ बहने से रोकने का आह्वान किया। गांव रामबास की यह पहल आज जल संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और सामुदायिक भागीदारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभर रही है, जिससे अन्य गांव भी प्रेरणा ले रहे हैं।

सुषमा गुप्ता की छुट्टी, हरियाणा बाल कल्याण परिषद में बड़ा प्रशासनिक बदलाव

चंडीगढ़. हरियाणा राज्य बाल कल्याण परिषद में बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया गया है। परिषद की मानद महासचिव सुषमा गुप्ता को उनके पद से हटा दिया गया है। इस संबंध में हरियाणा के राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष की ओर से आदेश जारी किए गए हैं। राजभवन से जारी आदेशों के तहत सुषमा गुप्ता की मानद महासचिव पद पर नियुक्ति समाप्त कर दी गई है। इस फैसले को परिषद और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजभवन की बड़ी कार्रवाई सूत्रों के अनुसार, यह फैसला सीधे राज्यपाल सचिवालय के स्तर पर लिया गया है। आदेश जारी होने के बाद अब हरियाणा राज्य बाल कल्याण परिषद के प्रशासनिक ढांचे में नए सिरे से जिम्मेदारियों का निर्धारण किया जाएगा। हालांकि, जारी आदेशों में सुषमा गुप्ता को हटाने के कारणों का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन राजभवन की ओर से की गई यह कार्रवाई राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गई है। परिषद में नई नियुक्ति पर नजर मानद महासचिव का पद परिषद के संचालन और विभिन्न बाल कल्याण योजनाओं के समन्वय में अहम माना जाता है। ऐसे में अब नजर इस बात पर है कि सरकार और राजभवन की ओर से इस पद पर अगली नियुक्ति कब और किसे दी जाती है। हरियाणा राज्य बाल कल्याण परिषद राज्य में बच्चों के कल्याण, शिक्षा, संरक्षण और सामाजिक विकास से जुड़े कार्यक्रमों का संचालन करती है। परिषद के मानद महासचिव की भूमिका योजनाओं के क्रियान्वयन, संस्थागत समन्वय और प्रशासनिक निर्णयों में महत्वपूर्ण मानी जाती है।