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राज्य में अग्नि सुरक्षा होगी मजबूत, 36 नए फायर स्टेशन बनाए जाएंगे

भोपाल   अग्निशमन सेवाओं को मजबूत करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से पूरे प्रदेश के नगरीय निकायों में 36 आधुनिक फायर स्टेशन बनाए जाएंगे। इसके लिए 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर फंड आवंटित किया गया है। फायर स्टेशन बनाने के साथ नई फायर गाड़ियां खरीदी जाएंगी और उपकरण भी आधुनिक तकनीक के होंगे, ताकि आग लगने की घटनाओं पर जल्दी और प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाया जा सके। इसके साथ ही सरकार राज्य स्तरीय फायर कंट्रोल रूम भी बनाएगी, जहां से पूरे प्रदेश के सभी फायर स्टेशनों को जोड़ा जाएगा। इससे आगजनी की घटनाओं पर त्वरित निगरानी और समन्वय सुनिश्चित होगा। नगरीय प्रशासन विभाग ने प्रस्ताव तैयार कर सरकार को भेज दिया है, जिसकी मंजूरी के बाद काम शुरू हो जाएगा।  कहां बनेंगे फायर स्टेशन फायर स्टेशन 8 नगर निगमों – रीवा, सागर, छिंदवाड़ा, रतलाम, मुरैना, खंडवा, इंदौर और उज्जैन में बनाए जाएंगे। इसके अलावा नए बने जिलों – मऊगंज, पांढुर्रा, मैहर, अनूपपुर, निवाड़ी सहित अन्य जिलों में भी स्टेशन स्थापित होंगे। साथ ही 4 औद्योगिक क्षेत्रों – पीथमपुर (धार), मंडीदीप (रायसेन), बामोर (मुरैना) और मेघनगर (झाबुआ) को भी शामिल किया गया है। दो एकड़ जमीन में बना स्टेशन  हर फायर स्टेशन लगभग 2 एकड़ जमीन में बनेगा। एक स्टेशन पर दो दमकल गाड़ियां रहेंगी। एक बड़ी और एक छोटी। प्रति स्टेशन निर्माण पर करीब 2 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसमें फायर स्टेशन + फायर गाड़ियां    पर 119 करोड़, प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण पर 20 करोड़, आधुनिक फायर उपकरण पर 178 करोड़, कंट्रोल रूम सुदृढ़ीकरण पर 20 करोड़, अन्य विशेष आवश्यकताएं पर 59 करोड़ खर्च होंगे। यानी कुल 398 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। इसमें   75% राशि लगभग 297 करोड़ केंद्र सरकार और 25% राशि करीब 100 करोड़ राज्य सरकार देगी।   

हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट अनिवार्य, नहीं लगाई तो घर पहुंचेगा चालान

जबलपुर  मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले से गुजरने वाले नेशनल हाईवे पर भी हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट (एचएसआरपी) न होने पर सीधे ई-चालान जारी किया जाएगा। परिवहन विभाग टोल प्लाजा में लगे सीसीटीवी कैमरों को अपने पोर्टल से लिंक कर रहा है। नई व्यवस्था जनवरी से लागू होने की संभावना है। इसका उद्देश्य है कि सभी वाहनों में एचएसआरपी अनिवार्य रूप से लगाई जाए। क्यों की जा रही सख्ती जानकारी के अनुसार सभी टोल प्लाजा पर 24 घंटे सीसीटीवी चल रहे हैं। इन्हें पोर्टल से जोड़ने पर वाहन का नंबर प्लेट सीधे स्कैन होगा। यदि नंबर प्लेट मानक के अनुरूप नहीं है या वाहन पर एचएसआरपी नहीं लगी है, तो सिस्टम तुरंत ही गाड़ी मालिक को ई-चालान भेज देगा। बता दें कि अप्रेल 2019 से नए बिकने वाले सभी वाहनों पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाना अनिवार्य है। पुराने (2019 से पहले रजिस्टर्ड) वाहनों के लिए भी एचएसआरपी लगवाना जरूरी किया गया है। इसके बावजूद इसकी गति धीमी है। दिसंबर तक लगवा लें हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट परिवहन विभाग ने वाहन मालिकों को दिसंबर तक का समय दिया है। इसके बाद बिना एचएसआरपी वाले वाहनों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी और चालान की राशि भी बढ़ाई जाएगी। ऐसी होगी नई व्यवस्था टोल प्लाजा के सीसीटीवी कैमरे परिवहन विभाग के पोर्टल से जुड़े। गाड़ियों के गुजरने के समय हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट को तुरंत स्कैन किया जाएगा। जिसमें पोर्टल पर तुरंत पूरा रिकॉर्ड खुलकर आ जाएगा। एचएसआरपी न होने या अन्य कमियों पर तत्काल ई-चालान जारी कर दिया जाएगा। 

मोबाइल बना मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा, 73% लोग डिजिटल डिपेंडेंसी से पीड़ित

 इंदौर  एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग द्वारा मोबाइल की लत से परेशान 500 लोगों पर किए गए अध्ययन के बेहद परेशान करने वाले निष्कर्ष सामने आए हैं। इसके अनुसार मोबाइल अब सिर्फ एक तकनीकी उपकरण नहीं रह गया, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। अध्ययन के अनुसार 73 प्रतिशत लोग मोबाइल की लत यानी डिजिटल डिपेंडेंसी से पीड़ित पाए गए। अत्यधिक मोबाइल उपयोग के कारण लोग बिना एहसास किए मूक अवसाद (साइलेंट डिप्रेशन) का शिकार हो रहे हैं। 80 प्रतिशत प्रतिभागियों में हल्का लेकिन लगातार चलने वाला अवसाद देखा गया। औसतन लोग प्रतिदिन सात घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं। यानी साल भर में करीब 1800 घंटे यानी पूरे 75 दिन मोबाइल पर निकल जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, मोबाइल न मिलने पर घबराहट (नोमोफोबिया), नींद में कमी, तनाव बढ़ना और बार-बार फोन चेक करने की मजबूरी जैसे व्यवहारगत लक्षण बढ़ते जा रहे हैं। बच्चों और किशोरों में इसका असर और भी गंभीर है। किशोरों में अवसाद का खतरा बढ़ रहा है और 10–14 वर्ष के बच्चों में दिमागी विकास प्रभावित हो रहा है। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं विकराल रूप ले लेंगी अत्यधिक मोबाइल चलाने के कारण किशोरों में आत्मविश्वास में कमी और वास्तविक जीवन से दूरी बढ़ रही है। चूंकि, यह उम्र सीखने, समझने और सामाजिक कौशल विकसित करने की होती है, ऐसे में अत्यधिक स्क्रीन टाइम उनके भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसके लिए स्कूलों में एक मॉडल बनाने की आवश्यकता है। समय रहते यदि मोबाइल उपयोग पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो जल्द मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं विकराल रूप ले लेंगी। उपाय     फोन पार्किंग जोन बनाएं     रोजाना मोबाइल उपयोग का समय तय करें।     अनावश्यक एप्स के नोटिफिकेशन बंद कर दें। इससे बार-बार फोन देखने की आदत कम होगी।     इंटरनेट मीडिया एप दिन में 2-3 बार ही खोलें। इनके उपयोग के लिए टाइम लिमिट सेट कर सकते हैं।     रात में सोते समय मोबाइल को अपने बिस्तर से दूर रखें।     दिनभर में कुछ ऐसा समय तय करें, जब मोबाइल से दूर रहेंगे। जैसे खाना खाते समय, पढ़ाई के समय या परिवार के साथ बैठते समय।     खाली समय में मोबाइल के बजाय किताब पढ़ें, संगीत सुनें, वाक पर जाएं।     घर में एक फोन पार्किंग जोन बनाएं, जहां सभी फोन रख दें और बार-बार हाथ में न लें। इन 5 तरीकों से छुड़ाएं बच्चे की फोन लत बच्चों की इन गलतियों को न करें नज़रअंदाज, तुरंत टोके वरना हाथ से निकल जाएगा आपका बच्चा स्क्रीन टाइम करें कंट्रोल  अपने बच्चे के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करने के लिए एक सीमित समय निर्धारित करें. उदाहरण के लिए, आप उन्हें दिन में केवल 1-2 घंटे के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करने की परमिशन दे सकते हैं. स्मार्टफोन-फ्री एरिया बनाएं अपने घर में एक स्मार्टफोन-फ्री एरिया बनाएं. उदाहरण के लिए, आप अपने डाइनिंग या बेडरूम में स्मार्टफोन का उपयोग बिल्कुल न करें.  ऑफलाइन एक्टिविटीज पर ध्यान दीजिए अपने बच्चे के लिए ऑप्शनल एक्टिविटीज का ऑप्शन दीजिए, जो उन्हें स्मार्टफोन से दूर रखें. उदाहरण के लिए, आप उन्हें खेल, बुक रीडिं, या कला बनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं. निगरानी रखें अपने बच्चे के स्मार्टफोन का उपयोग करने पर निगरानी रखें. आप फोन में पैरेंट्ल कंट्रोल एप्लीकेशन इंस्टॉल कर सकते हैं जिससे आपका बच्चा फोन पर क्या देख रहा है, इसको आसानी से ट्रैक कर सकते हैं.  रात में फोन चलाने से रोकें अपने बच्चे के साथ बातचीत करें और उन्हें स्मार्टफोन की लत के बारे में समझाएं. इसके अलावा रात के समय बच्चे को फोन बिल्कुल न दें. इससे बच्चे की आंख और स्किन दोनों पर बुरा असर पड़ सकता है.  फोन की लत से होने वाले नुकसान      नींद की कमी     अवसाद     चिड़चिड़ापन     ध्यानकेंद्रित करने में परेशानी     आत्मसम्मान की कमी  

विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा, मध्यप्रदेश में स्टेट टास्क फोर्स का गठन

भोपाल  कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर देशभर में बढ़ रही चिंता बढ़ रही है, इसे देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने इसे प्राथमिकता पर रखा है, उच्च शिक्षा विभाग ने इस दिशा में ठोस और व्यापक कदम उठाने की शुरुआत कर दी है। प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और नेशनल टास्क फोर्स (NTF) के निर्देशों के बाद स्टेट टास्क फोर्स (STF) का गठन कर उसे सक्रिय कर दिया है, जो अब पूरे राज्य में विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी उपायों की निगरानी और सुधार की रूपरेखा तय कर रही है। उल्‍लेखनीय है कि NTF द्वारा आयुक्त, उच्च शिक्षा प्रबल सिपाहा को राज्य स्तरीय नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है। उच्च शिक्षा विभाग के अनुसार यह पहल केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि “राज्य के विद्यार्थियों के लिए एक सुरक्षित, सहयोगी और दबावमुक्त शैक्षणिक माहौल” तैयार करने की दिशा में सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रयास है। STF के हाथ में मानसिक स्वास्थ्य सुधार की कमान NTF के निर्देशों के बाद उच्च शिक्षा विभाग ने एक स्टेट टास्क फोर्स (STF) का गठन किया है । यह राज्य में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, परामर्श सेवाओं और रोकथाम उपायों पर केंद्रित नीतिगत हस्तक्षेपों के लिए योजना एवं निर्देश जारी कर रही है। एसटीएफ के अध्‍यक्ष आयुक्त, उच्च शिक्षा प्रबल सिपाहा है। ओएसडी डॉ. उषा के. नायर को इसका सदस्य सचिव नियुक्‍त किया गया है। एसटीएफ में स्कूल शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, बाल सुरक्षा, सामाजिक न्याय तथा नगरीय प्रशासन विभागों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है । यह एक बहु-विभागीय तंत्र है जो विद्यार्थियों की चुनौतियों को व्यापक दृष्टि से देखेगा। स्टेट टास्क फोर्स (STF) क्या करेगी? राज्य में मानसिक स्वास्थ्य और परामर्श से जुड़े उपायों की निगरानी, NTF के निर्देशों के अनुपालन का मूल्यांकन, कोचिंग व कॉलेज परिसरों का मानसिक स्वास्थ्य ऑडिट, हेल्पलाइन, काउंसलिंग, मनोसामाजिक समर्थन की व्यवस्था को मजबूत करना, जिला स्तरीय DTF को दिशा देना और उनकी रिपोर्ट की समीक्षा, आत्महत्या रोकथाम से जुड़े जोखिम कारकों की पहचान और सुधार को बढ़ावा, राज्य सरकार को नियमित सिफारिशें और नीतिगत सुझाव शैक्षणिक संस्‍थानों में नोडल अधिकारियों की होगी नियुक्ति सभी सुधारों के समन्वय प्रभावी हो, इसके लिए उच्च शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी शासकीय एवं निजी शैक्षणिक संस्‍थानों को नोडल अधिकारी नियुक्‍त करने के निर्देश दिए हैं। इसमें सरकारी विश्वविद्यालय, निजी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालकों एवं सभी शासकीय महाविद्यालय शामिल हैं। जिला स्तरीय टास्क फोर्स (DTF) का गठन अनिवार्य राज्य स्तर के प्रयास प्रभावी रूप से जिलों तक पहुँचे इसके लिए उच्च शिक्षा विभाग ने प्रत्येक जिले में जिला स्तरीय टास्क फोर्स (DTF) का गठन भी अनिवार्य कर दिया है। डीटीएफ की अध्यक्षता जिला कलेक्टर करेंगे, जबकि अग्रणी महाविद्यालय के प्राचार्य, जिला शिक्षा अधिकारी और तकनीकी, चिकित्सा तथा स्वास्थ्य विभागों के प्रतिनिधि इसके सदस्य होंगे। ये जिम्मेदारी रहेगी डीटीएफ की      कोचिंग संस्थानों के पंजीयन की निगरानी करना।     परामर्श सेवाओं की उपलब्धता कराना।     STF–NTF निर्देशों के क्रियान्वयन कराना।     शैक्षणिक परिसरों की सुरक्षा पर निगरानी रखना। कोचिंग संस्थानों का अनिवार्य पंजीयन अनिवार्य  उच्च शिक्षा विभाग ने यह सुनिश्चित किया है कि किसी भी जिले में बिना पंजीयन के कोई भी कोचिंग संस्था संचालित न हो। यह कदम विद्यार्थियों पर बढ़ते शैक्षणिक दबाव, अनियमित प्रबंधन और अनुशासनहीन वातावरण को नियंत्रित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसलिए जरूरी हैं ये कदम देशभर में मानसिक तनाव और परीक्षा दबाव से जुड़े मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। उच्च शिक्षा विभाग का मानना है कि समस्या केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि संस्थागत संरचना से भी जुड़ी है, जहाँ गाइडलाइन, परामर्श, निगरानी और संवाद की कमी विद्यार्थियों को अकेला कर देती है। एसटीएफ और डीटीएफ का गठन इसी कमी को दूर करने का प्रयास है।  

नई कलेक्टर गाइडलाइन के तहत 15 जनवरी तक जिले भेजा जाएगा प्रस्ताव, महंगी होगी संपत्ति

भोपाल मध्य प्रदेश में एक बार फिर से प्रापर्टी की दरें बढ़ाने की कवायद शुरू कर दी गई है। इसके लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 की कलेक्टर गाइडलाइन (प्रापर्टी की दरें बढ़ाने का प्रस्ताव) बनाने का काम शुरू कर दिया गया है। इस संबंध में महानिरीक्षक पंजीयन अमित तोमर ने बुधवार को आदेश जारी किया है। आदेश के अनुसार नई गाइडलाइन का प्रस्ताव पहले सभी जिलों की उप जिला मूल्यांकन समितियों द्वारा बनाकर 15 जनवरी 2026 तक जिला मूल्यांकन समितियों को भेजना होगा। इसके बाद जिला मूल्यांकन समिति प्रस्तावित गाइडलाइन को लेकर अधिसूचना जारी कर लोगों व राजनीतिक दलों से सुझाव लेगी। 31 मार्च से नई दरें लागू होंगी इन सुझावों पर चर्चा के बाद आवश्यकता होने पर संशोधन कर 30 जनवरी तक प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया जाएगा। सभी जिला मूल्यांकन समितियों द्वारा 15 फरवरी तक गाइडलाइन का प्रस्ताव केंद्रीय मूल्यांकन बोर्ड को भेज दिया जाएगा। इस प्रस्ताव पर बोर्ड शासन से चर्चा के बाद 31 मार्च से प्रदेशभर में प्रापर्टी की नई दरें लागू कर देगा। जानकारी के अनुसार प्रदेश में करीब एक लाख 12 हजार में से 74 हजार स्थानों पर प्रापर्टी की खरीद-फरोख्त अधिक होती है। विभिन्न जिलों में इन स्थानों का पंजीयन और राजस्व अधिकारियों द्वारा एआई सहित अन्य माध्यमों से सर्वे कराया जाएगा। इस सर्वे के बाद ही तय होगा कि कितने स्थानों पर प्रापर्टी की दरों में वृद्धि की जानी है। बता दें कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में लगभग 60 हजार स्थानों पर प्रापर्टी की दरों में वृद्धि की गई थी। हालांकि आवासीय आरसीसी निर्माण और सभी क्षेत्रों में आरबीसी, टिनशेड, कच्चा कवेलू के लिए प्रचलित निर्माण दरों में कोई वृद्धि नहीं की गई थी। इन बिंदुओं का ध्यान रखना होगा     स्थानों में दरें निर्धारित करने (यथावत, वृद्धि या कमी) नये स्थान व कालोनी जोड़े जाने की स्थिति में दरें प्रस्तावित किए जाने के लिए आवश्यक अनुमतियों की जानकारी एवं दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध हों।     ऐसे स्थान जहां भूमि अधिग्रहण हो रही है या होने की संभावना है तो स्थानों व अधिग्रहण भूमि के आसपास के क्षेत्रों में होने वाले संभावित विकास को दृष्टिगत रखते हुए दरें प्रस्तावित की जाएं।     मूल्य सूचकांक तथा नगर व ग्राम में हुए और प्रस्तावित विकास को दृष्टिगत रखना होगा।     दरें यथासंभव वास्तवित रूप से प्रचलित दरों के अनुरूप हों।     पिछले सालों की निर्माण के लिए तय लागत दरों को ध्यान में रखते हुए प्लाट आदि की दरें निर्धारित की जाएं।  

साइबर अपराध-आतंकवाद पर सख्त संदेश: CM योगी बोले, अब वैश्विक एकता ही समाधान

लखनऊ  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजधानी लखनऊ में शुक्रवार को विश्व के मुख्य न्यायाधीशों के 26वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि साइबर क्राइम, अच्छे स्वास्थ्य और वैश्विक आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भी मुखर होकर यूएन जैसे प्लेटफार्म का उपयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह समय संवाद, सहयोग और आपसी समझ को मजबूत करने का है, क्योंकि दुनिया की मूल समस्या एक-दूसरे के साथ संवाद की कमी है। ऐसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन वैश्विक स्तर पर संवाद को बढ़ावा देते हैं और साझा समाधान की राह खोलते हैं। सीएम योगी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने कुछ समय पहले दुनिया के सामने 16 वैश्विक लक्ष्य रखे थे, जिनमें शिक्षा सर्वोपरि है। तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसके कारण अभूतपूर्व कानूनी चुनौतियां भी खड़ी हुई हैं।  साइबर क्राइम, डाटा चोरी और डिजिटल दुरुपयोग आज सबसे बड़ी वैश्विक चिंताओं में शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन और उससे उत्पन्न होने वाले संकट भी हमारे सामने एक नई चुनौती हैं। साइबर क्राइम, डाटा चोरी जैसी समस्याएं भी हमारे सामने खड़ी हैं। ऐसी स्थिति में न्याय, नैतिकता और अतंरराष्ट्रीय कानून, विश्व शांति और मानव सभ्यता के लिए एक बड़ी लकीर खींचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि दुनिया के अंदर जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो 250 करोड़ से अधिक बच्चों के लिए बेहतरीन शिक्षा के साथ-साथ, वे अपने बस्ते के बोझ से गायब न हों, हमें इस बारे में भी विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने हजारों वर्षों से दुनिया को एक परिवार के रूप में देखा है। यह सिर्फ भारत की सोच नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा है जिसमें संकट के समय किसी भी मत, मजहब या संप्रदाय को भारत ने शरण देने और सहयोग करने में कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। इसलिए शिक्षा, संवाद और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने के प्रयासों पर दुनिया को एकजुट होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि एक ऐसे दौर में, जहां वैश्विक स्तर पर अशांति, अराजकता और वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, वहां शिक्षा, विकास और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर काम करना और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। योगी ने कहा कि भारत की प्राचीन विचारधारा हमेशा पंचतत्वों- पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु-की सुरक्षा और संरक्षण को प्राथमिकता देती रही है। यही आधुनिक दुनिया को भी सतत समाधान की दिशा में मार्गदर्शन दे सकती है। सीएम ने कहा कि आज जब दुनियाभर के न्यायविद एक जगह एकत्र हुए हैं, तो न्याय मानवता की समस्या के समाधान का रास्ता कैसे निकाल सकता है? इस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से दुनियाभर में यह संदेश देने की आवश्यकता है।

सर्दी बढ़ते ही पंजाब में हेल्थ Advisory जारी, बच्चों-बुजुर्गों को विशेष निर्देश

पटियाला माननीय स्वास्थ्य मंत्री पंजाब डॉ. बलबीर सिंह जी के दिशा-निर्देशों के अनुसार, वायु प्रदूषण की गंभीरता के मद्देनजर, सिविल सर्जन डॉ. संजय कामरा ने लोगों से चौकस रहने और आवश्यक सावधानियां बरतने की अपील करते हुए कहा कि एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए पर्यावरण का साफ और स्वच्छ होना बहुत जरूरी है। सिविल सर्जन डॉ. संजय कामरा ने बताया कि वायु प्रदूषण का छोटे बच्चों, गर्भवतियों, 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुज़ुर्गों, और शुगर, सांस, दमा, दिल की बीमारियों आदि से पीड़ित मरीजों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वायु प्रदूषण से खांसी, सांस फूलना, नजला, जुकाम, आंखों में लाली, खुजली और घबराहट जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं, इसलिए छोटे बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और लंबे समय से बीमारी से पीड़ित मरीजों को बाहरी गतिविधियों से बचना चाहिए। अगर कोई समस्या आती है तो तुरंत डॉक्टरी सलाह के अनुसार इलाज कराना चाहिए। सिविल सर्जन ने बताया कि वायु प्रदूषण के दौरान खासकर सुबह-शाम बाहरी गतिविधियों से परहेज करना चाहिए, बाहर जाते समय मास्क का उपयोग करना चाहिए और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनने चाहिए। संतुलित आहार का सेवन करना चाहिए। वायु प्रदूषण को कम करने के लिए मशीनरी की जगह हाथ से काम करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। जितना ज्यादा हो सके पैट्रोल-डीजल से चलने वाले दोपहिया और चार पहिया वाहनों का कम से कम उपयोग किया जाए। अधिक से अधिक साइकिलों का उपयोग किया जाए। पराली को आग नहीं लगानी चाहिए और ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए।  

रामनगरी में तैयारियों को रफ्तार: मंदिर परिसर के एग्ज़िट रूट को मिला ‘सुग्रीव पथ’ नाम

अयोध्या  अयोध्या में राम मंदिर परिसर के शिखर पर 'ध्वजारोहण' के कार्यक्रम की तैयारियां जोरों पर हैं। सफाई से लेकर सुरक्षा के खास बंदोबस्त किए गए हैं। 25 नवंबर को लगभग चार घंटे चलने वाले कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई बड़े नेता शामिल होंगे। अयोध्या में तैयारियों के बीच राम जन्मभूमि परिसर के निकास मार्ग पर 'सुग्रीव पथ' नाम का साइनबोर्ड लगाया गया है। लोक निर्माण विभाग ने ध्वजारोहण समारोह से पहले यह बोर्ड लगाया। इसी बीच, अयोध्या नगर निगम ने 'ध्वजारोहण' कार्यक्रम से पहले खास सफाई अभियान चलाया। मेयर गिरीश पति त्रिपाठी ने आईएएनएस से कहा, "हमने शहर के अलग-अलग कॉलेजों के स्टूडेंट्स को इकट्ठा किया है और आज हम एक सफाई रैली निकाल रहे हैं।" उन्होंने कहा कि 25 नवंबर को भव्य कार्यक्रम है। अयोध्या में अभी स्वच्छता और उत्सव का वातावरण है। लोग स्वच्छता के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। मेयर ने लोगों से अपील की कि वे अपने घर, अपने आसपास और अपने पर्यावरण को अच्छा रखें। उन्होंने कहा कि हम लगातार सफाई कैंपेन चला रहे हैं। नगर आयुक्त जयेंद्र कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से अयोध्या नगर निगम की तरफ से स्वच्छता सप्ताह मनाया जा रहा है। इसी क्रम में शुक्रवार को स्वच्छता रैली निकाली गई। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी के 25 नवंबर को अयोध्या के दौरे से पहले भारत-नेपाल बॉर्डर तक सुरक्षा काफी कड़ी कर दी गई है। महाराजगंज के एसपी सोमेंद्र मीणा ने कहा, "आने वाले सभी बड़े इवेंट्स को देखते हुए, पूरे बॉर्डर एरिया में अलर्ट जारी कर दिया गया है और सभी बॉर्डर गांवों में लोकल कमेटियों की मीटिंग्स ऑर्गनाइज की गई हैं। एहतियात के तौर पर, सभी फुटपाथों पर चेकपॉइंट्स बनाए गए हैं और एसएसबी के साथ, लोकल पुलिस लगातार बॉर्डर पर कड़ी निगरानी रख रही है।" उन्होंने बताया कि होटल, सराय और सड़क किनारे खाने की जगहों की चेकिंग की जा रही है। सभी जगहों पर चेकपॉइंट्स लगाए गए हैं। सुरक्षा के तौर पर फुटपाथ बनाए गए हैं और अधिकारियों को भी बॉर्डर इलाकों में लगातार एक्टिव रहने का निर्देश दिया गया है।

स्कूलों में आवारा कुत्ता नियंत्रण का नया निर्देश विवादों में, शिक्षकों ने जताई आपत्ति

रायपुर आवारा कुत्तों पर नियंत्रण को लेकर प्रदेश सरकार द्वारा जारी नए निर्देशों का शिक्षकों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद स्कूल परिसरों में कुत्तों की एंट्री रोकने की जिम्मेदारी सीधे प्राचार्यों पर डाल दी गई है, जिसे शिक्षक संघ ने “अतिरिक्त और अव्यावहारिक बोझ” बताते हुए वापस लेने की मांग की है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में कुत्तों के काटने की घटनाओं में वृद्धि पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सभी राज्यों को सुरक्षा उपायों के निर्देश दिए हैं. इसके बाद छत्तीसगढ़ शासन ने आधा दर्जन से अधिक विभागों की जिम्मेदारी तय करते हुए संबंधित पत्र जारी किया है. राज्य शासन ने सभी विभागों को आदेश जारी करते हुए सरकारी व प्राइवेट स्कूल, अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और अन्य भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों की एंट्री रोकने के काम में लगा दिया है. इसके लिए 7 दिन के भीतर ऐसे स्थानों की पहचान कर फेंसिंग, गेट और अन्य सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएंगे, जहां आवारा कुत्ते घुस जाते हैं. हर स्थान के लिए एक नोडल अफसर की नियुक्ति भी की जाएगी. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बड़ा अभियान पहले चरण में स्कूलों के प्राचार्य, अस्पतालों के सीएमओ/अधीक्षक, बस स्टैंड/स्टेशन के मैनेजर अपने परिसर में कुत्तों की एंट्री के रास्तों की पहचान करेंगे और उन्हें रोकने के उपाय करेंगे. जरूरत पड़ने पर अन्य शासकीय विभागों से सहयोग भी लिया जाएगा. नोडल अफसर इस बात की निगरानी करेंगे कि कुत्तों की एंट्री पूरी तरह बंद रहे और वे परिसर के आसपास भी न भटकें. विभागों की जिम्मेदारी तय: पशुधन विकास विभाग     आवारा कुत्तों की नसबंदी     आरक्षित आश्रय स्थलों पर पशु चिकित्सक की नियुक्ति स्वास्थ्य विभाग     सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों में एंटी रैबीज वैक्सीन व इम्यूनोग्लोबुलिन का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध कराना लोक निर्माण विभाग (PWD)     कुत्तों की एंट्री वाले स्थानों की पहचान     फेंसिंग, बाउंड्रीवॉल और गेट का निर्माण शिक्षा विभाग     सभी स्कूलों में छात्रों व कर्मचारियों की सुरक्षा व्यवस्था     कुत्तों के काटने पर तुरंत इलाज उपलब्ध कराना नगर निगम/नगर पालिका/पंचायत     हर तीन महीने में निरीक्षण कर कुत्तों की एंट्री बंद होने की पुष्टि     आवारा कुत्तों को पकड़ने और नसबंदी की व्यवस्था     कुत्तों के लिए बाड़ा, चिकित्सक और देखभाल कर्मचारियों की नियुक्ति     प्रत्येक वार्ड में कुत्तों के लिए भोजन स्थलों की व्यवस्था     लोगों को स्ट्रीट डॉग गोद लेने के लिए प्रेरित करना खेल मैदान प्रबंधन     आवारा कुत्तों की एंट्री रोकने सुरक्षा या ग्राउंड कीपिंग स्टाफ की तैनाती शिक्षकों पर नई जिम्मेदारी, संगठन ने जताया कड़ा विरोध इन निर्देशों में स्कूल प्राचार्यों को परिसर में आवारा कुत्तों की एंट्री रोकने, फेंसिंग की निगरानी, साफ-सफाई से लेकर अप्रिय घटना होने पर जिम्मेदारी संभालने जैसे कार्य सौंपे गए हैं. इस पर शालेय शिक्षक संघ ने कड़ा विरोध जताया है. संघ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र दुबे ने कहा- “शिक्षकों पर पहले से ही शैक्षणिक कार्यों के अलावा कई गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां हैं. अब आवारा कुत्तों को भगाने और सुरक्षा उपायों की जिम्मेदारी देना न सिर्फ अव्यवहारिक है, बल्कि शिक्षकों पर अनावश्यक बोझ डालने जैसा है. किसी अप्रिय घटना की स्थिति में संस्था प्रमुख को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह गलत है.” उन्होंने मांग की कि यह निर्णय तुरंत वापस लिया जाए और आवारा कुत्तों के नियंत्रण की जिम्मेदारी नगर निगम को सौंपी जाए, जो इसका विशेषज्ञ विभाग है.

सिरसा डेरा प्रमुख राम रहीम के खिलाफ गवाही बाधित: कोर्ट का सख्त रुख, अधिकारियों को फटकार

पंचकूला डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम और अन्य आरोपियों से जुड़े मामले में अमेरिका से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही दर्ज होनी थी लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक तैयारी न होने के कारण गवाही नहीं हो सकी। अदालत ने देरी पर नाराजगी जताते हुए सीबीआई को अधिक सक्रिय होने के निर्देश दिए। सीबीआई के डिप्टी एसपी ने अदालत को बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कई बार अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस को पत्र भेजे लेकिन जवाब नहीं मिला। इस कारण गवाही की तारीख आगे नहीं बढ़ाई जा सकी। तकनीकी उपकरण भी काम नहीं आए  सीबीआई अपने साथ गवाही रिकॉर्ड करने के लिए डिवाइस और डॉक्यूमेंट विजुअलाइजर लेकर आई थी लेकिन अदालत के सिस्टम में ये उपकरण काम नहीं कर पाए। तकनीकी विंग के प्रभारी ने बताया कि वेंडर एक सप्ताह में कंपैटिबल डिवाइस उपलब्ध कराएगा। शिकायतकर्ता ने सीबीआई पर लापरवाही का आरोप लगाया  अदालत ने सीबीआई से पूछा कि क्या अमेरिकी विभाग की मदद लिए बिना केवल भारतीय एंबेसी की सहायता से गवाही रिकॉर्ड की जा सकती है। इस संबंध में नियम, मार्गदर्शन और पूरी रिपोर्ट 21 नवंबर तक अदालत को पेश करने के निर्देश दिए गए हैं।   शिकायतकर्ता के वकील नवकिरन सिंह ने कहा कि गवाह अमेरिका से गवाही देने के लिए तैयार हैं और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति भी दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीआई ढिलाई बरत रही है और गवाह को कोई जानकारी नहीं दी गई। अदालत ने कहा कि 2018 में चार्जशीट दाखिल होने के बाद से कुल 92 गवाहों में से केवल 12 गवाही दर्ज हो सकी है। अदालत ने इसे गंभीर देरी बताया और प्रक्रिया को तेज करने के निर्देश दिए।